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हार कभी न मानूंगा, क्योंकि हालात सुधारने के लिए कोशिश ज़रूरी है...

मेरी जीवनचर्या का एक नियम है, किन्हीं भी हालात में हार न मानना, और हालात को सुधारने के लिए निरंतर प्रयास करते रहना...

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हार कभी न मानूंगा, क्योंकि हालात सुधारने के लिए कोशिश ज़रूरी है...
कुछ ऐसी बातें और स्वभावगत विशेषताएं होती हैं, जो हमें जीवन में लगातार संघर्षरत रहने और आगे बढ़ने की प्रेरणा देती हैं... मेरी जीवनचर्या में ऐसा ही एक नियम है, किन्हीं भी हालात में हार न मानना, और हालात को सुधारने के लिए निरंतर प्रयास करते रहना... सिखों के दसवें गुरु गुरु गोविन्द सिंह जी ने एक सवैये में कहा है...

देहि शिवा वर मोहि इहै...
शुभ करमन ते कबहूं न टरूं...
न डरूं अरि सौं जब जाई लरूं...
निसचै कर अपनी जीत करूं...


इस सवैये का अर्थ है - हे शिव (परमपिता परमात्मा), मुझे यही वर (वरदान) दीजिए, कि मैं शुभ कार्यों को करने से कभी पीछे न हटूं, उन्हें कभी न टालूं... जब भी मैं शत्रु से लड़ने जाऊं, मेरे भीतर डर के लिए कोई स्थान न हो, और मुझमें इतना आत्म-विश्वास हो, कि मैं दृढ़ निश्चय के साथ जाकर युद्ध करूं, और जीतकर लौटूं...

ये हमेशा से मेरी पसंदीदा पंक्तियां रही हैं, लेकिन मैं हमेशा यह भी सोचता हूं कि इनका महत्व वही व्यक्ति समझ सकता है, जिसे निडर, दृढ़-निश्चयी होने के महत्व का अंदाज़ा हो, और जिसके भीतर जीत की इच्छा के अतिरिक्त शुभ कार्यों को करने की कामना भी हो...

आज के इस दौर को हम अक्सर मतलबपरस्त लोगों का दौर कहते हैं, और इसी अवगुण के लिए हर वक्त किसी न किसी को कोसते रहते हैं... लेकिन क्या हम ख़ुद निडर हैं... क्या हम अपनी बात को सही और ग़लत के तराजू पर तोलने के बाद गलती को स्वीकार करते हैं, और सही होने पर किसी के सामने भी अपनी बात पर अड़ सकते हैं... नहीं, आमतौर पर ऐसा नहीं होता है... बॉस, पिता, उम्र में बड़े रिश्ते-नातेदार, दोस्त - बहुत-से लोग ऐसे हैं हमारी ज़िंदगी में, जिनकी बात को हम ग़लत होते हुए भी ग़लत नहीं कहते... कभी शर्म की वजह से, कभी लिहाज की वजह से, और कभी डर की वजह से...

देखा जाए तो अगला गुण भी पहले गुण का ही हिस्सा है... क्या हम ख़ुद दृढ़-निश्चयी हैं... क्या हम अपने मन में कोई निश्चय करने के बाद किसी का भी लिहाज न करते हुए उस पर कायम रह पाते हैं... ज़ाहिर है, हम ऐसा भी नहीं कर पाते हैं...

हम हमेशा जीत के लिए काम करते हैं... यानि जीत की इच्छा हम सबमें है, लेकिन क्या हमारे भीतर इतना आत्म-विश्वास भी है, कि हम पहले से तय कर सकें कि हम जीतेंगे ही... शायद नहीं... काम करने के दौरान विरले ही मिलेंगे, जिनके दिल में शंका ने घर न किया हो... हां, और क्या हम हमेशा शुभ कार्यों को करने के लिए लालायित रहते हैं... बिल्कुल नहीं... हम सिर्फ़ वे काम करते हैं, जिनमें हमें अपना लाभ दिखाई देता है...

इसके अलावा मुझे कुछ और पंक्तियां भी बेहद पसंद हैं, जिनका जिक्र मैं यहां करना चाह रहा था, लेकिन अंग्रेज़ी में हैं... फिर सोचा, क्या फर्क पड़ता है भाषा से... सो, पेश हैं...

Wait, your waiting will not be in vain...
Time guilds, with gold, the iron links of pain...
The dark today leads into a light tomorrow...
There is no endless joy, no endless sorrow...


इन पंक्तियों का अर्थ है...

सब्र (शाब्दिक अर्थ है प्रतीक्षा) करो, सब्र करना व्यर्थ न जाएगा...
लोहे की ज़ंजीरों जैसी प्रतीत होती पीड़ा पर समय सोने का मुलम्मा बनकर चढ़ जाएगा, और दुःख हर लेगा...
हर अंधकारमय रात के बाद प्रकाशयुक्त सवेरा ज़रूर आता है...
इसी प्रकार, न कोई खुशी स्थायी होती है... और न ही कोई दुःख...


इन पंक्तियों का जो आशय मुझे समझ में आता है, वह है - धीरज धरो, क्योंकि किसी भी विपत्ति के समय वही बेहतरीन हथियार होता है... धीरज धारण करने से ही आप किसी भी परेशानी को दूर करने के लिए उपाय करने में सक्षम बने रहते हैं, वरना आप विपत्ति से परेशान हो गए, तो स्थिति को सुधारने के लिए कुछ करने योग्य भी नहीं रहते... समय वैसे भी हर दुःख को भुला देता है, वरना हर मरने वाले के बाद उसका परिवार कभी ठीक रह ही नहीं सकता...

हमेशा सोचो, हर दुःख बड़ा दुःख है, लेकिन उससे बड़े दुःख भी हैं, जो तुम्हे नहीं मिले... इसी सन्दर्भ में अपने पसंदीदा लेखक के एक उपन्यास में पढ़ी एक पंक्ति याद आ रही है - युद्ध में किसी की टांग कट जाए, बहुत बड़ा दुःख है, लेकिन उसके साथी से बड़ा दुःख नहीं, जिसका सिर कट गया...

सो, जो हो चुका है, उसका अफ़सोस करना छोड़ दो, क्योंकि वह बीत चुका है, जिसे तुम बदल नहीं सकते, लेकिन तुम्हारे अफ़सोस करते हुए एक जगह पड़े रहने से आगे जो बिगड़ सकता है, उसे रोक लो, क्योंकि वह तुम्हारे हाथ में है... उठो, और परिस्थिति को अपने अनुकूल बनाने के लिए प्रयासरत हो जाओ, क्योंकि परिस्थिति के अनुकूल पशु होता है, मनुष्य नहीं...

सो, आज मैं एक बार फिर तय करता हूं कि मैं निडर, दृढ़-निश्चयी रहूंगा, और किसी भी दुःख को अपने भीतर घर नहीं करने दूंगा...

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विवेक रस्तोगी Khabar.NDTV.com के संपादक हैं...

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति NDTV उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार NDTV के नहीं हैं, तथा NDTV उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.



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