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भारतीय रेल की लेटलतीफ़ी कब ख़त्म होगी?

सांसद हरीश द्विवेदी तो चले गए मगर मनवर संगम एक्सप्रेस तब भी नहीं आई. जबकि ऐसे मौके पर कार्यक्रम पहले से तय होता है. रेल मंत्रालय से लेकर ज़ोनल ऑफिस में सबको ख़बर होती है.

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भारतीय रेल की लेटलतीफ़ी कब ख़त्म होगी?

प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर

भारतीय रेल की देर से चलने की बीमारी किस हद तक पहुंच गई इसका एक किस्सा बताता हूं. देरी से चलने की आदत ऐसी हो गई है कि एक सांसद जी अपने क्षेत्र में रेलगाड़ी के स्टॉपेज का स्वागत करने पहुंच गए. अपने समय से पहुंचे लेकिन ट्रेन उनके चले जाने के कई घंटे बाद तक नहीं आई. आम तौर पर अपने इलाके के स्टेशन पर गाड़ी रुकवाने के लिए सांसद लोग महीनों चिट्ठी पत्री करते हैं. रेल मंत्री से मिलते हैं. जब यह मौका आता है तो उनके लिए भी सबको दिखाने का मौका मिलता है. ऐसे मौके पर समर्थकों का जमावड़ा होता है. सांसद जी काफिले के साथ आते हैं. गाड़ी पर माला लदी होती है. लगता है कि बड़ा भारी काम हुआ है, जनता को बताया जाए. सो बस्ती ज़िले के सांसद हरीश द्विवेदी भी पहुंचे कि आज बभनान स्टेशन पर गाड़ी का ठहराव होगा, हम झंडा दिखाएंगे और कार्यकर्ताओं के बीच भाषण देंगे.

उपरोक्त पंक्तियों में जिस ट्रेन की बात हो रही है उसका नाम है मनवर संगम एक्सप्रेस. बभनान स्टेशन पर इसके आने का समय था सुबह साढ़े दस बजे. मगर देर हो गई इसलिए सांसद जी चार बजे आए. मगर तब भी ट्रेन नहीं आई थी. जिस वक्त सांसद जी आए उस वक्त ये ट्रेन साढ़े पांच घंटा लेट हो चुकी थी. लिहाज़ा सांसद जी साढ़े पांच घंटे की देरी को थोड़ा लेट बताकर चले गए.


सांसद हरीश द्विवेदी तो चले गए मगर मनवर संगम एक्सप्रेस तब भी नहीं आई. जबकि ऐसे मौके पर कार्यक्रम पहले से तय होता है. रेल मंत्रालय से लेकर ज़ोनल ऑफिस में सबको ख़बर होती है. इतनी गर्मी में समोसे का आलू भी अरुआ जाता है यानी ख़राब हो जाता है. हज़रात यह ट्रेन 12 घंटे से अधिक लेट पहुंची. अब आप यह तस्वीर देखिए जिस वक्त गाड़ी के आने की घोषणा हो रही है, जहां यह पहली बार ठहरने वाली थी, जब पहुंची तो वहां कोई नहीं था. आखिर सांसद हरीश त्रिवेदी भी क्या करते.

यह ट्रेन आदतन लेट चलती है. 25 मई को जिस दिन इसका सांसद जी स्वागत करने वाले थे, 12 घंटे 08 मिनट की देरी से बभनाम स्टेशन पर पहुंची. 26 मई को 9 घंटे की देरी से चल रही थी. 28 मई को 5 घंटे बीस मिनट की देरी से चल रही थी.

अगर सांसद की परवाह नहीं है तो आम आदमी की क्या हालत है आप अंदाज़ा नहीं लगा सकते. अभी 18-20 घंटे की देरी से चलने वाली गाड़ियों की सूची दिखाने वाला हूं ताकि आप सरकार के छपने वाले विज्ञापनों में इन हकीकतों को खोज सकें. कम से कम एक लाइन माफी की ही छप जाती कि लोगों को तकलीफ हो रही है, इसका हमें अफसोस है. तनवीर ने उन लोगों से बात की जो मारे खुशी बभनाम स्टेशन आ गए कि बस्ती तक इसी से जाएंगे.

हम पिछले हफ्ते से दिखा रहे हैं कि हरदोई स्टेशन पर पीने के पानी का संकट है. यहां पर आईआरसीटीसी की वेंडिंग मशीन लगी है जो तीन महीने से ख़राब है. आप बताइये कि ये क्या सिस्टम है कि एक रेलवे स्टेशन पर पानी की वेंडिंग मशीन तीन महीने से ख़राब हो और ठीक न की गई हो. कितना वक्त लगना चाहिए. साधारण रेलगाड़ियों के यात्री जब हकासल पियासल स्टेशन पर पहुंचते हैं तो मशीन की तरफ भागते हैं. मशीन खराब मिलती है तो फिर इधर उधर भागने लगते हैं. इस बीच गाड़ी के खुलने पर भी ध्यान रखना होता है.

हमें लगा था कि 28 मई को यहां सब ठीक हो जाएगा. यह वीडियो आपने प्राइम टाइम में देखा होगा, गायत्री परिवार के लोग उस दिन पानी पिला रहे थे. किस तरह जग में पानी लेकर कीप के ज़रिए बोतलों में डाल रहे थे. इतनी गरमी में कभी जनरल क्लास में चल कर देख लीजिए. मगर जब अजय वीर 28 मई को हरदोई स्टेशन गए तो वहां गायत्री परिवार के लोग भी नज़र नहीं आए. आखिर जनता अपने दम पर कितनी समाज सेवा करेगी. अजय ने चेक किया तो पाया कि कोई मशीन ठीक नहीं हुई है. लोगों को ठंडा पानी नहीं मिल रहा था. यहां एक दूसरी कंपनी का बोतल इस गाड़ी से उतरते हुए देखा गया. इसका नाम है एमओएम. हम बेवजह शक नहीं करना चाहते कि प्राइवेट पानी वाले को लाभ पहुंचाने के लिए मशीनें ख़राब छोड़ दी गई होंगी. 2013 में हरदोई स्टेशन को ए क्लास स्टेशन बनाया गया जिस पर तीन करोड़ रुपये खर्च हुए. संवाददाता अजय वीर ने सांसद अंशुल वर्मा से पूछ लिया.

सांसद महोदय कहते हैं कि पूरे मंडल में मशीनें काम नहीं कर रही हैं. वे मुरादाबाद मंडल की बात कर रहे हैं जिसमें कई ज़िले आते हैं. तो क्या वे यह कह रहे हैं कि कई ज़िलों के स्टेशनों में पानी की वेंडिंग मशीन खराब है, अगर ऐसा है तो क्या यह गंभीर स्थिति नहीं है. जो भी है, सांसद ने तीन महीना पहले शिकायत की है मगर एक अदद मशीन ठीक नहीं हो पाई. बस्ती के सांसद भाषण देकर चले जाते हैं, ट्रेन उसके छह घंटे बाद आती है, क्या यह मज़ाक नहीं है. क्या हम जानते हैं रेल मंत्री पीयूष गोयल को पता है कि कुछ ट्रेनें 18 घंटे की देरी से क्यों चलती हैं और उनमें यात्रियों का किस तरह ख्याल रखा जाता है.

04405 दरभंगा से दिल्ली होली स्पेशल 25 मई की ट्रेन 16 घन्टे 43 मिनट की देरी से दिल्ली आई. 13 अप्रैल को यह ट्रेन 29 घंटे 35 मिनट लेट थी. 14017 सद्भावना एक्सप्रेस, रक्सौल से आनंद विहार, 26 मई को यह ट्रेन 20 घंटा 20 मिनट लेट थी. 18104 अमृतसर से टाटानगर जालियावाला एक्सप्रेस 25 मई की ट्रेन 17 घंटा देरी से पहुंची. 04115 अलाहाबाद से मुम्बई स्पेशल 26 मई की ट्रेन 16 घंटे की देरी से लोकमान्य तिलक टर्मिनल पहुंची. 22406 आनंद विहार भागलुपर गरीब रथ, 25 मई की ट्रेन भागलपुर 19 घंटा 45 मिनट लेट थी. 14116 हरिद्वार इलाहाबाद एक्सप्रेस, 25 मई की ट्रेन इलाहाबाद 23 घंटे 15 मिनट की देरी से पहुंची. 13006 अमृतसर हावड़ा मेल. 25 मई की ट्रेन हावड़ा 18 घंटे 55 मिनट की देरी से पहुंची. 13238 कोटा पटना एक्सप्रेस 25 मई की ट्रेन पटना 18 घंटा 12 मिनट की देरी से पहुंची.

यह सारा रिसर्च शिवांक ने हमारे लिए कर दिया है. अगर हवाई जहाज़ उड़ान भरने के बाद रास्ते में बीस घंटे लेट हो जाए तब क्या होगा. अगर रोज़ इसी तरह बीस पचीस प्लेन 20 घंटे की देरी से चलें तो क्या होगा. हमने पहले की सीरीज़ में रेल अधिकारियों से बात की थी, क्यों ऐसा होता है. लेकिन यात्री क्या करें. 20 घंटे, तीस घंटे लेट होने पर उनका जो नुकसान होता है वो क्या करें. ये कुछ ट्वीट देखिए कि रेल लेट होने के कारण कितनों की ज़िंदगी ख़राब हुई है.

निशांत ने पीयूष गोयल, रेल मंत्रालय, पीएम कार्यालय, मनोज सिन्हा को टैग करते हुए ट्वीट किया है कि हमलोग एक साल से इस परीक्षा का इंतजार कर रहे थे, मड़ुआडीह एक्सप्रेस 12537 10 घंटा लेट हो गई, मेरे भाई की परीक्षा छूट गई... उसके और परिवार के लिए यह निराशा का क्षण है.

अरविंद यादव ने 24 मई को सुबह 7 बजकर 51 मिनट पर रेल मंत्रालय और पीयूष गोयल को टैग करके ट्वीट किया है कि मेरे भाई की परीक्षा 11 बजे से वाराणसी में है, वो ट्रेन नं 12537 में सफर कर रहा है, ट्रेन 6 घंटे लेट हो चुकी है, ट्रेन को अभी भी कुछ दूरी तय करनी है, मुझे नहीं लगता कि वो परीक्षा में बैठ पाएगा..

हमारा सवाल सिम्पल है. हवाई यात्रियों की तरह रेल यात्रियों को भी ट्रेन के लेट होने पर मुआवज़ा मिलना चाहिए कि नहीं. मान लीजिए आपकी ट्रेन 20 घंटे लेट है, उसका टिकट तो कैंसिल करा सकते हैं लेकिन जो ट्रेन चलने के बाद 20 घंटे लेट हो जाए उसका क्या करेंगे आप. क्या आपको 20,000 का मुआवज़ा नहीं मिलना चाहिए.

यात्रीगण कृपया ध्यान दें, अगर आप छात्र हैं, कहीं परीक्षा देने जा रहे हैं तो अपने घर से पैदल ही निकल लें, पांच छह दिन पहले चलेंगे तो पहुंच भी जाएंगे और परीक्षा भी नहीं छूटेगी. कहीं नौकरी के लिए ज्वाइन करने जा रहे हैं तो तीन दिन पहले का टिकट ले लें. प्राइम टाइम की यह रेल सीरीज़ राइट टाइम चल रही है.

देश के विश्वविद्यालयों की बदहाली की दास्तान
अब हम आते हैं यूनिवर्सिटी सीरीज़ पर. नेताओं के भाषण को ध्यान से सुनना बंद कर दीजिए. उसमें आप बार बार युवा युवा का ज़िक्र सुनेंगे मगर युवाओं के साथ क्या हो रहा है यही बात सामने लाई जाए तो आप हैरान रह जाएंगे. आपने बैचलर इन होमियोपैथिक मेडिसीन इन सर्जरी कोर्स का नाम सुना ही होगा. उसी के छात्र मुज़फ्फरपुर में वाइस चांसलर के घर के बाहर धरना दे रहे हैं. इन छात्रों की दो साल से परीक्षा नहीं हुई है. 2016 से एडमिशन लेकर परीक्षा का इंतज़ार कर रहे हैं. वाइस चांसलर के घर धरना देने गए तो गरमी में एक छात्रा बेहोश हो गई. इसके बाद स्थिति बिगड़ी तो छात्र उग्र हो गए और जवाब में पुलिस भी उग्रतर हो गई. स्थानीय मीडिया में छपा है कि छात्रों ने पत्थरबाज़ी की और पुलिस ने इन्हें बॉन्‍ड भरने के बाद छोड़ा. साढ़े पांच साल का कोर्स होता है, उसमें अगर दो साल परीक्षा नहीं होगी तो यह कोर्स साढ़े सात साल का हो जाएगा. भारत के नौजवानों को बर्बाद करने का प्रोजेक्ट चल रहा है. नौजवानों को यह बात पूरी तरह ख़ाक हो जाने के बाद भी समझ नहीं आएगी.

हमने बिहार यूनिवर्सिटी का मामला उठाया था कि दो लाख से भी ज्यादा छात्रों के इम्तहान नहीं हो रहे हैं. अब पता चल रहा है कि प्रभावित छात्रों की संख्या पांच से 6 लाख तक हो सकती है. क्या यह मुमकिन है कि लाखों छात्रों को इस तरह बर्बाद किया जाए और इनके मां बाप या किसी को फर्क ही न पड़े. ये लड़के फिर क्या करते हैं. व्हाट्सऐप करते हैं या खुद को बर्बाद होने दे रहे हैं. प्राइम टाइम के बाद यूनिवर्सिटी ने परीक्षा की तारीख का ऐलान कर दिया है. जून के अंतिम सप्ताह में बीए फर्स्ट ईयर और सेकेंड ईयर की परीक्षा शुरू होगी. स्थानीय अखबारों के मुताबिक इसी के साथ प्रश्न पत्र छापने का टेंडर जारी हुआ है. प्रिंसिपल के साथ बैठक हुई है कि गरमी की छुट्टी में परीक्षा होगी तो सहयोग करें. सहयोग, कायदे से सबको सस्पेंड कर देना चाहिए. अगर हम प्राइम टाइम में इस पर ज़ोर नहीं देते तो यकीन जानिए परीक्षा होती ही नहीं. अब आपको एक कॉलेज की कहानी और तस्वीर दिखाता हूं. तस्वीर से आप देखिए कि क्या हाल है, कहानी से ये समझिए कि कैसे नौजवान बर्बाद है.

यह राधाकृष्ण गोयनका कॉलेज है सीतामढ़ी ज़िले का. राधाकृष्ण जी व्यापारी थी. अपनी जेब से कई साल शिक्षकों का वेतन दिया. इस कॉलेज में 10,000 लड़के पढ़ते हैं. यहां 69 शिक्षक होने चाहिए मगर 13 ही हैं. कई कोर्स की कोई क्लास ही नहीं होती है. कॉलेज के एक वरिष्ठ अधिकारी से हमने बात की तो उन्होंने कहा कि हमारे दबाव बनाने से भी कुछ नहीं होता है. आप मुख्यमंत्री और राज्यपाल से क्यों नहीं बात करते हैं. बच्चे भी दबाव बनाते हैं मगर यूनिवर्सिटी को कोई फर्क नहीं पड़ता है. 2014-16 के पीजी सत्र की परीक्षा नहीं हुई है. जब यहां के लड़के बाहर नौकरी करने जाते हैं सवाल पूछा जाता है कि दो साल का कोर्स चार साल में करके आ रहे हैं, क्या कारण था.

विश्वविद्यालय के रवैये से सभी छात्र नाराज चल रहे हैं, पिछले दो साल से पीजी के फर्स्ट, सेकेंड सेमेस्टर के छात्र इंतजार कर रहे हैं कि हमारी परीक्षा की जाए लेकिन यहां परीक्षा तो क्या यहां डेट भी नहीं निकाला जा रहा है. छात्र इस हद तक परेशान हैं कि वो सुसाइड करने पर बाध्‌य हो जाएंगे. ग्रेजुएशन पांच साल और पीजी चार साल में होगा तो छात्र नौकरी पाने के लिए कहां जाएंगे. विश्वविद्यालय द्वारा एक डेट तो दिया गया है लेकिन अब भी तिथि निर्धारित नहीं की गई है कि कब से कब तक परीक्षा की जाएगी. इससे पीजी के छात्रों में रोष है. पीजी के छात्र इसको लेकर हतोत्साहित हो चुके हैं.

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बिहार के कॉलेजों में शिक्षक और छात्र का अनुपात निकालेंगे तो घासपात निकलेगा. बिहार ही नहीं दूसरे राज्यों का भी. 199 छात्रों पर सिर्फ एक शिक्षक. इस समस्या का समाधान नहीं करके, आपको बताया जा रहा है कि यूनिवर्सिटी की रैंकिंग होगी. वैकेंसी क्यों नहीं निकल रही है, शिक्षक भर्ती होंगे, बेरोज़गारी दूर होगी, जिन बच्चों ने फीस देकर एडमिशन लिया है उन्हें मास्टर मिलेंगे. मगर आप लोग भी इस झांसे में आ गए हैं कि यूनिवर्सिटी की रैंकिंग का निकलना कोई बहुत भारी काम है जो हो गया है. मोतिहारी में एक कॉलेज है श्री नारायण सिंह कॉलेज. यहां एक ही शिक्षक हैं, जो खुद प्रिंसिपल हैं. किसी भी कोर्स में कोई शिक्षक नहीं है. आप यह सोच रहे होंगे कि मैं 3278 नौजवानों की नियुक्ति का मामला भूल गया तो आप गलत हैं. एसएससी सीजीएल 2016 की परीक्षा पास किए हुए दस महीने हो गए मगर 3000 से अधिक टैक्स सहायकों की नियुक्ति नहीं हो रही है. एक छात्र ने बताया कि 'मेरे पापा ने मुझे पढ़ाने के लिए अपनी दुकान बेच दी. जब रिज़ल्ट आया तो हम बहुत खुश थे. पापा के पास अब कुछ नहीं बचा है. आजकल पापा एक से ब्याज़ पर रुपये लेते हैं और थोड़े समय के बाद किसी और से. कभी कभी घर में खाने के पैसे नहीं होते तो मम्मी एक शाम का खाना नहीं बनाती. मम्मी ने भी छोटी फाइनेंस कंपनियों से कर्ज़ लेना शुरू कर दिया है. हमने सोचा था कि नौकरी लग गई है तो माता पिता को राहत देंगे. पापा ने भी पूछना बंद कर दिया है कि नौकरी कब लगेगी. ये हायर पोस्ट पर बैठे लोग क्या समझेंगे कि हम जैसे लोग कैसे जी रहे हैं.'

अगस्त 2017 में रिज़ल्ट आ गया था. मई 2018 बीत गया इनकी ज्वाइनिंग नहीं हुई है. मैं पिछले एक हफ्ते से रोज़ इसका ज़िक्र करता हूं इस उम्मीद में कि डाइनैमिक वित्त मंत्री पीयूष गोयल इनकी नौकरी करा देंगे मगर कुछ नहीं हुआ. कांग्रेस नेता शशि थरूर ने ज़रूर इन परेशान छात्रों के लिए ट्वीट किया है मगर उसके बाद भी कुछ नहीं हुआ. सरकार ने चार साल होने पर बहुत से विज्ञापन छापे हैं, उन विज्ञापनों को फिर से पढ़िएगा, क्या उनमें 3287 छात्रों की कोई व्यथा है, क्या 3287 नौजवानों को दस महीने से अप्वाइंटमेंट लेटर का न मिलना बड़ी खबर नहीं है, कैसे नहीं है, नेताओं के बकवास बयानों से कहीं ज्यादा बड़ी खबर है.



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