उमाशंकर सिंह की कलम से : हम भी हैं रेस में...

उमाशंकर सिंह की कलम से : हम भी हैं रेस में...

फाइल फोटो

नई दिल्ली:

तक़रीबन सारे राजनीतिक पंडित और पूरा मीडिया यह मान कर चल रहा है कि कांग्रेस इस चुनाव में कहीं नहीं है। मुक़ाबला सिर्फ बीजेपी और आम आदमी पार्टी के बीच है। अनुमान यहां तक लगाया जा रहा है कि कांग्रेस को इस बार आठ सीट मिलनी भी मुश्किल होगी। उसकी सीटें घट सकती हैं। पिछले विधानसभा चुनाव से भी बुरी हालत उसकी हो सकती है।

लेकिन कांग्रेस लगातार यह जताने की कोशिश कर रही है कि हम भी रेस में हैं। चाहे प्रचार समिति के अध्यक्ष अजय माकन हों या प्रदेश अध्यक्ष अरविंदर सिंह लवली, कांग्रेस के बेहतर प्रदर्शन के लगातार दावे कर रहे हैं। दावे तो चुनाव नतीजे आने के ठीक पहले तक चलते रहते हैं। वैसे कांग्रेस राहुल गांधी और सोनिया की रैली में जुटी भीड़ दिखा कर भी भरोसा दिलाने की कोशिश कर रही है कि मतदाता उसकी तरफ लौट रहे हैं।

आख़िर कांग्रेस को क्यों ऐसा लगता है कि जिस दिल्ली ने उसे तख़्त से उठा कर सड़क पर ला दिया, वही दिल्ली एक साल
के भीतर उसके साथ सम्मानजनक तौर से पेश आएगी। इसके पीछे पार्टी की कुछ अपनी गणना है और कुछ उससे जुड़े आकलन।

कांग्रेस को लगता है कि मोदी सरकार के पिछले 8 महीने के कामकाज़ से लोगों में निराशा का भाव है। यानि वह मान कर चल रही है कि इन आठ महीनों में केंद्र सरकार के खिलाफ जो एंटी इनकम्बेंसी फैक्टर पैदा हुआ है उसे वह अपने पक्ष में भुना पाएगी, लेकिन वह शायद यह भूल रही है कि अगर केंद्र की मोदी सरकार के खिलाफ कोई एंटी इनकम्बेंसी पैदा हुआ है तो वह कांग्रेस से ज्यादा मज़बूत दावेदार मानी जा रही आम आदमी पार्टी के पक्ष में जाएगा।

लेकिन यहां कांग्रेस की गणना मान कर चल रही है कि क्योंकि अरविंद केजरीवाल 49 दिनों में इस्तीफ़े देकर अपनी ज़िम्मेदारी
से भाग गए थे और जनता का उन पर भरोसा टूटा। इससे कांग्रेस को लगता है कि वह केजरीवाल के करने की बजाय धरने की
राजनीति से मध्य वर्ग के जिस एक तबके का मोहभंग हुआ वह कांग्रेस की तरफ लौटेगा।

केजरीवाल के बहुत सारे चुनावी वादे सत्ता में आते ही रंग बदलने लगे थे और कांग्रेस को भरोसा है कि वोटरों ने इसे याद रखा हुआ है। जनता दरबार लगाने से लेकर संगम विहार जैसे इलाक़ों में वादे के हिसाब से पानी पहुंचाने तक, आम आदमी पार्टी सत्ता में आने के बाद वादों को पूरा करने की मुश्किलों से दो-चार हुई और उस पर सवाल उठे।

कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी के हाथों जो अपनी ज़मीन गंवाई थी उसे पाने की पुरज़ोर कोशिश कर रही है। लेकिन कई ज़मीनी
हक़ीकतों को शायद वह जानबूझ कर नज़रअंदाज़ कर रही है। जैसे, वह झुग्गी वालों को पक्के मकान का अधिकार देने संबंधी
कानून बनाने की बात से लेकर डेढ़ रुपये प्रति यूनिट बिजली तक, उन्हें रिझाने की हर संभव कोशिश में जुटी है। लेकिन वह भूल
रही है कि केजरीवाल की सबसे बड़ी ताक़त 49 दिनों के शासन में पुलिसिया भ्रष्टाचार पर काबू पाने की रही।

झुग्गी बस्तियों में रहने वाला बड़ा तबका जो रेहड़ी पटरी पर अपनी दूकान लगा कर अपनी जीविका चलाता है, उसके लिए यह किसी वरदान से कम नहीं था। केजरीवाल के जाते ही कहते हैं कि पुलिस वाले एरियर भी लेने आ गए। कालका जी जहां राहुल गांधी ने बड़ा रोड शो किया, वहां कई झुग्गी वालों का कहना है कि बिजली तो वे दो रुपये भी ले लेंगे। अगर पुलिस वाले हर दिन 30 रुपये के हिसाब से जो वसूली कर ले जाते हैं वह पैसे तो बच जाए तो। वैसे पुलिस वाले 1000 रुपये महीने की बजाय 2000 की मांग करने लगे हैं। ऐसे में भ्रष्टाचार पर अंकुश इन लोगों के लिए सबसे ज़्यादा मतलब रखता है और पिछले चुनावों में भ्रष्टाचार के आरोप झेल चुकी कांग्रेस के पास इस भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कोई ठोस भरोसा दे पाने में अक्षम है।

हालांकि घोषणापत्र से लेकर हर मंच से वह भी भ्रष्टाचार से लड़ने की बात कर रही है। आम आदमी पार्टी को कांग्रेस एक सूरत में नुकसान पहुंचा जा सकती है। अगर कांग्रेस किसी भी तरह कुछ वोट आम आदमी पार्टी से छीनने में कामयाब रहती है तो बीजेपी के साथ उसके मार्जिन पर असर पड़ेगा। यह तब होगा जब बीजेपी अपने वोट साबूत रख पाने में क़ामयाब रहती है।

कांग्रेस की सीटें बेशक न बढ़ा पाए, लेकिन अगर वो अपने वोट बढ़ाने में क़ामयाब हो जाए तो इसका सीधा फ़ायदा बीजेपी को होगा। कांग्रेस के वोट घटते हैं तो फ़ायदा आम आदमी पार्टी को होगा।

जैसे अगर किसी क्रिकेट टेस्ट मैच में जिस टीम से जीत बहुत दूर हो और उसे हार का ख़तरा सता रहा हो तब वह मैच ड्रॉ कराने के लिए खेलने लगती है। कांग्रेस भी मैच ड्रॉ कराने के लिए खेल रही है। दिल्ली के चुनावी मैदान में मैच ड्रॉ का मतलब फिर से हंग असेंबली है। इसलिए त्रिशंकु विधानसभा की सूरत में कांग्रेस को लगता है कि अगले मैच में वह ज्यादा बेहतर हालत में मैदान में उतर सकेगी।

फिलहाल उसका पूरा ज़ोर पिछली बार जीती आठ सीटों के अलावा उन सोलह सीटों पर है जिसमें वह दूसरे नंबर पर रही थी। इन 24 सीटों के अलावा शुएब इकबाल की सीट मिला कर 25 ठहरती है। इन 25 में वो 17-18 पर पूरी ताक़त छोंक रही है। कोशिश एकाई से दहाई अंक तक पहुंचने की है। इसलिए उसके नेता मान रहे हैं हम भी हैं रेस में...

 
Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com