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'बाढ़ सिर्फ राहत और बचाव कार्य नहीं है', प्राइम टाइम रवीश के साथ

हमारा सिस्टम बाढ़ को सिर्फ राहत और बचाव कार्य ही समझता है. पानी घटता है और फिर सारी चीज़ें सामान्य हो जाती हैं.

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'बाढ़ सिर्फ राहत और बचाव कार्य नहीं है', प्राइम टाइम रवीश के साथ
बाढ़ का मीडिया कवरेज़ देखिये तो आप भी महसूस करेंगे कि बाढ़ की रिपोर्टिंग थकने लगी है. बाढ़ को लेकर किस नए एंगल से कवर किया जाए, यह चुनौती विकराल होती जा रही है. यही कारण है कि बाढ़ की रिपोर्टिंग रूटीन हो चली है. इसमें ग़लती रिपोर्टर की नहीं है, उस सिस्टम की है जो बाढ़ को सिर्फ राहत और बचाव कार्य ही समझता है. पानी घटता है और फिर सारी चीज़ें सामान्य हो जाती हैं.

बाढ़ के कारणों को लेकर जमशेदपुर के प्रोफेसर दिनेश मिश्र, हिमालयी इलाकों में चंडी प्रसाद भट्ट ने जीवन लगा दिया और तमाम लेख लिखे, तमाम सरकारों के पास बाढ़ के कारणों की जानकारी है, कुछ नया नहीं जानना है, फिर भी इस समस्या को निपटने के लिए कुछ हुआ नहीं. यही कारण है कि बिहार, असम, बंगाल और पश्चिमी बंगाल की बाढ़ की कवरेज एक-दो तस्वीरों में सिमट कर रह जाती है. ताकि आप देख सकें कि कुछ घर पानी में डूबे हुए हैं.

VIDEO: प्राइम टाइम: बाढ़ सिर्फ राहत और बचाव कार्य नहीं है
बिहार में बाढ़ से 18 ज़िले प्रभावित हैं और अब तक 253 लोगों की मौत हो चुकी है. ये सरकारी आंकड़ा है. ज़ाहिर है ग़ैर सरकारी आंकड़ा भी होगा. हम नहीं जानते कि इस सैलाब में कितनी लाशें बह गईं. अकेले अररिया में 57 लोगों की मौत हुई है. अररिया और किशनगंज के बीच लाशों का बहना जारी है. अररिया में परमान नदी ने भारी तबाही मचाई है. पूर्णिया शहर को सौरां ने डुबो दिया. किशनगंज में महानंदा ने. चंपारण, सीतामढ़ी, दरभंगा का हाल भी बुरा है. जूट, मक्का और सीमेंट के गोदाम बाढ़ से बर्बाद हो गए. भारी संख्या में बिहार में पुल और पुलिया बह गए. इनकी लागत न जाने कितने हज़ार करोड़ में जाएगी. हज़ारों दुकानों में करोड़ों के सामान बह गया होगा. 

दरअसल, हम बाढ़ के वक्त ऐसी तस्वीरों और मरने वालों की संख्या और राहत शिविरों के अलावा कुछ नहीं जानते. इसीलिए हमें यह मान लेना चाहिए तमाम कवरेज के बाद भी बाढ़ की तबाही के बारे में हम सही-सही नहीं जानते हैं. हम तस्वीरें देखते हैं मगर दर्द नहीं होता.

बिहार सरकार ने एक और आंकड़ा जारी किया है. बाढ़ के कारण एक करोड़, 26 लाख लोग बाढ़ से प्रभावित हुए हैं. राहत शिविरों में चार लाख से अधिक लोगों को रखा गया है. सरकार और पत्रकार बाढ़ के समय प्रभावित शब्द का खूब इस्तमाल करते हैं. एक तरह से प्रभावित में सारे तथ्य आच्छादित यानी ढंके रह जाते हैं. कुछ पता नहीं चलता. पूर्णिया में चनका रेसिडेंसी चलाने वाले अपने मित्र गिरिंद्रनाथ झा से गुज़ारिश की कि मुझे झोपड़ी का हिसाब जानना है ताकि अंदाज़ा कर सकूं कि एक ग़रीब का जब घर बह जाता है तो उसका क्या मतलब होता है.

गिरिंद्रनाथ झा ने बताया-
-400 वर्गफीट में दो कमरे की फूस की झोपड़ी बन जाती है. इसकी लागत 50,000 रुपये आती है.
-एक बांस की कीमत करीब 80 रुपये, 400 वर्गफीट की झोपड़ी के लिए 200 बांस चाहिए. यानी 16,000 रुपये का तो बांस चाहिए.
-रस्सी, कील, वगैरह में पांच हज़ार रुपये लग जाते हैं.
-दस दिनों तक चार मजदूर रोज़ चाहिए. एक दिन की मज़दूरी 300 रुपये. इस तरह 12,000 रुपये की मज़दूरी.
-ज़मीन और दीवार के लिए मिट्टी चाहिए. एक ट्रेलर मिट्टी का दाम होता है 300 रुपये. 10,000 रुपये की मिट्टी.
-फूस की झोपड़ी के ऊपर टिन की छत डालने का रिवाज है. आंधी-तूफान में टिन के उड़ने से कई लोगों की मौत हो जाती है.
-एक बंडल में टिन की छह चादर आती हैं. बंडल की कीमत होती है 2000 रुपये. 400 वर्गफुट के लिए 10,000 रुपये की टिन. 
-ये सबसे कम रेट का हिसाब है. इस हिसाब से एक झोपड़ी की कीमत 50 से 60 हज़ार रुपये बैठती है.
-एक कमरे की छोटी झोपड़ी बनाने में भी 25 से 30 हज़ार रुपये लग जाते हैं.

इन घरों में रहने वाले ज़्यादातर खेतिहर मज़ूदर, मज़दूर और ग़रीब किसान होते हैं. हमें तबाह होने वाली झोपड़ियों की संख्या और उनकी लागत के बारे में कुछ अंदाज़ा नहीं है. बाढ़ में बहती झोपड़ियां हमें सिर्फ एक तस्वीर लगती है. हम महसूस ही नहीं कर पाते कि एक ग़रीब की ज़िंदगी की पूंजी बह रही है. पसीना बह रहा है. जब तक सरकारें बाढ़ से निपटने के लिए कुछ करके नहीं दिखाती हैं, हमें मजबूरन बाढ़ की त्रासदी को नए-नए एंगल से देखते रहना होगा ताकि हम पूरी तबाही को एक तस्वीर में न समेट दें. 

सरकारी आंकड़ा है कि बिहार में बाढ़ से एक करोड़ 26 लाख लोग प्रभावित हुए हैं. मान लेते हैं कि इनमें से 50 लाख लोग फूस की झोंपड़ी में रहते होंगे. पांच लोगों के परिवार के हिसाब से 10 लाख झोंपड़ियां हो जाती हैं.

-मान लेते हैं कि दो कमरे की झोपड़ी की संख्या 5 लाख है.
-दो कमरे की एक झोंपड़ी की लागत है 50,000 रुपये
-इस तरह 250 करोड़ की झोपड़ियां तबाह हो गईं
-एक कमरे की झोंपड़ी की संख्या भी पांच लाख मान लेते हैं.
-एक कमरे की झोंपड़ी की लागत 30,000 रुपये आती है.
-इस तरह 150 करोड़ की एक कमरे की झोपड़ियां तबाह हो गईं


ये एक अनुमान भर है. इस लिहाज़ से इस बार की बाढ़ में 400 करोड़ की फूस की झोपड़ियां तबाह हो गई हैं. भागलपुर का सृजन घोटाला, जिसमें नौकरशाहों और नेताओं ने मिलकर 700 करोड़ का गबन किया है, वो भी समझिये बाढ़ में ही बह गया. जांच-वांच होती रहेगी, दोष साबित होने में ही कई साल लग जाएंगे. प्वाइंट यह है कि अगर इस तरह का एक घोटाला रोक दिया जाए तो बिहार के दस लाख लोगों को सरकार 30 से 50 हज़ार रुपये झोपड़ी बनाने के लिए दे सकती है. आलू-बालू घोटाले की राशि जोड़ लेंगे तो ग़रीब जनता में पैसे दोनों हाथ से बांटा जा सकता है बिना हिसाब किए. मगर जनता को मिलता है भाषण.

बाढ़ में झोपड़ी के साथ-साथ उसमें रखा सामान भी बह जाता है. एक छोटी से पान की दुकान में 25,000 रुपये तक का सामान होता है. परचून की दुकान में 50 से एक लाख का सामान होता है. दो क्विंटल चावल ही बहा होगा तो वही दस हज़ार का हो जाता है. बाढ़ की तबाही के हिसाब-किताब में ये सब आंकड़े नहीं होते हैं. इसी तरह हमें अखबारों और टीवी की सतही रिपोर्ट से पता चलता है कि हज़ारों की संख्या में मवेशी बह गए. लेकिन हमें पता नहीं चलता कि उनके बह जाने का मतलब क्या है. एक भैंस की कीमत 40,000 रुपये होती है. एक गाय की कीमत होती है 30,000. नरपतगंज इलाका है, वहां कहा जा रहा है कि एक बस्ती के हज़ार से ज़्यादा मवेशी बह कर मर गए हैं. एक बस्ती मे 4 से 5 करोड़ की भैंस या गायें मर गईं या बह गईं. कितने करोड़ की बकरियां बह गईं होंगी, उनका ही हिसाब नहीं है. एक बकरी की कीमत पांच हज़ार होती है. क्या आपको सरकार ने बताया कि बाढ़ से गरीब जनता की इतने करोड़ की पूंजी बर्बाद हो गई है और सरकार इसकी भरपाई करने वाली है क्योंकि उसका काम जनता की सेवा के अलावा कुछ भी नहीं है.

हमने इस हिसाब में फसलों की बर्बादी नहीं जोड़ी. चारे की बर्बादी नहीं जोड़ी. ट्रैक्टर से लेकर तमाम तरह की मशीनों की बर्बादी नहीं जोड़ी. पूरी का पूरी ग्रामीण अर्थव्यवस्था तबाह हो गई है. ग़रीब और ग़रीब हो गए. सरकारों को हम टीवी और अखबार वालों की सतही रिपोर्टिंग का शुक्रिया अदा करना चाहिए क्योंकि हमारी वजह से बाढ़ की तबाही का असली मंज़र कभी जनता के सामने नहीं आता है.

बाढ़ सिर्फ बिहार के 18 ज़िलों में नहीं है. असम के 33 ज़िले कई हफ्तों से बाढ़ की चपेट में हैं. असम में 34 लाख लोग बाढ़ से प्रभावित हैं. मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री को बताया है कि फसलें भी बर्बाद हुई हैं और घर भी तबाह हुए हैं. प्रधानमंत्री ने बाढ़ का समाधान निकालने के लिए ब्रह्मपुत्र और सहायक नदियों पर अध्ययन के लिए 100 करोड़ का फंड देने की घोषणा की थी. असम के काजीरंगा में 25 जानवर भी मर गए. यहां मरने वाले लोगों की संख्या 150 के पार जा चुकी है. बाढ़ का पानी घट तो रहा है मगर पानी के हटने से बर्बादी का स्तर बड़ा होता जा रहा है क्योंकि क्या बर्बाद हुआ है पानी हटने के बाद ही दिख रहा है. उत्तरी बंगाल के छह ज़िलों में भी बाढ़ आई हुई है. यहां भी बाढ़ से 55 लोगों के मरने की ख़बर है. पूरबी उत्तर प्रदेश के 24 ज़िलों में बाढ़ आई हुई है. यहां भी मरने वालों की संख्या 69 हो चुकी है. चार राज्यों की बाढ़ में 500 से अधिक लोग मर गए हैं. करोड़ों लोग विस्थापित हैं. ऐसा नहीं है कि सरकारें राहत शिविरों के ज़रिये प्रयास नहीं कर रही हैं, बिल्कुल कर रही हैं. वो काम भी अपनी खामियों और चुनौतियों के बीच चल ही रहा है. मगर बाढ़ सिर्फ राहत और बचाव कार्य नहीं है.

'डाउन टू अर्थ' अकेली पत्रिका है जिसने बाढ़ आने से पहले बाढ़ की ख़बर ली. इसके हिंदी संस्करण के जुलाई महीने के अंक के कवर पर बाढ़ की स्टोरी छपी थी. डाउन टू अर्थ पत्रिका अब हिन्दी में भी आती है. अर्चना यादव ने पटना से बंगाल के फरक्का तक यात्रा कर जानने का प्रयास किया था कि बिहार की बाढ़ के क्या कारण हैं और उपाय क्या है. मुझे नहीं मालूम कि बिहार के अधिकारियों मंत्रियों ने बाढ़ को लेकर जुलाई में कोई बैठक की थी या नहीं. डाउन टू अर्थ पत्रिका में जो बातें हैं उनके कुछ प्रमुख हिस्से को यहां रखना चाहता हूं. 1950 के दशक में बंगाल के फरक्का में जब बैराज बन रहा था तभी उस वक्त एक इंजीनियर कपिल भट्टाचार्य ने कहा था कि

फरक्का के कारण बंगाल के मालदा व मुर्शिदाबाद के साथ बिहार के पटना, बरौनी, मुंगेर, भागलपुर और पूर्णिया हर साल पानी में डूंबेंगे. फरक्का बैराज से पैदा हुई रूकावट के कारण गंगा की गति धीमी हो जाएगी और पानी में बहकर आई गाद गंगा के तल में जमने लगेगी. जिससे गंगा उथली होने लगेगी. जैसे जैसे गंगा उथली होगी, वैसे-बैसे उसका बाढ़ का प्रभाव क्षेत्र भी बढ़ेगे.

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बिहार के किसी भी इलाके में जाइये लोग नदियों को लेकर अपने अनुभव बताते हैं, उन तमाम अनुभवों में गाद का भरना प्रमुख कारण आ जाता है. तटबंधों से हमने नदियों को बांधा कम, बर्बादी के नए-नए रास्ते ज़्यादा खोल लिए. बाढ़ की तबाही बारिश के पानी से नहीं आती है, नीतियों के कारण आती है. ये भी लोग जानते हैं मगर हमेशा कि तरह से जानने से ही सब नहीं हो जाता. 1950 के दशक के कपिल भट्टाचार्य की आशंका की पुष्टि हाल में गंगा के इलाके का हवाई सर्वे करने वाले आईआईटी के प्रोफेसर राजीव सिन्हा करते हैं. जिनका बयान डाउन टू अर्थ में छपा है कि गाद का जमाव सचमुच में बहुत ज्यादा है. यह अविश्वसनीय है.

सिन्हा बाढ़ की समस्या का अध्ययन करने के लिए बिहार सरकार द्वारा गठित विशेषज्ञ दल के सदस्य हैं. इसके बाद अर्चना मछुआरों की बस्ती में जाती हैं, वहां भी वही बात कही जाती है कि पहले गंगा पचास से साठ हाथ गहरी होती थी अब आठ से दस हाथ गहरी है. यानी 1950 से लेकर 2017 तक एक ही राय उभर कर सामने आती है. अर्चना ने जब केंद्रीय जल आयोग, गंगा बाढ़ नियंत्रण आयोग, केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय से बात करनी चाही तो किसी ने बात नहीं की. सबको पता है कि जब वोट मिल ही जाता है तो सवाल का जवाब क्यों दें. यही नहीं पहले बाढ़ आती थी तो पानी कुछ दिनों में चला जाता था, अब बाढ़ का पानी कई दिनों तक मेहमान बनकर रहता है. इसका असर खेती पर भी पड़ा है. गाद भरने से गंगा की अस्सी फीसदी मछलियां समाप्त हो गईं हैं. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का बयान है कि बिहार जैसे राज्य को ज़मीन के कटाव और बाढ़ के तत्काल प्रभाव को रोकने पर ही 1000 करोड़ खर्च करना पड़ता है. गाद को हटाना अब संभव नहीं है. हटाकर रखेंगे कहां ये बड़ी चुनौती हो गई है.
 


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