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पीढ़ियों को विरासत में क्या मिलेगा - बाढ़, सूखा और राहत शिविर!

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पीढ़ियों को विरासत में क्या मिलेगा - बाढ़, सूखा और राहत शिविर!

प्रतीकात्मक फोटो

वास्तव में यह सच है कि इंसान की सोच रचना भी कर सकती है और विध्वंस भी. विध्वंस तो इतना की वह खुद के रचे हुए सिद्धांतों और धर्म को अपने लालच के लिए डुबोने से नहीं हिचकता. अपनी विकास की सोच में विध्वंस का यह सच बार-बार उभर कर सामने आता है. पता चला है कि 31 अगस्त 2016, यानी अब से चंद दिनों बाद यह निर्णय किया जाना है कि देश के सबसे बड़े बांध सरदार सरोवर के दरवाज़े बंद कर दिए जाएं. दरवाज़े बंद होने से सरदार सरोवर जलाशय में लाखों क्यूबिक मीटर पानी जमा हो जाएगा और मां नर्मदा का कल-कल बहाव प्रतिबंधित हो जाएगा.

विकास के नाम पर अन्याय और विनाश
हमने ऐसे विकास के लिए लालायित हो गए जिसमें मां को बंदी बनाने के कृत्य में भी नीति निर्धारकों को कोई हिचक नहीं होती. इसके दूसरी तरफ बिहार की सरकार यह मांग कर रही है कि गंगा नदी पर बने फरक्का बांध को हटाया जाए, क्योंकि यह उनके विनाश का कारण है. विकास की यह परियोजना साक्षात् अपनी कहानी कहती है. जरा गौर से सुनिए आपको पता चलेगा कि 'विकास" के नाम पर हमने झूठ, अन्याय और विनाश के कितने विशालकाय सरोवर का निर्माण किया है!

छोटा सा उदाहरण देखिये. 18-19 अगस्त 2016 को निसरपुर ब्लाक के करोंदिया गांव की पुलिया देश के सबसे बड़े बांध के बैक वाटर में डूब गई. संगीता और रानू समेत 50 बच्चे उस पुलिया पर से बह रहे पानी को पार करके स्कूल जाने की कोशिश करते हैं, लेकिन सरकार के रिकार्ड के हिसाब से इस गांव का विस्थापन हो चुका है. इस बांध में 1600 धार्मिक स्थल, सैंकडों स्कूल और लाखों घर डूबे हैं.


सबसे ज्यादा खर्चा 'आपदा राहत' में
यह विकास का स्मारक होगा या सभ्यता का कब्रिस्तान! मैं सोच रहा था कि यह आलेख मैं किसे संबोधित करूं. मुझे कुछ समझ नहीं आया, तो मैं खुद को संबोधित करता हूं. हम लोग तीन महीने पहले मध्यप्रदेश-महाराष्ट्र में गंभीर सूखे पर बहस कर रहे थे. तब अपनी सरकारें सूखा राहत के लिए बजट की जुगाड़ में लगी थीं. तीन महीने बाद बाढ़ आ गई. अब सरकारें बाढ़ राहत के लिए धन जुटा रही हैं. आपदा राहत के काम में हमारी सरकार को बहुत मज़ा आता है. यह उनका सबसे ज्यादा रूचि का विषय होता है, क्योंकि इससे सरकार के भीतर के पक्षकारों को अपनी सत्ता की जड़ों को और गहरा करने का अवसर मिलता है.

हम सब जानते हैं कि आपदा राहत का भ्रष्टाचार किस हद तक जड़ें फैलाए हुए है. एक साल में मध्यप्रदेश सरकार 9000 करोड़ रुपये के राहत के काम पर खर्च कर रही है. यह किसी एक मद में उसका सबसे बड़ा खर्च होता है. यह कैसा विकास, जिसमें सबसे ज्यादा खर्चा "आपदा राहत" के लिए होता है?

पुनर्वास देता है लूटखसोट का मौका
फिर भी विकास के लिए तत्पर सरकार ऐसी परियोजना बनाती है, जिसमें लाखों लोगों का विस्थापन होता है. उनके पुनर्वास के लिए भी कुछ अरब रुपये की राशि आवंटित की जाती है. बाद में पता चलता है कि सरकार के नुमाइंदों-दलालों-कतिपय राजनीतिज्ञों और पेशेवरों का गठजोड़ विस्थापितों के लिए बनी योजना के पकवान बनाकर संसाधनों को डकार लिया है. हम सब जानते हैं कि सरदार सरोवर बांध परियोजना के तहत पुनर्वास के नाम पर फर्जी रजिस्ट्री का भयंकर भ्रष्टचार हुआ है. इसकी जांच के लिए माननीय सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ द्वारा न्यायमूर्ति झा आयोग की नियुक्ति की थी. पता चला कि जमीन खरीदी के नाम पर 1500 फर्जी रजिस्ट्रियां करवाई गई हैं, जिनमें भ्रष्टाचारियों के गठजोड़ ने जमकर लूट की गई.

अनुमान है कि पुनर्वास के लिए आवंटित 2300 करोड़ रुपयों में से 1000 से 1500 करोड़ रुपये भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गए. न्यायमूर्ति झा आयोग अपनी रिपोर्ट पेश कर चुका है. आखिर में क्या हुआ? आखिर में सरकार उन्ही लोगों के खिलाफ कार्यवाही करने का मन बना रही है, जिन पर विस्थापन का आघात हो चुका है. संभवतः ये कार्यवाही सरकारी तंत्र के वही लोग करेंगे, जो वास्तव में घोटाले में शामिल थे. यह व्यवस्था इतनी अमानवीय कैसे हो सकती है कि सामने दिखाई दे रहे आपातकाल को नकार देने का कदम उठा सके. हो सकती है, क्योंकि विकास के जो मानक हमने तय किये हैं, उन्हें हासिल करने में मानवीयता को जद से उखाड़ फेंकना बुनियादी शर्त है.

अभी भी नहीं हो पाया पूरी तरह से विस्थापन
सरदार सरोवर बांध के संदर्भ में माननीय सर्वोच्च न्यायालय के आदेश रहे हैं कि जब तक सभी बांध प्रभावितों का पुनर्वास न हो जाए, तब तक बांध को पूरा नहीं भरा जाएगा; किंतु मध्यप्रदेश सरकार माननीय न्यायालय की अवमानना कर रही है. दूसरी तरफ महाराष्ट्र में 1000 परिवार सिंचाई की मांग करते रहे और 1335 परिवार विस्थापित की श्रेणी की पहचान के लिए 'आवेदन दे रहे हैं और अपील' कर रहे हैं.

हाल ही में भारत के मुख्या न्यायाधीश ने बिलकुल ठीक बात कही कि क्या कोर्ट के आदेश से देश में राम राज्य आ सकता है? भ्रष्टाचार खत्म होने का आदेश दें, तो क्या ऐसा होगा? मुख्य न्यायाधीश की बात बहुत जायज़ इसलिए है, क्योंकि सरकार खुद शोषण की संचालक बन गई है.

सरदार सरोवर बांध के गेट बंद किए जाने की तैयारी
सरदार सरोवर बांध की ऊंचाई 139 मीटर पूरी हो चुकी है. इसके बाद बांध पर गेट लगाने का काम भी पूरा हो चुका है. अब उन दरवाजों को बंद किया जाना ही बाकी है; बस! इस पर सरकार झूठ बोलती है कि सबका पुनर्वास हो चुका है. संभव है कि अब बच्चों को यह पाठ पढाना बंद कर दिया जाए कि 'झूठ बोलना पाप है'; क्योंकि हमारी सरकार ही सबसे ज्यादा यह पाप करती है. मध्यप्रदेश सरकार का कहना है कि बांध की डूब में आने वाले सभी गांवों और परिवारों का पुनर्वास हो चुका है.

यह दावा पूरी तरह से झूठ है क्योंकि अब भी डूब प्रभावित क्षेत्र में 48 हज़ार परिवार निवास कर रहे हैं. उनकी कोई सुध नहीं ली गई है. मध्यप्रदेश और गुजरात सरकार की रणनीति यह है कि बांध में 139 मीटर की ऊंचाई तक पानी भर दिया जाए. जब जमीन डूब आएगी, तो आदिवासियों, दलितों, किसानों, मजदूरों के अपने घर-जमीन खुद छोड़ना पड़ेंगे और सरकारों को पुनर्वास के लिए कोई व्यवस्था नहीं करना पड़ेगी. इस तरह की नीति से 244 गांव और एक नगर डुबोए जाने की तैयारी है.

15946 परिवारों को रिपोर्ट में दिखाया गया डूब से बाहर
नर्मदा अवार्ड में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि बांध का पूर्ण जलाशय स्तर (138.68 मीटर) होगा और अधिकतम जलाशय स्तर 141.21 मीटर होगा. खंड में स्पष्ट किया गया है कि अवार्ड के प्रकाशन दिनांक 7 दिसंबर 1979 से 45 वर्षों तक इसका पुनरावलोकन/परिवर्तन नहीं होगा; किंतु बैक वाटर लेवल के मामले में पूर्व में डूब से प्रभावित माने गए 52 गांवों की डूब लेवल 138.68 मीटर के स्तर से भी कम करके दिखाया गया है और 15946 परिवारों को डूब से बाहर बताया जा रहा है, जबकि बांध की ऊंचाई 138.68 मीटर ही रखी गई है. यह असंभव काम मध्यप्रदेश और गुजरात सरकार धोखधड़ी से
मिलकर कर रहे हैं. वैज्ञानिक तथ्य यह है कि बैक वाटर लेवल (यानी बांध के पीछे के जल भराव का स्तर) एक खास स्थान पर हमेशा बांध की ऊंचाई के बराबर के जलस्तर से कहीं ज्यादा होता है.

धरमपुरी पुनर्वास की कोई प्रक्रिया नहीं चली
इस तथ्य को सरकार ने जानबूझकर छिपाया है. मध्यप्रदेश सरकार के इस कृत्य के कारण धरमपुरी सरीखा नगर बांध के बैक वाटर में डूब जाएगा. सच यह है कि धरमपुरी के पुनर्वास की कोई प्रक्रिया ही नहीं चलाई गई है.आश्चर्यजनक है कि मध्यप्रदेश सरकार को इससे न तो सिंचाई का फायदा मिल रहा है, न बिजली का, और सबसे ज्यादा नुकसान मध्यप्रदेश के लोगों को हो रहा है, पर मध्यप्रदेश सरकार चुपचाप गुजरात सरकार के सामने नतमस्तक है और अपने राज्य के नागरिकों के साथ हो रहे अन्याय पर चुप है....केवल सत्ता सुख की खातिर समाज का संहार! 

बांधों का पानी ला रहा है तबाही
अपना जीवन सूखे-बाढ़-भ्रष्टाचार-गैर जवाबदेय व्यवस्था और अंधेरे वर्तमान के बीच फंस गया है. आज फिर नर्मदा नदी अपने विकराल रूप में है, लेकिन यह नर्मदा नदी का मूल चरित्र नहीं है. इस पर बने बरगी, इंदिरा सागर, ओंकारेश्वर सरीखे बड़े बांध बार-बार भर रहे हैं. जब वे लगभग पूरे भर रहे होते हैं, तब एक साथ लाखों क्यूबिक मीटर पानी बांध के दरवाज़े खोलकर बहा दिया जाता है. बांध वालों के लिए यह एक सामान्य प्रक्रिया होती है, उन्हें यह अहसास होता ही नहीं है कि जो पानी छोड़ा जा रहा है, वह आगे जाकर किस तरह की तबाही मचा सकता है!

धाराजी में घटी ऐसी ही घटना ने 500 लोगों की जान ले ली थी. वे पानी को भी आंकड़ों में तोलते हैं और सोचते हैं कि पानी आंकड़ों के मुताबिक ही बर्ताव करेगा! विकासकारों को यह जरा भी अहसास नहीं होता है कि ऐसा कोई विकास नैतिक नहीं हो सकता है, जो खूब सारे पेड़ों, जमीन, पहाड़ों, जीवों और लाखों लोगों के जीवन की संभावनाओं को पानी में डुबो और बहा देता हो. क्या कुदरत के हित में हम थोड़े अभावों को भी विकास का मानक नहीं मान सकते हैं, ताकि आने वाली पीढ़ियों को कल-कल बहती नर्मदा, पेड़, मंदिर, गांव के साथ के सहजीवन का सुख मिल सके!

नर्मद मैया को कैद करने पर संतानें चुप!
जब सरकार यह तय कर रही होगी कि सरदार सरोवर बांध के दरवाज़े बंद कर दिए जाएं, तब क्या उनकी आंखों के सामने वो पेड़ होंगे, जिन पर पंछियों के घोंसले बने हुए हैं. शायद नहीं, उनकी यह ठोस धारणा है कि जब पेड़ डूब जाएगा, तब या तो चिड़िया मर जायेगी या उड़ कर कहीं और घोंसला बनाने की जद्दोजहद में जुट जाएगी. वे यही सोच इंसानों के बारे में भी रहते हैं. हम भयंकर विरोधभासों के बीच जीने वाले लोग हैं. एक तरफ तो मंदिरों-मस्जिदों के नाम पर दंगा-फसाद करते हैं, पर जब हज़ारों मंदिर-मस्जिद विकास की बाढ़ में डुबोए जा रहे हों, तब हम चुप हो जाते हैं. क्या इसका मतलब यह है कि हमें ईश्वर से कोई खास लगाव नहीं होता, हमें तो उस व्यवसाय से लगाव होता है, जो ईश्वर के नाम पर किया और फैलाया जाता है. नर्मदा तो मैया है, पर जब यह मैया कैद की जा रही थी, तब संतानें चुप क्यों रहीं?

विकास ने पानी बहने के रास्ते किए बंद
अक्सर कहा जाता है कि जब बारिश कम होती है, तब सूखा पड़ता है और जब बारिश ज्यादा होती है तब बाढ़ आती है. हमें यही पढाया जाता है. यह महज़ झूठ ही तो है. जरा अपने भारत के जैसलमेर जिले के बारे में जानिये, जहां 15 से 40 मिलीमीटर की बारिश में समाज रहता है, गेहूं पैदा करता है और सूखे की शिकायत भी नहीं करता. इसके दूसरी तरफ ऐसा क्यों होता है कि 1 घंटे की बारिश मुंबई-दिल्ली-भोपाल को बाढ़ में डुबो देती है. इसलिए नहीं कि बारिश ज्यादा हुई, बल्कि इसलिए कि विकास ने पानी को बहने के लिए जो रास्ता चाहिए, उसे पूर दिया, उस पर अपने लालच के महल खड़े
कर लिए और अपनी गंदगी से उन रास्तों को बंद कर दिया. तब पानी बहेगा कहां से?

बाधों से आई बाढ़ ने छीनी आजीविका, फसल
बिलकुल ताज़ा उदाहरण देखिये. साउथ एशिया नेटवर्क आन डेम्स, रिवर्स एंड पीपुल ने हाल ही में बताया कि वास्तव में
बांध भी बाढ़ का बड़ा कारण हैं. बिहार में क्या हुआ? वहां तो अभी तक सामान्य से 14 प्रतिशत बारिश कम हुई है, फिर भी गंगा नदी में बाढ़ आई और पटना डूबने लगा. अब इससे 10 लाख लोग प्रभाहित हैं. बांध तो विकास के लिए बनता हैं न; फिर इसने 10 लाख लोगों का घर, सुकून, सामान, मंदिर, पेड़, पहाड़, आजीविका, फसल क्यों छीन ली? यह कैसा विकास है, जो हर साल 200 लाख लोगों को राहत की पंक्ति में ला खड़ा करता है, राहत शिविरों में ले आता है, खाने के पैकेट लेने के लिए कतार में लगा देता है! कभी सोचा है?

फरक्का और बाणसागर बांध का पानी ला रहा है बिहार में तबाही
बिहार में आई बाढ़ को पश्चिम बंगाल में गंगा नदी पर बने फरक्का बांध और मध्यप्रदेश में सोन नदी पर बने बाण सागर बांध ने विकराल रूप दिया है, क्योंकि लाखों घन मीटर पानी इकठ्ठा करके छोड़ देने के कारण पानी नदी के तटों-किनारों से बाहर निकल आया. अब यह बाढ़ उत्तरप्रदेश की तरफ बढ़ चुकी है. बांध में पानी इकठ्ठा किया जाता है, किंतु विकास विशेषज्ञों को यह अंदाजा कभी नहीं होता है कि जब पानी छोड़ा जाएगा, तब वह कहां और कितनी तबाही ला सकता है; उनका संवाद तो अधपके आंकड़ों से होता है.

हड़प्पा सभ्यता से भी पुरानी है नर्मदा घाटी की सभ्यता
हम सब सभ्यता के बारे में पढ़ते हैं. हमें पढ़ाया गया था कि हड़प्पा सभ्यता 5000 साल पहले अस्तिव में आई. लेकिन हाल के वर्षों में यह तथ्य भी सामने आने लगा कि सिंधु घाटी की सभ्यता से पहले नर्मदा घाटी की सभ्यता अस्तित्व में थी. संभवतः मानव उद्विकास का केंद्र नर्मदा घाटी ही थी. तथ्यों को पुख्ता करने के लिए नर्मदा घाटी में दबे-बिखरे 20 लाख सालों के अवशेषों का अध्ययन किया जाना तय हुआ, लेकिन अब शायद हम कभी अपने उद्विकास के बारे में जान नहीं पायेंगे, क्योंकि विकास के नाम पर उन सूत्रों को ही डुबोया जा रहा है. विडबना देखिये कि विकास की नीति बनाने वालों की माथे पर शिकन भी नहीं है!

जब भी अपनी सरकार सरदार सरोवर बांध पर दरवाज़े लगाने का निर्णय लेगी, तब क्या वह एक बार आंखे बंद करके इनमें से कुछ सवाल खुद से पूछेगी कि यह विकास आने वाली पीढ़ी को विरासत में क्या देगा? क्या हमने इस विकास के जरिये, मानव सभ्यता को कोई नयी सकारात्मक और मानवीय पहचान दी? क्या प्राकृतिक पर्यावरण को डुबोकर ही विकास का लक्ष्य हासिल करना एकमात्र विकल्प था? क्या यही सांस्कृतिक राष्ट्रवाद है?

सचिन जैन, शोधार्थी-लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं.

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