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मोदी सरकार के दो साल : ब्रांड मोदी और आने वाली चुनौतियां

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मोदी सरकार के दो साल :  ब्रांड मोदी और आने वाली चुनौतियां

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (फाइल फोटो)

किसी भी सरकार के पास गिनाने के लिए अनगिनत उपलब्धियां होती हैं और विपक्षी दलों के पास उन उपलब्धियों को ख़ारिज करने के उतने ही तर्क होते हैं। सच क्या है यह जनता ही जानती है और वह अपना फ़ैसला चुनाव के चुनाव ही दिया करती है। गिनाने वाली उपलब्धियां छह साल के शासन के बाद वाजपेयी सरकार के पास भी थीं और दस साल के शासन के बाद मनमोहन सिंह सरकार के पास भी थीं, लेकिन दोनों सरकारों की उपलब्धियों को जनता ने ख़ारिज कर दिया। नतीजतन दोनों ही सत्ता से बाहर हो गईं।

सरकारों के कामकाज के राजनीतिक विश्लेषण कई बार बहुत ग़लत साबित होते हैं। दरअसल सरकारों के कामकाज का सामाजिक आकलन (जिसे सोशल ऑडिट कहते हैं) होना चाहिए। दुर्भाग्य से भारत में इसका एक ही वैज्ञानिक तरीक़ा है और वह है चुनाव। और जब तक चुनाव नहीं होते हमें राजनीतिक विश्लेषणों से ही काम चलाना होता है। चूंकि लोकसभा के चुनाव को तीन साल और बचे हैं इसलिए नरेंद्र मोदी के दो साल के कार्यकाल का भी फ़िलहाल राजनीतिक विश्लेषण ही करना होगा।

ब्रांड मोदी के सहारे बीजेपी पूर्ण बहुमत से सत्ता में आई
भारतीय राजनीति की परंपरागत परिपाटियों से हटकर नरेंद्र मोदी पिछले लोकसभा चुनाव में एक राजनेता से अधिक एक ब्रांड की तरह लोकप्रिय हुए और उन्होंने जीत का इतिहास रच दिया। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) इस ब्रांड मोदी के सहारे पहली बार पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आ गई। नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2014 के चुनावों में किसी चतुर पेशेवर की तरह पहले से स्थापित ब्रांड को ख़त्म किया। उन्होंने भारतीय राजनीति के सबसे बड़े ब्रांड नेहरू-गांधी परिवार के ख़िलाफ़ जमकर प्रचार किया और समाज के एक बड़े हिस्से में इस ब्रांड की महत्ता को धराशाई ही कर दिया। उनके नकारात्मक प्रचार ने मनमोहन सिंह की छवि को एक भले आदमी से नाकाम आदमी में बदल दिया। फिर इस ध्वस्त ब्रांड का स्थान भरने के लिए उन्होंने अपनी एक सकारात्मक छवि चमकाई।


अपनी छवि चमकाने के लिए नरेंद्र मोदी ने ‘अच्छे दिन’,‘भ्रष्टाचार से मुक्त सरकार’,‘काले धन की विदेशों से वापसी’से लेकर ‘गुजरात मॉडल’और ‘मिनिमम गवर्नमेंट मैक्सिम गवर्नेंस’ जैसे कई लुभाने वाले नारे दिए। पाकिस्तान को सबक सिखाने और अवैध रूप से भारत में रह रहे बांग्लादेशी नागरिकों को देश से रुख़सत करने जैसे कई असंभव वादे भी किये गये। सिनेमाई मनोरंजन के आदी मध्यम वर्ग को एकाएक लगा मानो कोई मसीहा आने वाला है। मोदी सरकार के इन दो बरसों को ब्रांड मोदी की मसीहाई के पैमाने पर तोलना चाहिए।

अच्छे दिन के सपने दिखाना और हकीकत में बदलना अलग-अलग बात
सरकार संभालने के कुछ ही महीनों के भीतर नरेंद्र मोदी और उनके सिपहसालार अमित शाह को यह अहसास हो गया कि कुछ गड़बड़ हो गई है। उन्हें समझ में आ गया कि हर भारतीय के खाते में 15 लाख लाना तारे तोड़कर लाने जैसा है। वे समझ गए कि अच्छे दिन के सपने दिखाना और उसे हक़ीकत में बदलना दो अलग-अलग बातें हैं। लिहाजा अमित शाह को जनता से कहना प़ड़ा कि जो कुछ चुनावों के दौरान कहा गया, वह चुनावी जुमला था।

वे भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ हर मंच पर एक तरह से शपथ लेते हुए दिखते हैं और कहते हैं कि ‘न खाऊंगा और न खाने दूंगा’ लेकिन हक़ीकत में वे वसुंधरा राजे सिंधिया से लेकर शिवराज सिंह और रमन सिंह तक अपने ही मुख्यमंत्रियों के ख़िलाफ़ लग रहे भ्रष्टाचार के आरोपों को अनदेखा करते हैं। वे भ्रष्टाचारियों को सबक सिखाने की बात करते हैं लेकिन पनामा पेपर्स पर उनकी सरकार का रवैया उनके भक्तों को भी अखरता है। उनकी पार्टी पाकिस्तान को सबक सिखाने की बात करती है लेकिन नरेंद्र मोदी अपने शपथ ग्रहण समारोह से लेकर नवाज़ शरीफ़ की बेटी की शादी तक उनसे दोस्ती का हाथ बढ़ाते ही दिखते हैं। जो गुजरात की गद्दी से दिखता था, वह लुटियन के टीले से कुछ और ही दिखता है.

मायावी नहीं, री-पैकेजिंग के उस्ताद
नरेंद्र मोदी ने एक आस लोगों के मन में जगा दी थी कि वे नया भारत गढ़ने जा रहे हैं। लेकिन हक़ीकत यह सामने आई कि वे हवा में कुछ पैदा कर सकने वाले मायावी नहीं हैं। वे हो भी नहीं सकते थे। इसलिए उन्होंने पिछले दो बरसों में नई बोतलों में पुरानी शराब परोसने का ही फ़ार्मूला अपनाया। स्वच्छता अभियान से लेकर जनधन योजना तक अधिकांश योजनाएं पहले से ही अस्तित्व में थीं। मोदी ने अपने जनसंपर्क के कौशल और वाकचातुर्य से जनता को समझाया कि यह कोई क्रांति है,  जबकि हक़ीकत कुछ और है।

प्रधानमंत्री संसद में 'मनरेगा' का मखौल उड़ाते हैं और आश्चर्यजनक रूप से उनके वित्तमंत्री इसी योजना के लिए बजट में अधिक धनराशि का इंतज़ाम करते दिखते हैं। वे आधार कार्ड के ख़िलाफ़ दिखते हैं लेकिन दो साल के भीतर की उसी आधार कार्ड को अनिवार्य बनाने की वक़ालत करते हैं। जानकार दावा करते हैं कि 'मेक इन इंडिया' जैसी कोई स्कीम भी योजना आयोग के दस्तावेज़ों में पहले से मौजूद थी।

नई नीतियों में नया क्या है?
एक आर्थिक विश्लेषक ने मोदी सरकार के छह महीने पूरे होने के बाद लिखा था कि किस तरह नई नीतियां बनाने में मोदी सरकार अपनी ही पार्टी की वाजपेयी सरकार से मीलों पीछे है। यह बात आज भी ठीक लगती है कि मोदी सरकार नई नीतियां बनाने में दिलचस्पी लेती नहीं दिखती। यह भी शायद उनकी विफलता की तरह देखा जाएगा। एक नीति ज़रूर धीरे-धीरे स्पष्ट हो रही है और वह यह कि मोदी सरकार चाहती है कि सरकारी अनुदान और सब्सिडी पर लोगों की निर्भरता कम की जा सकती है, की जानी चाहिए। चाहे वह गैस की सब्सिडी हो या उच्च शिक्षा में मिलने वाला अनुदान हो। हालांकि अभी स्पष्ट नहीं है कि इसका विकल्प क्या होगा, लेकिन इससे लोगों में नाराज़गी पनप रही है।

मोदी जी ने जब कामकाज संभाला था तब ऐसा लगता था कि सरकार यह आस लगाए बैठी है कि देशी और विदेशी उद्योगपति भारत में भारी भरकम निवेश के लिए टूट पड़ेंगे, लेकिन ऐसा होता हुआ दिखा नहीं। ज़्यादातर उद्योगपति और व्यावसायी अभी भी नीतियों में ऐसे परिवर्तनों की बाट जोह रहे हैं जो उनके लिए निवेश का रास्ता आसान बनाए। जीएसटी जैसा अहम बिल भी एक के बाद एक संसद सत्र के बाद लटकता जा रहा है। संयोग ही था कि नरेंद्र मोदी के सत्ता संभालते ही कच्चे तेल के दामों में भारी भरकम गिरावट आई। इसका फ़ायदा सीधे जनता तक पहुंचाने की जगह सरकार ने चतुराई से इसे अपने खाते में डाल लिया। जब तक तेल की क़ीमतें कम हैं, तब तक तो चिंता नहीं लेकिन अगर अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में बदलाव हुआ तो सरकार की परेशानी शुरू हो जाएगी। वैसे भी सरकार की आर्थिक नीतियों से रिज़र्व बैंक की असहमति किसी से छिपी नहीं है।

यूपी में होगी नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता की असल परीक्षा
नरेंद्र मोदी की जीत एक आंधी की तरह थी। उसके बाद उन्हें स्वाभाविक रूप से लग रहा था कि उनके हाथ कोई 'पारस पत्थर' लग गया है, लेकिन यह भ्रम जल्दी ही दिल्ली में टूटा जब केजरीवाल ने दिल्ली में ऐसी जीत दर्ज की जिसका कल्पना भी अमित शाह और नरेंद्र मोदी की जोड़ी ने नहीं की होगी। दूसरा झटका बिहार में लगा जब नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव और कांग्रेस ने साथ आकर भाजपा को रोक दिया। यह भ्रम टूटा कि मोदी अपराजेय हैं। इससे भाजपा में एक तरह से हताशा का माहौल ज़रूर बना,  लेकिन हाल ही में हुए 5 राज्यों के चुनाव के परिणामों ने उसमें फिर ऊर्जा भरी है। अगर इन परिणामों को मई 2014 के बरक्स देखें तो भाजपा के लिए परिणाम वैसे नहीं हैं जिसकी कल्पना वे तब कर रहे थे।  लेकिन दो करारी हार के बाद ये जीत पार्टी के लिए बुरी नहीं है। असम का झोली में आना और केरल में खाता खुलना दोनों अच्छे संकेत हैं, लेकिन यह उस सपने से बहुत दूर है जिसमें पश्चिम बंगाल से लेकर तमिलनाडु तक हर जगह कमल खिलने वाला था।

मोदी सरकार की लोकप्रियता की अगली और असली परीक्षा अगले साल होगी जब उत्तर प्रदेश की जनता वोट डालेगी। इस चुनाव को लेकर भाजपा के नेता फ़िलहाल तो बहुत आश्वस्त और आशावादी नहीं दिख रहे हैं। अमित शाह का तो ख़ैर धर्म है कि वे ज़ोर से कहें कि ‘यूपी में हमारे अलावा कौन जीतेगा। सरकार  की नीतियों में तो ऐसा कुछ नहीं दिखता जिसे अलग कहा जा सके। अलबत्ता आरएसएस पार्टी की ओर से हिंदुत्व का जो परचम लहराया गया है उसे सरकार के स्तर पर ख़ूब हवा दी जा रही है।  ऐसा लगता है कि हिंदुत्व को राष्ट्रवाद में घोलकर ही अलगे चुनावों के लिए कोई नया रास्ता निकालने की कोशिश हो रही है। मोदी सरकार फ़िलहाल देशभर के संस्थानों में अपनी पसंद के लोगों की नियुक्तियों में लगी है। हो सकता है कि वे उम्मीद कर रहे हों कि जैसे ही वे कामकाज संभालेंगे तो परिदृश्य बदल जाएगा लेकिन यह सिर्फ़ उम्मीद है। तब तक तो मोदी सरकार वैसी ही है जैसा कि अरुण शौरी ने कुछ समय पहले कहा था, “यूपीए की सरकार में गाय जोड़ दीजिए तो मोदी सरकार बन जाती है।”

मोदी की एकमात्र सफलता बस यह ...
जिस तरह से दो बरस बीते हैं उसमें तो ऐसा लगता नहीं कि यह सरकार कोई चमत्कार करने जा रही है। रोज़गार के अवसर पैदा करने से लेकर किसानों को राहत देने तक हर स्तर पर सरकार की रिपोर्ट सकारात्मक तो नहीं ही है। सूखे से लेकर भ्रष्टाचार के मामलों से निपटने में भी यह सरकार वैसी ही है जैसी कि पूर्ववर्ती सरकारें थीं। एक बात अलबत्ता बहुत अच्छी हो गई है कि अब सरकार के कामकाज के बारे में ख़ुद प्रधानमंत्री बहुत कुछ बोलते रहते हैं हालांकि विवाद के मुद्दों पर चुप्पी साधने में वे मनमोहन सिंह से दो क़दम आगे ही दिखते हैं।फिलहाल तो मोदी जी एकमात्र सफलता दिखती है कि उन्होंने दिशाहीन सी दिख रही कांग्रेस को और कमज़ोर किया है, लेकिन उन्हें ख़ुश नहीं होना चाहिए क्योंकि कांग्रेस ने पहले भी साबित किया है कि वह राख से फिर खड़ी हो जाती है। जैसा कि मोदी ने 15 साल पहले एक इंटरव्यू में कहा था कि राजनीतिक पार्टियां ख़त्म नहीं होतीं। अगर यह भाजपा के लिए सच था तो कांग्रेस के लिए भी ग़लत नहीं हो सकता। धीरे-धीरे निराशा के स्वर उभर रहे हैं। पता नहीं वे कहां जाकर ठहरेंगे।

अब लोग पूछने लगे हैं कि 2019 में क्या होगा? और फिर किसी कोने से एक आकलन आता है कि चुनाव सरकार की नीतियों से नहीं जीते जाते।  अगर यह सही है तो फिर पार्टी के पास पाकिस्तान से लेकर हिंदुत्व तक बहुत कुछ है जो सोते मतदाता को जगाकर कमल खिलाने में मदद कर सकता है।

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-विनोद वर्मा वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति एनडीटीवी उत्तरदायी नहीं है। इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार एनडीटीवी के नहीं हैं, तथा एनडीटीवी उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।



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