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उमाशंकर सिंह की कलम से : मोदी जी का 'ध्यानाकर्षण प्रस्ताव' और उसका नतीजा

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उमाशंकर सिंह की कलम से : मोदी जी का 'ध्यानाकर्षण प्रस्ताव' और उसका नतीजा

स्वच्छ भारत अभियान के तहत झाड़ू लगाते पीएम नरेंद्र मोदी

नई दिल्ली: आपको एक बात बताता हूं। कुछ विश्वसनीय सूत्रों के मुताबिक सरकार बनने के कुछ हफ्ते बाद ही मंत्रियों का एक छोटा-सा दल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलने गया। शुरुआती बातों के बाद मंत्रियों ने उनसे फरियाद की कि लोग महंगाई पर सवाल पूछ रहे हैं, और चूंकि हम महंगाई के मुद्दे पर भी चुनाव जीतकर आए हैं, और यह कम नहीं हो रही है, सो, लोगों को जवाब देना मुश्किल हो रहा है। मोदी जी मंत्रियों की बात गौर से सुनते रहे, फिर इन शब्दों में बोले, देखिए, महंगाई तो जो बढ़नी थी, बढ़ गई... अब यह कम होने से रही... और महंगाई को लेकर तो आप जानते हैं कि यह और आगे बढ़ सकती है... महंगाई विश्व अर्थव्यवस्था से जुड़ी चीज़ है... यह तो आप सब जानते ही हैं...

मोदी जी की बात सुनकर मंत्रियों ने आश्चर्य से पूछा, फिर हम पब्लिक को क्या मुंह दिखाएं? उन्हें कैसे समझाएं? आखिर यही सारी दलीलें तो पिछली सरकार भी देती आई थी, फिर हम उन्हें क्या कहें? मोदी जी ने शांतचित्त भाव से कहा, आप पब्लिक का आकर्षण दूसरी तरफ क्यों नहीं ले जाते। कहने का मतलब कि लोगों का ध्यान कुछ ऐसी तरफ ले जाएं कि वे महंगाई की बात भूलकर उसमें लग जाएं। मंत्रियों को बात समझ नहीं आई, लेकिन मोदी जी के सामने एक सीमा से आगे अपनी बात कहने का कोई मतलब नहीं, सो, मंत्री लोग बैरंग लौट गए।

इस जानकारी को पहले मैंने हल्के में लिया, लेकिन फिर सरकार के क्रियाकलापों पर गौर करना शुरू किया। मंत्रियों की तरफ से तो ऐसा कुछ नज़र नहीं आया, जिससे पब्लिक का आकर्षण महंगाई से हटकर दूसरी तरफ जाए, सिवाए कुछ विवादों के। जैसे अनुच्छेद 370 पर दिया गया जितेंद्र सिंह का बयान, या फिर डिग्री विवाद ठंडा पड़ जाने के बाद अचानक एक दिन स्मृति ईरानी का येल यूनिवर्सिटी की अपनी डिग्री को लेकर आगे आना - इन सब विवादों ने कुछ सुर्खियां बटोरीं, लेकिन आशातीत सफलता नहीं मिली।

फिर पाया कि मोदी जी ने इस मोर्चे की कमान खुद ही संभाल ली है। ऐसे तमाम मौके आपके सामने हैं, जहां मोदी जी के भाषण या उनके बयानों ने अलग ही सुर्खियां बटोरीं। इस बात में कोई शक नहीं कि वह बहुत सक्रिय प्रधानमंत्री हैं, हर चीज़ अपने तरीके से करना चाहते हैं। कुछ कानूनों के जरिये, तो कुछ कानूनों को मिटाकर। वह अपनी उपस्थिति से हर मौके को एक इवेंट में बदल देते हैं।

अब चाहे वह श्रीहरिकोटा में वैज्ञानिकों की खास उपलब्धि के मौके पर उपस्थित हो उनकी हौसलाअफ़ज़ाई करने की बात हो या फिर सार्क सैटेलाइट का ऐलान कर सुर्खियां बटोरने की बात। हर बार वह कुछ ऐसा नया कर देते हैं कि अलग ही सुर्खियां चल पड़तीं हैं। इसमें नकारात्मकता वाली कोई बात नहीं, अच्छी बात है, और शायद उनकी दूरदर्शिता से जुड़ी भी।

लेकिन, यह भी सच है कि इन सबके बीच मूल मुद्दे पर से ध्यान हट जाता है। आप सिलसिलेवार ढंग से भूटान से लेकर उनकी नेपाल तक की यात्रा को देख लीजिए। या फिर जापान के दौरे से लेकर चीनी राष्ट्रपति के भारत दौरे तक। कैसे सब कुछ मोदी जी के बने-बनाए प्रभामंडल के आसपास ही सिमटा रह गया। उन्होंने कुछ न कुछ ऐसा बोला, ऐसी उम्मीद जगाई, ऐसा भरोसा या आंकड़ा दिया कि असल मुद्दों से मीडिया हट उन बयानों पर न्योछावर होने लगा।

और फिर लोगों का ध्यान भी उसी तरफ आकर्षित होने लगा। एक बड़ा उदाहरण जापान का है। मोदी की यात्रा से पहले जापान के पीएम शिंज़ो आबे ट्विटर पर जिन तीन लोगों को फॉलो करते थे, मोदी उनमें से एक थे (अब वह चौथे व्यक्ति के रूप में केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह को भी फॉलो करने लगे हैं)। इस लिहाज़ से जापान का दौरा मोदी के लिए पर्सनल कैमिस्ट्री के लिहाज़ से अहम था। जापान और भारत के बीच परमाणु करार अभी तक नहीं हुआ है। इसे अगर पिछली सरकार की कमी मान लें तो 'विश्वनेता बनने की ओर अग्रसर' मोदी जी पर यह ज़िम्मेदारी थी कि वह इसे फलीभूत करते, लेकिन यह नहीं हुआ। कुछ अख़बारों में इस बाबत ख़बर भी छपी, लेकिन जैसे ही उन्होंने ढोल बजाया, मीडिया दीवाना हो गया, और उन्होंने एक अलग ही चर्चा बटोर ली।

दूसरा उदाहरण, अपने कश्मीर में बाढ़ में फंसे लोगों को अभी निकाला भी नहीं गया था, उन तक पूरी तरह से मदद पहुंची भी नहीं थी कि पाकिस्तान के कब्ज़े वाले कश्मीर को मदद की बात ने पब्लिक का ध्यान दूसरी तरफ खींच लिया। फिर नवाज़ शरीफ़ के साथ चली खतो-किताबत भी कई दिन तक सुर्खियों में रही। कश्मीर में लोग सरकारी मदद से अब भी महरूम हैं। हालांकि इसका दारोमदार राज्य सरकार पर है, और वह खुद को पंगु करार दे चुकी है।

ऐसे में भारत की एकता, राष्ट्रवादिता आदि की बात करने वाली पार्टी की सरकार आंखें मूंदकर क्यों बैठी है। अगर राज्य सरकार कुछ नहीं कर पा रही है तो केंद्र की ज़िम्मेदारी नहीं बनती कि वह वैकल्पिक उपाय करे। यह बात इसलिए लिख रहा हूं, क्योंकि कश्मीर कवरेज के दौरान लोगों के गुस्से को देखा है। उनकी इस मांग को भी सुना है कि सीधे केंद्र दखल दे तो हमें मदद की उम्मीद है, वरना नहीं। ख़ैर, कश्मीर के बाढ़ पीड़ित अब सुर्खियों में नहीं हैं। असम के बाढ़ पीड़ितों की पीड़ा सामने आई ही नहीं, क्योंकि मीडिया दूसरे आकर्षणों में फंसा है।

फिर आई मंगलयान की बारी। इस बड़ी उपलब्धि पर प्रधानमंत्री की मौजूदगी बेहद उत्साहवर्धक रही। सात रुपये प्रति किलोमीटर से भी कम खर्च पर मंगल पर पहुंचने की कामयाबी पर हमने जमकर जश्न मनाया, और मनाना भी चाहिए, क्योंकि उपलब्धि ही इतनी बड़ी है, लेकिन इस बीच हमें एहसास ही नहीं हुआ कि हमारे रसोई के ईंधन की कीमत बढ़ा दी गई। बिना सब्सिडी वाला सिलेंडर महंगा हो गया। सब्सिडी वाले सिलेंडर पर पहले छह, फिर नौ और फिर 12 का कैप लगाने के पिछली सरकार के फैसले पर हायतौबा मचाने वाली बीजेपी अब अपनी सरकार के दौरान इसे 12 से 13 भी नहीं कर पाई है। यह अलग से सोचने की बात है।

यहां हम बात कर रहे हैं, पब्लिक के आकर्षण को दूसरी तरफ ले जाने की। अमेरिका दौरा हर भारतीय प्रधानमंत्री का बड़ा और अहम दौरा होता है। पीएम मोदी का भी रहा। उन्होंने वहां सब कुछ नए तेवरों और कलेवर के साथ किया। इसमें कोई दो राय नहीं कि डॉ मनमोहन सिंह की तुलना में नरेंद्र मोदी का दौरा ज़्यादा भव्यता और सक्रियता समेटे रहा। यह दौरे की भव्यता और सक्रियता का ही नतीजा है कि पुरानी सरकार की नीतियों को आगे बढ़ाने वाले उनके कई ऐलानों को भी मीडिया ने ऐसे परोसा और लोगों ने ऐसे लिया, मानो वे सब नई सरकार के सौ दिन का ही कमाल हो।

मोदी के अमेरिका दौरे से हासिल उपलब्धियों की विवेचना अख़बारों में जगह पाती, इससे पहले ही मोदी जी ने 2 अक्टूबर को स्वच्छ भारत अभियान का ऐलान कर दिया। हाथ में झाड़ू पकड़ने की जानकारी ने ऐसा रंग जमाया कि आम आदमी पार्टी की दिल्ली विधानसभा चुनाव में हुई जीत के जश्न में हाथ में लेकर लहराए गए सैंकड़ों झाड़ुओं की असरदार तस्वीर भी धुंधली पड़ गई। उदाहरण कई हैं। कुछ मुझे याद हैं, कुछ आपको याद होंगे।

लेकिन इन सबके बीच हम लोग जो भूल गए हैं, वह यह है कि सब्ज़ियों के दाम अब भी हमारी जेब काट रहे हैं। आलू-प्याज़ अब भी 35-40 रुपये किलो बिक रहा है। टमाटर की क़ीमत टीवी पर नहीं आ रही, इसलिए लगता है लोग भी भूल गए हैं। वह भी 45-50 रुपये किलो बिक रहा है। चाहे दाल की क़ीमतें हों या फिर खाने-पीने की दूसरी चीज़ों की, ऐसा नहीं है कि सब चुनावी वादों के हिसाब से ज़मीन पर आ गए हों, बल्कि अभी भी ये अपनी तेज़ी में हैं।

घर का ईएमआई अभी भी कम नहीं हुआ है। रेल किरायों में पहले 14 फीसदी बढ़ोतरी के बाद अब फिर तत्काल टिकटों के किराये में बढ़ोतरी होने वाली है। हां, पेट्रोल की कीमतों में कुछ गिरावट ज़रूर हुई है, लेकिन क्योंकि पेट्रोल की प्राइसिंग पर सरकार का नियंत्रण नहीं, इसलिए बढ़ने का दोष उनको नहीं दिया जा सकता, तो घटने का क्रेडिट क्यों।

अंत में कहना चाहता हूं कि मोदी जी, लोकतांत्रिक तरीके से चुने हुए प्रधानमंत्री के तौर पर आप देश को जिस दिशा में, जिस गति से और जितनी भी ऊंचाई पर ले जाना चाहते हों, हम आपके साथ हैं। मैं तो बस इतना कह रहा हूं कि दरअसल महंगाई अब हमारे लिए मुद्दा नहीं, क्योंकि 'पब्लिक का आकर्षण' दूसरी तरफ ले जाने में आप कामयाब रहे हैं। जनता घर की खाली रसोई की भी सफाई में जुट गई है। उम्मीद है, आपके मंत्रियों को भी आपका यह मंत्र अब समझ में आ गया होगा।

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