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क्या है राफेल सौदे का सच?

फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने एक ऐसा बयान दिया है, जिससे राफेल मामले में तूफान मच सकता है. फ्रांस की मीडिया में ओलांद का यह बयान काफी सनसनी फैला चुका है.

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क्या है राफेल सौदे का सच?

फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने एक ऐसा बयान दिया है, जिससे राफेल मामले में तूफान मच सकता है. फ्रांस की मीडिया में ओलांद का यह बयान काफी सनसनी फैला चुका है. वहां के पत्रकार फ्रांस्वा ओलंद के इस बयान को खूब ट्वीट कर रहे हैं. यह एक ऐसा बयान है जो राफेल मामले में सरकार को नए सिरे से कटघरे में खड़ा करती है. आपको याद होगा कि जब अप्रैल 2015 में प्रधानमंत्री मोदी फ्रांस की यात्रा पर गए थे तब फ्रांस्वा ओलांद ही राष्ट्रपति थे. उन्हीं के साथ राफेल विमान का करार हुआ था. 'मीडियापार्ट फ्रांस' नाम के अख़बार ने पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद से पूछा कि रिलायंस को किसने चुना और क्यों चुना तो फ्रांस्वा ओलांद ने कहा कि हमारे पास पार्टनर चुनने का कोई विकल्प नहीं था. भारत की सरकार ने ही रिलायंस को प्रस्तावित किया. डास्सो ने अनिल अंबानी के साथ समझौता किया. हमारे पास कोई चारा नहीं था. हम उस मध्यस्थ के साथ काम कर रहे थे जो हमें दिया गया था. मैं तो कल्पना भी नहीं कर सकता कि इसका संबंध फिल्म जुली गाइये होगा.

जुले गाइये फ्रांस्वां ओलांद की गर्लफ्रैंड रही हैं. भारत में तो इसी बात पर आग लग जाए मगर गर्लफ्रैंड की फिल्म में भारतीय कंपनी के निवेश के तार भी राफेल डील से जोड़े जा रहे हैं. यह पहली बार है जब अनिल अंबानी ग्रुप को लेकर गंभीर बयान आया है. अब यह आरोप आरोप से ज्यादा हो जाता है. अब भारत सरकार को इस सवाल का जवाब देना होगा कि अंबानी का नाम किसकी तरफ से फ्रांस सरकार को भेजा गया. किस स्तर पर भेजा गया. इसके पहले क्या इस डील के बनी कई कमेटियों में चर्चा हुई थी. क्या रक्षा मामलों के कैबिनेट कमिटी में अंबानी की फ्रांस्वा ओलांद का यह बयान साधारण नहीं है.


आप इस तस्वीर में देख रहे हैं. यह तभी की है जब प्रधानमंत्री मोदी पेरिस गए थे. उनके साथ तब के राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ही हैं. 10 अप्रैल 2015 का दिन है ये. इसी डील के 16 दिन पहले राफेल बनाने वाली डास्सो एविएशन के सीईओ का बयान आता है कि हिन्दुस्तान एयरोनोटिक्स लिमिटेड से बात हो रही है. मार्च 2014 के बीच दोनों के बीच करार हुआ था कि भारत में 108 लड़ाकू विमान बनेगा और 70 फीसदी काम एचएएल को मिलेगा. लेकिन इस डील से दो दिन पहले हिन्दुस्तान एयरोनोटिक्स लिमिटेड का नाम गायब हो जाता है. प्रशांत भूषण ने अपने प्रेस कांफ्रेंस में आरोप लगाया था जिसे बार-बार राहुल गांधी ने कहा था कि क्रोनी कैपटलिस्ट को लाभ पहुंचाने के लिए एचएएल को डील से हटा दिया गया. रिलायंस डिफेंस डील के भीतर आ जाती है. यही नहीं प्रशांत भूषण ने 8 अप्रैल 2015 के दिन भारत के विदेश सचिव के एक बयान का भी ज़िक्र किया था. प्रधानमंत्री मोदी के भारत दौरे से पहले विदेश सचिव ने कहा था कि राफेल को लेकर मेरी समझ यह है कि फ्रेंच कंपनी, हमारा रक्षा मंत्रालय और हिन्दुस्तान एयरोनोटिक्स लिमिटेड के बीच चर्चा चल रही है. ये सभी टेक्निकल और डिटेल चर्चा है. नेतृत्व के स्तर पर जो यात्रा होती है, उसमें हम रक्षा सौदों को लेकर शामिल नहीं करते हैं. वो अलग ही ट्रैक पर चल रहा होता है.

तो आपने देखा कि 10 अप्रैल 2015 को डील होती है. उसके दो दिन पहले 8 अप्रैल को विदेश सचिव के अनुसार एचएएल डील में शामिल है. उसके 14 दिन पहले डास्सो एविएशन के बयान के अनुसार सरकारी कंपनी एचएएल डील में शामिल है. अब यहां सवाल आता है कि रिलायंस डिफेंस की एंट्री कब होती है. किसके इशारे पर होती है. राहुल गांधी इसी को लेकर लगातार आरोप लगा रहे हैं. जिसके कारण अनिल अंबानी की कंपनी ने कांग्रेस पार्टी पर मानहानि का दावा भी किया है. तो पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद के बयान के बाद यह मामला कहां पहुंचता है. सरकार बार-बार कह चुकी है कि रिलायंस डिफेंस के मामले में उसकी कोई भूमिका नहीं थी. यही बात रिलायंस डिफेंस ने मीडिया को दिए अपने जवाब में कहा था कि विदेशी वेंडरस के भारतीय पार्टनर्स के चयन में रक्षा मंत्रालय की कोई भूमिका नहीं है. 2005 से अभी तक 50 ऑफसेट कांट्रेक्ट साइन हो चुके हैं. सब में एक ही प्रक्रिया अपनाई गई है. हमारे सहयोगी विष्णु सोम ने रिलायंस डिफेंस और रक्षा मंत्रालय से भी उनकी प्रतिक्रिया के लिए संपर्क किया है. जवाब का इंतज़ार है. फिलहाल रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता का ट्वीट आया है.

फ्रांस्वा ओलांद का बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि डील उन्हीं के वक्त हुई थी जब वे राष्ट्रपति थे. उनका कहना है कि हमारे पास पार्टनर चुनने का कोई विकल्प नहीं था. भारत की सरकार ने ही रिलायंस को प्रस्तावित किया. डास्सो ने अंबानी के साथ समझौता किया. हमारे पास कोई चारा नहीं था. हम उस मध्यस्थ के साथ काम कर रहे थे जो हमें दिया गया था. मैं तो कल्पना भी नहीं कर सकता कि इसका संबंध फिल्म जुली गाइये होगा. अब आप 'इंडिया टुडे' की वेबसाइट पर जाइये. 8 मार्च 2018 की एक खबर मिलेगी, जिसमें भारत की यात्रा पर आने से पहले फ्रांस के राष्ट्रपति एमानुएल मैक्रों कहते हैं कि अगर नरेंद्र मोदी की सरकार इस डील से संबंधित कुछ संवेदनशील सूचनाओं को साझा करना चाहती है तो फ्रांस एतराज़ नहीं करेगा.

उन्होंने यह भी कहा था कि यह समझौता उनके कार्यकाल में नहीं हुआ था मगर दोनों देशों के हित में था. भारत और फ्रांस के बीच राफेल डील के पहले आर्थिक, औद्योगिक और रणनीतिक हितों पर काफी विचार विमर्श किया गया है. राफेल डील का विवाद दो सवालों को लेकर महत्वपूर्ण है. एक कि एक राफेल विमान कितने का है. कांग्रेस का आरोप है कि यूपीए के समय की तुलना में मोदी सरकार ने 1000 करोड़ ज्यादा देकर खरीदा है ताकि किसी खास उद्योगपति को फायदा पहुंचाया जा सके. दूसरा विवाद है कि खास उद्योगपति को फायदा पहुंचाने के पहले डील से कुछ हफ्ते पहले एक नई कंपनी बनाई जाती है. नई कंपनी का विमान निर्माण के संबंध में कोई अनुभव नहीं है. जिस हिन्दुस्तान एरोनोटिक्स लिमिटेड ने सुखोई 30 जैसे विमान बनाए हैं उसे डील से बाहर कर दिया जाता है.

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अनिल अंबानी ग्रुप की कंपनी को साझीदार बनाए जाने के कांग्रेस के हमले के बाद अरुण जेटली जो कि वित्त मंत्री हैं वो ब्लॉग लिखते हैं. कहते हैं कि जेटली इसका जवाब देते हैं कि डील में कोई प्राइवेट कंपनी कैसे आ गई. कहते है कि यूपीए के समय ही शर्त बनी थी कि जो मूल निर्माता कंपनी है वो भारत में कलपुर्ज़ों की आपूर्ति या रखरखाव के लिए खुद से भारतीय कंपनी को साझीदार बना सकती है. इसका सरकार से कोई लेना देना नहीं है. लेकिन इसका जवाब नहीं मिला कि राफेल बनाने वाली डास्सो एविशन कंपनी क्यों एक ऐसी कंपनी को साझीदार बनाएगी, जिसका इस क्षेत्र में अनुभव काफी नया है और आरोप है कि वह कंपनी कुछ ही महीने पहले वजूद में आई है. जेटली इस पहलू को नहीं छूते हैं. जेटली ने अपने ब्लॉग में इस बात का जवाब दिया है कि डील साइन से पहले 14 महीने तक Price Negotiation Committee और Contract Negotiation Committee ने इस पर विचार विमर्श किया है. कैबिनेट कमिटी ऑन सिक्योरिटी की मजूरी ली गई.

प्रशांत भूषण, यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी लगातार प्रेस कांफ्रेंस करते हैं. राहुल गांधी ने लगातार इस पर कई प्रेस कांफ्रेंस और ट्वीट किए हैं. निर्मला सीतारमण ने भी जवाब देना शुरू किया है. उन्होंने हाल ही में कहा था कि हिन्दुस्तान एरोनोटिक्स लिमिटेड को इसलिए डील से बाहर किया गया, क्योंकि एचएएल के पास क्षमता नहीं थी.


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