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प्राइवेसी को समलैंगिकता के अधिकार से क्यों जोड़ें...

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प्राइवेसी को समलैंगिकता के अधिकार से क्यों जोड़ें...

प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर...

प्राइवेसी के अधिकार पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के जज चंद्रचूड़ द्वारा यह टिप्पणी की गई कि यदि निजता के असीमित अधिकार को मान्यता मिली तो फिर समलैंगिकता पर नाज फाउंडेशन मामले में निर्णय पर पुर्नविचार की मांग हो सकती है. संविधान पीठ के सम्मुख इस मामले पर और भी दिलचस्प तर्क दिए जा रहे हैं, जो कानून की कसौटी पर शायद ही खरे उतरें. 

प्राइवेसी पर 6 दशक पुराने निर्णयों पर बेवजह बहस...
संविधान निर्माण या सुप्रीम कोर्ट द्वारा 60 वर्ष पहले प्राइवेसी पर निर्णय के समय कम्प्यूटर, मोबाइल और इंटरनेट थे ही नहीं तो फिर उन निर्णयों के विश्लेषण पर इतना जोर क्यों? संविधान की प्रस्तावना तथा अनुच्छेद-21 में जीवन की स्वतंत्रता में प्राइवेसी समाहित है. सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ द्वारा 1954 में एमपी शर्मा तथा 1962 में खड़क सिंह मामले आम जनता को भी रट गए हैं. इन मामलों में सरकार द्वारा निगरानी तथा छापे मारने के अधिकार को चुनौती की पृष्ठभूमि में प्राइवेसी के अधिकार को परिभाषित किया गया था. संविधान बनने के 70 वर्ष बाद ताकतवर सरकार के सहयोग से बाजार ने जनता के निजी जीवन पर कब्जा कर लिया है, जिस कारण प्राइवेसी पर नए विस्तृत कानून की जरुरत है. नए जमाने के डिजिटल इंडिया में डेटा लीक या दुरुपयोग होने पर व्यक्तिगत जिम्मेदारी के साथ कंपनियों की आपराधिक जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट की बजाय संसद में बहस की जरुरत है. 

समलैंगिकता पर संसद को बदलना होगा कानून...
एनजीओ नाज फाउंडेशन की याचिका पर दिल्ली उच्च न्यायालय ने वर्ष 2009 में आईपीसी की धारा-377 को गैरकानूनी करार देते हुए समलैंगिकता को आपराधिक मानने से इंकार कर दिया था. सुप्रीम कोर्ट ने दिसंबर 2013 में समलैंगिकता की आपराधिकता के कानून पर मुहर लगाते हुए कहा था कि कानून बदलने का काम संसद का है तो फिर उस फैसले पर कैसे पुर्नविचार हो सकता है?

संसद ने समलैंगिकता पर प्राइवेट बिल को नामंजूर किया...
कांग्रेसी सांसद शशि थरुर ने धारा-377 में बदलाव के लिए संसद में निजी बिल पेश किया था. इस पर मार्च 2016 बहस के दौरान कुल 73 सांसद उपस्थित थे, जिसमें 58 ने इसका विरोध, 14 ने समर्थन और 1 सांसद ने बहिष्कार किया. जब जनता के प्रतिनिधियों तथा संसद ने समलैंगिकता पर कानून को बदलने से इंकार कर दिया तो फिर सुप्रीम कोर्ट इस निर्णय पर पुर्नविचार कैसे कर सकता है?

सुप्रीम कोर्ट के सम्मुख दिलचस्प नज़ीरें और अजब तर्क...
समलैंगिकता हो या बच्चे को स्कूल भेजने का मामला, इन सभी में दूसरे व्यक्ति के संवैधानिक अधिकारों को संरक्षित किया जाता है. गर्भधारण के 20 सप्ताह के बाद गर्भपात की अनुमति नहीं है और बच्चा होने के बाद मां-बाप उसे शिक्षा से वंचित नहीं कर सकते. सरकार अनेक कानून के माध्यम से लोगों के व्यक्तिगत जीवन तथा निर्णयों पर प्रतिबंध तथा अंकुश लगाती है, जिन्हें अपवाद के तौर पर प्राइवेसी कानून का हिस्सा बनाया जा सकता है.

नए जमाने के डिजिटल इंडिया में जनता को चाहिए डेटा की प्राइवेसी...
सरकार आधार के माध्यम से और निजी कंपनियां इंटरनेट तथा मोबाइल के माध्यम से लोगों की निजी जानकारी तथा डेटा एकत्रित कर रहे हैं. इस डेटा का अनाधिकृत हस्तांतरण, व्यवसायिक इस्तेमाल या सार्वजनिक करना वर्तमान नियमों के अनुसार भी गैरकानूनी है. सरकार का डेटा विदेशों में जाने से देश की सुरक्षा को भी खतरा है. सरकार के डेटा की प्राइवेसी को सुरक्षित करने के लिए मेक इन इंडिया के तहत इंटरनेट कंपनियों के सर्वस भारत में स्थापित करने के आदेश क्यों नहीं दिए जाते? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गृहमंत्री तथा विधि मंत्री समेत अनेक मंत्रालयों की उच्च स्तरीय मीटिंग कर डेटा प्रोटेक्शन पर कानून का मसौदा जल्द पेश करने का निर्देश दिया है. क्या इस कानून में डेटा के व्यवसायिक इस्तेमाल पर टैक्स तथा कठोर दण्ड का प्रावधान होगा?

संसद कानून बनाने में विफल फिर न्यायिक सक्रियता पर आक्रोश क्यों?
प्राइवेसी एवं डेटा प्रोटेक्शन जैसे अनेक महत्वपूर्ण मामलों पर संसद कानून बनाने में विफल रही है. राज्यसभा में 'आधार' पर बहस के दौरान मार्च 2016 में केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली ने प्राइवेसी के कानून को अपने भाषण में स्वीकारा था, जिसका आधार कानून में भी उल्लेख है. इसके बावजूद केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के सम्मुख प्राइवेसी के अधिकार पर सवालिया निशान क्यों खड़े किए? सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुनवाई में विलंब से 'आधार' की अनिवार्यता पर बहस बेमानी हो गई है. 'आधार' के माध्यम से विश्व का सबसे बड़ा डेटाबेस एकत्रित करने वाली सरकार को जनता की निजी जानकारी को सुरक्षित रखने का भरोसा संसद में प्राइवेसी पर कानून बनाकर देना ही होगा.

विराग गुप्ता सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता और संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ हैं...

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