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बिहार में नैतिक-अनैतिक को समझना-समझाना आसान नहीं

इस राजनीतिक आंधी तूफान में कुछ घंटे के लिए गर्द गुबार और अंधेरा छाया, उसमें दिख नहीं पाया कि उस बीच सरकार में किस किस ने अपनी भूमिकाएं यानी अपने कपड़े झंडे बदल लिए.

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बिहार में नैतिक-अनैतिक को समझना-समझाना आसान नहीं

नीतीश कुमार के साथ लालू प्रसाद यादव (फाइल फोटो)

बिहार में अचानक राजनीतिक तूफान आया और कुछ ही घंटों में सरकार बदल गई. वैसे बाहर से दिखने में ऐसा लगता नहीं है क्योंकि मुख्यमंत्री वही हैं और मुख्यमंत्री की अपनी पार्टी जेडीयू अभी भी बिहार सरकार में है. बस गठबंधन का नाम बदला है. पहले राजद, जेडीयू और कांग्रेस महागठबंधन की सरकार थी जो अब भाजपा नीतीश गठबंधन की सरकार कहलाएगी. कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि नीतीश ने राजद और कांग्रेस को बाहर निकालकर बिहार की सत्ता में भाजपा को अंदर कर दिया है. इस राजनीतिक आंधी तूफान में कुछ घंटे के लिए गर्द गुबार और अंधेरा छाया, उसमें दिख नहीं पाया कि उस बीच सरकार में किस किस ने अपनी भूमिकाएं यानी अपने कपड़े झंडे बदल लिए. इस तरह के बदलाव के नैतिक अनैतिक पहलू हो सकते थे. लेकिन यह वक्त़ ही जीत-हार या सफलता-विफलता भर देखने का है. सो कुल मिलाकर पिछले 24 घंटों में यही देखा जाता रहा है कि किसने कितनी चतुराई और हुनर से खेला और कौन जीता.
 
कौन हारा
पिछले एक दिन के खेल का नतीजा बताता है कि लालू यादव या उनकी पार्टी बैठे बिठाए हार गई. यह प्रत्यक्ष है कि एक दिन पहले बिहार की सरकार में उसकी आधी से ज्यादा हिस्सेदारी थी और एक दिन बाद उसकी हिस्सेदारी शून्य हो गई. हारी कांग्रेस भी. लेकिन आजकल वह खुद को हाशिए पर रख कर चल रही है सो उसके नेता एक बार फिर ज्यादा नहीं दिखे. बहरहाल इतना तो बग़ैर किसी शक के कहा जा सकता है कि बिहार में अचानक आए राजनीतिक तूफान में 80 विधायकों वाली और सबसे बड़ी पार्टी राजद और 27 विधायकों वाली कांग्रेस हार गई. ये दोनों पार्टियां अभी 20 महीने पहले हुए चुनाव में सरकार चलाने के लिए जनादेश लेकर आईं थीं. और ये जनादेश 60 महीने के लिए था. लेकिन ये भी कभी कभी सच बन जाता है कि जो पहले से तय किया जाता है वह होता नहीं है. हालांकि इस बुराई रोकने के लिए दलबदल कानून जैसे तमाम कानून, नियम कायदे और नए रिवाज़ बनाए जाते हैं. लेकिन आजकल के कौन से नियम हैं जो क्षणभंगुर न होते हों.
 
कौन जीता
इसे तय करने में बड़ी मुश्किल आ रही है. बाहर से देखने में लगता है कि नीतीश जीते. लेकिन अगर बहस करें तो यह समझ में आता है कि वे पहले भी मुख्यमंत्री थे और अभी भी सिर्फ मुख्यमंत्री हैं. वे पहले राजद के 80 और कांग्रेस के 27 विधायकों की भारी भरकम संख्या के समर्थन से मुख्यमंत्री थे. लेकिन अब उनका साथ छोड़कर भाजपा नीत गठबंधन के सिर्फ 60 विधायकों के समर्थन वाले मुख्यमंत्री हैं. सो यह निष्कर्ष क्यों नहीं निकल सकता कि नीतीश भी कुछ कुछ हारे ही हैं. लेकिन भाजपा जो पिछले चुनाव में बहुत ही बुरी तरह से हारी थी वह इस राजनीतिक तूफान में सबसे ज्य़ादा जीती. वह अचानक ही सत्ता में आ गई. सत्ता में भागीदारी का आकार देखें तो उसके हाथ लगभग आधी सत्ता आ गई. कोई सोच भी नहीं सकता था कि पांच साल का इंतजार किए बिना वह बिहार में सत्ता पा भी सकती है. लेकिन आंधी तूफानों में क्या नहीं हो सकता?
 
सवालों के ढेर
भाजपा और नीतीश ने जो ये राजनीतिक तूफान उठाया उसके बाद के मलबे में सवालों का एक ढेर भी दिख रहा है. इस ढेर में एक सवाल यह है कि नीतीश कृत इस तूफान में जन आकांक्षा या जनादेश की क्या दशा हुई. अभी 20 महीने पहले ही नीतीश लालू और कांग्रेस के महागठबंधन को प्रचंड बहुमत देकर जनता ने अपनी आकांक्षा व्यक्त की थी. गठबंधन को मिला जनादेश इतना ज़बर्दस्त था कि कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था कि पांच साल के पहले बिहार में इस गठबंधन को कोई हिला भी सकता है. और वाकई तीन चार महीनों से गठबंधन को हिलाने डुलाने की जो कोशिशें होती दिखीं उस दौरान यह समझा गया कि स्पष्ट जनआकांक्षा या जनादेश के कारण बिहार में कोई उठापटक नहीं हो सकती. अब अगर एक झटके में गठबंधन टूटकर नए गठबंधन की शक्ल में आ गया तो सैकड़ों और सवाल पैदा क्यों नहीं होंगे. लोकतंत्र की मर्यादा, चुनाव प्रणाली, दल बदल कानून का दायरा बढ़ाकर गठबंधन बदल कानून, जनादेश या जनआकांक्षा की व्याख्या करने की व्यवस्था, अस्थिरता की स्थिति में किसे सरकार बनाने के लिए बुलाया जाए इस बारे में स्पष्ट नियम और ऐसे कई सवाल बिहार का अद्भुत तूफान अपने पीछे छोड़ गया है.
 
महागठबंधन को अप्राकृतिक कहने का सवाल
बिहार में पिछले चुनाव के दौरान बने इस गठबंधन को चुनाव के पहले अप्राकृतिक नहीं कहा गया था. चुनाव के पहले यह कहा गया था कि इस गठबंधन को जनता अपनी मंजूरी देगी ही नहीं. लालू को जंगलराज का पर्याय बनाकर महागठबंधन के खिलाफ माहौल बनाया गया था. कांग्रेस को शून्य माना गया था. बिहार में विपक्ष यानी भाजपा और देश भर के मीडिया ने इस महागठबंधन की जीत की संभावनाओं पर शक ही शक पैदा कर दिए थे. लेकिन जनादेश में जंगलराज और भ्रष्टाचार की बातों को इस क़दर नकार दिया कि चुनाव सर्वेक्षण और एग्ज़िट पोल करने वालों को मुंह छुपाने की जगह नहीं मिली थी. इतना ही नहीं, सबसे कमजो़र कड़ी राजद को ही बताए जाने वालों के होश उड़ गए थे. लोकतंत्र में संप्रभु मानी जाने वाली जनता ने राजद को सबसे ज्या़दा यानी सौ में से 80 सीटें दे दी थीं. जबकि राजनीति के हुनरमंद लोगों का अनुमान था कि महागठबंधन में सबसे ज्यादा सीटें नीतीश की पार्टी की आएंगी लेकिन नीतीश की पार्टी की सीटें राजद से 10 कम रह गईं थी. कांग्रेस को अनुमान से पांच गुनी सीटें मिली थीं. उसी समय यह सवाल भी तैरने लगा था कि क्या लालू की पार्टी राजद अब मुख्यमंत्री पद की दावेदारी की बात सोच सकती है? लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान कही बातों के कारण यह सवाल जल्द ही दब गया. आज लालू को याद आता होगा कि उनसे हुई चूकों में क्या क्या शामिल है.
 
लालू के अफसोस
आज लालू कितना भी अफसोस करें लेकिन उन्हें यह तो मानना ही पड़ेगा कि जब नीतीश नोटबंदी, जीएसटी और राष्ट्रपति चुनाव में भाजपा के साथ होने की बातें कह रहे थे तब उन्हें अपने सामने भाविष्य में आने वाली अड़चनों को भांप जाना चाहिए था. और वैसे भी हमेशा से नीतीश के साथ होने वाली प्रतिद्वंद्विता के बावजूद अगर वे मौके पर फैसले नहीं ले पाए तो उन्हें इस बात का भी अफसोस होना चाहिए.
 
खैर, बिहार का हित
अपनी ही बात को एक बार सही गलत के पैमाने पर देख लेना चाहिए. अगर हमने ताबड़तोड़ तरीके से बिहार में राजनीतिक हलचल को तूफान कहा है तो उसे भी जांच लेना चाहिए. एक बार लगता है कि यह हलचल अचानक आए तूफान जैसी नहीं थी. क्योंकि इसकी तैयारी पहले से होने के सबूत बहुत से लोगों ने दिए हैं. सबसे आखिरी सबूत है कि नीतीश ने इस्तीफा देते समय दो बातें कहीं, एक अंतर्आत्‍मा और दूसरी बात बिहार का हित. क्या इसमें कोई शक है कि राजनीति में इस अलौकिक अंतर्आत्‍मा का इस्तेमाल तर्क के अभाव में दिया जाता है. और जहां तक बिहार के हित का सवाल है तो जब कभी भी किसी को अपने तरीके में खोट को छुपाना हो तो पहले से बना बनाया एक ख्यात या कुख्यात तर्क है कि किसी अच्छाई को साधने के लिए गलत तरीका भी सही है. ये दोनों ही उपकरण समय सिद्ध हैं. इस लिहाज़ से नीतीश के दिए तर्कों को आसानी से खारिज नहीं किया जा पाएगा. इसे गलत या अनैतिक साबित करने के लिए विद्वानों और दार्शनिकों को मेहनत मशक्कत करनी पड़ेगी. लेकिन अपने लोकतांत्रिक समाज में इन लोगों का भाव इस समय रिकॉर्ड स्तर पर मंदा चल रहा है.

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सुधीर जैन वरिष्ठ पत्रकार और अपराधशास्‍त्री हैं...


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