सुशांत सिन्हा की कलम से : 'कौन जीतेगा' सोचने की जगह सोचिए, 'किसे जीतना चाहिए'

सुशांत सिन्हा की कलम से : 'कौन जीतेगा' सोचने की जगह सोचिए, 'किसे जीतना चाहिए'

नई दिल्ली : फिल्म नगरी भले मुंबई हो, लेकिन अगर आपको किसी फिल्म की पटकथा-सी राजनीति देखनी हो तो दिल्ली चुनाव पर नज़रें गड़ाए रखिए। बीते दो चुनाव कमोबेश किसी मसालेदार फिल्म से कम नहीं रहे हैं। पिछली दफा अगर 'द राइज़ ऑफ केजरीवाल' हिट होकर भी ज्यादा दिन चल नहीं पाई तो इस बार 'द मफलरमैन रिटर्न्स' या 'इनक्रेडिबल मोदी', इन दोनों में से किसी एक के ही हिट होने की गुंजाइश है।

लेकिन आप अंदाज़ा लगा लीजिए कि मुकाबला कितना कड़ा है कि चुनाव से चंद दिन पहले भी जिससे भी मिलिए, वह एक ही सवाल पूछता है 'आपको क्या लगता है, कौन जीतेगा'। सबके मन में एक जवाब होता है, लेकिन टटोलने की कोशिश होती है सामने वाले को कि आखिर चल क्या रहा है। पत्रकार होने के नाते लोग हमें दो कैटेगरी में रखते हैं, कुछ मानते हैं कि हम खुफिया एजेंट हैं, जिन्हें सब पता है कि अंदरखाने क्या चल रहा है और कुछ हमें ज्योतिषी से कम नहीं समझते और मानते हैं कि हम भविष्य देखने की अपनी छिपी ताकत से उन्हें बता सकेंगे कि क्या होने जा रहा है।

खैर, एक तरह से ठीक भी है, हमारा मिलना ज्यादा लोगों से होता है और थोड़ी-बहुत भनक तो लग जाती है कि लोग क्या सोच रहे हैं, लेकिन यकीन मानिए, दिल्ली चुनाव में पत्रकारों का भी स्टेथस्कोप यह नहीं पकड़ पा रहा है कि जनता की धड़कनें किसके लिए धड़क रही हैं। हालांकि चुनाव के पहले के कुछ सर्वे ज़रूर कह रहे हैं कि 'द मफलरमैन रिटर्न्स' के हिट जाने और 'इनक्रेडिबल मोदी' के पिट जाने की संभावना है, लेकिन हम यह भी जानते हैं कि फिल्मी पंडितों की स्टार रेटिंग और चुनावी पंडितों की वोट रेटिंग पर सब कुछ निर्भर नहीं करता। निर्भर करता है वोटर पर, जो कई बार चुनावी सर्वे को गलत भी साबित करती रहा है।

इस बार क्या होगा, वक्त तय कर देगा, लेकिन इतना तो तय है कि दिल्ली में जिस तरह का लास्ट-मिनट सस्पेंस बना हुआ है, वह लोकतंत्र के लिहाज़ से बेहद उम्दा है। जब मुकाबला इतना कड़ा हो कि आखिरी वक्त तक विजेता तय न हो पा रहा हो तो पार्टियों की जीत-हार से परे यह लोकतंत्र की जीत सुनिश्चित करता है। आम आदमी पार्टी की तारीफ इस लिहाज़ से ज़रूर होनी चाहिए कि उसने बेहद कम वक्त में जनता के सामने खुद को ऐसे विकल्प के तौर पर रख दिया है कि अनुभवी और पुरानी पार्टियों के पसीने छूट रहे हैं, और लोकतंत्र में वोटर के पास एक से ज्यादा बेहतर विकल्प हों, इससे बेहतर कुछ नहीं हो सकता।

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हालांकि आम आदमी पार्टी के लिए यह चुनावी जीत ज्यादा अहमियत रखती है और उसकी वजह यह है कि उनका अस्तित्व इस वक्त सबसे मज़बूती के साथ सिर्फ और सिर्फ दिल्ली में ही मौजूद है और अगर उन्हें खुद को राष्ट्रीय पार्टी के तौर पर स्थापित करना है तो काम करके दिखाना होगा और उसके लिए उससे दिल्ली की सत्ता चाहिए होगी। इस चुनाव में हार का मतलब होगा कि आम आदमी पार्टी को विपक्ष में बैठना होगा और उसके राष्ट्रीय स्तर पर आगे बढ़ने की रफ्तार को बड़ा झटका लगेगा।

हालांकि, बीजेपी के लिए भी दिल्ली की जीत कई मायनों में अहम है, क्योंकि अगर पार्टी दिल्ली में हारी तो आने वाले बिहार और यूपी विधानसभा चुनावों में विपक्षियों का मनोबल इस बात से बहुत मज़बूत होगा कि मोदी लहर को रोका जा सकता है। शायद इस बात को समझते हुए ही बीजेपी ने दिल्ली चुनाव में 120 सांसदों के साथ-साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैलियों के जरिये अपनी पूरी ताकत झोंक रखी है। पर मज़ा तो इस बात का है कि इसके बावजूद किसी को साफ-साफ नहीं पता कि दिल्ली कौन फतह करने जा रहा है, और इसलिए अब वोटर के लिए वक्त है कि वह 'आपको क्या लगता है, कौन जीतेगा' पूछने कि बजाए खुद से पूछे कि 'मुझे क्या लगता है, किसे जीतना चाहिए'... फैसले की घड़ी आ चुकी है।