सुशांत सिन्हा की कलम से : डॉ. कलाम को ये कैसी श्रद्धांजलि?

सुशांत सिन्हा की कलम से : डॉ. कलाम को ये कैसी श्रद्धांजलि?

नई दिल्ली:

रामेश्वरम में जिस वक्त डॉक्टर अब्दुल कलाम को सुपुर्द-ए-ख़ाक करने के पहले प्रधानमंत्री मोदी, राहुल गांधी और दूसरे नेता उन्हें श्रद्धांजली दे रहे थे, कमोबेश उसी वक्त यहां दिल्ली में राज्यसभा की कार्यवाही एक बार फिर पूरे दिन के लिए स्थगित की जा रही थी। वहां नम आंखों से ख़ामोशी के साथ कलाम साहब को आख़िरी विदाई दी जा रही थी, यहां हंगामे के शोर के सिवा कुछ नहीं था सदन में।

आप सवाल कर सकते हैं कि आख़िर इन दोनों बातों का क्या ताल्लुक है? सीधे-सीधे तो इन दोनों तस्वीरों में शायद कोई ताल्लुक नज़र ना आए, लेकिन सच पूछिए तो बहुत बड़ा रिश्ता है। दरअसल, सदन की स्थगित हो रही कार्यवाही, उस श्रद्धांजली को अधूरा बना रही थी जो देश भर के नेता डॉक्टर कलाम को उनके इंतकाल के बाद से दे रहे हैं।

सवाल इस बात को लेकर उठते हैं कि जो डॉक्टर कलाम इस बात को लेकर चिंतित थे कि बार बार सदन की कार्यवाही स्थगित हो जाती है, सदन में काम नहीं हो पा रहा, उन्हीं कलाम साहब की आख़िरी विदाई के दिन भी सदन की कार्यवाही हंगामे की भेंट चढ़ गई और एक बार फिर कोई काम नहीं हो सका। अब यह एक विडंबना ही तो है कि नेता डॉ. कलाम को श्रद्धा सुमन तो चढ़ा आए, लेकिन एक दिन के लिए भी वो नहीं कर पाए, जो डॉ. कलाम चाहते थे यानि बिना हंगामे के, सदन में काम।

देश की तस्वीर बदलने के लिए जीवन भर काम करने वाले डॉ.कलाम अपने आख़िरी वक्त में संसद की तस्वीर बदलते देखना चाहते थे। उनके सहयोगी सृजन पाल सिंह ने डॉ. कलाम की ज़िन्दगी के आख़िरी कुछ घंटों के बारे में जो जानकारी दी है उसमें यह बात भी शामिल है कि शिलॉन्ग जाते वक्त विमान में डॉक्टर कलाम इस बात पर चर्चा करते हुए चिंतित थे कि इस देश में संसद चल नहीं पाती। काम अक्सर हंगामे की भेंट चढ़ जाता है। उनकी चिन्ता इस कदर बड़ी थी कि वो IIM के छात्रों से भी ये सवाल पूछना चाहते थे कि संसद को सुचारू तौर पर चलाने के लिए क्या किया जा सकता है, लेकिन ये सवाल पूछने से पहले ही वह इस बात से दुखी भी थे कि ख़ुद उनके पास भी इस सवाल का जवाब नहीं था।

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21 जुलाई से शुरू हुआ मॉनसून सत्र अब तक हंगामे की ही भेंट चढ़ा है। एक दिन भी काम नहीं हो सका। सरकार कहती है कि वह हर मुद्दे पर बहस के लिए तैयार है और विपक्ष इस्तीफ़ों के बिना किसी चर्चा के लिए तैयार नहीं और ऐसे में सदन में हर रोज़ वही होता है, जो डॉ. कलाम नहीं चाहते थे। सदन में हर रोज़ वही होता है जो डॉ. कलाम की पेशानी पर परेशानी की लकीरें खींच देता था। और सदन में हर रोज़ वही हो रहा है जिसके लिए डॉ. कलाम का मन बेचैन था।

ऐसे में देश के सांसदों को समझना होगा कि अगर डॉ. अब्दुल कलाम को अगर सच्ची श्रद्धांजलि देनी है तो सिर्फ़ फूल चढ़ाने और कुछ देर के मौन से आगे बढ़ते हुए सदन की कार्यवाही को सुचारू रूप से चलाना होगा। डॉ. कलाम सारी ज़िन्दगी बिना किसी दिखावे के कर्म में विश्वास करते रहे, इसलिए उन्हें दी जाने वाली श्रद्धांजली में भी दिखावा कम और कर्म की भूमिका ज्यादा हो तो शायद वो उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी। सदन की कार्यवाही अगर सुचारू तौर पर चल पाए तो शायद सांसदों की तरफ़ से ये उन्हें सबसे बड़ी श्रद्धांजली होगी।