प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम एक पोस्टकार्ड : कम लिखे को ज़्यादा समझना...

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम एक पोस्टकार्ड : कम लिखे को ज़्यादा समझना...

एक समय पोस्टकार्ड इस देश में संवाद का सशक्त माध्यम था. ख़ुशी और ग़म - दोनों का संदेशवाहक. जगह कम होती थी, सो लोग लिखते थे, 'कम लिखे को ज़्यादा समझना...' पोस्टकार्ड से निजता का उल्लंघन भी होता था, फिर भी लोग उसका उपयोग करते थे. बंद नहीं हुए, लेकिन अब पोस्टकार्ड दिखते नहीं. फिर भी आपको पोस्टकार्ड ही लिख रहा हूं.

आप प्रचारक रहे हैं, इसलिए आपको सबसे अच्छा प्रचार करना आता है. सरकार चलाने से भी अधिक. मई, 2014 के लोकसभा चुनाव में आपने इसे साबित भी कर दिया. भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को इतनी बड़ी जीत आपने ही दिलाई. इसी एहसान तले बीजेपी और आपकी मातृसंस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की ज़ुबान सिली हुई है. लेकिन अब तक इस देश पर आपका कोई एहसान नहीं है, इसलिए अब देश बोल रहा है.

देश में सोशल मीडिया तो पहले से था, लेकिन पहले उसे सोशल मीडिया की ज़ुबान ठीक तरह से नहीं आती थी. आपके चुनाव प्रचार ने उन्हें समझाया कि इसकी ताक़त क्या होती है. सुना है, आपने कुछ सौ करोड़ रुपये खर्च किए. इसकी पुष्टि न कभी आप करेंगे, न जनता के पास इसे जानने का कोई तरीक़ा है, लेकिन आपकी सोशल मीडिया टीम ने इस देश को झकझोर दिया. देश का वह प्रधानमंत्री, जिसकी ईमानदारी की मिसाल दी जा सकती थी, एकाएक दाग़दार और अपराधी दिखने लगा. राहुल गांधी को आपकी टीम ने हास्यास्पद बना दिया. राजनीतिक रूप से नासमझ बुज़ुर्ग और कथित गांधीवादी अन्ना हज़ारे ने देश के प्रति छद्म प्रेम की एक नकली लहर पैदा की और आपने बिना चूके उस पर अपनी नाव तिरा दी. अब आपकी तैयार की यह फ़ौज देशप्रेम और देशद्रोह के प्रमाणपत्र मुफ़्त बांटती है.

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बहरहाल, सोशल मीडिया की ज़ुबान आपने सिखाई, लेकिन नाशुक्रे लोगों को देखिए. वे आपके, आपकी पार्टी के और आपकी सरकार के ख़िलाफ़ बोलने लगे हैं. बहुत मेहनत से जो छवि आपने बनाई थी, वह नोटबंदी के बाद सोशल मीडिया पर तार-तार हो गई है. जो चाहे आपकी खिल्ली उड़ा रहा है. जैसा आपके समर्थक कहते हैं, 'देशद्रोही कहीं के'. आपने बहुत पैसे खर्च किए, लेकिन आपके ख़िलाफ़ यह सब तो मुफ़्त हो रहा है. सोशल मीडिया के टूल्स सही आंकड़े दे सकते हैं, लेकिन सतह पर दिखता है कि नोटबंदी के कुछ दिन बाद से आपकी स्वयंसेवी मंडली धीरे-धीरे चुप होने लगी है. व्हॉट्सऐप से लेकर फेसबुक और ट्विटर तक सब में आपका यशोगान एकाएक थमने लगा है.

बार-बार बदलता बयान...
आपने देश के लिए घर-परिवार छोड़ दिया है, इसलिए आपको एकांत भी बहुत मिलता होगा. अकेले में सोचिएगा कि क्यों आपको नोटबंदी पर इतनी बार बयान बदलने पड़े...? काला धन से शुरू हुआ अभियान नकली नोट के रास्ते डिजिटल और कैशलेस तक जा पहुंचा. देशप्रेम का पार्श्वसंगीत लगातार बजता रहा, लेकिन आप भटकते-से दिखे. सुर नहीं पकड़ पाए आप. हो सकता है, बैंकों में जमा होती राशि के आंकड़ों ने आपका विश्वास डगमगा दिया हो. जब सारा पैसा जमा ही हो जा रहा है तो उस काले धन का क्या हुआ, जो आपके हिसाब से बैंक में जमा ही नहीं होना था. आपकी पार्टी के नेता बताते हैं कि आपका आकलन तीन लाख करोड़ का था, जिसे बैंक में नहीं आना था, लेकिन वह भी आ गया.

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आप जानते हैं कि कैशलेस होने में इस देश को बरसों लगेंगे. ठीक वैसे ही, जैसे टेलीकॉम की क्रांति पीसीओ के ज़रिये आई और फिर मोबाइल क्रांति बन गई. आपका सीना भले ही 56 इंच का हो, आपके मुख्यमंत्री रमन सिंह आपको भले युवा प्रधानमंत्री मानते हों, लेकिन आप जानते हैं कि उम्र आपके रास्ते में बड़ी बाधक है. आपके बनाए कानून से ही आप कुछ साल बाद मार्गदर्शक बनाए जा सकते हैं, इसलिए आपके पास राजीव गांधी जैसा धैर्य नहीं हो सकता. वह तो 40 में वहां बैठे थे, जहां आप 64 में पहुंचे. पता नहीं कैसे, इन सोशल मीडिया वीरों को गुमान हो गया है कि कैशलेस के नाम पर आप देश को सिर्फ़ गुमराह कर रहे हैं. वे ग़लत हैं, यह साबित करने के लिए आपके पास सिर्फ ढाई साल हैं, जो किसी भी लिहाज़ से कम हैं.

देश का ढांचा समझने में चूक...
आप देश के सबसे बड़े अनौपचारिक (बिना पंजीयन वाले) सांस्कृतिक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, यानी आरएसएस के सदस्य हैं. आरएसएस देश के कोने-कोने में है. श्रीनगर से कन्याकुमारी और सिलचर से पोरबंदर तक. हर जगह उसकी उपस्थिति ताक़तवर है. आपके आने के बाद से यह ताक़त बहुगुणित हुई है. तो आपसे इस देश के मूल ढांचे को समझने में चूक कैसे हो गई...? आपने नोटबंदी करते हुए न सामाजिक संरचना का ध्यान रखा, न फसल चक्र का और न बाज़ार का. लिहाज़ा गृहिणी से लेकर किसान तक और छोटे दुकानदार से लेकर नौकरीपेशा तक, सब परेशान हो गए. आप लाख उन्हें देशप्रेम की घुट्टी पिलाएं, लेकिन क्या करें कि पेट से पहले तो हरि तक याद नहीं आते.

आपने जब नोटबंदी की (कथित) लाइव घोषणा की तो लगा नहीं कि आपके ज़हन में बस्तर का ग़रीब आदिवासी, असम के चाय बागान का मज़दूर, महाराष्ट्र का निरीह किसान, चावल के डिब्बे में पैसे छिपाती गृहिणियां और गुल्लक में पैसे जोड़ता बच्चा था. आपको नोटों की गड्डी बिछाकर सोने वाला भ्रष्ट आदमी याद था और शायद विपक्षी दल के नेता, जिन्हें अभी उत्तर प्रदेश में चुनाव लड़ना है. माफ़ कीजिए, लेकिन आप समझ नहीं पाए कि किसी व्यापारी और किसी उद्योगपति से कहीं ज़्यादा भ्रष्ट भारत की नौकरशाही है. वही नौकरशाही, जिसके कुछ सदस्यों ने आपको नोटबंदी का क्रांतिकारी आइडिया दिया. यही नौकरशाही राजनेताओं से लेकर कारोबारियों और उद्योगपतियों और आम जनता तक भ्रष्टाचार की कड़ी हैं. और हर बार वही बच निकलते हैं. वे इस बार भी बच जाएंगे. पिस गया बेचारा आम नागरिक.

संसाधनों का दुरुपयोग...
सुना है कि शिक्षा संस्थानों से लेकर एनसीसी और एनएसएस तक कई जगह निर्देश पहुंचे हैं कि वे जनता के बीच जाकर कैशलेस का प्रचार करें. अब आप प्रचारक नहीं रहे. प्रचार से उबर जाइए. आपने स्वच्छ भारत अभियान का प्रचार करके देख लिया. भारतीय मुद्रा तक में विज्ञापन छपवा दिया, लेकिन ज़मीन पर कुछ होता दिखता नहीं है.

आप भारत सरकार हैं. संसाधन आपके अधीन हैं. लेकिन हर संसाधन के अपने उपयोग हैं. उन्हें मत छेड़िए. छात्रों को पढ़ने दीजिए. एनसीसी में उन्हें अनुशासन सिखाया जाता है, उन्हें अनुशासन तोड़ने को मत कहिए. देशप्रेम और देश की सेवा के नाम पर उनका शोषण मत कीजिए.

...और अंत में आपका हास्य बोध
आप बहुत गंभीर दिखते हैं. गुस्से वाले भी. ऐसा सुना है, आप चुन-चुनकर बदला भी लेते हैं. लेकिन पिछले दिनों पता चला कि आप मज़ाकिया भी बहुत हैं.

चुनाव के समय, यानी 2014 में जब आपने कहा कि 'काला धन वापस न लाया तो मुझे फांसी चढ़ा देना' तो लोगों को लगा कि आप गंभीरता से कह रहे हैं. जब गोरक्षकों की वजह से बात हाथ से निकलती दिखी तो आपने कहा, 'मुझे गोली मार दो...' तब भी लोगों ने आपके हास्यबोध (यानी वही सेंस ऑफ ह्यूमर) को नहीं पहचाना. लेकिन जब आपने नोटबंदी पर कहा, 'देशवासियो, मुझे 50 दिन की मोहलत दो, फिर जो सज़ा आप तय करोगे, मुझे मंज़ूर होगी...' तब साफ लगा, आप तो मज़ाक करने लगे हैं. प्रधानमंत्री पद का तनाव कम होने लगा है.

फिर तो आप रुके ही नहीं. एक दिन आपने कहा, 'मेरा क्या है, मैं तो फकीर हूं, झोला उठाकर चल दूंगा...' और अब आपने कहा, '50 दिन बाद सब धीरे-धीरे ठीक हो जाएगा...' आपके हास्यबोध में अब सबका देशप्रेम धुलने / घुलने लगा है.

आपका मज़ाक हम समझते हैं. हमें पता है कि कोई आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकता (हालांकि कुछ लोग इससे असहमत हो सकते हैं और कह सकते हैं कि मोहन भागवत जी के होते ऐसा कहना ठीक नहीं होगा, क्योंकि एक बार वह बिहार बिगाड़कर दिखा चुके हैं). आप न फकीर हैं, न कहीं जाने वाले हैं. आप बहुत तपस्या करके यहां तक पहुंचे हैं, तो आप वहीं बने रहिए और 'राजधर्म का पालन' कीजिए.

अब बस इतना ही. कम लिखे को ज़्यादा समझिएगा. आपके ज़्यादा कहे को लोग कम समझ रहे हैं, इसके लिए उन्हें माफ़ भी कर दीजिएगा.

विनोद वर्मा वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं...

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