तीन तलाक : तीस साल बाद फिर वहीं खड़ा मुद्दा

तीन तलाक : तीस साल बाद फिर वहीं खड़ा मुद्दा

प्रतीकात्मक फोटो

जो लोग भी समाज में; विशेषकर भारत जैसे बहुविध एवं लोकतांत्रिक समाज में होने वाले परिवर्तनों की प्रक्रिया को जानते हैं, उन्हें अभी तीन बार तलाक कहने तथा मुस्लिम समाज की बहुविवाह प्रथा जैसे मुद्दों पर हो रही खींचातानी बहुत अजीब नहीं लग रही होगी. इस तरह के मामलों में; युग चाहे जो भी रहा हो, धर्म और समाज चाहे जो भी रहे हों, होता वही है, जो अभी हो रहा है. साथ ही यह भी कि होगा वह ही, जिसके कंधे पर राजनीतिक शक्ति का साथ होगा.
    
यहां यह याद करना गलत नहीं होगा कि स्वयं हिन्दू समाज में परिवर्तन लाने वाले कानूनों को बनाने में नेहरू जैसे लोकप्रिय एवं ताकतवर नेता को दस साल लग गए थे. जब एंड्रे मेलरोक्स नाम के फ्रांसीसी लेखक ने नेहरू जी से पूछा था कि आजादी के बाद उनके लिए सबसे बड़ी समस्या क्या रही है, तो उन्होंने कहा था ‘‘एक धार्मिक देश में एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र का निर्माण करना.’’ यह समस्या आज भी मौजूद है.
    
एक लम्बी जद्दोजहद के बाद सन् 1955-56 में संसद द्वारा हिन्दू कोड बिल पारित किए जाने के बाद कुछ ऐसा ही दूसरा मौका तीस सालों बाद तब आया आया, जब संसद ने सन् 1986 में मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों की रक्षा) अधिनियम पारित किया. यह बहुचर्चित मामला इतिहास में शाहबानो केस (बनाम मोहम्मद अहमद खान) के नाम से दर्ज है. मध्यप्रदेश के सबसे बड़े शहर इंदौर के एक वकील ने पांच बच्चों की मां एवं बासठ वर्षीया अपनी पत्नी को सन् 1978 में तलाक दे दिया था. तीन साल बाद यह महिला, जिसे शाहबानो कहते हैं, सर्वोच्च अदालत में गई. अदालत ने 23 अप्रैल 1985 को उनके पति को आदेश दिया कि वे अपनी इस 69 वर्षीय पत्नी को 179 रुपये 20 पैसे प्रतिमाह का गुजारा भत्ता दें. पति वकील थे और उनकी आर्थिक स्थिति भी काफी ठीक थी.
    
सन् 1984 के चुनाव में कांग्रेस स्पष्ट बहुमत के साथ सत्ता में आई थी. प्रधानमंत्री राजीव गांधी आधुनिक विचारों के थे. उन्होंने अपने 35 वर्षीय युवा गृहराज्य मंत्री आरिफ मोहम्मद खान से कहा कि वे न्यायालय के इस निर्णय के पक्ष में लोगों के सामने अपनी राय रखें. आरिफ खुद न्यायालय के पक्ष में थे. लेकिन मुस्लिम समुदाय नहीं. कुछ ही समय बाद बिहार के सीवान में मुसलमानों की एक बहुत बड़ी सभा हुई, जिसमें लगभग तीन लाख लोग आए. हालांकि इसका आयोजन मुस्लिम पसर्नल लॉ बोर्ड ने नहीं किया था, लेकिन इस विशाल आयोजन ने उसे आगे करने का रास्ता सुझा दिया था. अली मियां के नाम से लोकप्रिय पसर्नल लॉ बोर्ड के तत्कालीन अध्यक्ष मौलाना सैय्यद अब्दुल हसन ने इस मुद्दे को अपने हाथ में ले लिया और देखते ही देखते माहौल बदल गया.
    
समाज की इस कुलबुलाहट को भांपने के बाद राजनेता, खासकर कांग्रेस के राजनेता सक्रिय हुए. सांसद जीएम बनातवाला ने तो संसद में इस आशय का एक गैर सरकारी विधेयक ही प्रस्तुत कर दिया कि मुसलमानों को सीआरपीसी की धारा 125 से बाहर कर दिया जाए. इससे राजीव गांधी थोड़े विचलित हुए. इस दौर के प्रभावशाली कांग्रेस मुस्लिम नेताओं में जेडए अंसारी, सीके जाफर शरीफ तथ नजमा हेप्पतुल्ला आदि भी इस बात को लेकर चिंचित थे कि कहीं उनकी पार्टी का मुस्लिम आधार खिसक न जाए. इसी तरह की सोच में नारायणदत्त तिवारी तथा अर्जुन सिंह जैसी हिन्दू कांग्रेसी भी शामिल थे. फलस्वरूप मुस्लिम नेताओं की मध्यस्थता से प्रधानमंत्री एवं पसर्नल लॉ बोर्ड की मुलाकात कराई गई, और यहीं से धारा उलट गई.  सरकार ने एक कानून पारित करके न्यायालय के निर्णय को खारिज कर दिया, जिसे उस समय भारतीय जनता पार्टी ने ‘‘मुसलमानों की संतुष्टिकरण’’ तथा ‘‘सर्वोच्च अदालत की पवित्रता की अवमानना’’ कहा. युवा आरिफ मोहम्मद खान ने संसद में एक ऐसा ऐतिहासिक भाषण दिया, जिसकी सराहना पूरे देश ने की, और फिर उन्होंने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया.

उस घटना के तीस साल बाद अब फिर से कुछ-कुछ वैसी ही स्थिति बन रही है. देखते हैं कि इस बार ऊंट किस करवट बैठता है. सही करवट बैठाना बहुत कठिन होता है. यह सबके लिए है, किसी एक के लिए नहीं, बशर्ते कि इतिहास में झांकने की तकलीफ उठाई जाए.


डॉ. विजय अग्रवाल वरिष्ठ टिप्पणीकार हैं...

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