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तीन तलाक : सुप्रीम कोर्ट नहीं कर सकता फैसला

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तीन तलाक : सुप्रीम कोर्ट नहीं कर सकता फैसला

प्रतीकात्‍मक फोटो

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने समान नागरिक संहिता पर विधि आयोग द्वारा शुरू किए गए परामर्श के बहिष्कार करने का फैसला लिया और दूसरी ओर तीन तलाक के समर्थन में सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा भी दे दिया. तीन तलाक सहित अन्य मामलों पर जब कानून बनाने की प्रक्रिया शुरू हो गई है, उसके बाद सुप्रीम कोर्ट को क्या ऐसे मामलों में सुनवाई का अधिकार है?

विधि आयोग द्वारा तीन तलाक पर विमर्श के बाद संसद द्वारा कानून निर्माण
देश में सभी नागरिकों के लिए एक-समान क्रिमिनल लॉ है. शादी, तलाक, मेनटेनेंस, उत्तराधिकार एवं गिफ्ट के बारे में मुस्लिम समुदाय अपने पर्सनल लॉ से संचालित है, जिसे 1937 के कानून से मान्यता मिली है. संविधान के अनुच्छेद-44 के तहत समान नागरिक संहिता बनाने के बारे में पिछले 30 वर्षों से विवाद है जिसे सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद लागू करने के लिए केंद्र सरकार ने विधि आयोग को निर्देश दिया. (पढ़ें समान नागरिक संहिता : संवैधानिक जिम्मेदारी की बजाय राजनीति क्यों?)

सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2014 के प्रवासी भलाई संगठन मामले में फैसले में यह कहा गया है कि संसद द्वारा पारित कानून को ही सुप्रीम कोर्ट लागू कर सकता है. जब विधि आयोग और सरकार कानून का मसौदा बना रहे हैं, तब सुप्रीम कोर्ट तीन तलाक जैसे मामलों पर सुनवाई कैसे कर सकता है?


तीन तलाक़, हलाला, बहुविवाह और 'साइंस'...

संवैधानिक बेंच को ही सुनवाई का अधिकार
उत्तराखंड की शायरा बानो ने में सुप्रीम कोर्ट में तीन तलाक, निकाह हलाला और बहुविवाह का विरोध किया. उनकी याचिका को जयपुर और हावड़ा की महिलाओं के साथ भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन तथा सरकार का भी समर्थन मिला है. जब इन मामलों पर सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच 1997 में पहले ही फैसला दे चुकी है तो मामले की नई सुनवाई पांच जजों की संविधान पीठ द्वारा ही हो सकती है।

आधी आबादी को चाहिए आधुनिक कानून
अंग्रेजी शासन काल में सती-प्रथा तथा बाल-विवाह पर बंदिश के कानून का हिंदू कट्टरपंथियों द्वारा विरोध हुआ था. आजादी के बाद अंबेडकर जैसे प्रगतिशील लोगों के कारण हिंदू सिविल कानून भी कट्टरपंथियों के विरोध के बावजूद पारित हुआ. रामचंद्र गुहा ने वामपंथी तथा मुस्लिम प्रगतिशील वर्ग से पूछा है कि मुस्लिम सिविल लॉ को नए जमाने के अनुरूप बदलने में उनकी भूमिका विफल क्यों रही?

दलील दी जा रही है कि 2005 के मॉडल निकाहनामे में ट्रिपल तलाक को अस्वीकार किया गया है. यदि यह सही है तो तीन तलाक के विरोध में पर्सनल लॉ बोर्ड सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा क्यों नहीं देता? सिर्फ भोपाल में पिछले दस महीनों में मुस्लिम महिलाओं द्वारा तीन तलाक के दुरुपयोग के विरुद्ध 494 शिकायतें आईं, जिनमें 228 महिलाओं ने कोर्ट की शरण ली है. भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन को सुप्रीम कोर्ट में पक्षकार बनने के लिए 50,000 मुस्लिम महिला और प्रगतिशील पुरुषों के समर्थन के बावजूद रूढ़िवादी मुस्लिम संगठन सुधरने को तैयार क्यों नहीं है?    

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मुस्लिम सिविल लॉ के बाद ही समान नागरिक संहिता पर हो चर्चा
सुप्रीम कोर्ट ने 2002 में लिली थॉमस मामले में कहा था कि समान नागरिक संहिता क्रमिक तरीके से ही लागू होना चाहिए. मुस्लिम पर्सनल लॉ को आधुनिक समाज में महिलाओं की समानता के अनुसार कानूनबद्ध करके अदालतों में न्याय की व्यवस्था होने से इसकी शुरुआत हो सकती है. मुस्लिम महिलाओं को घरेलू हिंसा कानून का लाभ मिलता है. व्हॉट्सएप्प, ट्विटर, ई-मेल द्वारा आधुनिक तकनीक से दिए गए तीन तलाक को मानने वाले मुस्लिम संगठन विवाह की न्यूनतम आयु एवं पंजीकरण के आधुनिक कानून पर सहमत क्यों नहीं होते? सोती हुई पत्नी को पति द्वारा तीन बार तलाक बोलने से होने वाले तलाक को शिया भी स्वीकार नहीं करते और पाकिस्तान समेत 22 इस्लामिक मुल्क इसे बैन कर चुके हैं.

30 साल पहले शाहबानो मामले में कट्टरपंथी विजयी हुए थे पर शायरा बानो के हक की लड़ाई में प्रगतिशील तबके को आगे आना ही होगा. वरना चुनावी राजनीति में मुस्लिम समुदाय वोट बैंक के तौर पर तथा महिलाएं आटे में नमक जैसे पिसने के लिए अभिशप्त रहेंगे..

विराग गुप्ता सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता और संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ हैं...

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