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शिक्षक दिवस के बहाने शिक्षा प्रणाली पर एक नज़र

शिक्षक दिवस आमतौर पर शिक्षक प्रशस्ति का राष्ट्रीय पर्व है.लेकिन इसी दिन हम उसके पेशे यानी शिक्षाकर्म और शिक्षा प्रणाली पर बात करने का भी मौका देखते हैं. खासतौर पर तब तो और जब शिक्षक दिवस के अलावा शिक्षा पर बात करने का कोई और दिन या दिवस अभी बन न पाया हो.

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शिक्षक दिवस के बहाने शिक्षा प्रणाली पर एक नज़र

प्रतीकात्‍मक फोटो

शिक्षक दिवस आमतौर पर शिक्षक प्रशस्ति का राष्ट्रीय पर्व है.लेकिन इसी दिन हम उसके पेशे यानी शिक्षाकर्म और शिक्षा प्रणाली पर बात करने का भी मौका देखते हैं. खासतौर पर तब तो और जब शिक्षक दिवस के अलावा शिक्षा पर बात करने का कोई और दिन या दिवस अभी बन न पाया हो. कुछ साल पहले तक गाहे-बगाहे अपनी शिक्षा प्रणाली पर चिंता चिंतन हो जाया करते थे. वे भी आजकल ज्यादा सुनाई  नहीं दे रहे हैं. खैर शिक्षा के बदले रूप और उसमें शिक्षक की बदली जगह पर गौर क्यों नहीं होना चाहिए.

शिक्षण की बजाए प्रशिक्षण का नया दौर
शिक्षण और प्रशिक्षण का भेद समझते हुए ही मैकाले की शिक्षा प्रणाली पर हम दशकों तक विलाप करते रहे. कहते थे अंग्रेजों को बाबू लोगों की जरूरत थी सो वह शिक्षा नहीं बल्कि अंग्रेजों की जरूरत के हिसाब का प्रशिक्षण था. तब हम शिक्षा के आदर्श रूप् की बात किया करते थे. छात्र को नैतिक बनाने की चिंता करते थे. लेकिन पिछली सदी के नौवें दशक में जो नई शिक्षा नीति आई वह रोजगार परक शिक्षा पर जोर देने के लिए आई थी. यह बहुत ही दिलचस्प बात है कि उस नीति का मसौदा बनाने के पहले एक करोड़ से भी ज्या़दा नागरिकों की भागीदारी कराई गई था. यानी रोजगार परक शिक्षा नीति जनआकांक्षा का रूप थी सो उसकी आलोचना और समीक्षा की गुंजाइश खत्म हो गई थी. ठीक भी था क्योंकि माना जाता था कि सामूहिक निर्णय ग़लत नहीं होता. और आपदधर्भ का तर्क भी था. खैर वह नीति लागू हुई. और देखते ही देखते देश में व्यावसायिक शिक्षा का बोलबाला हो गया. आज अगर उसकी समीक्षा करें तो क्या वह नीति देश में अपनी व्यवस्थाओं को चलाने के लिए मानव संसाधन का विकास करने के लिए ही नहीं थी. तो फिर मैकाले और हममें अंतर क्या पड़ा.

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प्रशिक्षक रूपी शिक्षक की दुविधा
जो भी निष्ठावान शिक्षक समाज है वह अपने को दुविधा में पाता है. उसे जब खुद ही लगने लगता है कि उसका किया शिक्षाकर्म न तो समाज के काम आ रहा है और और न ही उसके छात्र को रोजगार या आजीविका का साधन दे पा रहा है वैसी स्थिति में अपनी शिक्षा प्रणाली और उसकी धुरी शिक्षक की दुविधा पर विमर्श क्यों नहीं होना चहिए. ज्यादा नहीं तो कम से कम यह तो सोचना शुरू कर ही देना चाहिए कि मैकाले को लानत देते देते क्यों हमें अपनी शिक्षा प्रणाली रोजगार परक बनानी पड़ी? और कब शिक्षकों की भर्ती को राजनीतिक औजार बना लिया? ये तो बहुत ही मोटी सी बात है कि खुद शिक्षकों के प्रशिक्षण की बुरी हालत है.  गुणवत्ता तो बहुत दूर की बात है शिक्षकों के प्रशिक्षण की मात्रा ही हमें अपना मज़ाक उड़वाने का मौका दे रही है.

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शिक्षण के अलावा और क्या-क्या नहीं कर रहे सरकारी शिक्षक
अभी भी देश में सरकारी शिक्षकों की संख्या सबसे ज्यादा है. इसके लिए कोई सर्वेक्षण या शोध की जरूरत नहीं कि देश के छह लाख से ज्यादा गांव में शिक्षा के आधारभूत ढांचे के रखरखाव की जिम्मेदारी भी शिक्षकों की ही है. पांच कक्षाओं वाले प्राइमरी स्कूल में ज्य़ादातर जगह दो तीन शिक्षकों से काम चलाया जा रहा है. दोदो तीनतीन कक्षाओं को एक साथ बैठाकर पढ़ाकर हाजिरी पूरी हो रही है. अभी ऐसा कोई शोध या सर्वेक्षण उपलब्ध है नहीं कि देश के सरकारी शिक्षक पढ़ाने के अलावा सरकार के और क्या क्या काम कर रहे हैं. जनगणना, मतदाता सूची और यहां तक कि विभिन्न मंत्रालय के लिए किए जाने वाले सर्वेक्षणों के लिए साक्षात्कार प्रश्नावली भरवाने के काम के लिए सरकारों के पास ये शिक्षक ही उपलब्ध हैं.  गई. गैरसरकारी जमात के शिक्षकों में शिक्षाकर्म के साथ साथ दूसरे कामधंधे चलाने की चाह भी इसी दौर में बढ़ी है. उनकी तनखाह इतनी कम है कि टयूशन के बग़ैर उनका गुजा़रा नहीं हो पाता.

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शिक्षा के निजीकरण का पहलू
इसमें कोई शक नहीं कि देश को प्रतिभावान बनाने में निजी शिक्षण संस्थाओं ने क्रांति सी कर दी. जिनके पास अपने बच्चों को वक्त के लिहाज़ से शिक्षा दिलाने के लिए चार से आठ गुना ज्यादा खर्च करने की कूबत है उनके लिए निजी स्कूल कालेजों की सेवा लेने का पूरा मौका है. अब तो स्थिति यह है कि शिक्षा क्षेत्र के व्यापारीकरण के इस दौर में ऐसी होड़ मची है कि देश के कोने कोने में इंजीनियरिंग, मेडीकल और साइंस कालेज खुल गए हैं. और इतने सारे खुल गए हैं कि उतनी फीस देकर दाखिला लेने वालों का टोटा पड़ गया है. जब तक उच्च शिक्षा को नौकरी पाने की योग्यता का प्रचार किया जा सका तब तक हमने निजी सस्थाओं से मुनाफा तो कमा लिया  लेकिन अब जब पता चल रहा है कि उतने युवकों को नौकरी देने का इंतजाम तो है नहीं सो इन कॉलेजों का संकट नई समस्या पैदा कर रहा है. वैसे भी देश की वास्तविक ज़रूरत के लिहाज़ से मानव संसाधन के ये उत्पादन केंद्र अपनी सार्थकता साबित नहीं कर पा रहे हैं.

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कम से कम इतना तो कर ही सकती है सरकार
शिक्षा, शिक्षक और शिक्षा प्रणाली के सामने आ खड़ी चुनौतियों को जानने समझने के लिए पर्याप्त और विश्वसनीय शोध अध्ययन उपलब्ध नहीं है. विश्वसनीय शोध के लिए वस्तुनिष्ठ तथ्यों की जरूरत पड़ती है. तथ्य मुहैया कराने का काम सरकार का है. लेकिन उसकी दिलचस्पी जानने में कम और नारे बनाने में ज्यादा लगती है. वैसे और कुछ हो पाए या न हो पाए सरकार शिक्षा की स्थिति पर श्वेतपत्र ला सकती है. वह भी न कर पाए तो कम से कम स्टेटस रिपोर्ट तो बना ही सकती है.

सुधीर जैन वरिष्ठ पत्रकार और अपराधशास्‍त्री हैं...

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति NDTV उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार NDTV के नहीं हैं, तथा NDTV उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.


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