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अंबेडकर के साथ रामजी को जोड़ने से क्या होगा?

त्वरित टिप्पणी : राजनीतिक तौर पर यह जयभीम को जय श्रीराम के क़रीब लाने की कोशिश है? लेकिन क्या जय श्रीराम को छोड़े बिना जयभीम बोलना संभव है?

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अंबेडकर के साथ रामजी को जोड़ने से क्या होगा?
बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर के नाम के साथ रामजी जोड़ने से क्या हो जाएगा?  खुद अंबेडकर ने अपने पूरे नाम का ऐसा सार्वजनिक प्रदर्शन ज़रूरी नहीं समझा. उनके राजनीतिक-बौद्धिक अनुयायियों को भी कभी यह खयाल नहीं आया कि अंबेडकर के साथ रामजी को जोड़ें. उनका कई खंडों में जो समग्र साहित्य अंग्रेजी, हिंदी और मराठी जैसी भाषाओं में सुलभ है, उसमें भी अंबेडकर के साथ रामजी नाम जोड़ा हुआ नहीं है. यही नहीं, मराठी में वे पहले से आंबेडकर लिखे जाते रहे हैं, हिंदी में उनका अंबेडकर नाम प्रचलित है.

फिर अचानक योगी आदित्यनाथ को सभी सरकारी दस्तावेजों में भीमराव के साथ रामजी जोड़ने और अंबेडकर को आंबेडकर करने का का ख़याल क्यों आया? बहुत संभव है, पहले उन्हें यह जानकारी न रही हो. जब उन्हें पता चला हो तो उन्हें खयाल आया हो कि शायद इस तरह अंबेडकर को हिंदुत्व के कुछ क़रीब लाया जा सकता है.

अगर योगी की यह मंशा है तो यह सबसे पहला छल अंबेडकर के साथ ही है. क्योंकि अंबेडकर बौद्ध हो चुके थे. यही नहीं, हिंदू रहते हुए भी उन्होंने हिंदुत्व के बारे में जो कुछ कहा, उसे अगर बीजेपी, प्रधानमंत्री मोदी या मुख्यमंत्री योगी सही मानते हों तो उनको अपनी पूरी विचारधारा का आग्रह छोड़ना होगा. अंबेडकर हिंदू धर्म को एक मिथ बताते थे, इसे किसी भी बराबरी के विरुद्ध मानते थे. उनकी स्पष्ट राय थी कि हिंदू तभी एक होते हैं जब उन्हें मुसलमानों से लड़ना होता है. वे यह भी कहते थे कि अगर हिंदुओं को एक होना है तो सबसे पहले हिंदुत्व से मुक्ति पानी होगी.

ऐसा नहीं कि अंबेडकर यह सब किसी राजनीतिक लक्ष्यसिद्धि के लिए कहते थे. यह उनकी सुविचारित विचारधारा थी जिसे लगातार उनके अनुभव पुष्ट करते रहे और अंततः उन्होंने धीरे-धीरे ख़ुद को हिंदुत्व से दूर किया और बौद्ध धर्म की शरण ली. उनका यह आकलन बहुत दूर तक सटीक रहा कि भारत की राजनीतिक आज़ादी के बावजूद उसके बहुत सारे उन समुदायों की सामाजिक आज़ादी नहीं मिलेगी जिन्हें जातिवाद की जंजीरों से जकड़कर रखा गया है.

ऐसा भी नहीं कि बीजेपी के झंडाबरदार यह सब कहने वाले अंबेडकर को जानते या समझते न हों. अगर उन्हें लोकतंत्र का, दलितों के वोट खोने का भय न होता तो ऐसे अंबेडकर को वे सबक सिखाने में देर न करते- वेद पढ़ने के लिए उनके कान में शीशे डाल देते या इनकी आलोचना करने के लिए उनकी जीभ काट लेते. लेकिन आजाद हिंदुस्तान के लोकतंत्र की यह मजबूरी है कि उन्हें अंबेडकर को भी सहन करना है- बल्कि उनका सम्मान भी करना है.

लेकिन बीजेपी को अंबेडकर का विचार नहीं उनकी मूर्ति चाहिए जिस पर वे माला चढ़ा सकें. उन्हें बौद्ध नहीं, हिंदू दिखने वाले अंबेडकर चाहिए. क्या यह भी एक वजह है कि सरकार को उनके नाम के साथ रामजी जोड़ना ज़रूरी लग रहा है?

लेकिन अगर इस फ़ैसले के पीछे अंबेडकर या राम के ऐसे किसी राजनीतिक इस्तेमाल की मंशा है तो यह फिर से दोनों के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है. हालांकि न यह इस्तेमाल नया है और न ही इस इस्तेमाल की वजह से दोनों के व्यक्तित्व पर पड़ने वाले दाग नए हैं. राम बीजेपी और संघ परिवार के पैदा होने से सदियों पहले से ही भारतीय मानस का हिस्सा रहे हैं- उन्हें सिर्फ हिंदू अस्मिता से जोड़कर जय श्रीराम की आक्रामकता के साथ की जाने वाली राजनीति करके बीजेपी ने दरअसल उन्हें कुछ छोटा करने का ही काम किया है. अब अंबेडकर के साथ रामजी को जोड़कर वह अगर कोई राजनीतिक संदेश देना चाहती है तो इसके अपने विद्रूप हैं. यह अनायास नहीं है कि इसी हफ़्ते योगी आदित्यनाथ ने विधानसभा में समाजवाद को ख़ारिज करते हुए रामराज्य की बात की. ऐसा कौन सा रामराज्य हो सकता है जो समाजवाद के बिना चला आए?  या राजनीतिक तौर पर यह जयभीम को जय श्रीराम के क़रीब लाने की कोशिश है? लेकिन क्या जय श्रीराम को छोड़े बिना जयभीम बोलना संभव है?

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प्रियदर्शन NDTV इंडिया में सीनियर एडिटर हैं...

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