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प्राइम टाइम इंट्रो: कब सुधरेंगी हमारी स्‍वास्‍थ्‍य सेवाएं?

अच्छा होता कि अस्पतालों को भी भव्य तरीके से जन्माष्टमी मनाने के आदेश दिए जाते तो कम से कम कृष्ण के नाम पर ही सही आज की रात वहां अच्छे इंतज़ाम हो जाते. पैदा होने वाले बच्चों की किलकारियों से आवाज़ आती कि वे कान्हा के देश में पैदा हुए हैं. आप सभी को जन्माष्टमी मुबारक.

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प्राइम टाइम इंट्रो: कब सुधरेंगी हमारी स्‍वास्‍थ्‍य सेवाएं?
आप सभी को जन्माष्टमी की बधाई. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पुलिस प्रमुख सुलखान सिंह को पत्र लिखा है कि पुलिस जन्माष्टमी को पारंपरिक और भव्य तरीके से मनाने का इंतज़ाम करे. पहले भी पुलिस मनाती थी लेकिन अब इसे फिर से बड़े पैमाने पर मनाया जाएगा. हम समझ रहे थे कि सरकार 30 बच्चों की मौत का शोक मना रही है लेकिन उसे इस बात का ध्यान रहा कि पुलिस विभाग जन्माष्टमी भव्य तरीके से मनाए. कान्हा सिर्फ कारागार में पैदा नहीं होते हैं. देश की करोड़ों माताओं के कान्हा जिन सरकारी अस्तपालों में पैदा होते हैं वहां के हालात भी कारागार जैसे ही हैं. यह बात मुख्यमंत्री भी जानते हैं और आप नागरिक भी जानते हैं. अच्छा होता कि अस्पतालों को भी भव्य तरीके से जन्माष्टमी मनाने के आदेश दिए जाते तो कम से कम कृष्ण के नाम पर ही सही आज की रात वहां अच्छे इंतज़ाम हो जाते. पैदा होने वाले बच्चों की किलकारियों से आवाज़ आती कि वे कान्हा के देश में पैदा हुए हैं. आप सभी को जन्माष्टमी मुबारक.

एक दिन में तीस बच्चों की मौत, पांच दिन में साठ बच्चों की मौत, तमाम मंत्रियों के दौरे बताते हैं कि हमारी सरकार संवेदनशील है. मृत्यु के बाद मंत्रियों का दौरा इस बात की गारंटी है कि अब भी सब समाप्त नहीं हुआ है. 2012 से यहां 3000 बच्चों की मौत हुई है, अगर उस रात आक्सीजन की सप्लाई का मामला नहीं होता तो यह बात स्वीकार करने में कोई बुराई नहीं है कि गोरखपुर का स्थानीय समाज भी और बाकी समाज भी इन मौतों को लेकर सामान्य हो चुका है. मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने खुद इस मामले को लोकसभा में कई बार उठाया है और घटना से दो दिन पहले वे अस्पताल के दौरे पर ही थे. तब भी ये घटना हुई. इस घटना के बाद जो बड़ी दुर्घटना हुई है वो यह है कि मूल सवालों से ध्यान हटाने के लिए तरह तरह की बहसें पैदा कर दी गईं. कुछ मीडिया की जल्दबाज़ी से और कुछ संगठित तरीके से ट्रोलिंग के द्वारा. इसलिए ज़रूरी है कि गोरखपुर की घटना को लेकर मूल सवाल पर ही हम टिके रहे.

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मूल सवाल क्या है? क्या आक्सीजन की सप्लाई के कारण मौत हुई? क्या पैसे के भुगतान के कारण सप्लाई बंद हुई? सप्लाई करने वाली कंपनी ने जब बंद करने की धमकी दी तो अस्पताल के सीएमओ ने क्या किया? कोई आपात बैठक की, ज़िलाधिकारी को बताया? क्या ज़िलाधिकारी को मालूम था, क्या ज़िलाधिकारी ने इसे स्वास्थ्य मंत्री को बताया, मुख्यमंत्री के प्रतिनिधि को जानकारी दी? पैसे का भुगतान करने की ज़िम्मेदारी सीएमओ की थी या बच्चा विभाग के प्रमुख की? ऑक्सीजन के सिलेंडर की सप्लाई का मामला किसके अंडर आता है, सीएमओ के या बच्चा विभाग के प्रोफेसरों या डॉक्टरों के. ये सब व्यवस्था से संबंधित मूल सवाल हैं जिस पर हर हाल में टिके रहना होगा. कोई चाहे तो इन सवालों के जवाब तीन चार घंटे की बैठक के बाद ही दे सकता है लेकिन सरकार के बयान और मीडिया की रिपोर्ट में इतने अंतर हैं कि लगता नहीं कि जवाब जल्दी मिलेंगे इसलिए जन्माष्टमी मनाने में कोई कमी नहीं होनी चाहिए.

10 अगस्त को अस्पताल में ऑक्सीजन प्लांट चलाने वाले कर्मचारियों ने सीएमओ को लिखा कि आक्सीजन का स्टॉक खतरनाक रूप से कम हो चुका है और रात तक के लिए भी नहीं बचा है. ऑपरेटर ने अस्पताल प्रशासन से गुहार लगाई कि जल्दी कीजिए मरीज़ों की ज़िंदगी ख़तरे में है. यह दूसरा पत्र था. एक हफ्ता पहले भी ऐसा ही पत्र लिखा जा चुका था जिसका कोई जवाब उन्हें नहीं मिला. हमारी सहयोगी शिखा त्रिवेदी ने एनडीटीवी डॉट काम पर लिखा है कि जनवरी से आठ अगस्त के बीच बाबा राघव दास मेडिकल कॉलेज में 476 मरीज़ दाखिला लेते हैं. ज्यादातर बच्चे थे. 117 बच्चों की मौत हो जाती है. स्थानीय मीडिया में भी छप रहा था कि ऑक्सीजन सप्लाई करने वाली कंपनी पुष्पा सेल्स ने सप्लाई बंद करने की धमकी दी है. आप ही सोचिये अगर कोई ऐसी धमकी दे कि आक्सीजन की सप्लाई बंद होगी तो क्या उस पर गौर करने में दस दिन बीस घंटे या चार घंटे का इंतज़ार किया जा सकता है. क्या हम या आप पांच मिनट भी बग़ैर ऑक्सीजन के रह सकते हैं.

इसलिए मूल सवाल पर टिके रहना ज़रूरी है. यह इसलिए ज़रूरी है कि जिस अस्पताल का दौरा राज्य के मुख्यमंत्री एक महीने में दो बार करते हों, मेडिकल शिक्षा सचिव एक महीने में दो बार जाती हों, स्वास्थ्य सचिव भी दौरा करते हों, वहां ये घटना क्यों हुई जबकि ऑक्सीजन सप्लाई करने वाली कंपनी ने कानूनी नोटिस भी भेजा था. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ 9 जुलाई को भी आए थे और 9 अगस्त को भी. इसके बाद भी इस अस्पताल की अनेक समस्याएं दूर नहीं हुईं. कुछ वार्ड की हालत ऐसी है कि जानकर लगेगा कि ये अस्पताल चल कैसे रहा था. और सारे प्रमुख व्यक्तियों के दौरे के बाद भी वो कौन सी शक्ति थी जो इसमें सुधार नहीं होने दे रही थी.

- एंसेफलाइटिस के उपचार के लिए फिजिकल मेडिसिन एंड रिहैब विभाग के सभी कर्मचारियों को 28 महीने से वेतन नहीं मिला है.
- आज की तारीख तक किसी को वेतन नहीं मिला है. वेतन न मिलने के कारण 4 डॉक्टर छोड़ कर चले गए.
- इस बाबत गोरखपुर न्यूज़लाइन के मनोज सिंह ने दि वायर के लिए एक ख़बर भी छापी थी.
- इस विभाग में अब कोई डॉक्टर नहीं है, 11 थेरेपिस्ट बचे हैं जिन्हें वेतन का इंतज़ार है.
- एक और वार्ड है जिसके स्टाफ को पांच महीने की देरी के बाद घटना से दो दिन पहले वेतन मिला था.
- इसी अस्पताल के नियो नेटल विभाग के छह महीने से सैलरी नहीं मिली है.
- इन्हें भी हाल में सैलरी मिली है.

हालत ये होती है कि 100 मरीज़ होते हैं कि एक बेड पर चार चार मरीज़ को रखा जाता है. पिछले साल 28 अगस्त को केंद्रीय स्वास्थ्य राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल भी यहां आई थी और कमियों का जायजा लिया था. मेडिकाल कॉलेज ने उन्हें दो प्रस्ताव दिए कि नियो नेटल आईसीयू को 100 बेड का कर दिया जाए, जो इस वक्त 44 बेड का है. उसके लिए 11.50 करोड़ का बजट था. अनुप्रिया पटेल ही बेहतर तरीके से बता सकती हैं कि उनके दौरे के बाद क्या क्या हुआ है. मनोज सिंह का कहना है कि कुछ नहीं हुआ. हमारे सहयोगी अजय सिंह ने गोरखपुर न्यूजलाइन से बात की है. गोरखपुर न्यूज़लाइन बहुत कम संसाधान से चलता है फिर भी इस वेबसाइट ने जुलाई से अगस्त के बीच अस्पताल को लेकर कम से कम बीस पचीस ख़बरें प्रकाशित की थीं.

मूल सवाल ये है कि जिस अस्पताल में एक साल के भीतर केंद्रीय मंत्री से लेकर दो दो बार मुख्यमंत्री का दौरा होता है वहां भी समस्याओं का समाधान नहीं होता है. घटना के अगले दिन भी हालात जस के तस थे. 25 किलोमीटर दूर अपने चार दिन के बच्चे को लेकर एक पिता बीआरडी अस्पताल गया था. उसे वेंटिलेटर नहीं मिला. पांच घंटे तक अम्बू बैग से बेटे को ऑक्सीजन देता रहा लेकिन उसकी सांस टूट गई.

गोरखपुर की घटना के बाद सोशल मीडिया पर ट्रोलों की जमात और उससे बाहर राजनेताओं की प्रतिक्रिया ने जगह ले ली है. जिनके बच्चे मरे हैं और जो इस तरह की व्यवस्था के शिकार होते हैं वो इस बहस से गायब कर दिए गए हैं. उनका चेहरा इस विवाद का चेहरा नहीं है. हमारे सहयोगी अजय सिंह उन घरों में गए जिनके बच्चों की मौत हुई है.

हमारी एक ही कोशिश है कि इस घटना में जिनके बच्चे मारे गए हैं उन्हीं का चेहरा आपको बार बार दिखे. बड़े बड़े मंत्रियों के बार बार होने वाली प्रेस कांफ्रेंस से बयान तो निकल रहे हैं, लगता है कि बहुत कुछ होने वाला है लेकिन आपने देखा कि जब उनके दौरे से कुछ नहीं हुआ तो उनके बयानों पर इतनी जल्दी भरोसा क्यों किया जाए.

बीआरडी कॉलेज के प्रिंसिपल को लेकर कई तरह की खबरें आ रही हैं. उन्हें सस्पेंड किया जा चुका है लेकिन इंडियन मेडिकल एसोसिएशन का कहना है कि अस्पताल के प्रिंसिपल राजीव मिश्रा का निलंबन ग़लत है क्योंकि ये हादसा एक प्रशासनिक नाकामी की वजह से हुआ जिसके लिए सब ज़िम्मेदार हैं. अगर आप उन्सें सस्पेंड करते हैं तो स्थानीय प्रशासन को भी सस्पेंड कीजिए और कंपनी पर पाबंदी लगाइए. एम्स के डॉक्टरों के यूनियन ने भी कहा कि मूल सवालों को छोड़ डॉक्टरों के खिलाफ कार्रवाई का वे विरोध करेंगे.

आप जैसे ही नेताओं के बयान को इस त्रासदी का चेहरा बनाएंगे, उनके आश्वसानों को एक हद से ज्यादा महत्व देंगे फिर गलती करेंगे. 24 जुलाई के प्राइम टाइम में हमने बताया था कि ग्रामीण इलाकों में डॉक्टरों की क्या हालत है. सीएजी की रिपोर्ट आई है. सीएजी ने 2011 से 2016 तक राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन का हिसाब किताब किया है. गांवों कस्बों में स्वास्थ्य की हालत के लिए यह योजना बहुत महत्वपूर्ण है. सीएजी ने कहा है कि 27 राज्यों ने इस योजना के मद में दिए गए पैसे खर्च ही नहीं किए. 2011-12 में यह रकम 7,375 करोड़ थी. 2015-16 में 9509 करोड़ थी. ये वो राशि है जो ख़र्च नहीं हो सकी.

इसका मतलब है कि पैसे की कमी नहीं है. सरकार के पास पैसा है. आप फिर गलती करेंगे अगर इस समस्या को गोरखपुर की घटना तक सीमित रखेंगे. सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि हमारे देश में सैकड़ों ऐसे स्वास्थ्य केंद्र हैं जो बहुत ही गंदे हालात में काम कर रहे हैं. 20 राज्यों में 1285 प्रोजेक्ट कागज़ों पर ही पूरे हुए हैं, मगर असलियत में शुरू भी नहीं हुए हैं. क्या आपने सुना है कि इन 1285 प्रोजेक्ट से जुड़े लोगों के खिलाफ कार्रवाई हुई है. गोरखपुर में 30 बच्चे मरे हैं, न जाने देश के अस्पतालों में गंदगी और डॉक्टर न होने के कारण कितने सौ बच्चे रोज़ मरते होंगे. गोदी मीडिया को अब प्रोपेगैंडा से फुर्सत नहीं है इसलिए अब टीवी का कैमरा अस्पतालों की तरफ जाता भी नहीं है. तभी तो गोरखपुर की घटना के बाद एक अंधेरे कमरे से चलने वाले वेबन्यूज़ पोर्टल गोरखपुर न्यूज़लाइन की चर्चा होती है. सरकारों का प्रोपेगैंडा करने वाले बड़े बड़े एंकरों का इस मामले में आने नाम सुना क्या. कभी इस पर बहस देखी है क्या. 24 जुलाई के प्राइम टाइम में हमने सीएजी की रिपोर्ट के हवाले से बताया था कि 27 राज्यों के लगभग हर स्वास्थ्य केंद्र में 77 से 87 फीसदी डॉक्टर नहीं हैं. 13 राज्यों में 67 स्वास्थ्य केंद्र ऐसे मिले जहां कोई डॉक्टर ही नहीं था. 17 राज्यों में 30 करोड़ की अल्ट्रा साउंड, एक्स रे मशीन, ईसीजी मशीन पड़ी हुई है मगर मेडिकल स्टाफ नहीं होने के कारण चलती नहीं है. इन मशीनों को रखने के लिए जगह भी नहीं है.

ये अस्तपाल और ये योजना नवजात बच्चों और प्रसव के दौरान मरने वाली माताओं को बचाने के लिए बेहद अहम है. इन सवालों पर विचार करने से हमारी राजनीतिक निष्ठाएं हिल जाएंगी. क्योंकि अब देश में कोई भी ऐसा मुख्य दल नहीं है जिसे दिल्ली और तमाम राज्यों में दस दस साल राज्य करने का मौका नहीं मिला है. इसके बाद भी सबका रिकॉर्ड यही है. यहां तक कि माताओं और बच्चों में आयरन की कमी के कारण एनिमिया हो जाता है. प्रसव के दौरान पचास फीसदी माएं एनिमिया से मर जाती हैं. इसके बाद भी सीएजी ने पाया कि सभी राज्यों के प्राथमिक केंद्रों में आयरन टैबलेट दी ही नहीं जा रही थी. एनएचआरएम सेंटर में गर्भवती महिला को सौ फौलिक एसिड टेबलेट देनी होती है. आडिट में पाया गया कि सभी 28 राज्यों में 3 से 75 फीसदी की कमी मिली यानी दिये ही नहीं गए. अरुणाचल, जम्मू कश्मीर, मणिपुर, मेघालय में 50 फीसदी गर्भवती महिलाओं को टेटनस का टीका भी नहीं लग सका.

सीएजी ने गुजरात में 3 जनरल अस्पतालों की जांच की. नडियाड जनरल अस्पताल में ऑपरेशन थियेटर तो है लेकिन ऑपरेशन के पहले और बाद में मरीज़ को रखने के लिए कमरे नहीं हैं. अगर आप सीधे मरीज़ को ऑपरेशन थियेटर में ले जाएं, वहां से सीधे वार्ड में तो उसे इंफेक्शन होने का खतरा बढ़ जाता है. इसी अस्पताल में जगह की कमी के कारण लैब का काम भी मरीज़ों के वेटिंग एरिया में ही चल रहा था. गोधरा के जनरल अस्पताल में 440 बिस्तर की ज़रूरत है लेकिन 210 ही होने के कारण मरीज़ ज़मीन पर मिले. झारखंड में 17 प्राइमरी हेल्थ सेंटर की इमारत ही नहीं है. 5 ज़िला अस्पतालों में 32 स्पेशल ट्रीटमेंट सुविधाओं में से 6 से 14 सुविधाएं ही उपलब्ध थीं. यानी जितनी बीमारी का इलाज होना चाहिए, नहीं हो रहा है. केरल की 1100 से अधिक सीएसची और पीएचसी में सिर्फ 23 में डिलीवरी की सुविधा है. बिहार में जननी सुरक्षा योजना के तहत 40 फीसदी योग्य महिलाओं को नहीं दिये गए.

ये हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था की हालत है. इसलिए नेता जब यह कहें कि गोरखपुर के अस्पताल का दुख दर्द दूर हो जाएगा, इतनी जल्दी यकीन मत कीजिएगा. यह सवाल कीजिए कि क्या बाकी अस्पतालों का भी दुख दर्द दूर हो जाएगा. इसलिए हमने आज अपने कार्यक्रम में किसी नेता का कोई बयान नहीं लगाया है.


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