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लोकायुक्त की नियुक्ति में 'दाग' से यूपी में संवैधानिक संकट

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लोकायुक्त की नियुक्ति में 'दाग' से यूपी में संवैधानिक संकट

उत्तर प्रदेश में लोकायुक्त की नियुक्ति में मचे घमासान से न सिर्फ संवैधानिक संकट पैदा हो गया है बल्कि तथाकथित 'उत्तम प्रदेश' में भ्रष्टाचार के विरुद्ध जंग पर सवालिया निशान भी खड़े हो गये हैं ? नियम के तहत मुख्यमंत्री, नेता विपक्ष तथा हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की समिति द्वारा लोकायुक्त के नाम पर फैसला होने पर राज्यपाल द्वारा नियुक्ति के आदेश जारी होने चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने दिया 20 दिसंबर तक अमल का आदेश
सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी की सरकार द्वारा उ.प्र. राज्य उपभोक्ता फोरम के अध्यक्ष एवं पूर्व न्यायाधीश वीरेन्द्र सिंह को लोकायुक्त बनाने की मांग सुप्रीम कोर्ट ने 16 दिसम्बर को मानते हुए 20 दिसम्बर तक क्रियान्वयन का निर्देश दिया। नियुक्ति हेतु राज्य सरकार द्वारा भेजी गई फाइल को राज्यपाल राम नाइक ने लौटाते हुए सुप्रीम कोर्ट के आदेश की प्रति प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।

दूसरी ओर, हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश चन्द्रचूड़ ने राज्य सरकार को 50 पेज का पत्र लिखकर यह पूछा है कि उनकी आपत्ति के बावजूद उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा पांच नामों के पैनल में वीरेन्द्र सिंह का नाम कैसे शामिल किया गया ? उन्होंने इस बारे में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से मुलाक़ात का समय भी मांगा है।  


 कदाचार और भ्रष्‍टाचार की कई शिकायतें हैं दर्ज
नवनियुक्त लोकायुक्त वीरेन्द्र सिंह न सिर्फ सपा नेता शिवपाल सिंह यादव के रिश्तेदार हैं, वरन उनका पुत्र सपा का नेता भी है। जातीय तथा राजनीतिक संलिप्तता के अलावा सिंह के विरुद्ध कई संगठनों द्वारा कदाचार तथा भ्रष्टाचार की शिकायतें दर्ज कराई गई हैं। इसके बावजूद राज्य सरकार द्वारा उनके नाम पर जोर दिये जाने से भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई की मंशा में संदेह होना स्वाभाविक है।

इसके पहले उ.प्र. लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष अनिल यादव द्वारा नियुक्तियों में जातीय आधार पर गड़बडि़यों के आरोप के बाद उच्च न्यायालय ने उनकी नियुक्ति को अवैध घोषित कर दिया था। नोएडा के माफिया इंजीनियर यादव सिंह को बचाने के लिए सपा तथा बसपा ने हाथ मिला लिया जिसमें केंद्र की भाजपा सरकार सीबीआई तथा ईडी के माध्यम से सहयोग दे रही है। और अब लोकायुक्त की नियुक्ति में सपा सरकार व बसपा के विपक्षी नेता ने वीरेन्द्र सिंह की लोकायुक्त पद पर नियुक्ति हेतु सहमति जता दी जिसे सुप्रीम कोर्ट में कांग्रेस के नेता तथा वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने अंजाम तक पहुंचा दिया।

इस सियासी घमासान के बीच कई कानूनी सवाल खड़े हो गए हैं-
• अनुच्छेद 142 के तहत लोकायुक्त की नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट वर्तमान आदेश क्या विधि सम्मत है ?

• क्या राज्यपाल इस मामले में सपा सरकार को दरकिनार कर सीधे सुप्रीम कोर्ट के सम्मुख पुर्नविचार याचिका दायर कर सकते हैं?

• संविधान के अनुसार उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए सुप्रीम कोर्ट के कोलेजियम द्वारा अनुशंसा की जाती है पर उनकी ईमानदारी की जांच सरकार द्वारा आई0 बी0 से कराई जाती है। लोकायुक्त के मामले में भी  सुप्रीम कोर्ट द्वारा अनुशंसित वीरेन्द्र सिंह के विरुद्ध यदि प्रदेश के मुख्य न्यायाधीश या राज्यपाल द्वारा प्रतिकूल सामाग्री प्रस्तुत की गई तो क्या सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में पुर्नविचार नहीं करना पड़ेगा ?

• पुनर्विचार याचिका पर विचार के दौरान यदि सुप्रीम कोर्ट द्वारा अपने आदेश को स्थगित नहीं किया गया तो क्या राज्यपाल के विरुद्ध अवमानना का मामला बन सकता है ?

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• प्रदेश के मुख्य न्यायाधीश की सहमति के बगैर वीरेन्द्र सिंह के नाम को पैनल में दिखाकर सुप्रीम कोर्ट के सम्मुख पेश करने के लिए क्या राज्य सरकार के विरुद्ध झूठे तथ्य प्रस्तुत करने के लिए आपराधिक कार्यवाही की जा सकती है ?
दिल्ली में आप-भाजपा, अरुणाचल प्रदेश में राज्यपाल-मुख्यमंत्री और अब उ.प्र में राज्य सरकार तथा हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश में टकराव से संवैधानिक प्रणाली पर गहरे सवाल खड़े हो गये हैं ? यदि दागी व्यक्ति को ही लोकायुक्त बना दिया गया तो भ्रष्टाचार की दागी संस्कृति का अन्त कैसे होगा। 'उत्तम'  प्रदेश का दावा करने वाली सरकार को आने वाले समय में सुप्रीम कोर्ट के सम्मुख इसका 'उत्तर' देना मुश्किल पड़ सकता है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति एनडीटीवी उत्तरदायी नहीं है। इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार एनडीटीवी के नहीं हैं, तथा एनडीटीवी उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।



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