'हम लाशों के ढेर पर चुनाव क्यों नहीं चाहते...'

विगत कुछ महीनों से वर्तमान 15-वर्षीय शासन की उदासीनता और अकर्मण्यता के कारण बिहार में कोरोना महामारी विकराल रूप लेती जा रही है और स्थिति और भी विस्फोटक होने की ओर अग्रसर है, लेकिन नीतीश जी इसकी परवाह न करते हुए अपने CM पद का नवीनीकरण करने की जुगत में लगे हुए हैं.

'हम लाशों के ढेर पर चुनाव क्यों नहीं चाहते...'

विगत कुछ महीनों से वर्तमान 15-वर्षीय शासन की उदासीनता और अकर्मण्यता के कारण बिहार में कोरोना महामारी विकराल रूप लेती जा रही है और स्थिति और भी विस्फोटक होने की ओर अग्रसर है, लेकिन नीतीश जी इसकी परवाह न करते हुए अपने CM पद का नवीनीकरण करने की जुगत में लगे हुए हैं. उन्हें बिहारवासियों के स्वास्थ्य की बिल्कुल चिंता नहीं है, अगर चिंता है, तो वह है मुख्यमंत्री की कुर्सी की, जो येन-केन-प्रकारेण बनी रहे. आज संक्रमण जितनी तेज़ी से बढ़ रहा है, उससे स्वास्थ्य विशेषज्ञ अनुमान लगा रहे हैं कि बिहार में आगामी 2-3 महीनों में लाखों लोगों को संक्रमित होने का ख़तरा है. अगर प्रतीक में कहें तो बिहार आने वाले ज्वालमुखी के अंदेशे से परेशानी में है. मुख्यमंत्री जी जितनी कर्मठता से चुनावी गोटी फिट करने में लगे हुए हैं, अगर उसका दसवां हिस्सा भी बिहार के लोगों को सुरक्षित करने में लगाया होता, तो स्थिति इतनी गंभीर नहीं होती.

सुशासन की प्रसार सामग्री का वितरण करते-करते स्वयं मुख्यमंत्री जी अपने छद्म विकास को अंतिम सच मान बैठे, जिसकी परतों को कोरोना महामारी के दौरान के दृश्यों और तथ्यों ने उजागर कर रख दिया है. पिछले 15 वर्षों में चरमराई स्वास्थ्य व्यवस्था ने खुद अपना सच बताना शुरू कर दिया है. नीति आयोग, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM), यूनिसेफ (UNICEF) इत्यादि संस्थानों के मूल्यांकन में बिहार लगातार फिसड्डी और अंतिम पायदान पर रहा है. यहां तक कि कोर्ट ने बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था पर बिहार सरकार को कई बार फटकार लगाई है. कोरोना से लड़ने के लिए बिहार सरकार ने कोई प्रबंधन नहीं किया, बल्कि लगभग तीन महीने से ज़्यादा की लॉकडाउन अवधि में सरकार ने अपने को गहरी नींद में भेज दिया. चाहे छात्रों व प्रवासी मज़दूरों का मसला हो या बदहाल स्वास्थ्य अधिसंरचना का मुद्दा, सरकार ने पहलकदमी लेने और त्वरित कारवाई और उपाय करने की बजाय सब कुछ भगवान भरोसे छोड़ दिया. बीते वर्षों में किसी भी आपदा के दौरान नीतीश सरकार का यह डिफॉल्ट टेम्पलेट रहा है. विपदा या कोई भी गंभीर संकट आने पर मुख्यमंत्री मीडिया से दूरी बना चुप्पी साध लेते हैं.

आम लोगों में इस महामारी की चिंताओं के बावजूद कोई नए अस्पताल नहीं बने. उपलब्ध अस्पतालों का क्षमता वर्धन नहीं किया गया. चार महीने बाद भी बिहार में डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी PPE किट जैसी मूलभूत ज़रूरत पूर्ति के लिए विरोध प्रकट कर रहे है. आबादी और संक्रमण की बढ़ती संख्या के आलोक में अगर वेंटीलेटर आदि की बात करें, तो चिंता और भयावह हो जाती है. पूरा देश इस बात को समझ पाने में असमर्थ है कि सबसे अधिक जनसंख्या घनत्व वाले बिहार में पूरे देश में न्यूनतम जांच क्यों हो रही है...? आज भी अधिकांश अस्पतालों में PPE किट, मास्क जैसी मौलिक चीज़ें नहीं मिल रही हैं. हमने मार्च के महीने से ही सरकार से विनती की और सकारात्मक सुझावों से आगाह करते रहे कि जन स्वास्थ्य को प्राथमिकता दें, राजनीति किसी और दिन कर लेंगे, लेकिन इस सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी. इसके उलट, हमारे सुझावों और सलाह पर नकारात्मक टिप्पणी की गई. हम सबने अपनी आंखों से लाखों लोगों को सड़कों पर पैदल चलते देखा, उनके प्रति मुख्यमंत्री जी की उदासीनता देखी. बीमार को अपने स्वजनों के कंधों पर इलाज के लिए जाते देखा और यह भी देखा कि प्रदेश के मुख्यमंत्री 100 दिन तक अपने आलीशान बंगले में निश्चिंत सोते रहे.

आज भी कोरोना से लड़ने की तैयारी के बजाय चुनावी तैयारी में लगे हुए हैं और एक बार फिर जनादेश का चीरहरण करने का प्रपंच रच रहे हैं. ऐसे प्रावधान किए जा रहे हैं कि मतदान की गोपनीयता और निष्पक्षता रहेगी ही नहीं. विडम्बना देखिए कि 65 वर्ष के लोग चुनाव लड़ेंगे, वोट मांगने के लिए घूमेंगे, लेकिन 65 वर्ष से अधिक उम्र के मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री और उनकी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अपना वोट घर पर ही डालेंगे. सत्ता में बैठे हुक्मरान को इस बात का आभास है कि उनकी निष्क्रियता और विफलता को लेकर जनता में भारी आक्रोश है, इसलिए चुनाव होगा, लेकिन राजनीतिक पार्टियां जनसंपर्क नहीं करेंगी. सिर्फ वर्चुअल रैली और अन्य डिजिटल माध्यमों द्वारा प्रचार-प्रसार करने की अनुमति रहेगी, जिसमें BJP और JDU पार्टी झूठ और दुष्प्रचार फैलाने में पारंगत है. स्वस्थ लोकतंत्र के लिए निर्बाध भागीदारी और समान अवसर महत्वपूर्ण अवश्य हैं और इस प्रकार के प्रावधान से चुनाव तो हो जाएंगे, लेकिन लोकतंत्र चोटिल होगा.

हम सब जानते हैं कि चाहे रोज़गार का सवाल हो या शिक्षा, स्वास्थ्य और कानून व्यवस्था का या प्रवासी मज़दूर भाइयों के अपमान का सवाल हो, साफ दिख रहा है कि नीतीश सरकार के खिलाफ असंतोष और बदलाव बिहार के हर हिस्से में है. हमें यह भी पता है कि सत्ताधारी दल के खिलाफ 15 वर्षों का इस प्रकार का आक्रोश और असंतोष का विपक्ष और खासकर हम जैसे मजबूत विपक्ष के लिए वांछित माहौल है. बावजूद इस प्रकार की अनुकूल परिस्थिति के हमारी पार्टी सरकार और चुनाव आयोग से लगातार गुहार कर रही है कि कृपया प्राथमिकताओं को समझिए. अभी बिहार के हमारे भाइयो-बहनों को हमारे बच्चों को इस महामारी से बचा लीजिए, उनकी सेहत का इंतज़ाम करिए, रोजी-रोटी का प्रबंध करिए... मत भूलिए कि 'जान है, तो जहान है...' बिहार में कोरोना प्रबंधन की कैसी तैयारियां हैं, इसी बात से समझ लीजिए कि मुख्यमंत्री आवास में उनके पारिवारिक सदस्यों सहित 85 लोग कोरोना पॉज़िटिव पाए गए हैं. उपमुख्यमंत्री के निजी स्टाफ सहित आवास के अन्य लोग भी संक्रमित हैं. कई मंत्री, विधायक और सांसद भी कोरोना पॉज़िटिव पाए गए हैं. वर्चुअल रैली करने के कारण बिहार BJP के 75 नेता संक्रमित हो गए हैं. मुख्य सचिव और सचिवालय के अनेक कर्मचारी संक्रमित हैं. अब आप ख़ुद अंदाज़ा लगाइए, आम आदमी कैसे कोरोना संक्रमण से बचा होगा...? सरकारी बदहाली और जर्जर स्वास्थ्य व्यवस्था देखकर रूह कांपती है.

हम मानवीय संवेदनाओं के साथ हैं. हम लाशों के ढेर पर चुनाव नहीं चाहते. हम नहीं चाहते कि तीन महीने बाद लोग पोलिंग बूथ की बजाय शमशान जाएं. अगर BJP-JDU पूर्णतः आश्वस्त हैं कि बिहार में कोरोना कोई समस्या नहीं है और चुनाव ससमय ही होने चाहिए, तो इन्हें डिजिटल और वर्चुअल नहीं, परंपरागत रूप से चुनाव प्रचार और चुनाव की पैरवी करनी चाहिए.

लोकतंत्र परंपरागत चुनावों से ज़िन्दा रहता है, लेकिन अगर आम ज़िन्दगियां खतरे में हों, लोग इस महामारी के डर के साये में जी रहे हों, तो फिर आज के हालात में चुनाव और चुनावी विमर्श हमें 'गिद्ध' की श्रेणी में नहीं खड़ा कर देगा...? एक संवेदनशील पार्टी हमेशा यह मांग करेगी कि चुनाव के लिए थोड़ा सामान्य माहौल हो. समाज और राज्य इस आपदा से निकलकर अपने को महफूज़ महसूस करें. चुनाव होंगे और ज़रूर होने चाहिए... हमारे अलावा पूरा बिहार इंतज़ार कर रहा है, लेकिन आशंका और डर के इस माहौल में नहीं. मैं नीतीश जी की मनःस्थिति समझ सकता हूं. वह डर रहे हैं कि अगर किसी कारणवश चुनाव टलता है, तो राष्ट्रपति शासन में BJP इनके साथ वह सब करेगी, जो इन्होंने बीते वर्षों में BJP के साथ किया. नीतीश जी और BJP की इस नूराकुश्ती में 12.6 करोड़ बिहारवासियों की जान को जोखिम में डालने का कोई औचित्य समझ में नहीं आता.

मैं चुनाव आयोग से अनुरोध करूंगा कि ज़मीनी और संक्रमण की हकीकत के मद्देनज़र उचित समय पर ही चुनाव कराने के बारे यथोचित निर्णय लें. लोकतंत्र में 'लोक' महत्वपूर्ण है और जब लोक / लोगों की भागीदारी बाधित होगी, तो फिर महज 'तंत्र' से क्या होगा...?

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तेजस्वी यादव राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के वरिष्ठ नेता तथा बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री हैं...

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