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चुनावों में बेरोजगारी का मुद्दा कहां उठ रहा है?

किसी भी राज्य के चयन आयोग में कोई सुधार नहीं हुआ है. इन नौजवानों की परवाह किसी को नहीं है, यह अलग बात है कि इन्हें भी अपनी परवाह नहीं है.

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चुनावों में बेरोजगारी का मुद्दा कहां उठ रहा है?

प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर

नौकरी की समस्या गंभीर होती जा रही है. भले ही बेरोज़गारी के बाद भी किसी के चुनाव जीतने या हारने पर असर न पड़े. मैं आपको अपना अनुभव बताता हूं. हर दिन नौजवान नौकरी को लेकर मैसेज करते हैं. उनके लिए कोई दूसरी प्राथमिकता नहीं है. किसी का इम्तहान हो चुका है रिज़ल्ट नहीं आ रहा. किसी का रिज़ल्ट आ गया है मगर चिट्ठी नहीं आ रही है. ठीक यही लाइन मैं प्राइम टाइम में अपनी नौकरी सीरीज़ के दौरान पचासों बार बोल चुका हूं. किसी भी राज्य के चयन आयोग में कोई सुधार नहीं हुआ है. इन नौजवानों की परवाह किसी को नहीं है, यह अलग बात है कि इन्हें भी अपनी परवाह नहीं है. इसके बाद भी मैंने देखा है कि ये अपनी नौकरी के लिए बाद में काफी संघर्ष करते हैं मगर चयन आयोग इतने निष्ठूर हो चुके हैं उन्हें फर्क नहीं पड़ता. नेताओं को लगता है कि पुलिस की लाठी से पिटवा कर बेरोज़गारों का गुस्सा शांत कर लेंगे लेकिन उससे भी हो नहीं रहा है. बेरोज़गारी को लेकर कुछ ज्यादा गंभीर होने की ज़रूरत है. यूथ को सेल्फी चाहिए ऐसी समझ राजनेता की हो सकती है मगर यूथ को पता है कि उसे नौकरी चाहिए. अलवर में जो घटना हुई है, अगर उस घटना से भी नौकरी के सवाल पर होने वाली बहस ईमानदारी से नहीं होगी, तो फिर कब होगी.

22 नवंबर का राजस्थान पत्रिका, पहले पन्ने की यह बैनर हेडलाइन डरा देने वाली है. नौकरी लगेगी नहीं जी कर क्या करेंगे, कह ट्रेन के आगे कूदे 4 दोस्त, 3 की मौत. इस खबर को देखने के बाद कुछ और सोच नहीं पाया. न्यूज़ चैनलों की प्राथमिकता से अब ऐसी खबरें गायब हो चुकी हैं. हिन्दू मुस्लिम डिबेट के अलावा टाइम नहीं है. सारा टाइम इस टाइप के फर्जी डिबेट में जा रहा है. सोचिए चार दोस्त मिलकर ट्रेन के आगे कूद जाएं कि नौकरी नहीं मिलेगी तो जी कर क्या करेंगे, अगर तब भी हम बेरोज़गारी के सवाल को कांग्रेस बीजेपी के खांचे में देखते रहेंगे तो यह उन नौजवानों के साथ इंसाफ नहीं होगा जो नौकरी की आस में अपनी ज़िंदगी तमाम कर रहे हैं. अखबार ने लिखा है कि घटना के चश्मदीद एक अन्य दोस्त के मुताबिक आत्महत्या से पहले चारों दोस्तों ने कहा था कि नौकरी लगेगी नहीं तो जी कर क्या करेंगे. 24 साल के मनोज मीणा, 22 साल के सत्यनारायण मीणा, एक की उम्र तो 17 साल ही है. 22 साल के अभिषेक मीणा अलवर में रहकर पढ़ाई कर रहे थे. यह ख़बर सामान्य नहीं है. सत्यनारायण ने दोस्तों से पूछा कि यार अब तो जीने से तंग आ गए हैं. हम सब तो मरेंगे, तू भी मरना चाहता है क्या. राहुल ने कहा कि मैं क्यों मरूं. मेरे घरवाले क्या करेंगे. सत्यनारायण बोला कि देख नौकरी लगेगी नहीं और खेतों में काम हमसे होगा नहीं तो जीकर क्या करेंगे. दूसरों को तकलीफ ही देंगे. और इस तरह 4 दोस्त आती हुई ट्रेन के नीचे चले गए. 3 की मौत घटना स्थल पर ही हो गई.


हमारे सहयोगी मुदित ने राहुल मीणा से बात की जो उस वक्त घटना स्थल पर मौजूद था. पुलिस की जांच से यह बात सामने आई है कि चारों दोस्त ज़िंदगी से ऊब गए हैं क्योंकि नौकरी नहीं लग रही थी. अच्छा होता ज़िंदगी जीते और संघर्ष करते. लेकिन जो संघर्ष कर रहे हैं क्या हमारी व्यवस्था उन्हें जीने दे रही है. आप किसी भी राज्य के चयन आयोगों से संबंधित खबरों को निकाल कर देखिए. खुद जांच लीजिए. बहाली की परीक्षाएं चोरी, पैरवी, दलाली की खबरों से भरी हुई हैं. बेरोज़गारी निराशा पैदा करती है. पर क्या जहां चुनाव हो रहे हैं वहां नौकरी का सवाल बड़ा सवाल है. समाज भी ईमानदार नहीं है इस सवाल पर. नेता तो ईमानदार होता भी नहीं है. भारत में छात्रों का आत्महत्या कर लेना सामान्य बात हो गई है. आज के बिजनेस स्टैंडर्ड में छपा है कि किस तरह मध्य प्रदेश के चुनावों में रोज़गार बड़ा मुद्दा हो गया है.

मध्य प्रदेश में 2015 में 579 नौजवानों ने बेरोज़गारी के कारण आत्महत्या की थी. यह देश में सबसे अधिक था. तमिलनाडु, महाराष्ट्र और गुजरात से भी अधिक.

बीच में नौकरी को लेकर बहस शुरू हुई थी, आज तक सरकार कोई नई मान्य व्यवस्था नहीं बना पाई. दरअसल ऐसी व्यवस्था का ना होना ही बेहतर है क्योंकि आप जान ही नहीं पाएंगे कि कितनों को रोज़गार मिला कितनों को नहीं मिला. तो एक नया सिस्टम आया EPFO के आंकड़े का. पहले इसका डेटा जारी हुआ और जश्न मना कि नौकरियां मिलने लगी हैं. यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी जुलाई महीने में लोकसभा में इस आंकड़े पर दम भर आए और कह दिया कि सितंबर 2017 से मई 2018 के बीच 45 लाख नए पंजीकरण हुए हैं. यानी नौकरियां मिली हैं. बाद में यह आंकड़ा सुधरते सुधरते इतना कम हो गया है कि उसके बारे में प्रधानमंत्री अब ट्वीट भी नहीं करते और न ही अपने भाषणों में ज़िक्र करते हैं.

21 नवंबर के इंडियन एक्सप्रेस में खबर छपी है, खबर की हेडिंग ही यही है कि EPFO के आंकड़े का इस्तमाल रोज़गार के प्रोक्सी यानी एक तरह से फर्जी तरीके से न करें. बताइये. जुलाई में लोकसभा में सदन में प्रधानमंत्री जिस आंकड़े को बोल आते हैं और जब उसमें संशोधन होता है तो सरकार कुछ बोलती ही नहीं है.

कर्मचारी भविष्यनिधि फंड संगठन EPFO के आंकड़ों में संशोधन के बाद काफी कमी आई है. पहले बताया कि सितंबर 2017 से मार्च 2018 के बीच 39.35 लाख नया पंजीकरण हुआ. संशोधन के बाद यह घट कर 29.77 लाख पर आ गया है. यानी 24.4 प्रतिशत कम हो गया है.

मध्य प्रदेश में 28 तारीख को चुनाव हो रहे हैं. बैटल ग्राउंड के तहत थोड़ा राज्य की स्थिति का जायज़ा लेते हैं. राज्य में 28 तारीख को मतदान होने वाला है. मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान चौथी बार मुख्यमंत्री बनने के लिए दावेदारी कर रहे हैं. राज्य में 230 विधानसभा सीटों के लिए चुनाव हो रहे हैं. 2013 में बीजेपी को 165 सीटें मिली थीं. 72 फीसदी आबादी मध्य प्रदेश के गांवों में रहती है. 28 फीसदी आबादी शहरी मानी जाती है. यही नहीं धार्मिक विविधता भी बहुत कम है. 91 फीसदी आबादी हिन्दू मानी जाती है. 7 फीसदी मुसलमान हैं और 0.3 प्रतिशत ईसाई. 20 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति के हैं और 15 फीसदी अनुसूचित जाति के हैं. 56 फीसदी आबादी ग़ैर अनुसूचित जनजाति और अनुसूचित जाति की मानी जाती है.

मध्य प्रदेश में 2011 की जनगणना के हिसाब से कुल 1 करोड़ 54 लाख के करीब अनुसूचित जनजातियां हैं. वैसे मध्य प्रदेश के जनजातीय कल्याण विभाग की वेबसाइट के अनुसार 46 प्रकार की अनुसूचित जनजातियां हैं. इसमें भील और गोंड जनजाति की संख्या सबसे अधिक है. इनके बाद वैगा, कोल और सहरिया आते हैं.

गोंड जनजाति में कांग्रेस का आधार ज़्यादा माना जाता है. 2014 के एक्ज़िट पोल सैम्पल साइज़ के अनुसार 60 प्रतिशत गोंड कांग्रेस में पक्ष में थे लेकिन 37 फीसदी बीजेपी के. भील जनजाति 58 प्रतिशत बीजेपी के पक्ष में और 34 प्रतिशत कांग्रसे के पक्ष में.

अब चुनाव काफी आगे निकल चुका है. फिर भी बसपा के अकेले लड़ने के फैसले पर नज़र है. अगर 2013 के विधानसभा के नतीजों को मिलाकर देखिए तो कांग्रेस और बसपा मिलकर चुनाव लड़ती तो दोनों के पास 103 सीटें होती. तब कांग्रेस को 58 सीटें आई थीं और बसपा को 4. अगर यह गठबंधन होता तो कांग्रेस और बीजेपी को 41 सीटों का लाभ हो सकता था. खासकर अनुसूचित जाति के प्रभाव वाले इलाके में. क्योंकि मध्य प्रदेश में 20 साल से बसपा को 6 से 9 प्रतिशत के बीच मिलता ही रहा है. 2008 में सबसे अधिक 9 प्रतिशत मिला था लेकिन 2013 में 6 प्रतिशत मिला था.

बीजेपी ने 39 प्रतिशत टिकट ओबीसी को और 24 प्रतिशत टिकट ठाकुर को, 23 प्रतिशत ब्राह्मण को दिया है. कांग्रेस ने भी ओबीसी को 40 प्रतिशत टिकट दिया है, 27 प्रतिशत ठाकुर और 23 प्रतिशत ब्राह्मण को दिया है. ये जानकारी हमने हिन्दुस्तान टाइम्स में छपी एक रिपोर्ट से ली है.

2003-2013 के बीच अनुसूचित जाति के इलाके में कांग्रेस ने 6 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हासिल की है. बीजेपी ने इसी दौरान 1 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हासिल की है. और बसपा ने सिर्फ 1 प्रतिशत बढ़त हासिल की है. जबकि अन्य छोटे दल, निर्दलीय उम्मीदवरों के पास 8 प्रतिशत वोट गया है. डॉ. प्रणॉय राय, दोराब सोपारीवाला और शेखर गुप्ता की टीम ने मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री शिवराज सिंह चौहान से बात की.

मध्य प्रदेश एक ग्रामीण राज्य है. यहां किसानों का मुद्दा काफी गरम रहा है. जिसके चलते शिवराज सिंह चौहान को फसलों की खरीद से संबंधित भावांतर योजना लानी पड़ी. बीजेपी के घोषणा पत्र से ही पता चलता है कि इस योजना का लाभ छोटे किसानों को नहीं मिला इसलिए उनके लिए अलग व्यवस्था करने की बात कही गई है. कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में किसानों पर दायर मुकदमे को वापस लेने की बात कही है. आइये दोनों के घोषणा पत्र से कुछ बातों को जल्दी से देख लेते हैं. बीजेपी ने दावा किया है कि किसानों को गेहूं के लिए 200 रुपया प्रति क्विंटल बोनस देंगे. जो दुनिया में कभी भी बिना मांगे नहीं दिया गया है. 5,900 करोड़ की राशि 33 लाख किसानों के खाते में जमा कर दी गई है.

कृषि विभाग में कार्यारत कर्मचारियों और वैज्ञानिक कर्मचारियों की संख्या को दोगुना करेंगे. अनुसूचित फसलों के तहत आने वाली अधिकतम कृषि भूमि को प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत लाने के लिए किसानों को प्रोत्साहित किया जाएगा. निजी उद्योगों द्वारा खरीद प्रतिबद्धताओं और सार्वजनिक उपार्जन के माध्यम से विक्रेय दलहन की 100 फीसदी खरीद सुनिश्चित करेंगे. 5 साल में 100 नए पशु चिकित्सालय की स्थापना की जाएगी. 5 साल में पशुओं के लिए पोलि क्लिनिक्स की संख्या 3 गुनी करेंगे. मौसम विभाग निगम की स्थापना की जाएगी. मिट्टी की जांच के लिए 1000 नए केंद्र की स्थापना करेंगे और तकनीकि कर्मचारियों की संख्या को सुनिश्चित करेंगे.

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कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में लिखा है कि सभी प्रकार के बैंकों से लिए गए 2 लाख तक का कर्ज़ माफ किया जाएगा. किसानों को शून्य ब्याज़ योजना का वास्तविक लाभ देने के लिए भुगतान की नई तिथि रबी फसल के लिए 31 मई तक खरीफ फसल के लिए 31 दिसंबर तक रखेंगे. प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना को लेकर कांग्रेस ने कई प्रकार के बदलाव पेश किए हैं.

नवीन फसल बीमा योजना लाएंगे जिसमें फसल बीमा की इकाई खेत रहेगा, जो किसान स्वेच्छा से इससे अलग रहना चाहते हैं उन्हें अनुमति रहेगी. बीमा कंपियों द्वारा किसानों को बीमा पॉलिसी एवं प्रीमियम राशि की रसीद देना सुनिश्चित किया जाएगा. नई फसल आने के पूर्व फसल क्लेम का वितरण कराएंगे. ग्राम सभा की अनुशंसा पर फसल बीमा का लाभ किसानों को देंगे. फसल बीमा से वंचित किसानों की फसल नुकसानी पर मुआवज़ा हेतु भू राजस्व परिपत्र 6-4 में संशोधन करेंगे. बिना कर्ज लिए खेती करने वाले किसानों को भी फसल बीमा से जोड़ेंगे. मंडियों में समर्थन मूल्य से नीचे फसल नहीं बिकने देंगे. किसानों को गेहूं, धान, ज्वार, बाजरा, मक्का, सोयाबीन, सरसो, कपास, अरहर, मूंग, चना, मसूर, उडद, लहसुन, प्याज़ टमाटर तथा गन्ने पर बोनस देगी. इंदिरा किसान योजना के तहत 10 हार्स पावर के इस्तमाल तक आधी दर पर बिजली प्रदान करेंगे. किसानों को उपज का नगद भुगतान तीन दिन के भीतर करेंगे.'



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