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हमारे बैंकिंग सिस्टम की बदहाली कब होगी ख़त्म?

किसी को इस बात का सर्वे करना चाहिए कि बैंकों में काम करने वाले कर्मचारियों और अधिकारियों के स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ रहा है.

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हमारे बैंकिंग सिस्टम की बदहाली कब होगी ख़त्म?

प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर

बैंक सीरीज का 11वां अंक. पहले एक भूल सुधार. शुक्रवार के प्राइम टाइम में हमने एक ग़लती कर दी. खबर थी कि यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया ने अपना वो आदेश वापस ले लिया है जिसमें कहा गया था कि वैसे 8 ब्रांचों के मैनेजरों और डिप्टी मैनजरों का वेतन काट लिया जाएगा जिनका प्रदर्शन ठीक नहीं. जनरेटर और एसी बंद कर दिया जाएगा. हमने एक जगह यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया बोला और लिख दिया यूनियन बैंक ऑफ इंडिया. एक जगह यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया की जगह यूनियन बैंक ऑफ इंडिया बोल दिया. यह एक बड़ी भूल थी जिसके लिए मैं माफी मांगता हूं. दोनों दो बैंक हैं, मैं यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया की बात कर रहा था. वैसे हमारी सीरीज़ के दौरान आईडीबीआई बैंक और यूनियन के बीच सैलरी बढ़ाने का समझौता हो गया है. इसका श्रेय बैंकर हमें भी दे रहे थे एबीपी चैनल के साथ-साथ. उनका आभार लेकिन अभी सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की सैलरी रिवाइज़ नहीं हुई है. उनके काम के अनुपात में सैलरी वाकई कम है. कहा जा रहा है कि नीरव मौदी जैसे लोगों ने एनपीए इतना बढ़ा दिया है कि न तो बैंकों में बहाली हो रही है और न जो काम कर रहे हैं उनकी सैलरी बढ़ रही है. हम बैंक कर्मचारियों के ऊपर हो रहे अत्याचार और उनकी ग़ुलामी की दास्तान को दिखाते जा रहे हैं. इस कड़ी में आयुष गर्ग के बारे में जानिए.

अस्पताल में भर्ती आयुष को हमने शुक्रवार को कहा कि आपका इस तरह सामने आना या मीडिया में बयान देना शायद ठीक न हो मगर आयुष अपनी बात पर अड़े रहे. खैर हमने आयुष को तीन दिनों का मौका दिया लेकिन अब नहीं टाल सकते. आयुष के साथ जो गुज़री है वो कई बैंकरों के साथ गुज़र रही है. हो सकता है कि आयुष की आवाज़ सभी की आवाज़ बन जाए और उससे लाखों बैंकरों को फायदा हो. आयुष मुज़फ्फरनगर के सर्व उत्तर प्रदेश ग्रामीण बैंक में काम करता है. उसका कहना है कि यह पंजाब नेशनल बैंक का हिस्सा है. कर्मचारियों पर बीमा पॉलिसी बेचने का दबाव डाला जाता है. आयुष ने बैंक के कैश की चाबी लेने से मना कर दिया क्योंकि नियम के अनुसार वह चाबी नहीं ले सकता था, इसके कारण ब्रांच मैनेजर रीजनल मैनेजर की मीटिंग में नहीं जा सके. अगले दिन आयुष गर्ग को रीजनल ऑफिस में बुलाया जाता है और वहां दो घंटे के लिए बिठा कर पूछताछ होती है. सस्पेंड करने के लिए कहा जाता है और ट्रांसफर लेटर दे दिया जाता है. तनाव में आयुष की तबीयत खराब हो जाती है और वो चार दिनों से अस्तपाल में है. उत्तर प्रदेश ग्रामीण बैंक एम्लाइज़ यूनियन ने सर्व उत्तर प्रदेश ग्रामीण बैंक के चेयरमैन को पत्र लिखा है कि रीजनल मैनेजर के खिलाफ कार्रवाई की जाए.

हमारे पास बैंक का पक्ष नहीं है, वो देंगे तो हम प्राइम टाइम में ज़रूर दिखाएंगे. यह सब सामान्य शिकायतें लग सकती हैं मगर क्रास सेलिंग का इतना आतंक है कि बैंकर शनिवार और रविवार को भी काम कर रहे हैं. रात के नौ बजे तक बैंक में बैठे रहते हैं. बीमा न बेचने की सज़ा क्यों दी जाती है, रात के सात बजे तो कोई ग्राहक बैंक नहीं आता है. फिर क्यों इन बैंकरों को बंद कर रखा जाएगा. हमने ज़रूर महिला बैंकरों की व्यथा पर फोकस किया मगर पुरुष बैंकरों की भी यही व्यथा है. वे अपनी समस्या टीवी पर देख रहे हैं, मुझे बधाई देते हैं और फिर उस व्यथा को भुगतने में लग जाते हैं. हालत यह है कि एक बैंकर ने फोन किया कि उसके पिता का ऑपरेशन हो रहा है और घर से 2000 किमी दूर बैठकर रो रहा है क्योंकि उसे छुट्टी नहीं मिली है और इकलौती संतान है. यह कोई अपवाद नहीं है, ऐसे हज़ारों मेसेज मुझे मिले हैं.

सैलरी तो कम है ही, बैंकरों के तनाव का कारण है कि कम स्टाफ में तरह तरह के लक्ष्यों का थोप दिया जाना. कई जगह तो इंटरनेट की स्पीड इतनी कम है कि उससे भी वे काम नहीं कर पाते हैं. कुछ बैंकों की हमने टूटी हुई कुर्सियों की तस्वीरें देखीं. किसी को इस बात का सर्वे करना चाहिए कि बैंकों में काम करने वाले कर्मचारियों और अधिकारियों के स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ रहा है. अगर ये सब सवाल महत्वपूर्ण नहीं होते तो एसोचेम जैसी उद्योगों की संस्था इस तरह का सर्वे क्यों करती कि कारपोरेट कंपनी में कितने मरीज़ कितने बीमार हैं. हाल की रिपोर्ट के अनुसार कारपोरेट सेक्टर के 56 प्रतिशत कर्मचारी अत्यधिक तनाव के कारण 6 घंटे से कम सोते हैं. 46 प्रतिशत कर्मचारियों को किसी न किसी प्रकार का तनाव है. टारगेट के दबाव के कारण उनमें उच्च रक्तचाप, यूरिक एसिड, मोटापा बढ़ जाता है. 42 प्रतिशत कर्मचारियों को नियमित रूप से सर दर्द की शिकायत रहती है.

अगर काम के हालात के कारण शरीर पर पड़ने वाले प्रभावों का महत्व ही नहीं होता तो यह सर्वे ही क्यों होता. बैंकों के भीतर आप सर्वे करेंगे तो महिलाओं के शरीर पर पड़ने वाले प्रभावों की भयंकर जानकारी आएगी. मैंने ऐसे कई मेसेज देखें हैं जिसमें गर्भपात की शिकायत आम हो गई है. बहुत से जोड़े शादी के बाद भी आठ-आठ साल से अलग रहे हैं. दोनों के बीच काम करने की दूरी 500 से 1500 किमी है.

कुछ महिला बैंकरों की चिट्ठियों पर एक नजर...

'आदरणीय रवीश सर, आपका प्राइम टाइम शो रोज़ाना देखकर मुझे भी अपनी बात कहने की इच्छा हुई. मैं और मेरे पति दोनों ही सरकारी बैंक में हैं. शादी को 3 साल हो गए हैं. मेरे बैंक ने पति के पास तबादला तो कर दिया लेकिन उसी साल पति का तबादला उनके बैंक ने दूसरे राज्य में कर दिया. पति का तबादला हुआ क्योंकि उनका प्रमोशन हुआ था. प्रमोशन मना कर दिया फिर भी तबादला कर दिया. मैं अब पिता और पति दोनों से दूर रहती हूं. पति हर दूसरे और चौथे शनिवार को देर तक काम करने के बाद थके हारे घर आते हैं. रविवार की रात फिर यात्रा पर निकल जाते हैं ताकि सोमवार को बैंक पहुंच जाएं. हमारी ज़िंदगी बेकार सी हो गई है. मैं इकलौती लड़की हूं. यह कहानी मेरे अकेले की नहीं है. हर उस लड़की की है जिसका पति बैंक में काम करता है. मैं चाहती हूं कि आप ये कहानी प्राइम टाइम में ज़रूर दिखाएं.'

'रवीश जी, मैं दो बातों पर आपका ध्यान खींचना चाहती हूं. ये मेरी नहीं बहुत सारी लड़कियों की कहानी है. आज की तारीख में बैंकिंग में 10 में से 5 शादीशुदा लड़कियों का मिसकैरिज हो जाता है या उनका भ्रूण विकसित नहीं हो पाता है. ये सिर्फ़ मेरे बैंक की नहीं, बल्कि सारे बैंकों की कहानी है. लेडीज़ स्टाफ प्रेगनेंट है फिर भी पोस्टिंग दूर होने के कारण उसे लंबी दूरी की यात्राएं तय करनी पड़ती हैं. ताकि पति और परिवार के साथ रह सकें. प्रेगनेंसी के आधार पर तबादले के लिए कहो तो कहा जाता है नौकरी छोड़ दें. 5 से 7 साल लग जाते हैं तबादला होने में. कोई क्या करे. ऑफ़िशियल हेल्थ चेक अप तो दूर, अगर आप बीमार हैं और डॉक्टर के पास जाना चाहते हैं तो बैंक बंद होने के बाद या छुट्टी में ही जा सकते हैं. जैसे कि बीमारी हमारी छुट्टी का इंतज़ार कर रही है. सर मेरी दोस्त का गर्भपात हुआ है, तीसरी बार कोशिश कर रही है मगर इस स्थिति में भी उसका तबादला घर से 80 किलोमीटर दूर कर दिया गया है. उसका रो-रो कर बुरा हाल है. इस बार भी गर्भपात हो गया तो वह क्या करेगी.'

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'मैं एक महिला बैंकर हूं. आपकी बैंक सीरीज़ देखकर इतनी हिम्मत आ गई है कि आपको बता पाऊं. सर मैंने मातृत्व अवकाश के लिए 6 महीने की छुट्टी ली थी. कुछ हफ़्तों की छुट्टी और ले ली तो मैनेजमेंट को पसंद नहीं आया. उन्होंने मेरा तबादला ही कर दिया. ऐसी जगह भेज दिया जहां 70,000 खाताधारक हैं. वहां पर मैं ही एकमात्र ऑफ़िसर हूं. इसलिए किया गया ताकि मैं छुट्टी भी न ले पाऊं. 7 महीने के बच्चे को अपनी मां के पास छोड़ दिया है. यहां कोई देखने सुनने वाला नहीं है.'

क्या एक अफसर 70-80 हज़ार खातों को संभाल सकता है. शायद नहीं. बैंकों में लोगों की बहुत ज़रूरत है मगर एनपीए के कारण बहाली नहीं हो सकती. बेरोज़गार बाहर नारे लगा रहे हैं, बैंकर भीतर आहें भर रहे हैं. उन्हें आपकी मदद चाहिए. आप उनकी मदद कीजिए. बैंकर वाकई मुश्किल में हैं. लाखों लोगों के तबादले में मुश्किलें आ सकती हैं मगर ऐसा कैसे हो सकता है कि तबादले से न स्त्री खुश है न पुरुष खुश हैं. क्या इसलिए बेहतर रास्ता नहीं निकाला गया है कि ताकि तबादले का इस्तमाल सताने के लिए किया जा रहा है. बैंकरों को कम से कम किसानों से सीखना चाहिए. जब किसान अपने हालात के लिए लड़ सकते हैं तो बैंकर क्यों नहीं लड़ सकते हैं, क्यों नहीं जीत सकते हैं.


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