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नरेंद्र मोदी सरकार के तीन साल : कानून बेहाल, अनेक सवाल...

अप्रासंगिक कानून और नौकरशाही की अड़चनों के कारण नरेंद्र मोदी सरकार तीन साल में बेहतर गवर्नेन्स लाने में विफल रही, तो फिर जनता के अच्छे दिन कैसे आएंगे...?

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नरेंद्र मोदी सरकार के तीन साल : कानून बेहाल, अनेक सवाल...
जटिल और विरोधाभासी कानूनों की वजह से भारतीय अर्थव्यवस्था और व्यापार को अंतरराष्ट्रीय मापदंडों पर नकारात्मक रेटिंग मिलती है. रविशंकर प्रसाद कानून मंत्री होने के साथ आईटी मंत्रालय के भी मुखिया हैं, जिन्हें 'डिजिटल इंडिया' के स्वप्न को साकार करना है. अप्रासंगिक कानून और नौकरशाही की अड़चनों के कारण नरेंद्र मोदी सरकार तीन साल में बेहतर गवर्नेन्स लाने में विफल रही, तो फिर जनता के अच्छे दिन कैसे आएंगे...?

देश में कानूनी शून्यता का बेजा फायदा : पुराने अप्रासंगिक कानून रद्द न होने से भ्रष्टाचार और लालफीताशाही बढ़ने के साथ आम जनता अभी भी प्रताड़ित हो रही है. कानूनी शून्यता का फायदा उठाकर अनेक ई-कॉमर्स कंपनियां, ड्रोन सेवाएं, ऐप-आधारित टैक्सी सेवाएं (उबर इत्यादि) बड़े पैमाने पर टैक्स चोरी के साथ 'डिजिटल इंडिया' में बेरोज़गारी का सबब भी हैं.

'डिजिटल इंडिया' में फुर्ती, तो डाटा प्रोटेक्शन के कानून में सुस्ती क्यों : 20वीं शताब्दी में तेल तथा 21वीं शताब्दी में डाटा को सबसे बहुमूल्य माना गया है. डाटा की गैरकानूनी बिक्री से भारतीय अर्थव्यवस्था तबाह होने के साथ जनता की प्राइवेसी भी खतरे में है. आधार और व्हाट्सऐप मामले पर सुप्रीम कोर्ट में बहस के दौरान केंद्र सरकार ने डाटा प्रोटेक्शन हेतु जल्द कानून बनाने की दलील दी, लेकिन असल सवाल यह है कि इस पर विलम्ब क्यों...?

जजों की नियुक्ति तथा जवाबदेही के लिए नया कानून क्यों नहीं : जजों की नियुक्ति हेतु एनजेएसी कानून को सुप्रीम कोर्ट ने 2015 में रद्द कर दिया. पूर्ववर्ती यूपीए सरकार द्वारा 2010 में जजों के नैतिक आचरण के लिए न्यायिक मानक और जवाबदेही विधेयक लोकसभा का कार्यकाल समाप्त होने की वजह से पारित नहीं हो सका. जजों की निष्पक्ष नियुक्ति और जवाबदेही के लिए कानून मंत्री संसद के माध्यम से नया कानून क्यों नहीं बनाते, जिससे जस्टिस कर्नन जैसे विवाद भविष्य में होने पर उनका समाधान तंत्र भी विकसित हो सके.

टेलीकॉम सेक्टर की गर्दिश से बैंकों को एनपीए का खतरा : कॉल ड्रॉप पर दूरसंचार कंपनियों की लूट पर लगाम के लिए ट्राई ने और अधिक कानूनी अधिकार मांगे, जिस पर सरकार कानून बनाने में विफल रही. रिलाइंस जियो ने फ्री सर्विस के नाम पर बहुतायत उपभोक्ताओं के डाटा पर कब्जा करने के साथ अन्य टेलीकॉम कंपनियों की कमर तोड़ दी. टेलीकॉम सेक्टर में आसन्न खतरे से बैंकों का चार लाख करोड़ एनपीए में तब्दील हो सकता है, जिसके बावजूद दूरसंचार कंपनियों के नियमन हेतु प्रभावी कानून बनाने में सरकार क्यों विफल हो रही है...?

साइबर सुरक्षा और बिटकॉइन पर प्रतिबंध हेतु ज़रूरी कानून क्यों नहीं : देश रैन्समवेयर वायरस के आतंक से ग्रस्त है, जिसके पीछे अमेरिका में एनएसए द्वारा लीक तकनीक का हाथ बताया जा रहा है. कई वर्ष पहले अमेरिका में प्रिज़्म कार्यक्रम के तहत बड़े पैमाने पर भारत समेत अनेक देशों की जासूसी की गई थी. जासूसी में लिप्त बड़ी कंपनियों के विरुद्ध भारत में सख्त कार्रवाई करने के बजाय 'डिजिटल इंडिया' में उन्हें व्यापार के लिए खुला मैदान दे दिया गया है. साइबर हमले में फिरौती के नाम पर बिटकॉइन करेंसी का भारत में रोजाना पांच करोड़ का अवैध कारोबार कैसे हो रहा है...?

तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट के क्षेत्राधिकार को मान्यता क्यों : कानून मंत्री, सरकार और विपक्ष द्वारा सुप्रीम कोर्ट की न्यायिक सक्रियता पर हमेशा सवाल खड़े किए जाते हैं. संविधान के अनुच्छेद 44 के अनुसार समान नागरिक संहिता पर क्रियान्वयन हेतु विधि आयोग को रेफरेंस भेजा गया है. बाल विवाह तथा सती प्रथा जैसी कुरीतियों समेत अनेक सामाजिक मामलों पर पूर्व में संसद द्वारा कानून बनाकर ज़रूरी सुधार किए गए, फिर तीन तलाक पर कानून बनाने के स्थान पर मामले को सुप्रीम कोर्ट के क्षेत्राधिकार में करने पर सरकार ने सहमति क्यों दी...?

अधिकारियों को सरकारी ई-मेल यदि नहीं मिल सकती, तो कानून बदलें : देश में लगभग तीन करोड़ सरकारी कर्मचारी हैं, जिनमें केंद्र सरकार के 50 लाख अधिकारी शामिल हैं. दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा 2013 में पारित आदेश के बावजूद केंद्र सरकार अभी तक सभी अधिकारियों को एनआईसी की सरकारी ई-मेल सुविधा नहीं दे पाई है. फलस्वरूप अधिकांश अधिकारी जी-मेल, याहू, हॉटमेल जैसी विदेशी ई-मेलों का गैरकानूनी इस्तेमाल करते हैं, जिसके लिए पब्लिक रिकॉर्ड्स एक्ट 1993 के तहत उन्हें तीन वर्ष की सजा हो सकती है. यदि सरकार ईमेल के लिए भी ज़रूरी ढांचा मुहैया नहीं करा सकती, तो कानून में ही ज़रूरी बदलाव होने चाहिए, जिससे सरकारी कर्मचारियों को अपराधी बनने से रोका जा सके.

19वीं शताब्दी के नियमों से संचालित संसदीय समितियों के नियमन में बदलाव क्यों नहीं : देश की संसदीय व्यवस्था 19वीं शताब्दी के जटिल नियमों से संचालित है. सरकार सड़कों और शहरों के नाम तो बदल रही है, लेकिन ब्रिटिश काल के नियमों को क्यों नहीं बदलती, जैसा बीजेडी सांसद जय पांडा ने मांग की है. अमेरिकी सीनेट तथा ब्रिटिश हाउस ऑफ लॉर्ड्स के अनेक बोझिल नियम भारत में संसद की कार्रवाई को नीरस बना रहे हैं, जिससे संसदीय व्यवस्था के विफल होने का खतरा बढ़ रहा है.

विराग गुप्ता सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता और संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ हैं...

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति NDTV उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार NDTV के नहीं हैं, तथा NDTV उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.



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