NDTV Khabar

कॉमेडी छोड़ सिर्फ मंत्रिपद संभालें सिद्धू : अन्य नेता भी बंद करें कारोबार

878 Shares
ईमेल करें
टिप्पणियां
कॉमेडी छोड़ सिर्फ मंत्रिपद संभालें सिद्धू : अन्य नेता भी बंद करें कारोबार
कांग्रेस नेता नवजोत सिंह सिद्धू मंत्री बन जाने के बाद कॉमेडी शो में काम कर सकते हैं या नहीं, इस बारे में पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने राज्य के एडवोकेट जनरल से कानूनी राय मांगी है. लाभ के पद पर विवाद होने की वजह से दिल्ली में आम आदमी पार्टी के अनेक विधायकों की सदस्यता खतरे में है. सांसद और विधायकों के लिए 'काम नहीं तो वेतन नहीं' का नियम लागू होने की बात भी हो रही है, तो फिर सिद्धू के कॉमेडी शो के बहाने देशभर के नेताओं को जवाबदेह बनाने का कानून क्यों न बने...?

अगर मंत्री के वेतन से सिद्धू का किचन नहीं चलता, तो नेता समझें जनता की लाचारी : पंजाब में जनता की औसत आमदनी लगभग 8,000 रुपये महीना है. सिद्धू को मंत्री होने के नाते निःशुल्क मकान, गाड़ी, फोन, स्टाफ, भत्तों के साथ भारी वेतन भी मिलता है, तो फिर किचन खर्च के लिए उन्हें कॉमेडी शो की आमदनी की दरकार क्यों है...?

कॉमेडी शो की तर्ज पर सांसदों के विज्ञापन और फिल्मी कारोबार पर रोक लगे : मंत्री बनने के बाद सिद्धू का कॉमेडी शो में भाग लेना यदि गैरकानूनी है, तो फिर सांसद हेमा मालिनी द्वारा उत्पादों का विज्ञापन और परेश रावल द्वारा फिल्मों में काम करने को कैसे जायज़ ठहराया जा सकता है...? इस बात को लेकर कानून अब बनना ही चाहिए कि विधायक-सांसद सरकार से वेतन लेते समय अन्य कारोबार से आमदनी न होने का शपथपत्र दें.

सभी पार्टियों के विधायक, सांसद और मंत्री दूसरे पेशों में लिप्त हैं : अकाली-बीजेपी सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल अपने रसूख से ट्रांसपोर्ट और खनिज का कारोबार चलाते थे, जिसका विरोध करके कांग्रेस ने पंजाब में विशाल बहुमत से सरकार बनाई. घोषणापत्र में बड़े वायदों की बजाय सभी पार्टियां अपने विधायकों, सांसदों और मंत्रियों को अन्य व्यापार और कारोबार बंद करने का नियम क्यों नहीं लागू करतीं...?

ऑफिस ऑफ प्रॉफिट कानून का देशव्यापी दुरुपयोग : कॉमेडी शो सरकारी कार्यक्रम या लाभ का पद नहीं है, इसलिए सिद्धू इस कानून के दायरे में नहीं आते. दोहरे लाभ के आरोपों की वजह से दिल्ली में 'आप' के विधायकों की सदस्यता तथा अन्य लोगों को छूट पर विवाद है. इस बारे में स्पष्ट कानून यदि बन जाए तो विधायकों-सांसदों के ऊपर देशव्यापी जवाबदेही लागू हो सकती है.

खेल संघों से सांसद तथा मंत्रियों को लाभ और कमाई पर लगाम क्यों नहीं : क्रिकेट तथा अन्य खेल संघों के माध्यम से कांग्रेस के राजीव शुक्ला, एनसीपी के शरद पवार, बीजेपी के अनुराग ठाकुर समेत कई विधायक, सांसद और मंत्री अनेक लाभ लेते रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट द्वारा बीसीसीआई मामले में आदेश के बाद अधिकांश राजनेता खेल संघों के प्रबंधन से बाहर हो गए हैं, लेकिन इसके बावजूद संसद को इस बारे में जल्द ही कानून बनाना चाहिए.

अफसर और जज दूसरा कारोबार नहीं कर सकते, तो फिर मंत्री क्यों करें व्यापार : पूर्व पर्यावरण मंत्री एवं कांग्रेसी नेता कमलनाथ पर अपने होटल की पर्यावरणीय मंज़ूरी, परिवहन मंत्री नितिन गडकरी पर ई-रिक्शा की नीतियों और कारोबार प्रभावित करने के गंभीर आरोप लगते रहे हैं. कानून के अनुसार सरकारी अधिकारी और जज दूसरे कारोबार नहीं कर सकते. वकालत जैसे निजी प्रोफेशन वाले लोग भी दूसरा व्यापार नहीं कर सकते, फिर सांसद और मंत्रियों को अन्य कारोबार करने की इजाज़त क्यों मिलनी चाहिए...?

विधानसभा तथा संसद में हितों का विरोधाभास : विधायक-सांसद यदि अन्य व्यापार से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर जुड़े हैं, तो वे लोग संसदीय समिति और कानून निर्माण का हिस्सा नहीं बन सकते. इसके बावजूद तंबाकू, सिगरेट, दवा, रक्षा समेत अनेक क्षेत्रों की नीतियों और टैक्स प्रणाली को अधिकांश सांसद गैरकानूनी तौर पर प्रभावित करते हैं. ऐसे लोगों को चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित करने का कानून क्यों नहीं बनना चाहिए...?

काम नहीं, तो वेतन नहीं का नियम कब लागू होगा : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में बीजेपी सांसदों की अनुपस्थिति के बारे में गंभीर रोष व्यक्त किया, जबकि पिछले संसदीय सत्र का बहुमूल्य समय सांसदों के बहिष्कार की वजह से बर्बाद हो गया. सांसदों को उपस्थिति तथा काम के अनुसार ही वेतन मिले, इसके लिए संसद कब नियम बनाएगी...?

विधायक-सांसदों को आरटीआई के दायरे में लाया जाए : विधायक और सांसद वेतन, भत्ते, सुविधाओं के साथ-साथ अन्य विशेषाधिकार भी लेते हैं, तो फिर उन्हें आरटीआई कानून के तहत जवाबदेह क्यों नहीं बनाना चाहिए...?

विदेशों की तर्ज पर 'हितों के विरोधाभास' के लिए भारत में बने कानून : हाल ही में ब्रिटेन के पूर्व वित्तमंत्री और वर्तमान सांसद जार्ज ओस्बोर्न के संपादक बनने पर विवाद हुआ था. भारत में विधायक-सांसदों द्वारा संपत्ति-कारोबार की घोषणा, गिफ्ट प्रतिबंध और व्यापारिक हितों का खुलासा करने के नियम हैं, जिन्हें गंभीरता से शायद ही लागू किया जाता हो. सिद्धू के बहाने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राजनेताओं के नियमन हेतु सख्त कानून बनाने की पहल यदि करें, तो गणतंत्र को 'कॉमेडी सर्कस' बनने से रोका जा सकता है...!

विराग गुप्ता सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता और संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ हैं...

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति NDTV उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार NDTV के नहीं हैं, तथा NDTV उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.



Hindi News से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर पर फॉलो करे...

Advertisement