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हम जो समाज बना रहे हैं...

ऐसा नहीं कि यह कोई पहली बार हो रहा है. लेकिन पहली बार इतने बड़े स्‍तर पर उसे किसी भी तरह के स्त्रीत्व से वंचित कर सिर्फ एक देह में बदला जा रहा है, पहली बार उसका चरम वस्तुकरण हो रहा है.

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हम जो समाज बना रहे हैं...

तेलंगाना रेप केस पर सदमे और गुस्से में आने से पहले सोचिए कि क्या आपके भीतर सदमे और गुस्से में आने का अधिकार बचा है? हम लगातार एक ऐसा समाज बना रहे हैं जो स्त्रियों, अल्पसंख्यकों, दलितों और आदिवासियों के लिए लगभग अमानवीय हुआ जा रहा है. अगर सिर्फ़ स्त्रियों की ही बात करें तो वे हमारे समाज में उपभोग के सामान में बदली जा रही हैं. विज्ञापन उद्योग उनका धड़ल्ले से इस्तेमाल करता है, मनोरंजन उद्योग उनका ख़ूब खुल कर इस्तेमाल करता है. क्रिकेट और कारोबार तक की दुनिया में उनका एक सजावटी इस्तेमाल है. ऐसा नहीं कि यह कोई पहली बार हो रहा है. लेकिन पहली बार इतने बड़े स्‍तर पर उसे किसी भी तरह के स्त्रीत्व से वंचित कर सिर्फ एक देह में बदला जा रहा है, पहली बार उसका चरम वस्तुकरण हो रहा है.

हमें वे म्यूजिक एलबम नहीं डराते जिनमें किसी लड़की की कटी-छंटी देह बिल्कुल टुकड़ा-टुकड़ा प्रदर्शित की जाती है. हमें वे वेब सीरीज़ें नहीं डरातीं जिनमें मां-बहन की गालियां आम हैं और इनको सुनना-सहना आधुनिकता की निशानी. पहले ये गालियां झटका देती थीं- अब भी देती हैं- लेकिन अब भी एक उद्योग इनको लगातार सहनीय बनाने में लगा हुआ है और विरोध करने वालों को बालिग़ होने की नसीहत दे रहा है. हमारे यहां फूल-फल रहा पोर्नोग्राफी का धंधा लगातार बड़ा हो रहा है और अब इस बात के वकील भी निकल आए हैं कि इसे वैध करार देना चाहिए. जिसे स्मार्टफोन क्रांति कहा जा रहा है, उसने अब वेब के बाहर इतना पोर्न कंटेंट परोस दिया है कि वह लगभग हर किसी के लिए बिल्कुल कौड़ियों के मोल सुलभ है. इस पूरी प्रक्रिया ने लगभग एक बीमार समाज पैदा किया है जिसके भीतर यौन कुंठाएं लगातार बड़ी होती जा रही हैं.


इस यौन कुंठा को वह लैंगिक भेदभाव भरी सामंती और मर्दवादी दृष्टि कुछ और मज़बूत करती है जिसके मुताबिक लड़कियों की जगह घर की चौखट के भीतर है. यही दृष्टि प्रस्तावित करती है कि घर से निकलने वाली लड़कियों को संदेह से देखें और जिनका निकलना रात के बाद का हो, उनको तो बिल्कुल बुरी लड़कियों की श्रेणी में डाल दें.

और यह सब कुछ ऐसे समय में हो रहा है जब लड़कियां पहली बार घर-परिवार की चौखट फलांग कर, पिता और भाइयों का हाथ झटक कर अपने बूते बाहर निकल रही हैं, शिक्षा और नौकरी हासिल कर रही हैं, अपने दोस्त चुन रही हैं, उनके साथ घूम रही हैं. इन लड़कियों की ओर से मिल रही बौद्धिक चुनौती का सामना करने की जगह उनका तिरस्कार करना, उन पर चुटकुले बनाना, उन्हें पीठ पीछे अपने गॉसिप का विषय बनाना, उनके कपड़ों पर छींटाकशी करना, उनकी आज़ादी पर सवाल खड़े करना एक आम और लगभग स्वीकार्य अभ्यास है जो लड़कियों को लगतार अकेला और असुरक्षित बनाता है. एक छुपा हुआ बलात्कार या छलात्कार उनके साथ जैसे लगातार चलता रहता है. हम स्त्री को जैसे मनुष्य नहीं रहने देते, उसे सजावट का या आखेट का सामान बना डालते हैं.

स्त्रीत्व के न्यूनीकरण की इस बहुत सूक्ष्म स्तर पर चल रही इस प्रक्रिया के जब स्थूल नतीजे किसी वीभत्स बलात्कार के रूप में सामने आते हैं तो अचानक हमारी चेतना इस तरह जाग उठती है कि हम बलात्कारियों को 6 महीने के भीतर फांसी पर लटका देने से लेकर सड़क पर गोली मार देने तक के सुझाव देने लगते हैं.

लेकिन इससे अधिकतम यह होता है कि हमारी अपराधग्रस्त चेतना अपने लिए कुछ सांत्वना महसूस करती है और फिर अगले किसी ऐसे ही वीभत्स अपराध तक सोई रहती है. दरअसल यह लड़की को न्याय, बराबरी या सम्मान देने की सहज भावना से उपजा ख़याल नहीं होता, बल्कि एक लड़की के प्रति एक वीभत्स अपराध से उपजी हमारी सामूहिक चीख होती है जो चाहे जितनी सच्ची होती हो, उससे कम से कम इंसाफ़ का मक़सद नहीं सधता- बल्कि यह संदेह होता है कि न्याय में जो धीरज होना चाहिए, उसकी जगह एक तरह की हड़बड़ी है जो बहुत सारे अन्यायों का बायस बन सकती है. इत्तिफ़ाक़ से पिछले कुछ वर्षों में बलात्कार के जिन दो मामलों में देश भर में सबसे ज़्यादा ग़म और गुस्सा दिखा है, उनमें एक निर्भया का मामला है और दूसरा तेलंगाना में हुई उस लड़की का, जिसे अब हैदराबाद पुलिस ने दिशा का नाम दिया है. इन दोनों मामलों के मुल्ज़िम समय रहते पकड़े गए और निर्भया केस के गुनहगारों को जल्द ही फांसी हो सकती है. लेकिन इसके बावजूद फांसी-फांसी की पुकार लगाती इस भीड़ को देखकर लगता है कि न्याय इसके लिए अपनी सहूलियत से ऑर्डर किया गया पिज्जा है जिसकी 45 मिनट में डिलीवरी हो जानी चाहिए. निर्भया मामला जब सामने आया था, उसके बाद से रेप के मामलों की रिपोर्टिंग को लेकर बहुत सारी बातें कही-सुनी गई हैं. अदालत का बहुत स्पष्ट निर्देश है कि ऐसे किसी भी मामले में पीड़िता का नाम उजागर नहीं किया जाना चाहिए- ऐसा कोई उल्लेख नहीं होना चाहिए जिसके उसकी पहचान स्पष्ट होती हो. लेकिन हम पा रहे हैं कि कठुआ मामले में भी और अब दिशा के मामले में भी अपना गुस्सा जताने और गुनहगारों के लिए फांसी की मांग करने वाले लोग धड़ल्ले से उसका नाम और उसकी तस्वीर दोनों इस्तेमाल कर रहे हैं. जाहिर है, अगर न्याय की कोई मर्यादा होती है तो उसका उल्लंघन सिर्फ वही पुलिसवाले नहीं कर रहे होते जो ऐसे मामलों में एफआईआर तक दर्ज करने को तैयार नहीं होते, वे भी होते हैं जो बहुत तेज़ी से पीड़ित की पहचान से जुड़ा अपना सामान्य ज्ञान प्रदर्शित करने की उतावली के शिकार होते हैं.

फिर अगर बलात्कार हमें इतना चुभता तो राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के वे आंकड़े हमें सोने नहीं देते जिनके मुताबिक इस देश में हर घंटे 4 बलात्कार हुआ करते हैं. हमारे कानों में हमेशा कोई न कोई चीख गूंजनी चाहिए थी, हमें हमेशा किसी न किसी पीड़ित के न्याय के लिए खड़ा होना चाहिए था. लेकिन हैरानी की बात यह है कि बलात्कार के बहुत जाने-पहचाने मामले भी हमें चुभते नहीं. बिलकीस बानो के साथ गुजरात में कई लोगों ने बलात्कार किया था. उसके परिवार का क़त्ल कर दिया गया. उसके अपराधियों को किसी ने फांसी पर चढ़ाने की बात नहीं की, क़रीब डेढ़ दशक बाद उसका इंसाफ़ सामने आया और कुछ लोगों को उम्रक़ैद की सज़ा मिली तो बिलकीस बानो ने भी उनके लिए फांसी की मांग नहीं की. वह इतने बरसों तक न्याय की लड़ाई लड़ते-लड़ते शायद समझ गई थी कि इंसाफ़ का असली मतलब क्या होता है.

बलात्कार निस्संदेह किसी भी समाज का सबसे वीभत्स अपराध होता है- शायद हत्या से भी क्रूर. क्योंकि यह अपने ही एक वर्ग की अस्मिता को कुचलने वाला अपराध होता है. इसके गुनहगारों को वाकई कड़ी सज़ा मिलनी चाहिए. लेकिन कभी भी किसी भीड़ को हम यह अधिकार नहीं दे सकते कि वह मुजरिमों की सज़ाएं तय करे. अगर ऐसा हुआ तो दो अपराधी मारे जाएंगे और बीस ग़रीब. इस देश में न्याय ही नहीं, संवेदना का वास्ता भी जैसे वर्गीय हितों या पहचानों से जुड़ा हुआ है- वरना हम सिर्फ गिनती के कुछ मामलों पर आहत नहीं होते, हर बलात्कार हमारी आत्मा में बराबरी पर चुभना चाहिए था.

बलात्कार न हों, इसके लिए ज़रूरी है कि कड़ी सज़ाएं हों. लेकिन अकेले कड़ी सज़ाओं से कोई अपराध रुकता नहीं, यह हम अपने अनुभव से जानते हैं. उसके लिए समाज के भीतर बराबरी, परस्पर सम्मान और न्याय के प्रति एक सहज आस्था का भाव होना चाहिए. इस लिहाज से सोचें तो हम बुरी तरह बंटे-बिखरे हुए समाज हैं. भयानक सामाजिक-आर्थिक ग़ैरबराबरी हमारे यहां न्याय की बहुत सारी संभावनाओं की कुचल डालती है. पिछले कुछ वर्षों में बढ़ते अकेलेपन और हताशा ने समाज को कुछ और क्रूर और व्यवस्था के प्रति आस्थाविहीन बनाया है. इसलिए हम न्याय करने निकलते हैं तो मॉब लिंचिंग पर उतरते हैं और अक्सर इसके शिकार वे गरीब लोग होते हैं जो अपनी आर्थिक-सामाजिक-वर्गीय पहचान की वजह से वेध्य होते हैं. स्त्रियों के संदर्भ में ये वेध्यता बहुत मार्मिक और तकलीफ़देह हो उठती है. हमें अगर एक मानवीय समाज बनाना है तो सभी वर्गों को मज़बूत करना होगा- हमें मज़बूत स्त्रियां चाहिए- लेकिन इसका मतलब बस यह नहीं है कि वे कराटे सीखें और मिर्च का पाउडर लेकर चलें- अगर वे ऐसा करती हैं तो यह उनकी मर्ज़ी है- लेकिन जो ऐसा न कर सकें, उनके भीतर यह मजबूती और भरोसा हो कि उनका कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता. यह भरोसा तब हासिल होगा जब हम एक बराबरी वाला समाज बना पाएंगे. कैसे बना पाएंगे, यह नहीं मालूम, लेकिन यह स्पष्ट है कि हर हादसे के बाद फांसी की आतुर मांगों से वह समाज नहीं बनेगा.

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(प्रियदर्शन NDTV इंडिया में सीनियर एडिटर हैं...)

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) :इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति NDTV उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार NDTV के नहीं हैं, तथा NDTV उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.



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