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विपक्ष के पास राहुल गांधी का विकल्प क्या है...?

राहुल गांधी या उनकी मां सोनिया गांधी पर यह इल्ज़ाम नहीं लगाया जा सकता कि उनमें प्रधानमंत्री बनने की चाहत है

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विपक्ष के पास राहुल गांधी का विकल्प क्या है...?
राहुल गांधी या उनकी मां सोनिया गांधी पर यह इल्ज़ाम नहीं लगाया जा सकता कि उनमें प्रधानमंत्री बनने की चाहत है. 2004 में UPA को मिले बहुमत के बाद जब कई दलों ने अपने समर्थन की चिट्ठी सोनिया गांधी के नाम कर दी थी और जब BJP की सुषमा स्वराज और उमा भारती जैसी नेता सोनिया के प्रधानमंत्री बनने पर बाल मुंडाने की बात कर रही थीं, तब सोनिया ने यह पद छोड़कर इस पूरी राजनीति को अंगूठा और आईना दिखा दिया था. उस एक मास्टरस्ट्रोक के साथ सोनिया का कद काफी ऊंचा हो गया था. 2009 में जब कांग्रेस दोबारा सरकार बनाने की स्थिति में आई, तो उत्साही कांग्रेसियों ने राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने की मांग की. तब राहुल ने बड़ी शालीनता से यह प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया. यह शील BJP के बड़े नेताओं ने भी नहीं दिखाया. आडवाणी मज़ाक में 'PM इन वेटिंग' कहे जाने लगे और अंततः नई पीढ़ी के महत्वाकांक्षी नेताओं द्वारा मार्गदर्शक मंडल में निर्वासित कर दिए गए.

इसलिए कर्नाटक में राहुल गांधी ने जब कांग्रेस के सबसे बड़ा दल रहने की स्थिति में प्रधानमंत्री बनने की बात की, तो इसे उनकी निजी महत्वाकांक्षा से कहीं ज़्यादा एक राजनीतिक रणनीति के तौर पर देखा जाना चाहिए. लेकिन इस रणनीति का हम कैसे विश्लेषण करें...? गठजोड़ की राजनीति में ऐसे मौके एकाधिक बार आए हैं, जब बड़े दलों ने छोटे दलों के लिए जगह बनाई है. 1990 में जब लालकृष्ण आडवाणी की गिरफ़्तारी के बाद BJP ने जनता दल की सरकार से समर्थन वापस लिया और वीपी सिंह की सरकार गिर गई, राजीव गांधी ने चंद्रशेखर के नेतृत्व में बनी सरकार को बाहर से समर्थन दिया था. यह अलग बात है कि वह समर्थन कुछ ही महीने चला और मध्यावधि चुनावों की नौबत आई. 1996 में भी अटल बिहारी वाजपेयी की 13 दिन की सरकार गिरी तो कांग्रेस ने बड़ा दल होते हुए भी संयुक्त मोर्चे को बाहर से समर्थन दिया. देवगौड़ा और गुजराल की सरकारें इसी समर्थन के बूते चलीं.

बेशक, बाहर से दिए गए ये सारे समर्थन राजनीतिक तौर पर कांग्रेस की संकीर्णता के उदाहरण रहे. इंदिरा गांधी ने अपने समर्थन का इस्तेमाल जनता पार्टी को तोड़ने के लिए किया और चरण सिंह को सदन में विश्वासमत का मौका भी नहीं दिया. चंद्रशेखर की सरकार से राजीव गांधी ने बहुत ही मामूली वजह पर समर्थन वापस लेकर बताया कि कांग्रेस बस चुनाव के लिए कुछ वक़्त चाहती थी. जबकि संयुक्त मोर्चे की देवगौड़ा सरकार से समर्थन वापसी की कोई ठोस वजह थी ही नहीं और गुजराल सरकार से समर्थन वापसी के पीछे जिस DMK की मौजूदगी को आधार बनाया गया, उसके साथ कांग्रेस ने बाद में गठजोड़ किया.

मगर ये सब गठबंधन के शुरुआती दौर की कहानियां हैं. इक्कीसवीं सदी की भारतीय राजनीति मूलतः गठबंधन की राजनीति है. 2004 और 2009 में कांग्रेस के नेतृत्व में UPA की गठबंधन सरकार बनी और 2014 में जब BJP को अपने बूते बहुमत मिल गया, तब भी उसने NDA की सरकार बनाना श्रेयस्कर समझा. ज़ाहिर है, गठबंधन की राजनीति अब पहले की तरह अंकगणितीय हिसाब की मजबूरी भर नहीं है. वह बदलते सामाजिक समीकरणों का नतीजा है, जिसमें अलग-अलग अस्मिताएं लोकतंत्र में अपना हिस्सा मांग रही हैं. BJP और कांग्रेस जैसी पार्टियों की कामयाबी बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करती है कि वे किस हद तक इन समीकरणों से बंधे दलों को अपने साथ जोड़ सकती हैं. 2014 में BJP की कामयाबी ऐसे कई समूहों और दलों को जोड़ने की भी कामयाबी थी.

लेकिन 2019 से पहले वे सामाजिक समीकरण बिखरते नज़र आ रहे हैं. यही नहीं, BJP के ख़िलाफ़ एक नई गोलबंदी दिख रही है. उत्तर प्रदेश में गोरखपुर और फूलपुर के बाद कैराना का प्रयोग इस दिशा में BJP के लिए चिंताजनक है. यूपी में ही ओमप्रकाश राजभर और कुछ दूसरे नेताओं की भाषा बता रही है कि NDA के भीतर उन्हें उनका प्राप्य नहीं मिल रहा. बिहार के कुछ दलित धड़ों में भी हल्की कसमसाहट दिख रही है. आंध्र में तेलुगूदेशम पार्टी NDA से अलग हो चुकी है और महाराष्ट्र में शिवसेना के तेवर तल्ख़ हैं.

2019 में विपक्ष की उम्मीद दरअसल गठबंधन की इसी बदलती तस्वीर से है. इस बात की उम्मीद कम है कि BJP को इस बार अपने दम पर बहुमत मिल पाएगा. उल्टे, जो धारा बह रही है, वह चलती रही तो उसकी सीटें ख़ासी कम हो सकती हैं.

यहीं पर वह नई मोर्चाबंदी प्रासंगिक हो उठती है, जो एक तरफ अखिलेश-मायावती और अजित सिंह जैसे नेताओं की कोशिश से यूपी में बनती दिख रही है और दूसरी तरफ़ जिसे ममता, लालू, चंद्रबाबू नायडू या कुछ और नेता मज़बूत करने की कोशिश कर रहे हैं. असली सवाल इस मोर्चे के सामने यही है कि वह कांग्रेस से कैसा रिश्ता रखे. क्योंकि यह एहसास सभी को है कि किसी भी सूरत में किसी भी क्षेत्रीय दल की सीटें कांग्रेस से ज़्यादा नहीं आएंगी. यूपी में अखिलेश हों या मायावती या बंगाल में ममता हों या बिहार में लालू - सबकी अपने इलाकों से बाहर पैठ नहीं है. लेकिन इसके बावजूद गठबंधन की सूरत में यह सवाल उनके यहां भी उठेगा कि इस गठबंधन का नेतृत्व कौन करेगा. ममता अगर एकाधिक बार बोल चुकी हैं कि गठबंधन को कांग्रेस-BJP से समान दूरी बरतनी चाहिए, तो इसीलिए कि वह राहुल की उम्मीदवारी को रफ़ा-दफ़ा करना चाहती हैं.

यही वजह है कि राहुल गांधी का बयान सबको कुछ असमंजस में डाल सकता है. सबसे बड़ी पार्टी होने की सूरत में प्रधानमंत्री बनने की बात मानकर उन्होंने इशारा कर दिया है कि BJP विरोधी जो भी गठबंधन बने, उसे कांग्रेस के पीछे ही चलना होगा.

लेकिन इस स्पष्ट घोषणा का एक और पक्ष है. नेतृत्व पहले से तय न होने की स्थिति में क्या होता है - यह हम कई बार देख चुके हैं. 1966 में प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के निधन के बाद बैठी कांग्रेस की सिंडिकेट ने कई दिग्गज नेताओं के टकराव के बीच 'गूंगी गुड़िया' कहलाने वाली इंदिरा गांधी को नेता चुना. अगले तीन साल तक इंदिरा अपने ही नेतृत्व से लड़ती-भिड़ती रहीं और अंततः उन्होंने पार्टी तोड़कर अपनी अलग कांग्रेस बनाई. लेकिन वह फिर भी कांग्रेस का अंदरूनी मामला था. 1996 में इस नेतृत्वविहीनता की एक और परिणति दिखी, जब एक-दूसरे का रास्ता रोकते लालू-मुलायम जैसे दिग्गजों ने रामकृष्ण हेगड़े के रहते एचडी देवगौड़ा को प्रधानमंत्री बनाने का फ़ैसला किय़ा और एचडी देवगौड़ा की विदाई के बाद इंदर कुमार गुजराल को प्रधानमंत्री बनाया, जो बिल्कुल जनाधारविहीन थे.

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राहुल गांधी के ऐलान ने कम से कम यह असमंजस दूर कर दिया है. विपक्षी गठबंधन के सामने यह साफ है कि उसे BJP के विरोध में राहुल को चुनना होगा. बेशक, इससे कुछ उथल-पुथल हो सकती है. लेकिन यह सच है कि तथाकथित तीसरे मोर्चे के सामने कोई और विकल्प नहीं है. गठबंधन के इस दौर में कांग्रेस भी बाहरी समर्थन का खेल खेलना पसंद नहीं करेगी. ऐसे में यह संभव नहीं है कि वह सबसे बड़ी पार्टी रहे, सरकार में रहे, लेकिन नेतृत्व किसी और नेता के हाथ में रहे. यह एहसास BJP को भी है कि राहुल गांधी ने यह पत्ता खोलकर और खेलकर गठबंधन को भले कुछ तनाव दिए हों, लेकिन स्थिति साफ कर दी है और इसीलिए प्रधानमंत्री अपने भाषण में देर तक राहुल के इसी बयान पर बोलते रहे - इसका मज़ाक उड़ाने की कोशिश करते रहे. लेकिन देर-सबेर यह सबको समझना होगा कि राहुल ने जो कहा है, वही राजनीतिक विकल्प है - यह तभी ख़त्म हो सकता है, जब कांग्रेस का प्रदर्शन बिल्कुल न सुधरे. राहुल के बयान के साथ उनकी यह चुनौती भी शुरू होती है कि वह अपनी पार्टी को फिर 100 सीटों के पार ले जाएं.

प्रियदर्शन NDTV इंडिया में सीनियर एडिटर हैं...
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