प्रवासी बिहारियों में अपने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के प्रति इतनी नाराज़गी क्यों है?

अधिकांश या सभी श्रमिक जो फंसे हैं या जो लौट कर घर आ गए हैं उनकी नीतीश कुमार के प्रति नाराज़गी का एक और केवल एक आधार होता है कि उन्होंने नियम क़ानून की आड़ में हमारी सुध नहीं ली और हमें अपने हाल पर छोड़ दिया.

प्रवासी बिहारियों में अपने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के प्रति इतनी नाराज़गी क्यों है?

वो चाहे देश के किसी भी भागे में रहने वाले प्रवासी बिहारी हों वो परेशान हैं, ये किसी से छिपा नहीं. परेशानी के कारण कई हैं. लेकिन अगर आप इन लोगों से बात करेंगे तो इनके अंदर अपने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के प्रति बहुत नाराज़गी दिखती है. ये इस ग़ुस्से में दूसरे राज्य के मुख्यमंत्रियों की तारीफ़ करने के अलावा उनसे तुलना करते हैं. अधिकांश या सभी श्रमिक जो फंसे हैं या जो लौट कर घर आ गए हैं उनकी नीतीश कुमार के प्रति नाराज़गी का एक और केवल एक आधार होता है कि उन्होंने नियम क़ानून की आड़ में हमारी सुध नहीं ली और हमें अपने हाल पर छोड़ दिया.

ये कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि हर विपदा में प्रभावित लोगों की सेवा में कोई कसर नहीं छोड़ने वाले नीतीश कुमार के प्रति शुरू में आम लोगों की धारणा यही थी कि इस बार भी नीतीश कोरोना के बहाने कुछ नई स्कीम और आपदा राहत केंद्रों को चलाने के अपने पुराने तजुर्बे के बल पर चुनावी साल के मद्देनज़र कोई गलती किए बिना लोगों के बीच अपनी एक कुशल प्रशासक की छवि और मज़बूत करने में में कामयाब होंगे. ऐसा मानने वालों में उनके राजनीतिक विरोधी भी शामिल हैं. लॉकडाउन के कुछ दिन बाद नीतीश कुमार ने प्रवासी बिहारियों के खाते में एक एक हज़ार रुपए ट्रांसफर शुरू किया जो अब तक सरकारी आंकड़ों के अनुसार 19 लाख लोगों के खाते में जा चुका है, तो लगा भी कि उन्होंने बीमारी को अपने लिए एक मौक़े के रूप में इस्तेमाल शुरू कर दिया हैं.

उसके अलावा राज्य में हर राशन कार्ड होल्डर के खाते में एक हज़ार रुपये का भी ट्रांसफर हुआ जिससे क़रीब एक करोड़ सतर लाख से अधिक लोगों के खाते में क़रीब 1800 करोड़ रुपये गये. इसके अलावा किसी भी विपदा में लोगों के लिए सामाजिक सुरक्षा कितनी आवश्यक होती है, नीतीश कुमार ने हर तरह के पेन्शन धारक को तीन महीने का अग्रिम भुगतान भी किया, ख़ासकर छात्रों को उनका पूरा स्कॉलरश‍िप से लेकर साइकल, पोशाक का भुगतान होने से बिहार में ग्रामीण इलाक़ों में काम ढप होने के बावजूद लोगों में उतना भय का वातावरण नहीं था क्योंकि खाते में पैसे आ गए थे. साथ ही साथ केंद्र सरकार ने भी किसानों को 2 हज़ार रुपये और जन धन खाता वालों को 500 रुपये का भुगतान किया. पहला लॉकडाउन जब ख़त्म होने वाला ही था तो नीतीश कुमार को इस बात का भी अंदाज़ा हो गया कि अगर ग्रामीण क्षेत्रों में निर्माण कार्य को शुरू नहीं किया तो लोग अपने पेट भरने की मजबूरी के साथ लॉकडाउन का पालन नहीं करेंगे. इसलिए मध्य अप्रैल के बाद से बिहार में मनरेगा के काम हों या बाढ़ से बचाव के लिए तटबंधों का निर्माण, या फिर बड़े-बड़े पुलों पर काम, सब शुरू हो गया जिससे मज़दूरों को खाने के लाले ना पड़े. ग्रामीण इलाके में लोग इस बात को लेकर भी खुश थे कि प्रवासी बिहारी बहुत बड़ी संख्या में लौट कर नहीं आए हैं इसलिए बहुत ज़्यादा कोरोना के संक्रमण का डर नहीं है. इस समय तक बिहार में जो भी कोरोना पॉज़िटिव रहे थे उनकी जड़ में या तो बिज़नेस से आए वो मज़दूर थे या दिल्ली में हुए तबलीगी जमात से संबंधित कई लोग.

नीतीश से नाराज़गी ग़ुस्से में कैसे बदली?

नीतीश कुमार से नाराज़गी प्रवासी मज़दूरों को उस समय हुई जब मार्च के तीसरे हफ़्ते में मुख्य NCP नेता शरद पवार के आग्रह पर रेल मंत्रालय ने महाराष्ट्र के कई शहरों से प्रवासी मज़दूरों के वापस जाने के लिए कुछ विशेष ट्रेनें चलायी और दक्षिण के कुछ राज्यों से भी ऐसी ट्रेनें चलीं. लेकिन नीतीश कुमार ने रेल मंत्री पीयूष गोयल से बात कर तत्काल इन ट्रेनों के परिचालन पर रोक लगा दी जिसको उन्होंने सार्वजनिक रूप से स्वीकार भी किया. इसके अलावा उन्होंने कभी भी फंसे हुए प्रवासी मज़दूरों के लिए न तो दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ना ही महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे या किसी अन्य मुख्यमंत्री से बात करने की आवश्यकता समझी. इन श्रमिकों से अभी भी अगर आप बात करेंगे तो यही लगता है कि अगर उनकी मुश्किलें बढ़ीं तो इसके पीछे नीतीश कुमार की संवादहीनता एक बड़ा कारण रही है. उन लोगों को लगा कि नीतीश उनकी सुध नहीं ले रहे हैं और येन केन प्रकारेण उनके वापसी को टालना चाहते हैं.

हालांकि नीतीश कुमार के पास हमेशा यह तर्क रहा कि लॉकडाउन का नियम था उसमें इंटर स्टेट लोगों के आवागमन पर रोक लगी हुई थी तो ऐसे में वो कैसे उन्हें वापस लाने की कोई पहल करते. लेकिन लोगों का कहना है कि ये सब नीतीश कुमार के बहाने हैं. अगर लॉकडाउन का नियम था तो BJP शासित राज्यों, ख़ासकर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कोटा में फंसे हुए उनके राज्य के छात्रों या श्रमिकों को लाने की पहल कैसे की ओर लाने में क़ामयाब भी कैसे रहे. और अगर वो उल्लंघन था तो नीतीश कुमार एक ऐसा प्रमाण दें जिस पर केंद्र सरकार ने इन राज्यों के मुख्यमंत्रियों को अपनी नाराज़गी, असहमति या इस कारण झाड़ लगायी हो. अब सब मानते हैं कि अगर मार्च महीने में नीतीश कुमार ने ट्रेनों के आवागमन पर प्रतिबंध नहीं लगाया होता तो अब जो ट्रेनों से चलकर दिल्ली, महाराष्ट्र, गुजरात से लोग आ रहे हैं, उसमें जो संक्रमित पाए गए हैं, तो ये नौबत ही नहीं आती क्योंकि मार्च महीने के अंत में 2 लाख के क़रीब प्रवासी बिहारी दिल्ली और उत्तर प्रदेश सरकारों की मदद से वापस लौटे उसमें एक भी संक्रमित नहीं था.

प्रवासी मज़दूर नीतीश कुमार से इस बात को लेकर भी चिढ़े हुए हैं कि उन्होंने एक बार भी एक ऐसा वीडियो संदेश भी उनके लिए नहीं जारी किया कि अगर वो फंसे हैं तो उनको निकालने के लिए वो क्या उपाय कर रहे हैं. जब एक बार केंद्र सरकार ने नीतीश कुमार के कहने पर नियमों में ढिलाई भी दे दी तो बसों से लाने में नीतीश कुमार ने जो असमर्थता जतायी उसने आग में घी डालने का काम किया. साथ ही साथ ट्रेनों से आने के लिए जो फ़ॉर्म का प्रारूप दिया, उसको लेकर इन प्रवासी मज़दूरों का कहना है कि यह काफ़ी जटिल था. जिन अधिकारियों को वापस लाने का ज़िम्मा दिया गया सब अपने नंबर सार्वजनिक होने पर स्विच ऑफ़ कर बैठे. जो हेल्पलाइन नंबर था उस पर या तो नंबर लगता नहीं था या लोग उठाते नहीं थे. लोगों का कहना है कि उनके धैर्य की सीमा उस समय टूट गई जब नीतीश कुमार ने यह जानते हुए कि सबके पास पैसे का अभाव है, यह कहकर टिकट की ज़िम्मेदारी लेने से इनकार कर दिया कि जब तक आप लौटकर आएंगे नहीं, क्वारेंटीन सेंटर में रहेंगे नहीं, तब तक टिकट के पैसे का भुगतान नहीं किया जाएगा. जबकि उन्हीं नीतीश कुमार ने कोटा में फंसे राज्य के बच्चों के टिकट का सारा पैसा अग्रिम में ही रेलवे को जमा कर दिया था क्योंकि वो मध्यम वर्गीय परिवारों के बच्चे हैं. तो मज़दूरों को यह लग रहा है कि नीतीश कुमार ने उनके साथ भेदभाव किया, उनको अपने हाल पर छोड़ दिया. लोग मनमाने दाम पर अपने साधन कर वापस आने पर मजबूर हुए और उसके लिए नीतीश कुमार के प्रति उनकी चिढ़ देखते बनती है. हालांकि ट्रेन से जो लोग लौटे उनके लिए प्रशासन चुस्त दुरुस्त रहा. स्टेशन पर आते के साथ खाने की थाली और पानी से उनका स्वागत करते दिखे.

मज़दूरों का कहना है कि नीतीश कुमार अन्य ने मुख्यमंत्रियों के तुलना में उनको अपने भाग्य भरोसे छोड़ दिया. मज़दूरों के ग़ुस्से में नीतीश कुमार के विरोधियों से ज़्यादा उनके सहयोगियों की आलोचना ने भी एक अहम भूमिका अदा की. जब कोटा से बच्चों को वापस लाने में नीतीश कुमार ने अपने हाथ खड़े किए तो BJP के विधायक और सांसद काफ़ी मुखर हो गये. उन्होंने अपने पार्टी के अंदर की बैठकों में खुलकर कहा कि लोग उन्हें फ़ोन कर गालियां दे रहे हैं और सरकार को बच्चों को वापस लाने के लिए पहल करनी चाहिए. इसके अलावा एक और सहयोगी लोक जनशक्ति पार्टी के अध्यक्ष चिराग पासवान हर दिन TV पर बैठकर बिहार सरकार क्या नहीं कर रही है और क्या करना चाहिए, उस पर नसीहत देते थे और ये सारे वीडियो मज़दूरों के पास इधर उधर से पहुंच रहे थे. उन्हें लगा कि नीतीश कुमार अब अपने सहयोगियों की भी बात नहीं सुनते हैं. नीतीश कुमार के बारे में उनके समर्थक भी मानते हैं कि विरोधियों से ज़्यादा उनकी छवि सहयोगियों ने ख़राब की.

हालांकि नीतीश कुमार के समर्थक मानते हैं कि ये एक जबरदस्ती धारणा बनाने की कोशिश इस पूरे करोना संकट के माध्यम से की जा रही है कि नीतीश कुमार एक कमज़ोर मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने अपने लोगों का ख्याल नहीं रखा. लेकिन जब आप उनसे पूछिए कि पिछले 2 महीने में नीतीश कुमार ही देश के एकमात्र मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने एक भी संवाददाता सम्मेलन करने की ज़रूरत नहीं समझी, ना अपने फंसे हुए लोगों के लिए कोई संदेश जारी किया. तब उनका तर्क होता है कि आप उनके हर दिन के रूटीन को देखिए कि कैसे वो मार्च महीने के पहले सप्ताह से सक्रिय हैं और कमोबेश हर दिन खुद पूरी चीजों पर नज़र रखे हुए हैं. लेकिन ये बात सबके समझ से परे है कि आख़िर नीतीश कुमार इतने संवेदनहीन कैसे हो सकते हैं कि जो अपनी पार्टी और सहयोगी पार्टी के विधायकों व सांसदों के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग लें लेकिन दिन में 30 मिनट उन्हें पत्रकारों के सवाल का जवाब देने के लिए नहीं मिला. ये शायद नीतीश कुमार की एक नई संवादहीनता मुख्यमंत्री के रूप में इस पूरे त्रासदी में उभरी है उसी के कारण आज आप बिहार में कहीं जाइए लोगों से पूछिए क्या आपके खाते में पैसा आया है? उनका कहना होता है हां 1 हज़ार रुपये आए हैं. अगर आप पूछें किसने भेजा है तो उनका जवाब होता है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भेजा है. किसने आपसे ये कहा तो उनका कहना होता है बैंक के अधिकारियों ने और स्थानीय नेताओं ने. जिससे साफ़ है कि नीतीश ने अपने माध्यम और पार्टी के तंत्र से जो पैसा लोगों के बीच बांटा उसका प्रचार भी नहीं कर पाये. और अख़बारों में   विज्ञापन देक़र आश्वस्त हो जाना कि जनता में संदेश चला गया उनकी भुल है. 

हालांकि पूरे कोरोना महामारी का सच यही है कि बीमारी कैसे रुकेगी इसका नुस्ख़ा किसी के पास नहीं लेकिन बीमारी से निबटने में जो मुख्यमंत्री सामने से सक्रिय हैं, मतलब बैठक और उसके निर्णय खुद से समझा रहे हैं उन्हें सबसे ज़्यादा प्रभावी माना जाता है. जैसे केरल के मुख्यमंत्री पिनरायी विजयन जो अपने विपक्ष के नेता के साथ संवाददाता सम्मेलन करते हैं. वैसे ही दिल्ली हो या राजस्थान या महाराष्ट्र या पंजाब या हर नियम का उल्लंघन कर अपनी एक छवि बनाने वाले उतर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ. कोरोना से निबटने के लिए संवाद तंत्र और आपका कम्यूनिकेटर होना बहुत ज़रूरी है. नीतीश में इस बार इसका अभाव दिखा.

बहुत लोगों का कहना है कि नीतीश में जो हर संकट में संवादहीनता का एक नया चरित्र पैदा हुआ है उसकी जड़ में उनका एक अति आत्म विश्वास है. लेकिन नीतीश कुमार भूल जाते हैं जिन प्रवासी मज़दूरों को सबसे ज़्यादा कष्ट झेलना पड़ रहा है वो उनके कोर वोटर रहे हैं जो अति पिछड़ा समुदाय और महादलित समूह से आते हैं जो भले ही बिहार में रहें या ना रहें लेकिन उनके परिवार, महिलाएं चुनाव के दिन सुबह से लाइन में लगकर उनके या उनके सहयोगी दलों के उम्मीदवारों को जिताने में कोई कसर नहीं छोड़ते. लेकिन राजनीति में दुर्गति उसी नेता की होती है जो अपनी गलतियों से न सीखे और नीतीश कुमार को लोकसभा चुनावों के दौरान अपनी उस गलती का ज़रूर एहसास हुआ होगा जब उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और BJP के माया मोह में ऐसे ही संवादहीनता की स्थिति पैदा कर ली थी और मीडिया से मुंह छिपाए फिरते थे. और नतीजा यह हुआ कि जब लोकसभा चुनाव के परिणाम आ गए और नीतीश कुमार ने अपने वादे के अनुसार 40 में से 39 सीटें बिहार से जितवाईं लेकिन जब केंद्रीय मंत्रिमंडल गठन का मामला आया तो नीतीश कुमार की मांग को ख़ारिज करते हुए BJP ने उन्हें 1 सीट से ज़्यादा मंत्रिमंडल में जगह नहीं दी. परिणाम यह हुआ कि नीतीश कुमार को ख़ाली ख़ाली हाथ दिल्ली से लौटना पड़ा और पटना एयरपोर्ट पर उन्हें यही याद दिलाने की ज़रूरत आ गई कि लोगों को यह भ्रम नहीं लाना चाहिए कि आख़िर किस वोटर की बदौलत ऐसी ऐतिहासिक जीत हुई है. प्रवासी मज़दूरों का यही रोना है कि उन्होंने नीतीश कुमार का हर संकट में साथ दिया लेकिन उनके संकट में नीतीश कुमार ने उन्हें एक तरह से डम्प कर दिया.

हालांकि नीतीश कुमार एक ऐसे नेता हैं जिन्हें इन सभी चीज़ों के बारे में ख़ुद से आत्ममंथन करने पर निश्चित रूप से आभास होता है इसलिए वो अब जो प्रवासी मज़दूर आ रहे हैं, ख़ासकर क्वारेंटीन कैंप में उनकी सेवा में कोई कसर नहीं छोड़ रहे. ख़ुद से हर दिन वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से उन लोगों से रूबरू हो रहे हैं और बार-बार आश्वासन देते हैं कि आप यहीं रहिए, आपका ख्याल रखा जाएगा. लेकिन साथ ही साथ जब वो समीक्षा करते रहते हैं तभी कुछ ऐसे वीडियो भी वायरल होते हैं जिसमें नीतीश कुमार मुर्दाबाद के भी नारे लग रहे होते हैं. अगर आप क्वारेंटीन कैंप में जाएंगे तो लोग नीतीश कुमार के प्रति कड़वा सच और साथ ही साथ कैंपों से संतुष्टि दिखाते हैं वहीं दूसरी ओर हर दिन कुछ ऐसे वीडियो वायरल होते हैं जिसमें नीतीश कुमार के प्रति लोगों का आक्रोश देखते ही बनता है और शायद आज के बिहार की सच्चाई यही है.

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मनीष कुमार NDTV इंडिया में एक्ज़ीक्यूटिव एडिटर हैं...

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