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विराग गुप्ता : जीएसटी से बढ़ेगी महंगाई, जो अगले चुनाव में बनेगी कांग्रेस का ब्रह्मास्त्र

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विराग गुप्ता : जीएसटी से बढ़ेगी महंगाई, जो अगले चुनाव में बनेगी कांग्रेस का ब्रह्मास्त्र
नई दिल्ली:

जीएसटी, यानी गुड्स एंड सर्विस टैक्स के प्रस्तावित लाभों के बारे में जान लेने के बाद अब पढ़िए इस कानून की खामियों के बारे में...

जीएसटी कानून की खामियां

  • राजनीतिक आग्रहों से किए गए निम्न समझौतों की वजह से जीएसटी का प्रस्तावित कानून न तो जीडीपी में विशेष वृद्धि ला पाएगा, न अर्थव्यवस्था की सेहत को दुरुस्त कर पाएगा।
  • वर्तमान में पेट्रोल-डीजल की कीमतें सभी राज्यों में अलग-अलग हैं, और यही हाल शराब का है। जीएसटी लागू होने के बाद भी फिलहाल ऐसा जारी रहेगा। पेट्रो पदार्थों पर सरकार ने निर्णय लिया है कि ये रहेंगे तो जीएसटी के अंदर, लेकिन इन पर राज्य पहले की तरह टैक्स वसूलते रहेंगे। यानी पेट्रोल, डीजल और एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में राज्यों में जो अंतर देखने को मिलता है, वह बरकरार रहेगा। इसी तरह राज्यों के दबाव पर केंद्र सरकार शराब को भी  जीएसटी से बाहर रखने पर राजी हो गई है।
  • जीएसटी की सबसे बड़ी खामी यह है कि असंतुष्ट राज्यों द्वारा बिना टैक्स संशोधनों के पुराने टैक्स नियमों को बिना जीएसटी के भी चालू रखा जा सकता है। दिल्ली जैसे केंद्रशासित राज्य में देश सरकारों का संघर्ष देख रहा है। जीएसटी पर रोज़ ऐसे संघर्ष होंगे और राजनीतिक दुराग्रहों के काल में इन्हें सुलझा न पाने की कीमत आम जनता को चुकानी पड़ेगी।
  • सरलता का दावा करने वाली जीएसटी कर व्यवस्था में केंद्र और राज्यों में छह तरह के कुल आठ फॉर्म भरने पड़ेंगे।
  • राज्य सरकारों को नए अप्रत्यक्ष कर लगाने की छूट नहीं होगी, जिससे उनके राजस्व स्रोतों में कमी आ जाएगी, जिससे आर्थिक संकटों, यथा - बाढ़-सूखा तथा सामाजिक कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में बड़ा गतिरोध हो सकता है।
  • अगर करों की दरों को संविधान संशोधन कानून का हिस्सा बना दिया गया तो भविष्य की गठबंधन सरकारों में परिवर्तन मुश्किल हो सकता है, जिसकी कीमत पूरे देश को चुकानी पड़ सकती है।
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पहला भाग : दरअसल क्या है जीएसटी, जो हो रहा है राजनीतिक असहिष्णुता का शिकार...?
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जीएसटी के खतरे और आशंकाएं

  • जीएसटी में दरों को कम करने के नाम पर सरकार द्वारा कॉरपोरेट टैक्स की दरों को 30 प्रतिशत से 25 प्रतिशत में लाकर कारोबार जगत के बड़े व्यापारियों को राहत देने का प्रबंध पहले ही कर दिया गया है, जिससे न सिर्फ कर-राजस्व में कमी आएगी, वरन आर्थिक विषमता भी बढ़ेगी।
  • मोदी सरकार द्वारा एफआईआई (विदेशी निवेशकों) के 42 हजार करोड़ से अधिक की टैक्स डिमांड को माफ करने और भविष्य में टैक्स न लगाने के अनुबंधों को लागू कर विदेशी निवेशकों के लिए अनुकूल आर्थिक माहौल प्रदान किया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त एसआईटी की अनुशंसाओं के बावजूद इनकी जवाबदेही तय नहीं होने से काले धन की अर्थव्यवस्था के विशाल स्रोत पर लगाम लगाना मुश्किल होगा।
  • 15-20 लाख रुपये का व्यापार करने वाले छोटे व्यापारी भी जीएसटी के दायरे में आकर हिसाब-किताब रखने को मजबूर होंगे, जो इन सुधारों का पुरज़ोर विरोध और असहयोग करेंगे।
  • सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को मानने से केंद्र सरकार की आय का 55 फीसदी और राज्यों की आय का 70 फीसदी से अधिक सरकारी अधिकारियों के वेतन और पेंशन में ही खर्च हो जाएगा, और राज्यों के पास बिजली बोर्डों के बकाया देने के पैसे भी नहीं है।
  • जीएसटी के माध्यम से करों में कटौती से राज्यों के राजस्व में कमी होने से राज्य कम आमदनी के बाद कैसे अपनी वित्तीय व्यवस्था को सफल रख पाएंगे, यह एक बड़ा प्रश्नचिह्न है। इससे क्षेत्रीय असंतुलन और अपराध बढ़ेंगे।
  • बिजली, रियल एस्टेट, पेट्रोलियम और शराब जैसे महत्वपूर्ण सेक्टरों को जीएसटी से बाहर रखने से करों की बहुलता जारी रहेगी, जिसके चलते तथाकथित सुधारों का कोई लाभ नहीं मिलेगा।
  • आधे-अधूरे सुधारों से विदेशी निवेशकों का उत्साह भंग होगा और घरेलू उत्पादकों की प्रतिस्पर्धी स्थिति को भी नुकसान पहुंचेगा।
  • राज्यों द्वारा जीएसटी के माध्यम से समानांतर व्यवस्था खड़ी करने से रोज़गार तथा कर प्रणाली में सुधार और भी मुश्किल हो सकता है।
  • राजनैतिक रस्साकशी के बीच जीएसटी के अधूरे सुधारों से देश में 'वित्तीय नक्सलवाद' पैदा हो सकता है, जहां छोटे और मध्यम उद्योगों का अस्तित्व ही खतरे में पड़ सकता है।
क्या जीएसटी महंगाई बढ़ाएगा...?
  • मोदी सरकार के पहले दो बजट अप्रत्यक्ष करों से भरपूर रहे हैं। सरकार को सोचना पड़ेगा कि क्या मंदी से जूझती अर्थव्यवस्था अप्रत्यक्ष करों की इतनी मार झेल सकती है और क्या टैक्स राज के जरिये महंगाई की आंच बढ़ाकर सरकार अपने लिए राजनैतिक मुसीबत नहीं न्योत रही...?
  • शुरुआती तीन सालों में जीएसटी महंगाई बढ़ाने वाला टैक्स साबित होगा, जैसा मलेशिया और अन्य देशों के उदाहरणों से स्पष्ट है। अभी हम सारी सेवाओं पर लगभग 14.5 फीसदी सर्विस टैक्स दे रहे हैं, जो जीएसटी लागू होने पर 18% से 22% के बीच हो जाएगा, जिसका प्रभाव पिक्चर के टिकट, होटल का बिल, बैंकिंग सेवा, यात्रा टिकट इत्यादि पर पड़ेगा, जिससे आम लोगों पर महंगाई की मार पड़ेगी।
  • लोगों को मोदी सरकार का सेस-राज चिंतित कर रहा है। नवंबर में लागू स्वच्छ भारत सेस के साथ अब लगभग 27 सेस या उपकर देने पड़ते हैं। यदि सरकार जीएसटी के जरिये कारोबार को आसान करने का दावा कर रही है तो यह सेस उन दावों के बिल्कुल उलट है, क्योंकि सेस राज से कारोबारियों के लिए कर नियमों के पालन की लागत (कम्प्लायन्स कॉस्ट) बुरी तरह बढ़ती है।
  • जीएसटी को लागू करने के लिए प्रौद्योगिकी ढांचा, सॉफ्टवेयर और नई कर व्यवस्था के पालन में छोटे व्यापारियों और आम लोगों को शुरुआत में अतिरिक्त निवेश करना पड़ सकता है, जो महंगाई के साथ-साथ परेशानियां भी बढ़ाएगा।
इस आलेख की अंतिम किस्त में हम पढ़ेंगे - संघवाद के लिए बड़ी राजनीतिक चुनौती क्यों है जीएसटी...?

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विराग गुप्ता सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता और टैक्स मामलों के विशेषज्ञ हैं...

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति एनडीटीवी उत्तरदायी नहीं है। इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार एनडीटीवी के नहीं हैं, तथा एनडीटीवी उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।



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