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मंदिर में महिलाएं : रूढ़ियां तोड़ना ही काफी नहीं

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मंदिर में महिलाएं : रूढ़ियां तोड़ना ही काफी नहीं

प्रतीकात्मक फोटो

नवसंवत्सर में देश के चारों दिशाओं में महिला मुख्यमंत्री तथा महाराष्ट्र में महिलाओं का शनि शिंगणापुर मंदिर में दर्शन की अनुमति से एक नयी महिला क्रांति की आहट है। यह मंदिर 400 वर्ष पहले भक्तिकाल के दौरान जब बना था तब संत ज्ञानदेव, नामदेव एवं तुकाराम के साथ मीराबाई ने भी महिलाओं की समानता के लिए धार्मिक स्वर दिए थे फिर आज के आधुनिक समाज में इस पर आपत्ति क्यों हो रही है?

कानून के पालन के लिए समाज को उठाने होंगे कदम
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14,15 एवं 25 में समानता का मूल अधिकार है। मंदिरों में सभी वर्गों के प्रवेश के लिए महाराष्ट्र में 1956 में कानून बनाया गया था, जिसके उल्लंघन पर 6 महीने की सजा हो सकती है। इसके बावजूद भू-माता ब्रिगेड की तृप्ति देसाई की कानूनी मांग तथा हाईकोर्ट के आदेश का पालन कराने में महाराष्ट्र सरकार क्यों विफल रही? क्या इस विफलता से समाज में भीड़तंत्र तथा अराजकता को बढ़ावा नहीं मिल रहा? इसका यह भी सबक है कि कानूनी प्रावधान अकेले नाकाफी हैं, उन्हें लागू कराने के लिए समाज को भी दो कदम बढाने का हौसला उठाना पड़ता है। शनि शिंगणापुर गांव में आज भी लोग घरों में दरवाजे नहीं लगवाते क्योंकि धार्मिक डर से वहां चोरी और अपराध नहीं होते। दूसरी ओर कानून होने के बावजूद भारतीय समाज में वेश्यावृत्ति, जाति-प्रथा और दहेज जैसी कुरीतियां व्याप्त हैं।  

(पढ़ें - बस्तर ही नहीं, समय के हिंसक होने की दास्तां है, ‘लाल लकीर’)


धार्मिक रूढियों के विरूद्ध महिलाओं का प्रतीकात्मक मुक्ति अभियान
 गार्गी और मैत्रेयी के आख्यानों से स्पष्ट है कि वैदिककाल में महिलाओं को बराबरी का दर्जा था पर बाद में स्मृति साहित्य के माध्यम से महिलाओं के विरूद्ध कई बंधन लगा दिए गये। इसी के विरोध में पिछले दिनों जेएनयू में कुछ छात्रों द्वारा मनुस्मृति की प्रतियां जलाई गई। पर क्या इस प्रतीकात्मक लड़ाई से ग्रामीण समाज में महिलाओं के विरुद्ध हिंसा और बलात्कार में कमी आई है, जिसके विरुद्ध सशक्त क़ानून मौजूद हैं?

मुस्लिम महिलाओं को कैसे मिलेगी समानता
मुंबई की हाजी-अली दरगाह में महिलाओं को जाने की मनाही है। इसको जब मुंबई हाईकोर्ट में चुनौती दी गई तो दरगाह के ट्रस्टियों ने कहा कि ‘पुरुष’ मुस्लिम संत की कब्र से महिलाओं की करीबी इस्लाम में एक भयंकर पाप है’। तीन तलाक के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में मामले की सुनवाई हो रही है जिस पर उलेमाओं ने आपत्ति की है। शिवसेना के बयानों से स्पष्ट है कि आने वाले समय में इबादतगाहों में मुस्लिम महिलाओं के अधिकार पर बहस एक नए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का बहाना बन सकती है।  

अधिकारों की लड़ाई में न भूलें ग्रामीण महिलाओं का दर्द
क्या ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं के लिए ये प्रतीकात्मक मुद्दे महत्वपूर्ण हैं? लातूर और अन्य पिछड़े क्षेत्र की महिलाओं को पानी, ईंधन और भोजन चाहिए जो उनके जीवन का मूल अधिकार है जिसे संविधान के अनुच्छेद 21 से सर्वोच्च मान्यता मिली है। थॉमसन रिपोर्ट के अनुसार भारत महिलाओं की सुरक्षा के लिए विश्व में चौथा सबसे खतरनाक देश है। सरकार द्वारा मनरेगा में महिलाओं को न्यूनतम मजदूरी के कानून का पालन सुनिश्चित नहीं हो पा रहा उसके खिलाफ सशक्त महिला आंदोलन क्यों नहीं होता?  

महिलाओं के मंदिर में प्रवेश से स्थापित मान्यताएं तो खंडित हो रही हैं पर क्या इससे समानता के अधिकार का वास्तविक सृजन भी हो पायेगा? आने वाले समय में केरल के शबरीमाल मंदिर सहित कई अन्य मंदिरों में महिलाओं की पूजा के अधिकार की मांग जोर पकड़ेगी जो मामले सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं। देवदासी सहित कई मामलों में धर्म के नाम पर ही महिलाओं का शोषण हुआ है और उसी अधिकार को अब क्रान्ति का नाम दिया जा रहा है। इन प्रतीकों से महिलाओं की मूल समस्याओं में बदलाव की लड़ाई कंही भटक तो नहीं जायेगी?

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विराग गुप्ता सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता और संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ हैं...

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