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उत्तराखंड : हाईकोर्ट के आदेश के बाद 'डर्टी पॉलिटिक्स' की भी हो जांच

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उत्तराखंड : हाईकोर्ट के आदेश के बाद 'डर्टी पॉलिटिक्स' की भी हो जांच

हरीश रावत (फाइल फोटो)

उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगाने के लिए जेटली द्वारा अपने ब्लॉग में दिए गए तीनों तर्क नैनीताल हाईकोर्ट के आदेश के बाद भोथरे साबित हुए हैं। नवीनतम आदेश के अनुसार सरकार के बहुमत का निर्धारण 31 मार्च को विधानसभा में कार्यवाही के आधार पर होगा जिसके लिए बागी विधायकों को भी मतदान की अनुमति मिल गई है। 'कांग्रेस मुक्त भारत' हेतु अमित शाह के  'ऑपरेशन लोटस' से कमल भले ही न खिले पर राजनीति में कीचड़ तो जरूर बढ़ रहा है जिसका 80 के दशक में बीजेपी पुरजोर विरोध करती थी।
 
विधायकों की खरीद-फरोख्त के विरुद्ध आपराधिक कार्यवाही क्यों नहीं?
सरकार बनाने या गिराने के लिए विधायक-सांसदों की खरीद-फरोख्त की कांग्रेसी संस्कृति को भाजपा समेत सभी दलों ने अपना लिया है। विगत दिनों उत्तर प्रदेश विधान परिषद चुनावों में भाजपा सांसद साक्षी महाराज ने प्रदेश भाजपा अध्यक्ष वाजपेयी द्वारा पैसे लेकर टिकट बेचने का आरोप लगाया गया था। उसके पहले अखिलेश दास को बसपा नेता मायावती द्वारा सौ करोड़ लेकर राज्यसभा सीट दिए की कथित पेशकश का संगीन मामला सामने आया था। राजनीति की इसी मंडी से विधायकों को खरीदकर कथित तौर पर विजय माल्या ने भी दो बार राज्यसभा सीट हासिल करने का गौरव हासिल किया जो अब 9000 करोड़ हजम कर विदेश में मस्ती कर रहे हैं।

उत्तराखंड में हरीश रावत द्वारा विधायकों की कथित खरीद-फरोख्त पर शायद ही किसी को संदेह हो परन्तु कांग्रेस के भ्रष्ट विधायकों को चार्टर्ड फ्लाइट से फाइव स्टार होटल में रखने की सहूलियत के साथ कितने पैसे का लेनदेन हुआ, क्या इसके लिए भी हाईकोर्ट द्वारा  न्यायिक जांच के आदेश दिए जायेंगे?  


विनियोग विधेयक और मनी बिल के संवैधानिक संकट का सच
संवैधानिक धोखाधड़ी कर 'आधार' को मनी बिल के तौर पर राज्यसभा में बीजेपी की अल्पमत सरकार ने कराया और अब उत्तराखंड विधानसभा में विनियोग विधेयक पारित न होने पर संवैधानिक संकट की बात किस मुंह से की जा  रही है? कांग्रेस के बागी विधायकों द्वारा विनियोग विधेयक के विरोध के तर्क को यदि सही माना जाय तो फिर विधानसभा अध्यक्ष द्वारा उन विधायकों को अयोग्य घोषित करने की वैधानिकता पर  सवाल कैसे उठाया जा सकता है?

सुप्रीम कोर्ट द्वारा बोम्मई मामले में दिये गये निर्णय के अनुसार राज्यपाल ने रावत सरकार को विधानसभा में बहुमत साबित करने के लिए 28 मार्च का दिन मुकर्रर किया था। उसके एक दिन पहले राष्ट्रपति शासन लागू करने के आदेश को अब हाईकोर्ट ने अपने आदेश से नकार दिया है।

उत्तराखंड स्टिंग की जांच रिपोर्ट एक दिन में पर अन्य अपराधों पर चुप्पी क्यों
देश में हजारों मामलों में वीडियो की सत्यता पर सवाल खड़े कर अपराधियों को बचाने का खेल चलता है। बीजेपी मुख्यमंत्री रमन सिंह द्वारा अपने दामाद के माध्यम से कांग्रेसी नेता अजीत जोगी को विधानसभा चुनाव में प्रत्याशी वापस लेने के लिए कथित तौर पर करोड़ों रुपये के लेनदेन  के प्रमाण होने के बावजूद छत्तीसगढ़ में राष्ट्रपति शासन नहीं लगाया गया। नारद न्यूज पोर्टल द्वारा टीएमसी विधायक-सांसदों को लॉबिंग के लिए नगदी लेने की स्टिंग के बावजूद पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं हुई।

जेएनयू में कन्हैया के भाषण के वीडियो में छेड़खानी के 'सच' को सरकार द्वारा अभी भी स्वीकार नहीं किया जा रहा। दूसरी ओर उत्तराखंड  में रावत के विरुद्ध स्टिंग की जांच एक दिन में ही पूरी करके राष्ट्रपति शासन लागू कर देने से, पूरी सरकार ही संदेह के घेरे में आ गई है जिसकी जांच के आदेश भी हाईकोर्ट द्वारा दिए जाने चाहिए।   

अरुणाचल प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाने को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई थी जहां मामले में सुनवाई के दौरान ही भाजपा द्वारा दलबदलू कांग्रेसी विधायकों के साथ सरकार बनाने से न्यायिक प्रक्रिया भोथरी हो गयी थी। परन्तु उत्तराखण्ड मामले में न्यायपालिका नें त्वरित निर्णय लेकर एक नयी मिसाल पेश की है। विश्वासमत के पहले विधायकों की नए सिरे से बोली दोनों राजनीतिक दलों द्वारा लगाई जा सकती है। हाईकोर्ट के आदेश से संविधान की रक्षा तो हुई है, पर क्या 'डर्टी पॉलिटिक्स' से जनता का दलों पर विश्वास खत्म हो गया है ?

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विराग गुप्ता सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता और संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ हैं...

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