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क्या आरबीआई गवर्नर और एलजी के विरुद्ध दर्ज होंगे आपराधिक मामले...?

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क्या आरबीआई गवर्नर और एलजी के विरुद्ध दर्ज होंगे आपराधिक मामले...?

दिल्ली में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के आवास के सामने बीजेपी सांसद महेश गिरी के धरने को डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी के समर्थन से टीवी और सोशल मीडिया पर मेलो-ड्रामा का नया एपिसोड चालू हो गया है, जिसकी धुन में राजनेता मस्त हैं पर कानून तो पस्त ही है...

स्वामी के आरोपों पर आरबीआई गवर्नर के विरुद्ध बन सकता है देशद्रोह का मामला - स्वामी वकील नहीं हैं फिर भी ठोस तर्क तथा आक्रामक बहस की क्षमता के कारण अधिकांश लोग उन्हें वकील मानने का शुबहा करते हैं। स्वामी ने रिजर्व बैंक के गवर्नर राजन के विरुद्ध प्रधानमंत्री को लिखित शिकायत देकर कई गंभीर आरोप लगाए, जिसके लिए स्वामी के पास निश्चित ही सबूत होंगे। राजन को दूसरा कार्यकाल नहीं देने से ही मामला खत्म नहीं होता। आरबीआई गवर्नर के विरुद्ध पुख्ता सबूतों के आधार पर स्वामी द्वारा भ्रष्टाचार तथा देशद्रोह का मामला कब दर्ज कराया जाएगा...?

एलजी के विरुद्ध हो उच्चस्तरीय न्यायिक जांच - केजरीवाल ने दिल्ली की तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के खिलाफ आरोपों तथा धरनों से राजनीति में सफलता के पायदान चढ़े, जिसमें गवर्नेंस दफन होना ही था। बीजेपी ने भी सत्ता में टिके रहने के लिए 'आप' के फॉर्मूलों पर अमल चालू कर दिया है, जिससे चिढ़कर केजरीवाल ने बीजेपी को धरना पार्टी की संज्ञा दे डाली। स्वामी ने सांसद महेश गिरी के धरने को समर्थन देते हुए कहा कि उनका अगला निशाना दिल्ली के उपराज्यपाल नजीब जंग हैं, जो कांग्रेसी नेता अहमद पटेल के इशारे पर काम करते हैं। इसके पहले केजरीवाल भी एलजी के विरुद्ध 'रिलायंस की कठपुतली' होने सहित कई संगीन आरोप लगा चुके हैं, जिनमें बिजली कंपनियों को बेजा फायदा पहुंचाना भी शामिल है। जब दिल्ली के मुख्यमंत्री और बीजेपी नेता एलजी के विरुद्ध आरोपों पर एकमत हैं, तो मोदी सरकार जंग को हटाकर उनके विरुद्ध भ्रष्टाचार की न्यायिक जांच क्यों नहीं कराती...? यहां यह भी जानना मौजूं होगा कि क्या सीएम हाउस के सामने धरना देने के लिए बीजेपी नेताओं ने पुलिस-प्रशासन की नियमानुसार अनुमति ली है...?


नेताओं के प्रशासन में गैरकानूनी हस्तक्षेप पर कार्रवाई क्यों नहीं - हैदराबाद में रोहित वेमुला की आत्महत्या मामले में केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी द्वारा लिखे गए पत्र पर बवाल हुआ था। एस्टेट ऑफिसर खान की हत्या की तह में भी एनडीएमसी द्वारा कनॉट होटल को वित्तीय लाभ पहुंचाने का मामला है, जहां होटल मालिक रमेश कक्कड़ के पक्ष में बीजेपी नेता करण सिंह तंवर और महेश गिरी द्वारा पत्र लिखने के आरोप हैं। सिफारिशी पत्रों के आधार पर बीजेपी नेताओं के खान की हत्या की साजिश में शामिल होने का आरोप, केजरीवाल की तिकड़मी राजनीति का ही शिगूफा ही हो सकता है, जिससे 'आप' के संसदीय सचिवों का संकट खत्म हो सके, परंतु पूरे मामले में महत्वपूर्ण बात दबाई जा रही है कि विधायक और सांसदों द्वारा निजी हितों को बढ़ावा देने के लिए प्रशासन में गैरकानूनी हस्तक्षेप होता क्यों है...?

आपराधिक मामलों का नहीं हो सकता राजनीतिक सेटलमेंट - राबर्ट वाड्रा के विरुद्ध बीजेपी तथा शीला दीक्षित के विरुद्ध 'आप' द्वारा सनसनी पैदा करके केंद्र और दिल्ली में सत्ता तो हासिल कर ली गई, लेकिन उसके बाद दोषियों के विरुद्ध कोई प्रभावी कार्रवाई हुई ही नहीं। अब सत्ताधारी दल के किसी नेता के विरुद्ध अगर आरोप लगें तो जवाब देने की बजाय विपक्षी नेता को ही आरोपों के कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है। इसका मतलब यह है कि बड़े नेताओं को भ्रष्टाचार तथा अपराध के मामलों का पूर्व एवं पूर्ण संज्ञान होता है, जिसे वक्त आने पर वे राजनीतिक सेटलमेंट के तौर पर इस्तेमाल करते हैं।

नेताओं द्वारा सबूतों की जानकारी पुलिस को नहीं देने पर दर्ज हो सकता है आपराधिक मामला - स्वामी और केजरीवाल जैसे नेता कई मामलों में खुफिया जानकारी का दावा करके विरोधियों को धमकाते हैं। सबूतों को पुलिस को नहीं सौंपने पर सीआरपीसी की धारा 39 तथा आईपीसी की धारा 177, 182, 186, 202 के तहत ऐसे नेताओं के विरुद्ध आपराधिक मामला दर्ज हो सकता है, जिसके लिए छह महीने की सजा का प्रावधान है। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में न्यायमूर्ति अराधे की खंडपीठ ने सरकार से यह जवाब मांगा है कि गलत आरोप लगाने वालों के विरुद्ध लोकायुक्त की जांच क्यों नहीं होनी चाहिए...?

गलत आरोप लगाने पर कानून के अनुसार अवमानना और अन्य आपराधिक कार्रवाई होनी चाहिए, क्योंकि राजनीतिक दल और नेता भी कानून के दायरे में आते हैं। दिल्ली की इस नौटंकी से राजसत्ता अगर कानून के अनुपालन का यह छोटा सबक सीख ले तो सुशासन और बदलाव दोनों आएंगे, जिसका सभी को इंतजार है।

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विराग गुप्ता सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता और संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ हैं...

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति एनडीटीवी उत्तरदायी नहीं है। इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार एनडीटीवी के नहीं हैं, तथा एनडीटीवी उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।


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