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डूबते कर्ज़ की बातों से पीएनबी घोटाले को ढकने की कोशिश?

गौर करने की बात है कि वित्त मंत्रालय की तरफ से कुछ नहीं कहा गया है सो सरकार के पास यह गुंजाइश बाकी है कि वह कल के दिन यह भी कह दे कि हमारी बैंकिंग प्रणाली अभी भी मज़बूत है और देश को डरने की जरूरत नहीं है.

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डूबते कर्ज़ की बातों से पीएनबी घोटाले को ढकने की कोशिश?
क्या इसे बैंकों की हालत हद से ज्यादा नाज़ुक होने का ऐलान माना जाए? सोमवार को रविशंकर प्रसाद की प्रेस कॉन्फ्रेंस से लगा तो ऐसा ही. भले ही उनके अपने मंत्रालय का इससे ज्यादा लेना देना नहीं है लेकिन उनकी सरकारी हैसियत सरकार के प्रवक्ता से कम नहीं है. गौर करने की बात है कि वित्त मंत्रालय की तरफ से कुछ नहीं कहा गया है सो सरकार के पास यह गुंजाइश बाकी है कि वह कल के दिन यह भी कह दे कि हमारी बैंकिंग प्रणाली अभी भी मज़बूत है और देश को डरने की जरूरत नहीं है. लेकिन इतना तय है कि प्रसाद की इस प्रेस कॉन्फेंस में सबसे दनदनाटेदार यही बात थी कि बैंकिंग प्रणाली तार तार हो चुकी है, ध्वस्त हो चुकी है.

मकसद पीएनबी घोटाले से बचाव का था
दरअसल बजट सत्र के दूसरे चरण के पहले दिन ही पीएनबी घोटाले को लेकर संसद नहीं चल पाई. बार-बार हंगामा होता रहा. सदन की कार्यवाही बार-बार टलती रही. आखिर में इसे अगले दिन तक के लिए स्थगित करना पड़ा. जब संसद में बात ही शुरू नहीं हुई तो विपक्ष पीएनबी पर नहीं बोल पाया और न ही सरकार की तरफ से जवाब का मौका बना. लेकिन सत्तारूढ़ दल यानी भाजपा की तरफ से संसद के बाहर यानी प्रेस कॉन्फेंस करके अपनी बात कह ली गई. प्रवक्ता ने पुरानी बातें ही दोहराईं लेकिन ऐसे तेवर में दोहराईं जैसे बड़ी सनसनीखेज बातें बता रहे हों. लेकिन लगता है मीडिया को उनकी बातों को आगे बढ़ाने लायक कोई खास नुक्ता मिला नहीं. फिर भी इस प्रेस कॉन्फेंस के मकसद पर गौर करते हुए एक खास बात देखी जा सकती है. मसलन बैंकों की हालत हद से ज्यादा नाजुक होने का कबूलनामा सरकार की तरफ से पहली बार आया है. जबकि मीडिया को लगता था कि इस प्रेस कॉन्‍फ्रेंस में भाजपा पीएनबी घोटाले पर अपनी तरफ से कोई नहीं बात कहेगी. यानी इस घोटाले पर अपने बचाव में कोई नया तर्क लेकर आएगी. लेकिन एक अच्छी खासी लंबी प्रेस कॉन्‍फ्रेंस में पीएनबी घोटाले के बारे में सबसे कम और बैंकों की पुश्तैनी बदहाली, कांग्रेस की कमज़ोरियों, यूपीए सरकार के वक़्त हुईं गड़बड़ियों, आधार पर विपक्ष का रुख, कार्ती चिदंबरम का घपला, त्रि‍पुरा में अपनी जीत को देश की जनता का समर्थन मानने जैसी बातें ज्यादा की गईं.

घोटाले को पुश्तैनी साबित करने के लिए
ज़रा गौर करें तो सरकार की तरफ से अनौपचारिक कोशिश यह है कि कैसे भी हो किसी तरह पीएनबी घोटाले की जड़ें पुरानी यूपीए सरकार में दिखा दी जाएं. फिलहाल पीएनबी घोटाले के तार सीधे-सीधे पांच सात साल पहले से खींचने में दिक्कत है लिहाजा अब बात को इस तरह से रखने की कोशिश लगती है कि बैंकों की हालत पतली होने का कारण यूपीए सरकार थी. लेकिन दिक्कत यह है कि पीएनबी घोटाला बिल्कुल अलग चीज़ है जो फर्जीवाड़े का मामला है. जबकि बैंकों के कर्ज वापस न आने की समस्या यानी एनपीए का मामला बिल्कुल ही अलग बात है. हालांकि तराजू पर रखकर तौलें तो एनपीए बेशक कई गुने वज़न की समस्या साबित हो सकती है. इसीलिए हो सकता है कि प्रेस कॉन्फेंस में पीएनबी घोटाले को छोटा करके पीछे सरकाने के लिए एनपीए को सनसनीखेज तरीके से आगे लगाया गया हो. यह तरीका पीएनबी से पिंड छुड़ाने के लिए फौरी तौर पर तो सरकार के काम का हो सकता है. लेकिन जब एनपीए की जड़ों और तनों की बात होगी तो मौजूदा सरकार को नए सिरे से अपने बचाव में लगना पड़ सकता है. क्योंकि कर्ज पर ब्याज़ उतनी बड़ी समस्या नहीं होती जितनी बड़ी ब्याज़ पर ब्याज़ बढ़ने से बनती है. पिछले चार साल में यह ब्याज़ पर ब्याज़ लगकर कर्ज़ की छोटी रकम कहां से कहां पहुंच गई होगी? और ऐसा भी नहीं है कि इसका पता अभी चला हो. मौजूदा सरकार के आने के साल भर बाद बैंकों के डूबते कर्ज की बातें होने लगी थीं. खुद सरकार के शीर्ष निकायों की तरफ से सरकार को समझाइश दी जाने लगी थी. यानी एनपीए कांड से बचाव के लिए मौजूदा सरकार को उतनी ही दिक्कत पेश आएगी जितनी पीएनबी घोटाले में आ रही है.

एनपीए और भी बड़ा कांड
पीएनबी घोटाला अभी बारह-पंद्रह हजार करोड़ तक पहुंच गया है. और इस घोटाले के उजागर होने से जा दूसरे घपले घोटालों का पता चल रहा है उससे नुकसान का आंकड़ा पचास हजार करोड़ तक पहुंचने का अंदेशा है. बेशक यह रकम बहुत बड़ी है. खासकर दो तीन साल से नाज़ुक होती जा रही बैंको की हालत के मददेनजर बहुत ही बड़ी है. ऊपर से पीएनबी घोटाले ने अचानक खतरे का सायरन सा बजा दिया है. इसीलिए पीएनबी घोटाले के अलावा भी बैंकों की मरणासन्न स्थिति एक बहुत बड़ा खतरा साबित हो रही है. अभी इस खतरे की तीव्रता का ठीक-ठीक अनुमान तो नहीं है फिर भी मोटा अनुमान है कि बैंकों की आठ से दस लाख करोड़ की रकम कर्जदारों के पास फंसती जा रही है या यों कहें कि फंस ही गई है. इस तरह इस समय यह भी हिसाब लगाना शुरू कर देना चाहिए कि एनपीए से निपटने के लिए क्या किया जा सकता है.

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कर्ज़ वसूलना उतना मुश्किल नहीं है
कर्ज़ देते समय उसकी वापसी के बहुत सारे इंतजाम करके रखे जाते हैं. जमानत अमानत के इतने सारे इंतजाम किए जाते हैं कि कर्जदार आसानी से भाग नहीं सकता. भले ही इस मामले में भी कुछ गड़बड़ियों की गुंजाइश होती हो लेकिन ऐसा नहीं होता कि कोई पूरा फर्जीवाड़ा करके ही बैंकों से कर्ज़ ले ले. कुछ अपवाद अलग बात है. यानी कर्ज़ के बहुत बड़े हिस्से की वसूली की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है, जो बेशक अभी भी होगी. बस दिक्कत यह है कि देश में उत्पादकता और व्यापार बढ़ाने की व्यवस्था ही हमने लोगों को बैंक से उधार दिलाने की बना रखी है. लिहाज़ा अगर कर्ज़ वसूली पर लगते हैं तो काम धंधे चौपट होने का खतरा है. और बहुत संभव है कि किसी भी तरह से कामधंधे चलाए रखने के इसी सरकारी लालच के कारण कर्ज वसूली के कड़े उपायों से परहेज किया जाता रहा हो. यह परहेज़ एक हद तक तो सहन किया जा सकता है लेकिन जब पूरी बैंकिंग प्रणाली ही बैठ जाने की स्थिति बन रही हो तो कड़ाई के अलावा चारा ही क्या बचता है. हो सकता है कि मौजूदा सरकार खुद को अब एनपीए के चक्कर में बुरी तरह फंसा पा रही हो और राजनीतिक कारणों से कह भी नहीं पा रही हो. लिहाजा पीएनबी घोटाले के बहाने सोमवार को की गई प्रसाद की प्रेस कॉन्‍फ्रेंस एक तरह से देश के एनपीए में फंसे होने का चतुर ऐलान माना जा सकता है. ऐलान में चतुराई यह है कि पीएनबी घोटाले की चर्चा बंद कराई जाए और एनपीए की जड़ें पुरानी सरकार में दिखाकर मुद्दे को बदल दिया जाए.


(सुधीर जैन वरिष्ठ पत्रकार और अपराधशास्‍त्री हैं...)
 
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति NDTV उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार NDTV के नहीं हैं, तथा NDTV उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.


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