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चीफ जस्टिस को क्लीन चिट और सुप्रीम कोर्ट में दाग

आलोचकों के अनुसार न तो पीड़ित महिला का पूरा पक्ष सुना गया और न ही सभी पहलुओं की जांच की गई, तो फिर ठोस आधार कैसे मिलेंगे?

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चीफ जस्टिस को क्लीन चिट और सुप्रीम कोर्ट में दाग

सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की आंतरिक समिति ने यौन उत्पीड़न के आरोपों पर चीफ जस्टिस रंजन गोगोई को क्लीन चिट दे दी, जिसके बाद विवाद और गहरा गया है. जांच समिति के अनुसार चीफ जस्टिस के खिलाफ लगाए गए आरोपों में कोई ठोस आधार नहीं मिला है. आलोचकों के अनुसार न तो पीड़ित महिला का पूरा पक्ष सुना गया और न ही सभी पहलुओं की जांच की गई, तो फिर ठोस आधार कैसे मिलेंगे? जांच समिति द्वारा यदि व्हाट्सऐप कॉल के रिकॉर्ड ही मंगा लिए जाते तो पूरा मामला शीशे की तरह साफ हो जाता. सोशल मीडिया में यह कहा जा रहा है कि इतनी फुर्ती से सभी मामलों की सुनवाई और निपटारा किया जाए तो न्यायिक विलम्ब की समस्या जड़ से खत्म हो जाएगी. हो सकता है कि जांच समिति के निष्कर्ष सही हों, लेकिन मामले को मनमाने तरीके से हैंडिल करने से सुप्रीम कोर्ट की साख को काफी नुकसान हुआ है.
 
चीफ जस्टिस को जांच रिपोर्ट दी गई तो फिर शिकायतकर्त्ता को क्यों नहीं
खबरों के अनुसार सुप्रीम कोर्ट के जज चन्द्रचूड़ ने पत्र लिखकर इस मामले की नियमों के अनुसार सही तरीके से जांच करने का निवेदन किया था. इसके बावजूद पूरे मामले की आनन-फानन में एकतरफा जांच पूरी कर दी गई. जांच समिति ने विशाखा मामले में दिए गए दिशा निर्देशों का पूरा पालन नहीं किया. इन्दिरा जयसिंह मामले के पुराने फैसले के आधार पर जांच समिति की रिपोर्ट को सार्वजनिक करने से मना भी कर दिया गया है. खबरों के अनुसार यह रिपोर्ट चीफ जस्टिस को भी दी गई है, तो फिर इसे शिकायतकर्ता महिला को क्यों नहीं दिया गया?
 
चीफ जस्टिस ने शुरुआती सुनवाई में ही लिख दी पूरी पटकथा
चीफ जस्टिस ने पिछले साल प्रेस कॉन्फ्रेंस करके इतिहास बनाया था, तो फिर इस मामले में उन्होंने अपना पक्ष सुप्रीम कोर्ट के सभी जजों और राष्ट्रपति के सामने क्यों नहीं रखा? महिला द्वारा 22 जजों को शिकायती हलफनामा भेजे जाने की खबर प्रकाशित होने के आधे घंटे के भीतर ही छुट्टी के दिन चीफ जस्टिस ने अपने ही मामले की न्यायिक सुनवाई क्यों कर डाली? सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस अपने ही मामले में जज कैसे हो सकते हैं? न्यायिक सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने महिला की शिकायतों को बेबुनियाद बताते हुए उसे आपराधिक चरित्र का करार दिया. आपातकाल के दौर में तत्कालीन प्रधानमंत्री को 'इंदिरा इज इंडिया' के पर्याय से नवाजा गया था. उसके बाद से व्यक्ति और संस्थाओं के घाल-मेल का भारत में ट्रेंड ही बन गया. कार्रवाई होने पर मायावती का दलित कार्ड, मुलायम सिंह और लालू यादव का ओबीसी कार्ड, प्रज्ञा ठाकुर का हिंदुत्व कार्ड, आतंकियों का मुस्लिम कार्ड, नेताओं का क्षेत्रीय कार्ड और पीएम मोदी का राष्ट्रवाद कार्ड कुछ ऐसी ही मिसाले हैं. इसी तर्ज पर चीफ जस्टिस ने भी अपने ऊपर लगे हुए आरोपों को न्यायपालिका पर हमला करार दिया है. अगले ही दिन एक वकील ने हलफनामा दायर करके चीफ जस्टिस द्वारा दी गई साजिश की कहानी पर मोहर भी लगा दी.
 
आतंक और अपराध की साजिश से जुड़ी न्यायपालिका
वकील उत्सव बेंस द्वारा फिल्मी तरीके से दिए गए हलफनामे पर सुप्रीम कोर्ट की नई बेंच ने दो दिन तक सुनवाई की. शुरुआत में कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट की व्यवस्था को दाउद इब्राहिम और रोमेश भंडारी जैसे माफिया से खतरा है. सुप्रीम कोर्ट के जजों ने आनन-फानन में सीबीआई और आईबी के डायरेक्टर के साथ पुलिस कमिश्नर को भी तलब कर लिया. आतंकियों के खिलाफ ठोस कार्रवाई करके सबूत और न्यायिक व्यवस्था को बचाने की बजाए, रिटायर्ड जज पटनायक को जांच सौंपकर मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया.
 
वकीलों के खिलाफ जांच के लिए याचिका
भारत के कानून के अनुसार किसी भी पीड़ित व्यक्ति समेत अपराधियों की भी मदद करना वकीलों की नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी है. महिला के खुलासे के बाद सुप्रीम कोर्ट में वकीलों के संगठन ने इस मामले की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की मांग की. अब सुप्रीम कोर्ट में एक नई पीआईएल दायर हुई है, जिसमें महिला को पर्दे के पीछे से मदद देने वाले वकीलों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई है. क्या इस मामले को भी जस्टिस पटनायक समिति को सौंपा जाएगा या फिर इसकी नए तरीके से सीबीआई जांच होगी?
 
महिला सुरक्षा का मामला और कानूनों का दुरुपयोग
मीडिया द्वारा आपराधिक घटनाओं के बढ़े हुए चित्रण करने के बाद संसद और सुप्रीम कोर्ट में सख्त कानून बनाने के लिए होड़ लग जाती है. महिलाओं की सुरक्षा के नाम पर अनेक सख्त कानून बन गए हैं जिनके दुरुपयोग से देशभर में लाखों लोग पीड़ित हैं. कठोर न्यायिक प्रक्रिया के चलते करोड़ों लोग कई पीढ़ियों से थाने और अदालतों के चक्कर लगा रहे हैं. चीफ जस्टिस के मामले में उन्हीं नियमों और कानूनों का पालन नहीं हो रहा, जिससे सुप्रीम कोर्ट की साख पर बट्टा लग रहा है. देश में अफसरशाही और नेताओं से आम जनता का भरोसा पहले ही टूट चुका है. क्लीन चिट पाने वाले चीफ जस्टिस गोगोई तो नवम्बर 2019 में रिटायर हो जाएंगे, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के दाग धुलने में समय लगेगा.


विराग गुप्ता सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता और संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ हैं...

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