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ग़रीबों की जगह ना दिल में, ना शहरों में

भारत ही नहीं दुनिया के तमाम बड़े शहरों में बेघर रहते हैं. मौसम की मार झेलते हुए किसी पार्क में, किसी पेड़ के नीचे, किसी फ्लाईओवर के नीचे अपने ठिकाने बना लेते हैं. बहुत से लोग इन्हें गंदगी के रूप में देखते हैं.

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ग़रीबों की जगह ना दिल में, ना शहरों में

शहर वही सबसे अच्छा होता है जो सबके लिए होता है. जिसकी हर जगह पर सबका दावा होता है. मुंबई को लोगों ने बनाया क्योंकि मुंबई पर सबका दावा था. दावा है. मुंबई के फुटपाथ की कहानी फिल्मों में और साहित्य में घर के रूप में आती है, एक ठिकाने के रूप में जहां से उठकर कोई आसमान में सितारा बन जाता है. श्री 420 से लेकर दीवार और तेजाब. न जाने कितनी फ़िल्में हैं. जब उसी मुंबई में कोई अपनी दुकान के बाहर खाली जगह में लोहे कीलें लगवा दे, तो वह कील मुंबई की आत्मा में ठोंक देता है. तभी जब ट्विटर पर कील की तस्वीर आई तो उन लोगों को सदमा लगा जो मुंबई की आत्मा में यकीन रखते हैं.

वैसे तो इन कीलों को अब हटा दिया गया है लेकि इसे लगाने के पीछे का इरादा कितना असंवेदनशील रहा होगा. शटर गिराने के बाद जो जगह बची होती है उसे ओट कहते हैं, वहां लोग बैठ जाते हैं. थक जाते हैं तो टिक जाते हैं. एचडीएफसी बैंक के फोर्ट रोड ब्रांच के बाहर कीलें लगाई गईं, जिन्हें अब बैंक ने हटा लिया है. बैंक ने अफसोस भी ज़ाहिर किया है. कील पहले से थीं मगर नए निर्माण के बाद बड़ी कर दी गई. ये कीलें भयानक हैं, बहुत दिनों तक शहर में ग़रीबों के लिए स्पेस को लेकर अध्ययन करने वालों के ज़हन से नहीं हटेंगी. चुभती रहेंगी. आज का शहरी भारत क्या इतना ग़रीब विरोधी होता चला जाएगा, दरसअल होता चला जा रहा है. खुद पेवमेंट की ज़मीन को पार्किंग के लिए हथिया लेता है, कालोनी के सार्वजनिक रास्तों पर लोहे का गेट लगा देता है मगर हम इस हद तक पहुंचेंगे कि बैठने की जगह पर कील लगा देंगे ताकि इस तरह कोई थका मांदा थोड़ी सी जगह पाकर बैठ न जाए.

भारत ही नहीं दुनिया के तमाम बड़े शहरों में बेघर रहते हैं. मौसम की मार झेलते हुए किसी पार्क में, किसी पेड़ के नीचे, किसी फ्लाईओवर के नीचे अपने ठिकाने बना लेते हैं. बहुत से लोग इन्हें गंदगी के रूप में देखते हैं, अतिक्रमण के रूप में देखते हैं, कानून व्यवस्था की समस्या के रूप में देखते हैं. आप क्या करेंगे, अमरीका का एक शहर है कैलिफोर्निया, यह शहर टैक्स के कारण बहुत महंगा हो गया है. इतना महंगा कि घर वाले बेघर हो जाते हैं. कार में रात गुज़ारते हैं और अपना मकान बेचकर दूसरे शहर की तरफ भाग रहे हैं. जुलाई 2016 से जुलाई 2017 के बीच 1 लाख 38 हज़ार लोगों ने कैलिफोर्निया शहर छोड़ दिया. इसलिए बेघर को देखकर नाक भौं सिकोड़ने की ज़रूरत नहीं है, जिनके घर हैं वे भी बेघर हो सकते हैं. पर वहां का समाज किस तरह से अपने बेघरों को देखता है. सिएटल पेसिफिकल यूनिवर्सिटी ने बेघरों से कहा कि आप सर्दी के 90 दिनों के लिए हमारे कैंपस में आकर रहें, वहां अपना कैंप लगा लें. उसके बाद वाशिंगटन यूनिवर्सिटी ने भी ऐसा किया है. क्या आपने भारत में किसी यूनिवर्सिटी को ऐसा करते देखा है कि सर्दी के दिनों में बेघरों के लिए अपना कैंपस खोल दे. सिएटल पेसिफिक यूनिवर्सिटी ने अपने पार्किंग में 65 बेघरों को कैंप लगाने के लिए जगह दे दी थी. हम हैं कि कील लगा रहे हैं. बेहतर है कि हम ऐसे शहर की कल्पना करें जो बेघरों को लेकर उदार हो. उनका ख़्याल रखता है. तभी तो सर्दी के दिनों में सरकार रैन बसेरा बनाती है तो सबको अच्छा लगता है. अब आपने मुंबई में एचडीएफसी शाखा के बाहर कीलें देखी लेकिन क्या यह दिल्ली में नहीं हो रहा है. दिल्ली में भी हो रहा है मगर दूसरी तरफ से.


आपने ग़ौर किया होगा कि दिल्ली के सारे फ्लाईओवर के नीचे का हिस्सा ग्रिल लगाकर बंद किया जा रहा है. आपको लगेगा कि यह शहर को सुंदर करने के लिए जायज़ है तब फिर आपको मुंबई में कील ठोंक देने पर नाराज़ होने का कोई हक नहीं. पर आपको एक बार सोचना चाहिए कि इन फ्लाईओवरों को ग्रिल से बंद करने से किसका नुकसान हो रहा है. यहां की सुंदरता आपकी आंखों के सामने कितनी देर ठहरेगी, जब तक आप ठीक से देखेंगे नहीं, आपकी कार या बस आगे बढ़ चुकी होगा. इरादा तो सुंदर बनाने का है, मगर जो साफ दिखाई देता है वह यह कि इसके नीचे सर्दी के दिनों में ग़रीब न बैठें, बारिश से बचने के लिए स्कूटर वाले यहां न छिपें. सरायकाले खां बस स्टैंड के सामने जो फ्लाईओवर है उसके नीचे ग्रिल लगा दिया गया है जहां बस से उतरने वाले ग़रीब दिल्ली आकर कई बार ठिकाना रखते थे, बैठ कर अपना दूसरा पता खोज लेते थे. इन गरीबों के बैठने का दूसरा इंतज़ाम हो इससे पहले ये ग्रिल बंद कर दिए गए हैं. यही नहीं इसके भीतर स्टील का बना विशालकाय चरखा रखा गया है. गांधी ने जिस चरखे को अंतिम आदमी तक पहुंचने के लिए ढूंढा, सरकारें उस चरखे के सहारे अंतिम आदमी को बेदखल कर रही हैं. पूरी दिल्ली के फ्लाईओवर के नीचे के हिस्से को इस तरह से घेरा जा रहा है. प्रदूषण इतना है कि सड़क के बीच में कोई टहलने भी नहीं जा सकता है मगर सजावट के नाम पर विस्थापन का यह नया खेल शहर की खाली जगहों में कील ठोंकने जैसा ही है. ज़रूर इसकी प्लानिंग करने वालों को यह बड़ा आइडिया लगा होगा मगर आप बेघरों और ग़रीबों की नज़र से देखिए. अक्सर यह कहना कि ये अतिक्रमण करते हैं, फ्लाईओवर को गंदा करते हैं, कानून व्यवस्था को खराब करते हैं सही नहीं है.

ग़रीबों को हटाने का तर्क इतना ही मज़बूत लगता है आपको, इतना ही मज़बूत तर्क लगता है कि शहर को सुंदर बनाना ज़रूरी है तो पहले कालोनी के भीतर सड़क के किनारे खड़ी कारों को ज़ब्त कर लेना चाहिए. वो भी तो अतिक्रमण है. दिल्ली शहर में ही सैंकड़ों तालाबों का अतिक्रमण हो गया. कोई हटा नहीं सका. बहुत सी जगहों पर अतिक्रमण कर क्या क्या नहीं बन गया. उन्हें हटाने के लिए तो दशकों मुकदमा चलता है, ऐसा क्या है कि ग़रीब को रातों रात चुप चाप एक बार में ही हटा दिया जाता है. इसे सजाने में जो पैसे खर्च हो रहे हैं उससे आम जनों की ज़िंदगी की सुविधाएं भी बेहतर हो सकती थीं.

क्या आप जानते हैं कि इन फ्लाईओवरों को सुंदर बनाने के नाम पर कितना पैसा ख़र्च किया जा रहा है. हमारे पास पूरा डेटा तो नहीं है मगर 16 दिसंबर 2017 की टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट मिली. इसमें कहा गया है कि पश्चिम दिल्ली के सांसद प्रवेश वर्मा ने राजा गार्डन और मायापुरी फ्लाईओवर के नीचे सौंदर्यीकरण के प्रोजेक्ट का उदघाटन किया. हमारा वीडियो वहां का तो नहीं है मगर आप अंदाज़ा कर सकते हैं कि इस पर गरीबों को दूर करने पर सांसद या सरकार कितना पैसा ख़र्च कर रही है. टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार दक्षिण दिल्ली म्युनिसिपल कॉरपोरेशन ने राजा गार्डन और मायापुरी फ्लाईओवर के नीचे के हिस्से को सुंदर बनाने के नाम पर 78 लाख रुपये ख़र्च किए हैं.

दिल्ली के राजागार्डन फ्लाईओवर के नीचे के हिस्‍से को भी सुंदर बनाया गया है. इस तरह से एक नगर निगम 12 से 14 फ्लाईओवर बना रहा है. यह काफी पैसा है. हमारे सहयोगी रवीश रंजन शुक्ला ने पता किया है कि दक्षिण दिल्ली नगर निगम ने 12 फ्लाईओवर को सुंदर बनाने के नाम पर पौने आठ करोड़ रुपये खर्च किए हैं. सरकारें लोगों को ठेके पर रख रही हैं, उन्हें सैलरी नहीं दे पा रही हैं और फ्लाईओवर को सुंदर बनाने के लिए 8 करोड़ रुपये ख़र्च कर रही हैं. क्या ये विलासिता नहीं है. इस पैसे में किसी ग़रीब की बस्ती ही बेहतर की जा सकती थी. अगर हमें यह पता चले कि सारी नगरपालिकाएं मिलकर फ्लाइओवर को सुंदर बनाने के नाम पर कितना ख़र्च कर रही हैं तो यह बजट काफी बड़ा हो सकता है. ज़रूरी है कि हम शहर के प्रति अपनी समझ को ज़रा ठीक करें. कानून व्यवस्था ठीक नहीं है तो पुलिस की भर्ती करें.

ठीक इसी तर्ज पर जंतर मंतर को ख़त्म कर दिया गया. राज्यों की राजधानियों से धरने प्रदर्शन की जगहों को दूर कर दिया गया. विस्थापन कई बार उन्हें भी झेलना पड़ता है जो कभी अपने से ग़रीब के हटाए जाने के समर्थन में तर्क खोज रहे होते हैं. हमारे सहयोगी सौरव शुक्ला गुड़गांव के न्यू पालम विहार इलाके में गए. सौरव बता रहे हैं कि वहां 24 घंटे पहले नोटिस दिया गया और 30 घरों को रातों रात तोड़ भी दिया गया. वहां चर्चा है कि प्रधानमंत्री को अप्रैल में द्वारका-गुड़गांव एक्सप्रेस वे का शिलान्यास करना है इसलिए इन घरों को ढहाने में इतनी जल्दी दिखाई गई.

शहर में जगह की बहुत कीमत होती है. सिर्फ ग़रीब के लिए नहीं, हमारे आपके बच्चों के लिए भी. आज सुबह सुबह चंडीगढ़ से एक नौजवान ने मेसेज किया कि वह पांच किलोमीटर साइकिल चला कर सेक्टर 42 के बेअंत सिंह मेमोरियल लाइब्रेरी में प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी करने जाता है. लाइब्रेरी ने सदस्यता की फीस 150 से बढ़ा कर 300 रुपये कर दी है. बहुतों को लगेगा कि मामूली वृद्धि है मगर एक छात्र की नज़र से देखिए तो यह 300 रुपया उसे चुभता है. एक महीने का सदस्यता शुल्क 300 और तीन महीने का सदस्यता शुल्क 900 रुपये कर दिया गया है. इससे पहले कि आप घर बैठे तर्क देने लगें कि किसी को पढ़ने से मतलब नहीं, लाइब्रेरी मस्ती करने जाते हैं तो मैं कुछ आपको बताना चाहता हूं. दस साल पहले बनी यह लाइब्रेरी काफी ठीक ठाक है. लाइब्रेरी के रीडिंग रूम में 250 लोगों के बैठकर पढ़ने की व्यवस्था है मगर जब हमने पता किया तो बताया गया कि रोज 450 छात्र यहां पढ़ने आते हैं. जब आप यहां की तस्वीरों में देखेंगे तो पाएंगे कि छात्र कितनी एकाग्रता से पढ़ रहे हैं. कुर्सी नहीं है तो ज़मीन पर बैठकर पढ़ रहे हैं. दीवारों के कोने में बैठकर पढ़ते हैं. बेअंत सिंह मेमोरियल लाइब्रेरी में 450 छात्र आते हैं, क्या यह कम बड़ी बात है. पहले यहां तीन महीने की फीस 150 रुपये थी, यानी एक महीने की फीस हुई 50 रुपये जिसे अब एक अप्रैल से बढ़ा कर 300 रुपये कर दिया गया है. 50 रुपये से सीधे 300 रुपये प्रति माह. अब सरकारें भी लाइब्रेरी पर कहां खर्च करती हैं, उन्हें लगता है कि लाइब्रेरी में कौन आता है, इसलिए वे झांसा देने का प्रोजेक्ट बना रही हैं, जैसे फ्लाईओवर के नीचे की जगह को ग्रिल से घेर कर सुंदर बनाओ. शहर में इतनी समस्या है, सरकार को सपने में सुंदरता का ख़्याल आता है. हाल फिलहाल में आपने कब सुना है कि किसी मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री ने लाइब्रेरी का उद्घाटन किया हो. आप इन तस्वीरों को देखकर अब ये न कहिएगा कि पढ़ने वाले नहीं हैं.

पंजाब की बात चली है तो वहां से एक और ख़बर है जिसका ज़िक्र ग़ायब है. वहां पर शिक्षकों पर क्या गुज़र रही है आप पूछेंगे तो देश के कई राज्यों से शिक्षक हाथ उठाकर कहेंगे कि हां हम पर भी वही बीत रही है. हमारा भी कुछ कीजिए.

ठेके की नौकरी और कम सैलरी ने लोगों के सब्र का इम्तहान ले लिया है. ये तस्वीर आपको कहां दिखी मगर इन लोगों को अपनी हालत दिखने लगी है. ये सभी पंजाब सरकार के तहत ठेके पर काम करने वाले शिक्षक हैं. इनसे कहा जा रहा है कि अगर आप तीन साल तक 10,300 रुपये वेतन लेंगे तो उसके बाद आपको परमानेंट किया जा सकता है. हमारी सरकारें या तो भीतर से खोखली हो चुकी हैं या फिर नौकरियों को लेकर उनकी नीयत बदल गई है. पंजाब में सर्व शिक्षा अभियान के तहत 15,000 शिक्षक हैं, इस वक्त इनकी सैलरी 35 से 40 हज़ार है मगर इनसे कहा जा रहा है कि आप 10 हज़ार 300 रुपये प्रति माह पर काम कर लें वो भी तीन साल तो नौकरी पक्की हो जाएगी. इनके प्रदर्शन के बाद सरकार ने 7000 शिक्षकों के खिलाफ केस किया है. क्या आपने कभी ऐसा सुना है कि 7000 शिक्षकों के खिलाफ केस किया गया हो. एफआईआर में 20 शिक्षकों के नाम हैं और बाकि बगैर नाम के दर्ज हैं.

झारखंड में 70 से 80 हज़ार पारा शिक्षक हैं. इन सभी को 8 से 10 हज़ार के बीच वेतन मिलता है. यहां शिक्षक ईंट के भट्टा में मज़दूरी कर रहे हैं. हर राज्य में शिक्षकों की हालत ख़राब है. बिहार, यूपी हर जगह. हमने कुछ दिन पहले बताया था कि झारखंड में सर्वे हो रहा है कि किस स्कूल का किस स्कूल में विलय होगा. यह एक नई नीति है जो हर सरकार में देखी जा रही है. हज़ारों की संख्या में स्कूल का विलय हो रहा है. सरकार तर्क देती है कि जितने छात्र होने चाहिए उतने से कम हैं. इस लिहाज़ से सरकार अपनी शिक्षा की ज़िम्मेदारी को जनता से दूर ले जा रही है. सोचना चाहिए कि आबादी बढ़ रही है और सरकारी स्कूल मे छात्रों की संख्या कम हो रही है. सामाजिक कार्यकर्ता कहते हैं कि स्कूलों को बंद करने का यह सब बहाना है. झारखंड में चर्चा है कि इस विलय से 30 से 35 हज़ार शिक्षक नौकरी से बाहर हो जाएंगे. गुजरात विधानसभा में बीजेपी के एक विधायक ने सवाल पूछा जिसका जवाब दिलचस्प है. 27 मार्च के संदेश में यह ख़बर छपी है. शिक्षा मंत्री ने सदन में जवाब दिया है कि राज्य के 107 सरकारी कॉलेजों में से 91 कालेज में प्रिंसिपल नहीं हैं, पद ख़ाली हैं. 60 प्रतिशत सहायक प्रोफेसरों के पद ख़ाली पड़े हैं.

रोज़गार की कोई कमी नहीं है फिर भी बेरोज़गार सड़क पर हैं. गुजरात के शिक्षा मंत्री ने यह भी बताया कि पोरबंदर के 8 सरकारी स्कूलों सहित 14 स्कूलों में बिजली का कनेक्शन नहीं हैं. जबकि गुजरात को बिजली के मामले में सरप्लस राज्य माना जाता है. 6 हज़ार से अधिक स्कूलों में चहारदीवारी नहीं है. शहर से धरना प्रदर्शन दूर कर देने से लोगों की बेचैनी खत्म नहीं हो जाती है. वो आपके सामने आ ही जाते हैं.

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लखनऊ में बीपी ईड यानी फिजिकल एजुकेशन की डिग्री धारकों ने भाजपा मुख्यालय के सामने प्रदर्शन किया है. तीन-तीन प्रदर्शन भाजपा मुख्यालय के सामने हो चुके हैं. ये लोग मांग कर रहे हैं कि राज्य सरकार ने भर्तियों पर जो रोक लगाई है वो हटाए और नौकरी दे. इनका कहना है कि इनके सेगमेंट में 32 हज़ार से अधिक नौकरियों पर रोक लगी हुई है. 23 मार्च 2017 को समीक्षा के नाम पर रोक लगाई गई है जबकि कोर्ट ने 28 दिनों के भीतर भर्ती प्रक्रिया शुरू करने का आदेश दिया था मगर अभी तक शुरू नहीं हुई है. इन नौजवानों ने अपने कपड़े तक उतार दिए ताकि इनकी ग़रीबी भी दिख जाए और बेचैनी भी. आप इस हुजूम को देखिए, आपको पता चलेगा कि इस वक्त नौजवान नौकरी को लेकर कितना सतर्क हो चुका है. ये नौजवान आज पहली बार नहीं बल्कि न जाने कितनी बार प्रदर्शन कर चुके हैं. फिर भी किसी को फर्क नहीं पड़ता है. नौकरी क्या करेंगे, जब पाने के लिए आंदोलन में ही इनके कई साल गुज़र जाएंगे.

रेलवे ने 90,000 के करीब भर्तियां निकाली थी, इसमें 10,000 और जोड़ दी है जबकि रेलवे ने संसद की स्थाई समिति को बताया है कि 2 लाख 20,000 नौकरियां हैं, फिर एक लाख ही क्यों, सारी भर्ती निकल सकती थी. अभी तक 90,000 भर्तियों के लिए करीब 2 करोड़ छात्रों ने फार्म भरा है. 2 करोड़ जबकि फार्म भरने में अभी 5 दिन और बाकी हैं. बेरोज़गारी अपने आंकड़ों के साथ सामने दस्तक दे रही है. कहां तो साल में 2 करोड़ बेरोज़गारों को रोज़गार देने का वादा था. एक इम्तहान में 2 करोड़ नौजवान फार्म भर रहे हैं. बेहतर है हम छात्रों की आवाज़ समय से पहले सुन लें. हज़ारों की संख्या में ग्रामीण बैंक के अधिकारी कर्मचारी तीन दिन की हड़ताल पर हैं, मगर कहीं कोई सुगबुगाहट नहीं है.



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