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बैंकरों का विरोध प्रदर्शन, आखिर क्यों बैंकर बेचें बीमा पॉलिसी?

हमारे रिश्ते इतने टूट चुके हैं कि जैसे ही कोई अपनी व्यथा कहता है हम उसे हिकारत की नज़र से देखने लगते हैं. हमें पता ही नहीं चलता कि हम जिस नज़र से किसी को देख रहे हैं, कोई हमें भी उस नज़र से देख रहा होता है.

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बैंकरों का विरोध प्रदर्शन, आखिर क्यों बैंकर बेचें बीमा पॉलिसी?

प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर

पिछले दो साल से बैंक से संबंधित ख़बरों को दिलचस्पी से पढ़ता रहा हूं. चेयरमैनों के इंटरव्यू से बातें तो बड़ी बड़ी लगती थीं लेकिन बैंक के भीतर की वे समस्याएं कभी नहीं दिखीं जो बैंकर के जीवन में बहुत बड़ी हो गई हैं. बैंक सीरीज़ के दौरान सैकड़ों बैंकरों से बात करते हुए हमारी आज की ज़िंदगी को वो भयावह तस्वीर दिखी जिसे हम जानते हैं, सहते हैं मगर भूल गए हैं कि ये दर्द है. इसे एक हद के बाद सहा नहीं जाना चाहिए. हमारे रिश्ते इतने टूट चुके हैं कि जैसे ही कोई अपनी व्यथा कहता है हम उसे हिकारत की नज़र से देखने लगते हैं. हमें पता ही नहीं चलता कि हम जिस नज़र से किसी को देख रहे हैं, कोई हमें भी उस नज़र से देख रहा होता है. बैंक सीरीज़ के दौरान बैंकरों ने अपने चेहरे और नाम को पीछे रखते हुए अपनी कहानी कही. घर से दूर, रात रात भर बैंकों में काम करना, टारगेट का तनाव, झूठ और झांसे के आधार पर बीमा पॉलिसी बेचना ताकि कोई उन आंकड़ों को अपनी कामयाबी बता सके. अगर हमारी व्यवस्थाएं वाकई संवेदनशील होतीं तो बैंक सिस्टम के भीतर की इस सड़न पर कोई कदम उठाता. कोई फैसला करता. जब भी कोई समस्या आती है, सिस्टम दूसरी समस्या का इंतज़ार करने लगता है, ताकि पहले आई समस्या को किनारे लगाया जा सके. इसी तरह आप देखेंगे कि भारत भर में लाखों लोग धरना प्रदर्शन कर लोकतांत्रिक होने का अपना फर्ज़ तो निभा देते हैं और सिस्टम सड़क से आ रही आवाज़ को नहीं सुनता है.

जो बैंकर कल तक अपना नाम और चेहरा छिपा कर बोल रहे थे. अपनी यातना के साथ किसी अंधेरे में छिपे थे, आज उसी अंधेरे के रंग का टी शर्ट पहनकर उजाले में आ गए. अब आप इन्हें देख सकते हैं, इनका नाम जान सकते हैं, इन्हें बोलते हुए सुन सकते हैं. काले टी शर्ट में जमा हुए बैंकर सिर्फ सैलरी के लिए आवाज़ नहीं लगा रहे हैं बल्कि बैंकों के भीतर तनाव का जो जाल बुना गया है उससे निकलने की कोशिश कर रहे हैं. वी बैंकर्स नया समूह है, ज़्यादातर युवा हैं. वी बैंकर्स का मानना है कि उनकी सैलरी केंद्र सरकार के कर्मचारियों के बराबर की जाए. जब चेयरमैन और कार्यकारी निदेशक को सातवें वेतन आयोग के हिसाब से वेतन मिलता है तो बैंकर को क्यों नहीं मिल रहा है. अगर ऐसा है तो इस बात में बहुत दम है. बड़े अफसर को किसी और व्यवस्था के तहत वेतन मिले और बाकियों को वेतन इतना कम मिले, इसकी व्यवस्था कर दी जाए. मुझे नहीं लगता है कि कोई भी इस तर्क को स्वीकार करेगा, कम से कम चेयरमैन और कार्यकारी निदेशको अपनी सैलरी सातवें वेतन आयोग के हिसाब से नहीं लेनी चाहिए थी क्योंकि उनके मातहत अफसरों को उस हिसाब से सैलरी नहीं मिलती है. इस समूह में सिर्फ युवा बैंकर नहीं हैं बल्कि भूतपूर्व सैनिक बैंकर भी हैं और बड़ी संख्या में ग्रामीण बैंकों में काम करने वाले भी हैं. जिनका कहना है कि 30,000 लोगों को पेंशन तक नहीं मिल रही है. जिन्हें मिलता है उन्हें महीने का 1800 ही मिलता है. यह तस्वीर दिल्ली की है मगर आज भारत के कई इलाकों में बैंकरों ने ऐसा ही प्रदर्शन किया है. 13 लाख से अधिक बैंकरों की ज़िंदगी में यातना घुस गई है. वे अपने आप को बंधुआ कहने लगे हैं. आप यह न समझें कि इसमें दिल्ली के बैंकर हैं. देश भर के कई जगहों से बैंकर अपने खर्चे से इस धरना में शामिल होने आए.

हमने एक चीज़ देखी है. आप सारे दरवाज़े बंद कर दें, आवाज़ अपने लिए दरवाज़ा खोल लेती है. जंतर मंतर पर इन बैंकरों का आना और अपनी कहानी बताना पिछले तीन हफ्ते से चेहरा छिपा कर बताई जा रही कहानी से अलग नहीं था. हमने उनके सैकड़ों पत्रों को पढ़ा है. सब में ये बात आई है कि पुरुष हों या महिला बैंकर, सब एक से एक बीमारी से पीड़ित हैं, ज़्यादातर बीमारी काम के तनाव की देन है. बीमार तो हैं मगर इलाज के लिए छुट्टी नहीं मिलती हैं. मुझे हैरानी है कि लाखों की संख्या में बैंकर इस तरह का शोषण कैसे बर्दाश्त कर रहे थे. कैसे वे अपने रीजनल मैनेजर से गाली सुन रहे थे, वे किसके लिए उस झूठ को जी रहे थे जो उनके ज़मीर पर बोझ बन रहा था.

शुरू में किसी को यह साहस नहीं था कि वे बोल सकते हैं. नहीं बोलने की संस्कृति कब लोकसंस्कृति का हिस्सा बन जाती है, हमें पता क्यों नहीं चलता है. हम नहीं कहते हैं कि सब कुछ हमारी सीरीज़ के कारण हो रहा है मगर धीरे-धीरे बैंकर अपने चेहरे को सामने लाने लगे. पहले उन्होंने बैज पहना कि हम बैंकर हैं और हमारी तनख्वाह कम है. फिर वे टोपी पहनने लगे. पहले इक्का दुक्का बैंकरों ने इसकी शुरुआत की और जैसे-जैसे समय बीतता गया अपनी मांगों की टोपी पहनकर और तख्ती लेकर बड़ी संख्या में बैंकर जमा होने लगे. मुझे दिख रहा था कि इनमें हिम्मत आ रही है. मुझे यह नहीं दिखा कि ये जंतर मंतर पहुंच जाएंगे, नहीं पहुंच पाएंगे तो अपने अपने शहरों में कैंडल मार्च करेंगे.

पत्रकारिता के दौरान हम लोगों की भयावह से भयावह तकलीफों से गुज़रे हैं मगर जो तकलीफ महिला बैंकरों की है उसे सुनने के बाद सामान्य रह पाना मुश्किल हो जाता था. मुझे अच्छी तरह याद है जब शुरू में कुछ महिला बैंकरों से पूछा था तो कोई बोलने के लिए तैयार नहीं थी. जैसे ही प्राइम टाइम में दो तीन महिलाओं की बात रखी, उनकी बातों की बाढ़ आ गई. मैंने बहुतों से बात की है. यह भी समझा है कि जहां आप नौकरी करते हैं वहां सब कुछ ठीक नहीं होता, इस बात को अलग रखते हुए जो साफ-साफ दिखा वो बताने लायक नहीं था. एक समाज के तौर पर हमने महिला बैंकरों के साथ जो होने दिया है वह शर्मनाक है. महिला बैंकरों ने जो अपने साथ होने दिया है वो उससे भी शर्मनाक है. आप ndtv.in पर जाइये, वहां बैंक सीरीज़ की पट्टी मिलेगी, उसे क्लिक करते ही सारे अंक खुल जाएंगे. आप 8 मार्च का एपिसोड देखिएगा. पता चलेगा कि दफ्तरों के नियम की आड़ में महिला बैंकरों के साथ क्या हो रहा है. रात के नौ बजे ब्रांच में बैठी हैं और घर में बच्चा बीमार है, तब भी घर जाने नहीं दिया जा रहा है. वी बैंकर्स के मांग पत्र में केंद्र सरकार के नियमों के अनुसार महिला बैंकरों को छुट्टी दिए जाने की मांग भी शामिल है.

इसलिए वी बैंकर्स के साथ नौजवान महिलाएं खूब आई थीं. वो लगातार मैसेज कर रही थीं कि किसी चैनल पर हमारे धरने की रिपोर्ट नहीं हैं. वो भूल गईं कि उन्होंने भी तो किसी चैनल पर किसी किसान की तकलीफ को नहीं देखा, किसी छात्र की तकलीफ को नहीं देखा होगा, तो उनकी तकलीफ को देखने और दिखाने वाले कैसे होते. अच्छा हुआ कि उन्हें यह बात समझ आई कि लोकतंत्र में कई बार संख्या की कोई कीमत नहीं होती है. उन्हें इस हैरानी का अनुभव होना चाहिए था कि तीन हज़ार की संख्या में जमा होने के बाद भी कोई टीवी वाला नहीं आता है. अब न्यूज़ चैनल लोगों के लिए नहीं आता है, सत्ता के लिए लोगों के पास जाता है या लोगों को ही रिजेक्ट कर देता है. मगर महिला बैंकरों के लिए अब अपनी व्यथा को दबा कर रखना असंभव होता जा रहा है.

आज एक महिला बैंकर ने लिखा है कि हमारी सीरीज़ के बाद उनके ब्रांच की जांच हुई है. सफाई और शौचालय को लेकर. हमने आपको बताया था कि महिला बैंकरों को भी जानबूझ कर ऐसे ब्रांच में भेजा जाता था जहां शौचालय ही नहीं है. अजीब है. मिडिल क्लास के लिए जो अंग्रेज़ी अखबार में विश्लेषण छपता है उसमें यही होता है कि लेबर लॉ को रिफॉर्म किया जाए. वी बैंकर्स यानी बैंकों में काम करने वाला मिडिल क्लास मांग कर रहा है कि लेबर लॉ को लागू किया जाए, काम करने के घंटे तय हों, देर रात तक रोकने पर वापसी का इंतज़ाम किया जाए और सप्ताह में 5 दिन का ही काम हो. आप अखबारों में पढ़ते होंगे कि पांच दिन बैंक बंद होंगे. ख़बर तो छप जाती है मगर यह नहीं छपती है कि उन पांच दिनों में भी बैंकर बैंक जाते हैं. बैंकर कई महीनों तक बिना छुट्टी के काम करते हैं. शनिवार को तो जाते ही हैं, रविवार को भी जाना पड़ता है. बैंकों के भीतर काम का तनाव काफी बढ़ गया है. इसके अलावा उनकी मांग है कि 'ट्रांसफर नीति में सुधार किया जाए, इसका आतंक कम किया जाए. ग़लत लोन मंज़ूर करने के लिए अनैतिक दबाव को समाप्त किया जाए. नई पेंशन नीति को समाप्त कर पुरानी पेंशन नीति लागू की जाए. कैंटीन में काम करने वाले लड़कों के लिए न्यूनतम मज़दूरी लागू हो.'

आप इन मांगों को गौर से देखिए, बैंक सिस्टम के भीतर का खोखलापन नज़र आएगा. कैंटीन ब्वाय या चपरासी अस्थाई रूप से काम करते हैं. इन्हें कहीं 100 से तो कहीं 200 रुपये मिलते हैं. कोर्ट का आदेश है कि जो भी अस्थाई है उसे वही वेतन मिलेगा जो स्थाई को मिलता है. एक चपरासी ने लिखा है कि कहीं वे कागज पर पकड़े न जाएं इसलिए उसे अलग अलग नाम से पैसे का भुगतान होता है. आप कहते हैं कि आधार नंबर लगा देने से भ्रष्टाचार मिट जाएगा. ये ठीक हो जाएगा, वो ठीक हो जाएगा.

वी बैकर्स नया संगठन है, पुराने यूनियन हैं. दोनों की मांग में अंतर है. पुराना यूनियन चाहता है कि यूनियन और इंडियन बैंक एसोसिशन से मिलकर बैंकों के हिसाब से सैलरी तय हो. वी बैंकर्स का कहना है कि हम सरकारी बैंक हैं तो हम सरकारी कर्मचारी क्यों नहीं हैं. इसलिए हमें वही सैलरी मिले जो केंद्र सरकार के कर्मचारियों को मिलती है. वी बैंकर्स का कहना है कि इस एक अंतर के अलावा उनसे अलग नहीं हैं. वी बैंकर्स की मांग बताती है कि काला टीशर्ट पहन कर भी उन मांगों को उठाया जा सकता है जिनके उठाने पर आईटी सेल आपको कम्युनिस्ट कह सकता है. आप रंग बदल लें मगर ठेके की नौकरी करने वाले हज़ारों लोग मिलते हैं जो टूट चुके हैं. उनके पास कुछ नहीं बचा है. इसलिए ये नई पेंशन नीति का विरोध कर रहे हैं. दूसरे पेशे के लोग भी कर रहे हैं. मगर कोई मिल कर नहीं लड़ रहा, सब पेंशन के सवाल पर अलग अलग लड़ रहे हैं. जंतर मंतर पर पिछले हफ्ते रेलवे यूनियन के लोग भी आए थे वे भी नई पेंशन नीति का विरोध कर रहे थे.

जंतर-मंतर पर ये नौजवान बैंकर अपने लिए नहीं, बल्कि बेरोज़गार भारत के लिए भी लड़ने आए थे. इनका कहना है कि बैंकों में काफी जगह खाली हैं. एक आदमी तीन से चार आदमी का काम कर रहा है. अगर भर्ती हो तो बड़ी संख्या में युवाओं को रोज़गार मिल सकता है. ग्रामीण बैंक से रिटायर हुए लोगों का हाल बहुत बुरा है. जो काम कर रहे हैं उनका तो है ही. रिटायर कर चुके हैं मगर पेंशन मिल रहा है 1800. कोई इनकी सुन नहीं रहा.

बुधवार के प्रदर्शन में देश भर के ग्रामीण बैंक के अफसर कर्मचारी शामिल हुए. बिहार ग्रामीण बैंक की भी अपनी भयंकर समस्याएं हैं. हमने पिछली बार दिखाया था कि कैसे आदेश आता है कि बीमार पड़ने पर ज़िले से बाहर नहीं जाना है इलाज के लिए. हमारे दिखाने के बाद आदेश की भाषा बदलती है. मगर इनकी सैलरी की भी बहुत समस्या है. पहले सब अपनी अपनी लड़ाई लड़ रहे थे मगर अब एक साथ आने लगे हैं. कई शाखाओं में स्टाफ नहीं है, एक ही स्टाफ के भरोसे काम चल रहा है. दफ्तर की सुविधाएं खराब हैं और यहां भी बीमा बेचने का दबाव है और ग़लत तरीके से लोन देने का.

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इनकी ही नहीं भूतपूर्व सैनिक बैंकरों की भी कोई नहीं सुन रहा है. जबकि वे तो कम से कम देशभक्त होंगे ही. गोदी मीडिया का एंकर उन्हें तो देशोद्रोही भी नहीं कह सकता है. आप केंद्र सरकार या राज्य सरकार के किसी भी कर्मचारी से पूछिए. नई भर्ती हो नहीं रही है और जो बचे हैं वे काम के दबाव से मारे जा रहे हैं. हम अगले महीने रेल मंत्रालय की भी भीतर से समीक्षा करेंगे जैसे बैंक सेक्टर की हुई है. अच्छा लगता है कि हमारी सीरीज़ रेलवे के ट्रैक पर काम करने वाले गैंगमैन तक पहुंचने लगी है. जब गैंगमैन आपको पत्र लिखने लगे तो समझ सकते हैं कि आप सही रास्ते पर हैं. ग्रामीण डाक सेवा वाले धीरज रखें, उनकी बात उठाई जाएगी, मगर सब अपना अपना टीवी पर देखेंगे तो सिस्टम चालाक है. गोलमाल कर जाएगा इसलिए पहले दूसरों के लिए लड़िए, फिर अपने लिए लड़िए.

ऐसा लगता है कि सिस्टम के भीतर कोई किसी की नहीं सुन रहा है. जब हमें रेलवे के ड्राईवर लिखने लगें तो समझिए कि कुछ तो है कि सिस्टम के भीतर आवाज़ दबाने की तमाम कोशिशों के बाद भी लोगों की आह बाहर आने लगी है. अभी और आएगी. हमारी इस सीरीज़ का असर लोगों के ज़मीर पर भी पड़ रहा है. एक बैंकर ने लिखा है कि दबाव डाला जाता है कि जो भी बैंक में आए, उसका मोबाइल लेकर भीम ऐप डाउनलोड करना है. बहुत लोग मोबाइल नहीं देना चाहते मगर उनसे लेकर दस बीस भीम ऐप डाउनलोड करना पड़ता है वरना डांट पड़ती है. एक ने बताया कि बैंक एसएमएस देने के लिए आपसे पैसे लेता है. सभी उपभोक्ताओं से पैसे लेता है. मगर सभी उपभोक्ताओं को यह सेवा नहीं मिलती है. बैंकर अंदर हो रही इन गड़बड़ियों को देखकर आहत हैं. हमारे पास कोई सिस्टम नहीं है जिसके आधार पर कुछ पुख्ता जानकारी मिल सके और कार्रवाई हो. आज किसी ने आदेश दिखाया, जिसमें कहा गया है कि बैंकर किसी को झूठ बोलकर या आधी जानकारी के आधार पर बीमा नहीं बेचेगा. कागज़ पर लिखा है क्योंकि पता चल गया है कि कोई कुदाल लेकर बैठ गया है, बैंकों के भीतर की गंदी मिट्टी को बाहर लाने के लिए. मोबाइल फोन पर गाली देना कम हो रहा है मगर टारगेट का दबाव कम नहीं हुआ है. जिसके चलते उन्हें वही काम करना पड़ रहा है. आज ही उदय कोटक का बयान पढ़ा है कि लोन के एनपीए में हो जाने का दूसरा जलजला लघु मध्यम उद्योगों के सेक्टर से आ रहा है. बैंक सीरीज में कई बैंकरों ने बताया कि वे मजबूर किए जा रहे हैं कि मुद्रा के तहत लोन देने के लिए. वैसे लोगों को दिया जा रहा है जो लेना भी नहीं चाहते और लेने के योग्य भी नहीं हैं. बेहतर है हम पहले सतर्क हो जाएं.


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