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सुप्रीम कोर्ट की 'तलवार' के बावजूद ग्राहकों पर आधार की बेज़ा मार

आधार को अनिवार्य बनाने के लिए मोबाइल कंपनियों और बैंकों की मनमानी से दीपावली के पर्व का जायका बिगड़ने के साथ सुप्रीम कोर्ट की सर्वोच्चता पर सवालिया निशान खड़े हो गए हैं?

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सुप्रीम कोर्ट की 'तलवार' के बावजूद ग्राहकों पर आधार की बेज़ा मार

प्रतीकात्‍मक फोटो

आधार को अनिवार्य बनाने के लिए मोबाइल कंपनियों और बैंकों की मनमानी से दीपावली के पर्व का जायका बिगड़ने के साथ सुप्रीम कोर्ट की सर्वोच्चता पर सवालिया निशान खड़े हो गए हैं?

..फिर ग्राहकों पर क्यों पड़ रही मैसेजों की मार
हाईकोर्ट के पूर्व जज पुत्तास्वामी की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने 23 सितंबर 2013 को कहा था कि आधार न होने की वजह से सरकार किसी भी व्यक्ति को लाभ से वंचित नहीं कर सकती. उसी याचिका पर 9 जजों की संविधान पीठ ने ऐतिहासिक फैसले से प्राइवेसी को मूल अधिकार मान लिया है. परन्तु आधार की वैधानिकता पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आना अभी बाकी है. मूल अधिकारों को आपातकाल में या फिर विधि स्थापित प्रक्रिया से ही निरस्त किया जा सकता है. फिर पिछले दरवाजे से आधार को अनिवार्य बनाने के लिए हड़बड़ी क्यों हो रही है? संसद द्वारा 2016 में बनाए गए क़ानून में आधार अनिवार्य नहीं
संसद द्वारा मार्च 2016  में मनी बिल के तौर पर पारित होने के बाद राष्ट्रपति की तुरत-फुरत मंजूरी के बाद बने कानून में भी आधार जरूरी नहीं है. पीएमएलए नियमों में संशोधन करके सरकार ने जून 2017 से बैंक खातों के लिए आधार जरूरी कर दिया है. संसद को दरकिनार करके सरकारी नियमों से आधार को जरूरी बनाने को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है जिस पर दीवाली के अवकाश के बाद सुनवाई होनी है.   

आदेश प्रीपेड वेरिफिकेशन के लिए फिर सभी मोबाइलों में आधार क्यों
लोकनीति की पीआईएल में 5 करोड़ फर्जी मोबाइल कनेक्शनों का मुद्दा था, जिस पर फरवरी 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को कार्रवाई और वेरिफिकेशन के निर्देश दिए. पोस्टपेड नंबर में ग्राहकों के पते का वेरिफिकेशन होने के साथ मासिक बिल का भुगतान बैंकों के माध्यम से होने की वजह केवाईसी नियमों का पालन तो पहले ही हो रहा है. दूरसंचार विभाग के 23 मार्च 2017 सर्कुलर से प्रीपेड के साथ पोस्टपेड मोबाइल को भी आधार से जोड़ने का आदेश क्या सुप्रीम कोर्ट के आदेश की मनमानी व्याख्या नहीं है?

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मोबाइल नंबरों की जांच आधार के बगैर अन्य कागजातों से संभव
सरकार ने भी यह माना है कि आधार कार्ड देश में रहने वाले सभी व्यक्तियों को बगैर जांच के दिया जा रहा है. कुछ दिनों पूर्व हैदराबाद पुलिस ने फर्जी कागज़ात से आधार बनवाने के आरोप में दो रोहिंग्याओं को गिरफ्तार किया है. मोबाइल ग्राहकों की जांच यदि पासपोर्ट, ड्राइविंग लाइसेंस, वोटर कार्ड, पैन इत्यादि से की जाए तो डुप्लीकेट नंबरों के साथ बोगस नम्बरों का फर्जीवाड़ा रुक जाएगा. सरकार आधार को नाम या पते के लिए आवश्यक दस्तावेज नहीं मानती फिर 12 अंकों के आधार पर किस तरह का ई-वेरिफिकेशन हो रहा है?  

कोर्ट के आदेश की आड़ में आधार को जरूरी बनाना अनैतिक, गैरकानूनी
सुप्रीम कोर्ट ने 24 मार्च 2014  के आदेश से आधार के डाटा शेयरिंग पर रोक लगाने के साथ आधार को जरूरी बनाने पर भी रोक लगाई थी. इसके बाद 11 अगस्त 2015 के आदेश से सुप्रीम कोर्ट ने एलपीजी और पीडीएस हेतु आधार को जरूरी बनाने की इजाज़त दी, जिससे सरकारी सब्सिडी में भ्रष्टाचार रोका जा सके. आधार के साथ पैन नंबर को जोड़ने की सरकार की योजना पर सुप्रीम कोर्ट ने 9 जुलाई 2017 के आदेश से 'सीमित' मुहर लगाई है. सुप्रीम कोर्ट के आदेश की आड़ में आधार को जरूरी बनाना नैतिक और कानूनी दृष्टि से गलत है और क्या इसके लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा संबंधित विभागों के विरुद्ध अवमानना की कारवाई की जायेगी?  

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आदेश के तहत सरकार आधार पर पब्लिक नोटिस क्यों न जारी करे
आधार से खातों को जोड़ने के लिए मोबाइल कंपनियों ने ग्राहकों को फ़रवरी 2018 और बैंकों ने दिसंबर 2017 तक की समय-सीमा दी है लेकिन जिन ग्राहकों ने केवाईसी की औपचारिकता अन्य दस्तावेजों से पहले ही पूरी कर ली, उनके मोबाइल या बैंक खातों की सुविधा सिर्फ आधार नहीं देने पर कैसे समाप्त की जा सकती है? सुप्रीम कोर्ट ने 11 अगस्त और फिर 15 अक्टूबर 2015  को सरकार से कहा था कि इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया में बड़े पैमाने पर प्रचार करके जनता को यह बताया जाए कि आधार जरूरी नहीं है. आधार पर सरकार की किरकिरी होने के बाद कांग्रेस पर इस योजना का ठीकरा फोड़कर राजनीतिक नुक्सान भले ही रुक जाए लेकिन जनता में उपजे अविश्वास को ख़त्म करने के लिए  आधार की संवैधानिक विसंगतियों को दूर करने की जवाबदेही तो सरकार को ही पूरी करने पड़ेगी!  
     
विराग गुप्ता सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता और संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ हैं...

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