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कॉल ड्रॉप पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर हो पुनर्विचार

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कॉल ड्रॉप पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर हो पुनर्विचार

सरकार को कॉल ड्रॉप मामले में पुनर्विचार याचिका दायर करना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने कॉल ड्रॉप पर मोबाइल कंपनियों द्वारा ग्राहकों को मुआवजा देने वाले नियम को खारिज करते हुए इसे मनमाना, असंगत और गैर-पारदर्शी बताया है। यह निर्णय देश के 100 करोड़ मोबाइल ग्राहकों के लिए बुरी खबर है जिसके खिलाफ सरकार को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पुनर्विचार याचिका अवश्य दायर करना चाहिए।

कॉल ड्रॉप पर ग्राहक को सूचना पाने का हक
दरअसल मोबाइल कंपनियां नेटवर्क पर पर्याप्त निवेश नहीं कर रहीं तथा स्पैक्ट्रम को भी ज्यादा आमदनी वाली सेवाओं में इस्तेमाल किया जा रहा है। इससे कॉल ड्रॉप की संख्या में भारी वृद्धि हुई है, पर उसका पूरा विवरण ग्राहकों को मिलता ही नहीं है। कानून के अनुसार मोबाइल में हुई बातचीत जैसे एसटीडी, आईएसडी एवं कॉल ड्रॉप इत्यादि का विवरण, पोस्टपेड उपभोक्ता को बिल से और प्री-पेड ग्राहक को एसएमएस से मिलना चाहिए। इस नियम का क्रियान्वयन 1 जनवरी 2016 से होना था, जिसका मोबाइल कंपनियों से पालन नहीं कराने पर ट्राई की भूमिका संदेह के घेरे में है।

कॉल ड्रॉप पर मोबाइल कंपनियों द्वारा पैसे वसूलना गैर-कानूनी है
दूरसंचार कंपनियों को मोबाइल सेवा के लिए दूरसंचार विभाग द्वारा लाइसेंस दिया गया है। कॉल ड्रॉप में ग्राहक की बात ही नहीं होती, इसलिए उस पल्स/मिनट का पैसा मोबाइल कंपनी नहीं वसूल सकती। कंपनियां मोबाइल बातचीत से लगभग 300 करोड़ रुपये रोज कमाती हैं, जिसमें से 41 फीसदी हिस्सा मिनट प्लान के ग्राहकों से आता है। कॉल ड्रॉप होने पर इन ग्राहकों को बेवजह पूरे मिनट का पैसा देना पड़ता है, जो लाइसेंस की शर्तों के विपरीत होने के साथ गैर-कानूनी भी है। बड़े पैमाने पर कॉल ड्रॉप होने से मोबाइल कंपनियां इस मद से 57,000 करोड़ रुपये से अधिक की गलत वसूली कर रही हैं।


नियम बनाने से पहले ट्राई ने मोबाइल कंपनियों से किया था मशविरा
ट्राई द्वारा कॉल ड्रॉप पर मुआवजे के नियम को 16 अक्‍टूबर 2016 में बनाने से पहले मोबाइल कंपनियों से कई  दौर की बैठक की गई थी जिसके तहत ही इसे 3 महीने बाद 1 जनवरी 2016 से लागू किया गया। इस विमर्श के अनुसार ही मोबाइल कंपनियों द्वारा पूर्व में गैर-कानूनी वसूली के खिलाफ ट्राई द्वारा कोई कार्रवाई नहीं करते हुए, कॉल ड्रॉप पर मुआवजे की अधिकतम सीमा 3 रूपये रखी गई। मोबाइल कंपनियों के दवाब से ट्राई द्वारा 28 नवंबर के संशोधित आदेश से इनकमिंग नेटवर्क के कारण कॉल ड्रॉप पर मुआवजे का प्रावधान खत्म कर दिया। जब यह फैसला मोबाइल कंपनियों की भागीदारी के बाद लिया गया, तब किस आधार पर इसे अदालत में चुनौती दी गई?

नेटवर्क में कमी के प्रावधान से दो फीसदी कॉल ड्रॉप का कानूनी हक नहीं
सुप्रीम कोर्ट में मोबाइल कंपनियों की तरफ से सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने कॉल ड्रॉप पर मुआवजे का विरोध किया। क्या टेलीकॉम मामले में पूर्व दूरसंचार मंत्री ने बहस करके संविधान की शपथ और गोपनीयता का उल्लंघन नहीं किया? लाइसेंस की शर्तों के अनुसार मोबाइल कंपनियों को 98 फीसदी इलाके में नेटवर्क का विस्तार जरूरी है, जिसके विफल होने पर कड़े जुर्माने का प्रावधान है। इसे कुतर्क के माध्यम से 2 फीसदी कॉल ड्रॉप की अनुमति बना दिया गया, जिसका सरकार के वकीलों ने जोरदार विरोध किया ही नहीं। अगर इस कुतर्क को मान भी लिया जाए तो भी कॉल ड्रॉप होने पर मोबाइल कंपनियों को बगैर सर्विस को पैसे वसूलने की अनुमति कैसे दी जा सकती है?

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद मोबाइल कंपनियों के बल्ले-बल्ले
एयरटेल ने कहा है कि वह 1.5 फीसदी तक कॉल ड्रॉप रखने के लिए कृत संकल्प है। विदेशों में कॉल ड्रॉप होने पर ग्राहकों को मुफ्त कॉल मिलती है पर भारत में इसका पालन ही नहीं होता। अटार्नी जनरल ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि मोबाइल कंपनियां संगठित गिरोहबंदी करके ग्राहकों को चूना लगा रहीं है। क्या इसी वजह से सभी तथ्यों को सुप्रीम कोर्ट के सम्मुख प्रभावी तरीके से रखा ही नहीं गया। क्या रविशंकर प्रसाद जी इस गोरखधंधे की जांच कराकर सुप्रीम कोर्ट के सम्मुख पुनर्विचार याचिका दायर करने का निर्देश देंगे? अन्यथा कॉल ड्रॉप मंत्री का कलंक तो इतिहास में दर्ज ही हो जाएगा..।

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विराग गुप्ता सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता और संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ हैं...

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति एनडीटीवी उत्तरदायी नहीं है। इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार एनडीटीवी के नहीं हैं, तथा एनडीटीवी उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।



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