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मेड इन इंडिया के सामने सस्ते दाम की चुनौती..

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मेड इन इंडिया के सामने सस्ते दाम की चुनौती..

प्रतीकात्‍मक फोटो

आखिर समय रहते हम मेड इन इंडिया की बात को आगे ले आए. दो साल से हम विदेशी लोगों को भारत में आकर देश में माल बनाने की बात कर रहे थे. यह काम करते-करते पता लगा होगा कि देश में पहले से ही बन रहे माल को खपाने में दिक्कत आ रही है. कुछ घंटों पहले ही वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय ने देश के बाहर ब्रांड इंडिया को बढ़ावा देने की बात कही है. इसके लिए वाणिज्य और उद्योग मंत्री ने एक समारोह में ऐलान किया कि विदेशों में भारत के माल का प्रचार करने के तरीके खोजने के लिए एक दिन का सोच.विचार किया जाएगा. उन्होंने दुनिया भर के लोगों से अपनी अपनी राय देने की मंशा जताई है.

पीछे मुड़कर देखने में कोई हर्ज नहीं
मेक इन इंडिया के साथ ही मेड इन इंडिया के प्रचार की नई जरूरत पड़ना कुछ बातों को पलटकर देखने की भी मांग कर रहा है. इससे कुछ काम की बातें निकल कर आ सकती हैं. वैसे  पिछले दो दशकों में ब्रांड इंडिया को लोकप्रिय बनाने का काम कम नहीं हुआ है. नया सोचने में दो चार साल लग जाएंगे सो पुराने तरीकों को लागू करने में हर्ज नहीं होना चाहिए.

नया क्या समझ में आया
नया यह समझ में आया है कि देश में अभी जितना उत्पादन हो रहा है वह मांग के लिहाज से पहले से ही ज्यादा है. अगर इसे मांग न होने का नाम न देना चाहें तो स्थिति यह है कि भारतीय खरीदारों की जेब उन्हें अपनी जरूरत का सामान खरीदने नहीं दे रही है. इसीलिए आर्थिक विकास पर जोर लगाने की बाते की जाती थीं. खैर इस काम को करने में लंबा वक्त लगता है. और फिर गरीबों की जेब में पैसा पहुंचाए बगैर यह नहीं हो सकता. अपनी जरूरत या चाहत या इच्छाओं  को पूरा करने के लिए जिनके पास पैसा है उनकी संख्या बहुत थोड़ी सी है. गरीबों और बेरोजगारों की संख्या पहाड़ जैसी हो चली है. जाहिर है नई बात यह समझ में आई है कि विदेशों में अपना माल बेचने के अलावा कोई चारा नहीं. वैसे ये बात भी कोई बिल्कुल नई नहीं है. अभी साल भर पहले ही महीने पहले ही विशेषज्ञ स्तंभ के रूप में इसी ब्‍लॉग में इस मुददे पर विचार किया गया था.


तरीका क्या हो
पारंपरिक तरीके अपनाए जा चुके हैं. पारंपरिक तरीके सामान्य परिस्थितियों के लिए होते हैं. नई परिस्थितियां वैश्विक मंदी की हैं. सभी देशों की तरह हमारे सामने भी चुनौती हमारी गिरती माली हालत की हैं. ऐसे में नई प्रबंधन प्रौद्योगिकी को लगाए बगैर हम ढंग से सोच नहीं पाएंगे. इस बारे में प्रबंधन प्रौद्योगिकी के युवा प्रशिक्षु एक किताबी बात सुझाते हैं. इसका नाम है एसटीपी. एस यानी सैगमेंटेशन, टी मानें टारगेटिंग यानी लक्ष्य, और तीसरा पोजीशनिंग या लक्ष्य के लिए मोर्चा संभालना. विदेशों में ब्रांड इंडिया के आक्रामक प्रचार.प्रसार के लिए प्रबंधन प्रौद्योगिकी के इस मॉड्यूल के तीनों हिस्सों पर थोड़ी थोड़ी सी बात करेंगे.

सैगमेंटिंग : विश्वस्तरीय प्रबंधन प्रौद्योगिकी के युवा प्रशिक्षुओं के मुताबिक अपने देश को तुरंत ही ढंग से एक सर्वेक्षण के काम पर लगना पड़ेगा. विश्व के उन देशों को चिन्हित करना पड़ेगा जिनमें माल की खपत का पोटेंशियल यानी विभव है. यह काम चीन ने सबसे पहले किया था. उसने सैगमेंटिंग के जरिए ही जाना था कि अपना माल खपाने के लिए किन देशों में अच्छा यानी पोटेंशियल सैगमेंट है. उसके बाद उसने भारत में अपना टारगैट एरिया यानी लक्षित  क्षेत्र तय किया था. यह सैगमेंट निम्न मध्य वर्ग निकल कर आया था जिसे सस्ते सामान की दरकार थी.

टारगेटिंग : सस्‍ता सामान खरीदने वाले करोड़ो लोगों की संख्या पता लगते ही चीन ने भारत में बारीकी से उन क्षेत्रों का पता भी कर लिया था जहां ज्यादा से ज्यादा सामान बिक सकता था. यह क्षेत्र सामाजिक और धार्मिक क्षेत्र के रूप में चिन्हित हुआ. इस तरह से भारत में ब्‍लॉक स्तर पर बड़े गांवों तक को माल बेचने का लक्ष्य बनाया गया. आज  चीन की मार्केटिंग का सनसनीखेज रूप हमारे सामने है. गौर करने की बात यह है कि हम अपने ही देश में इस टारगैट को नहीं देख पाए थे. खैर देखते ही देखते बात बहुत दूर निकल गई है. हमारे पास कुछ बचा है तो जानने के तौर पर यह प्रबंधन प्रौद्योगिकी ही बची है जिसे हम दूसरे देशों में अपना सामान बेचने में लगा सकते हैं.

पोजीशनिंग : यह एसटीपी मॉडल का आखिरी चरण है. फिर भी किसी न किसी स्तर पर अपने देश के पास इसका अनुभव होगा जरूर. आखिर पहले से ही हम कई देशों को निर्यात तो करते ही हैं. अगर कुछ नया देखना होगा तो वह ये होगा कि पोजीशनिंग करते समय इस बात का ख्याल जरूर रखें कि यह वैश्विक मंदी का समय है. आर्थिक विकास को लेकर छोटे-बड़े देश ठहराव की हालत में आ गए हैं. सो हमें वैश्वीकरण के दौर में इतना आगे निकल आने के बाद यह तो देखना ही पड़ेगा कि माल के दाम के मामले में प्रतिस्पर्धा हमें करनी ही पड़ेगी.

देश के भीतर भी काम आ सकता है मेड इन इंडिया
प्रबंधन प्रौद्योगिकी के मेधावी युवाओं से बातचीत में यह सबसे काम की और दिलचस्प बात निकली. जब तय हुआ कि हमें सस्ते माल के उत्पादन के तरीके खोजने ही पड़ेंगे तो यह भी बात निकली कि तब विदेश में ब्रांड इंडिया की मुहिम चलाने की उतनी जरूरत ही कहां पड़ेगी. हमारा अपना देश ही इतना बड़ा बाजार है कि कई बड़े देश हमारे इस बाजार से पल रहे हैं. हमें दिक्कत यह आ रही है कि चीन या दूसरे देशों के माल के सस्ते होने के कारण हमारा बनाया उत्पाद घर की दुकानों में बिना बिके रखा रह जा रहा है. खैर अगर सस्ते माल बनाने की मुहिम चला ली तो विदेशों में भी अपना बाजार तलाशने में हमें दिक्कत नहीं आएगी. तब दिन दूनी, रात चौगनी रफ्तार से आगे बढ़ने के बहुत सारे  रास्ते अपने आप नजर आने लगेंगे.

सुधीर जैन वरिष्ठ पत्रकार और अपराधशास्‍त्री हैं...

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