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नोटबंदी पर सरकार को निशाना बनाना क्यों अच्छी बात नहीं है

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निहित अर्थों वाले आलेखों से तत्काल वैचारिक अभिमत तैयार कर लेने के आज के दौर में सही बौद्धिक स्थान मिल पाना बहुत कठिन है. यह ऐसा स्थान है जहां कोई भी लेखक का नाम पढ़े बिना दृष्टिकोण से परिचित हो सकता है. घरवापसी और पुरस्कार वापसी के बाद, अब नोटवापसी का मुद्दा सामने आ गया है. पृष्ठभूमि बदल गई है लेकिन मुद्दे को गर्माने वाले अभिनेता अभी भी मंच पर जमे हुए हैं. सरकार के विमुद्रीकरण के फैसले ने वैचारिक ज्ञान देने वालों को तर्क को दांव पर लगाकर अपनी बात रखने का मौका दे दिया है. इसके चलते बिना विश्लेषण वाले आलेखों की बाढ़ आ गई है जो 'विशेषज्ञ राय' के नाम पर जनता को बरगला रहे हैं.
 
राय, पहले से ही मन में तय विचार से भी ज्यादा सशक्त होती है. बड़े-बड़े अक्षरों में उकेरी गई हेडलाइन को सोशल मीडिया पर साझा किया जा रहा है. आइए विमुद्रीकरण के मुद्दे पर हाल ही में बात को बढ़ा-चढ़ाकर के अंदाज में लिखी गईं कुछ हेडलाइन का विश्लेषण करते हैं - "नोटबंदी पर पीएम मोदी के 'मास्टर स्ट्रोक' का उल्टा असर", "विमुद्रीकरण अभियान से हमारे जीने के अधिकार का उल्लंघन क्यों" और एक हेडलाइन में तो सारी हदों को पार करते हुए लिखा गया, "नरेंद्र दामोदारदास मोदी - नाकाम". मैं सचमुच में हैरान हूं कि किसी व्यक्ति या उसकी नीतियों को तत्काल खारिज करने के लिए इतनी जल्दबाजी क्यों? हालांकि जूरी ने फैसला अभी भी नहीं दिया, लेकिन इसे पूरी तरह से 'नाकाम' बताना मामले की गंभीरता को कम करता है.   

किसी भी समकालीन राजनीतिक या आर्थिक विश्लेषक को अपनी जिंदगी में इस तरह का अनुभव देखने को नहीं मिला होगा. इसलिए सभी समीक्षाएं संभावनाओं पर आधारित हैं न कि तथ्य पर. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि किसी कदम को कितनी अच्छी तरह से उठाया गया. इस तरह के मामलों में कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है जिन्हें वास्तविक समय के आधार पर निपटाया जाता है. लेकिन परीक्षण के दौर वाले मामलों से पूरे परिदृश्य की तरह व्यवहार करना और सरकार का माखौल उड़ाना बेतुकी बात है.


टिप्पणीकारों, संपादकों और पत्रकारों को पता होना चाहिए कि "पारस्परिक संबंध, कारण संबंध को नहीं समझाता". एक साथ होने वाली दो घटनाओं में कारण और प्रभाव संबंध नहीं होता. नोटबंदी के कारण 25 लोगों की मौत वाले समाचारों में तार्किक भ्रम है. यह स्थापित तथ्य है कि नोटबंदी को हाल ही में हुई मौत के मामले में गलत ढंग से दोषी ठहराया गया. पहले से ही परेशान जनता के सामने इस तरह की खबरों को परोसना वास्तव में अपराध है. लेकिन दुराग्रहपूर्ण राय बनाने वाले से उत्तरदायित्व लेने के लिए कौन कहेगा? तथ्य यह है, ऐसे कई लोग हैं जो मीनमेख वाली समीक्षा और नज़रिये की तलाश में रहते हैं लेकिन बुद्धजीवियों के बीच निष्ठावान समर्थक भी परिस्थिति की संतुलित और सच्ची आर्थिक समीक्षा देने में असफल रहते हैं.

हालांकि सरकार का शुरुआती कदम अघोषित संपत्ति को हटाना था, तो क्या यह मानना सही होगा कि सरकार आगे कोई कदम नहीं उठाएगी? या क्या सरकार कालेधन को बढ़ावा देने वाली कमियों को दूर नहीं करेगी? क्या इस संक्रमण काल में सरकार को एक और मौका नहीं दिया जाना चाहिए ताकि वह नीतियों के साथ अपनी ढांचे को और मजबूत कर सके? जब सरकार ने बेनामी संपत्ति को अगला निशाना बनाने का संकेत दिया है तो इसे भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार की लड़ाई समझा जाना चाहिए.   

भय उत्पन्न करने वाले स्वर में, प्रताप भानु मेहता लिखते हैं, "आपको सचेत किया गया था". मेहता मध्यम वर्ग को "आम नागरिक" कहकर उसके नैतिक मूल्य को और बढ़ाचढ़ाकर पेश करते हैं. इससे ऐसा लगता है जैसे उन्हीं से सबको शिकायत हो और सरकार द्वारा उन्हीं से कानून का अनुपालन कराया जा रहा है. कालाधन सभी के लिए अभिशाप है. यह केवल सौ अत्यधिक अमीर डिफ़ॉल्टर से जुड़ा मसला नहीं है. इसके लिए समाज में सांस्कृतिक बदवाल की आवश्यकता होती है. 

इसके अलावा, मेहता समाज में होने वाली नैतिक आकाक्षांओं को इसकी वजह मानसे से इनकार कर देते हैं और इसे "शुचितावाद" की ओर किया गया एक प्रयास मानने से भी इनकार कर देते हैं. हालांकि, वह यह जरूर कहते हैं कि विमुद्रीकरण एक सार्वजनिक प्रोजेक्ट है लेकिन वह इस तथ्य को मानने से हिचकिचाते हैं कि जनता की भलाई के इरादे से चलाए गए सार्वजनिक प्रोजेक्ट के लिए लोगों की नैतिक रूप से सहभागिता की आवश्यकता होती है.

चाहे वह महात्मा गांधी का असहयोग आंदोलन हो या लाल बहादुर शास्त्री की सोमवार को व्रत रखने की अपील, ऐसे बड़े अभियानों में स्व-बलिदान की आवश्यकता होती है और जनता पूरे उत्साह से भाग लेती है. समाज की भलाई के लिए सामूहिक रूप से कष्ट उठाना गलत कहां है?

हालांकि सरकार को प्रतिदिन सामने आने वाली चुनौतियों का अहसास है. सरकार नए सच्चाईयों और तथ्यों के हिसाब से काम कर रही है. परिस्थिति का जायजा लेते हुए, इस कदम को 'गलत सोच' कहना सही नहीं है. खास करके तब जब सरकरी कर्मचारी रात-दिन काम कर रहे हैं. पहले से ही अफवाहों से परेशान जनता का इस तरह की आलोचनाओं से भला नहीं होगा. विनम्रता के साथ मेरा सुझाव है कि जब सरकार समस्याओं को स्वीकार कर रही है और अधिक से अधिक प्रतिक्रिया जुटा रही है, तो ऐसे हालात में हमें स्वस्थ आलोचना करनी चाहिए और रचनात्मक समाधान प्रस्तुत करना चाहिए. हम अपनी राजनीतिक व्यवस्था में किसी भी मुद्दे पर दलगत राजनीति से ऊपर उठने की उम्मीद नहीं करते लेकिन क्या हम समलोचकों से कुछ तार्किक दृष्टिकोण की उम्मीद नहीं कर सकते?

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(रजत सेठी बीजेपी से संबद्ध हैं. वह हार्वर्ड कैंडी स्कूल से पब्लिक पॉलिसी में स्नातक हैं और इंडियन फाउंडेशन में सीनियर रिसर्च फेलो हैं.)

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति NDTV उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार NDTV के नहीं हैं, तथा NDTV उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.



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