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सुषमा स्वराज, नरेश अग्रवाल और शील का सवाल

प्रधानमंत्री के ऊपर उसके नेताओं ने बुरी तरह छींटाकशी की है.  लेकिन बीजेपी ने सोनिया गांधी और राहुल गांधी को कब छो़ड़ा है?

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सुषमा स्वराज, नरेश अग्रवाल और शील का सवाल

फाइल फोटो

नई दिल्ली: सुषमा स्वराज को नरेश अग्रवाल की टिप्पणी स्वीकार्य नहीं है, होनी भी नहीं चाहिए। वह एक अशालीन टिप्पणी थी जिस पर किसी भी संवेदनशील आदमी को एतराज़ होना चाहिए. लेकिन जब रेणुका चौधरी पर प्रधानमंत्री की टिप्पणी के बाद लोकसभा के बीजेपी सांसद समवेत हंस रहे थे, तो क्या वह एक शालीन दृश्य था? जब देश के गृह राज्य मंत्री किरेन रिजीजू ने शूर्पनखा की हंसी लगाते हुए ट्वीट कर रेणुका चौधरी पर कटाक्ष किया था, तब क्या वह एक भद्र कृत्य था? सुषमा स्वराज से यह उम्मीद करना अन्याय होगा कि वे अपने प्रधानमंत्री या केंद्रीय मंत्री के विरुद्ध उसी साहस से बोलेंगी, जिस साहस से उन्होंने नरेश अग्रवाल के बयान पर टिप्पणी की है. किसी भी राजनीतिक दल या सार्वजनिक संस्थान में अपने सहयोगियों या वरिष्ठों के बारे में बोलने का रिवाज नहीं है.  

हमारा संसदीय लोकतंत्र चाहे जितना भी अपरिहार्य और मज़बूत लगे, हमारा सांस्थानिक लोकतंत्र अभी इतना उदार और परिपक्व नहीं हुआ है कि वहां वरिष्ठ अपने कनिष्ठों की आलोचना बर्दाश्त करें. लेकिन सुषमा स्वराज जैसी नेता से यह उम्मीद तो की ही जा सकती है कि लगातार अभद्र, छिछली और कई मायनों में स्त्री-विरोधी होती जा रही राजनीति में शील की स्थापना के लिए वे लगातार प्रयत्नशील होंगी.

और क्या यह शील सिर्फ भाषा के सवाल तक ही सीमित है? कहीं स्त्री की अवमानना उस राजनीतिक संस्कृति में भी तो निहित नहीं है जिससे हमारा लोकतंत्र गुज़र रहा है? मसलन, नरेश अग्रवाल के बयान को फिर से देखें. उन्हें दुख हुआ कि उनकी जगह समाजवादी पार्टी ने फिल्मों में अभिनय करने वाली, नाचने वाली एक अभिनेत्री को टिकट दे दिया.  दिलचस्प यह है कि जिस समाजवादी पार्टी में नरेश अग्रवाल कल तक थे, वहां सितारों के ऐसे राज्याभिषेक की परंपरा पुरानी है. तब नरेश अग्रवाल को कभी यह एहसास नहीं हुआ कि ये नाचने-गाने वाली अभिनेत्रियां समाजवादी विरासत का हिस्सा नहीं होनी चाहिए. लेकिन क्या यह सच नहीं है कि भारतीय राजनीति की अवमानना इस बात में भी है कि वहां बाहर से लाकर सितारे भरे जाते हैं और उनके सहारे चुनाव जीते जाते हैं?
 
बल्कि इस मामले में बीजेपी का ट्रैक रिकार्ड कहीं ज़्यादा बुरा है. सुषमा स्वराज की असली तकलीफ़ यही है. अब भी बीजेपी में हेमा मालिनी और स्मृति ईरानी सरीखी नेता हैं जिनकी प्राथमिक शोहरत अपने अभिनय की वजह से रही.  हेमा मालिनी अब भी टीवी पर विज्ञापन करती देखी जाती हैं.  सच तो यह है कि बीजेपी के भीतर यह सिलसिला बहुत पुराना है. रामायण सीरियल के बाद उन्होंने राम, सीता, रावण- सबको टिकट दे डाले.  वे अरुण गोविल और दीपिका अब राजनीति में कहां हैं, किसी को नहीं मालूम.  बीकानेर से सांसद रहे धर्मेंद्र को खोजने के लिए वहां के लोगों ने पोस्टर लगए.  विनोद खन्ना, शत्रुघ्न सिन्हा और किरण खेर जैसे कई स्टार रहे जिन्हें बीजेपी ने जगह दी और ओहदा दिया.

जब ऐसे लोग राजनीति में आते हैं तो वे राजनीति का बहुत भला नहीं करते. नरेश अग्रवाल कितना भला करते हैं, यह नहीं मालूम, लेकिन वे कम से कम ठेठ राजनीति के आदमी है. उन्हें अपने कहे हुए की क़ीमत दूसरों से ज़्यादा अदा करनी पड़ती है. बेशक, नरेश अग्रवाल की आपत्ति एक अशालीन भाषा में है.  लेकिन योगी आदित्यनाथ ने जब मायावती और अखिलेश को लेकर सांप-छुछुंदर के मुहावरे का इस्तेमाल किया तो वह कितना शालीन था? क्या बीजेपी की राजनीतिक संस्कृति में वह स्वीकार्य है? कहने की ज़रूरत नहीं कि अक्सर शालीन भाषा की बात करने वाली कांग्रेस का दामन भी इस मामले में साफ़ नहीं है.  

प्रधानमंत्री के ऊपर उसके नेताओं ने बुरी तरह छींटाकशी की है.  लेकिन बीजेपी ने सोनिया गांधी और राहुल गांधी को कब छो़ड़ा है? भारतीय संविधान के मुताबिक लोकसभा चुनाव जीतने के बाद और सभी दलों की स्वीकृति हासिल करने के बाद 2004 में जब सोनिया गांधी का प्रधानमंत्री बनना तय माना जा रहा था तब सुषमा स्वराज और उमा भारती जैसी नेत्रियां इसके विरोध में सिर मुंडाने की घोषणा कर किस राजनीतिक शील का परिचय दे रही थीं?  यह अलग बात है कि सोनिया ने ख़ुद प्रधानमंत्री पद छोड़ते हुए सुषमा स्वराज के केशों की रक्षा कर ली. 

समझने की ज़रूरत है कि राजनीति का शील सिर्फ़ शब्दों का शील नहीं होता- वह मुद्दों और आचरण का भी शील होता है. इस लिहाज से हिंदुस्तान की सभी पार्टियां सवालों से घिरी हो सकती हैं. लेकिन सबसे ज़्यादा सवाल बीजेपी और उनके नेताओं पर हैं.  क्या सुषमा स्वराज इसके बारे में भी सोचेंगी? 

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प्रियदर्शन NDTV इंडिया में सीनियर एडिटर हैं...

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