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EVM पर बहस क्यों है समय की बर्बादी...

इन सभी चुनाव परिणामों से एक बात साफ़ हैं कि EVM पूर्व चुनाव में लालू, नीतीश दोनों हारे और EVM आने के बाद भी नीतीश, लालू और बिहार में नरेंद्र मोदी जीते और हार का मुंह भी देखा. आप धांधली कर चुनाव नहीं जीत सकते.

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EVM पर बहस क्यों है समय की बर्बादी...

प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर

पूरे देश में इन दिनों EVM पर खुली बहस समय की बर्बादी है. इस बारे में अगर आप बिहार में होने वाले चुनाव और उसमें शामिल  होने वाले राजेनताओं एवं राजैनतिक कार्यकर्ताओं से एक बार पूछ लेंगे तब शयद आपका भी जवाब यही होगा. जबकि मैं पिछले 25 वर्षों से अधिक से चुनाव कवर कर रहा हूं. चुनाव में EVM के आने से कैसे माहौल और बूथ लूटेरा गैंग की दुकानें बंद हुई हैं, उसके लिए आपको धरातल की वास्तविकता को समझना होगा. सबसे पहले EVM पूर्व और EVM के आने के बाद का माहौल मतदान केंद्र पर कैसा होता था वो आपको समझना होगा. पहले EVM पूर्व के चुनाव...

1. 21 जनवरी 1991 : इस दिन को पूरे देश में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की जयंती के रूप में मनाया जाता है लेकिन उसी दिन तब लोकसभा के चुनाव के लिए वोट डाले गए थे. बिहार में भी वोट डाले गए थे और देश और विदेशी मीडिया के करीब 100 से अधिक पत्रकार एवं फोटोजोर्नलिस्ट बिहार के जहानाबाद और आरा लोकसभा छेत्र में बूथ कैप्चरिंग का नजारा देखने के लिए घूम रहे थे. जहानाबाद में टक्कर जनता दल यूनाइटेड के सांसद किंग महेंद्र, जो उस समय कांग्रेस के उमीदवार थे और सीपीआई के रामाश्रय यादव के बीच थी. सीपीआई उम्‍मीदवार को जनता दल का समर्थन प्राप्त था. वहीं आरा में जनता दल उम्‍मीदवार और शेरे बिहार रामलखन सिंह यादव और समाजवादी जनता पार्टी के उमीदवार और धनबाद के चर्चित सूर्यदेव सिंह के बीच था. दोनों जगहों पर अपने अपने प्रभाव के अनुसार लोगों ने अपने इलाके में जमकर बूथ कैप्चरिंग की. लेकिन एक मुकाबला उतर बिहार के मुजफ्फरपुर में भी चल रहा था जो जनता दल उम्‍मीदवार जॉर्ज फर्नांडिस और कांग्रेस उमीदवार रघुनाथ पांडे के बीच था. पांडे चुनाव हार सकते हैं ये किसी की कल्पना के बाहर था. लेकिन मुजफ्फरपुर शहर, जो कांग्रेस और पांडे का गढ़ माना जाता था, वहां तत्कालीन मंत्री बृजबिहारी प्रसाद के नेतृत्‍व में सुबह से बम फोड़ने, बैलेट पेपर लूटने समेत इतनी हिंसा हुई कि शाम तक स्‍पष्‍ट था कि फर्नांडिस की जीत तय है. हां चूंकि सरकार लालू यादव की थी इसलिए प्रशासन मौन था. लेकिन उस ज़माने में लालू यादव पिछड़ों, गरीबों के नेता और बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी की गिरफ़्तारी के बाद मुस्लिम समुदाय के हीरो थे, इसलिए चुनाव में 40 से अधिक सीटें जीतीं. कांग्रेस पार्टी को एक मात्र  बेगुसराय सीट हाथ लगी.

2. 1995 का विधानसभा चुनाव : ये चुनाव लालू यादव बनाम मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन था और आप कह सकते हैं कि शायद चुनाव आयोग अपने पूरे फॉर्म में था. उस समय के अविभाजित बिहार में अर्धसैनिक बलों की 800 से अधिक कंपनियों को चुनाव कार्य में लगाया गया लेकिन लालू यादव का जनाधार - पिछड़े, दलित और मुस्लिम - में बहुत ज्यादा बिखराव नहीं हुआ था और उनके खिलाफ वोट तीन दलों नीतीश कुमार की समता पार्टी, भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस में बिखरे थे. तब लालू यादव की जनता दल ने पहली और आखिरी बार अपने बलबूते बहुमत का आंकड़ा पार किया था. लेकिन शेषन की सक्रियता के बावजूद अर्धसैनिक बलों को कई जिलों में मतदान केंद्रों पर तैनात नहीं किया गया था. और तब के ज़माने में अधिकारियों की लालू यादव के लिए भक्ति चुनाव में उनके खिलाफ आरोपों का एक मुख्य आधार होता था. उस समय की गया की जिलाधिकारी और अब झारखंड की मुख्य सचिव राजबाला वर्मा को चुनाव आयोग ने चुनाव कार्यों से वंचित भी कर दिया था. लेकिन उस समय भी नकली बैलेट पेपर और मतपेटी की बहुत कहानियां होती थीं.

3. 1999 का लोकसभा चुनाव : ये पहला चुनाव था जब बिहार में लालू यादव के राष्ट्रीय जनता दल का मुकाबला जनता दल यूनाइटेड जिसमें तब रामविलास पासवान भी शामिल थे और बीजेपी गठबंधन से हो रहा था. इस चुनाव में सबसे रोचक मुकाबला दो क्षेत्रों में था, एक मधेपुरा और दूसरा बाढ़. जहां मधेपुरा से लालू यादव खुद चुनाव मैदान में थे, वहीं बाढ़ से वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पांचवीं बार जीत के लिए मैदान में थे. चुनाव बैलेट पेपर से ही था लेकिन अपने तमाम प्रयासों के बाद भी लालू यादव चुनाव हार गए. वहीं नीतीश कुमार, जिनके यहां मतदान के दिन जमकर बूथ कैप्चरिंग होती थी और आरोप लगे की ढाई लाख अतरिक्त बैलेट पेपर की छपायी कराई गयी. नीतीश चुनाव तो जीते लेकिन मात्र 1500 वोटों से. लेकिन ये पहला चुनाव था जब लालू यादव की पार्टी के मात्र सात सांसद पूरे बिहार में लोकसभा चुनाव जीत पाए. क्योंकि उनके विरोधी एक जुट हो रहे थे और लालू पिछड़े, गरीब के नेता से यादव, मुस्लिम और उनके विरोधियों के अनुसार धांधली के नेता होकर सिमट रहे थे.

4. 2004 का लोकसभा चुनाव : ये पहला चुनाव था जब पूरे बिहार में EVM का इस्तेमाल किया गया था. लेकिन लालू यादव ने न केवल कांग्रेस पार्टी बल्कि रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी से भी तालमेल किया. और पूरे देश में फील गुड के चक्कर में नीतीश-बीजेपी को मुंह की खानी पड़ी. लालू यादव एक बार फिर अपनी पार्टी के लिए 20 से अधिक लोकसभा सीटें जीतने में कामयाब हुए. इतना ही नहीं, सहयोगी रामविलास पासवान की पार्टी से चार संसद चुने गए और कांग्रेस के भी तीन सांसद लोकसभा पहुंचे. नीतीश कुमार और उनका एनडीए गठबंधन अति आत्मविश्वास का शिकार बन गया. ये चुनाव बाद के चुनाव में वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बिहार के प्रचार से अलग रखने का एक मुख्य कारण बना क्योंकि दोनों बीजेपी और नीतीश की पार्टी इस बात पर एक मत थी कि जो गुजरात के दंगो में हुआ उसका खामियाजा उन्हें उठाना पड़ा.

5. नवंबर 2005 का बिहार विधानसभा चुनाव : इस बार के विधानसभा चुनाव में कुछ बातें ऐसी हुईं जो अबतक नहीं हुई थीं. लालू यादव अपने गठबंधन को एक नहीं रख पाए. रामविलास पासवान इस बार लालू यादव से अलग ही नहीं लड़ रहे थे बल्कि उनके निशाने पर बीजेपी-नीतीश से ज्यादा लालू-राबड़ी होते थे. और नीतीश को बीजेपी ने आखिरकार मुख्यमंत्री पद का चेहरा मान लिया था जिससे जनता के पास राबड़ी देवी का एक विकल्प था. चेहरे का कोई मुकाबला ही नहीं था, लेकिन इस चुनाव में जो बात सबसे अलग थी वो चुनाव आयोग की भूमिका. चुनाव आयोग ने अपने मंझे हुए अधिकारी केजे राव को विशेष ऑब्जर्वर बनाकर भेजा. उन्होंने अधिकरियों में ऐसा खौफ पैदा किया कि लालू यादव के लिए चुनाव, खासकर मतदान के दिन आंख मूंद लेने वाले अधिकारियों की ऐसी क्लास लगायी कि बिहार में सत्ता परिवर्तन हो गया. ये बात सच है कि पुलिस और प्रशासन का एक वर्ग लालू यादव के लिए खुलकर काम करता था और उनकी इस भक्ति के पीछे की वजह लालू यादव का उनके ऊपर होना होता था. और ऐसे अधिकारियों को विश्वास हो गया था कि लालू यादव का कभी राजनैतिक अस्त नहीं होगा, कम से कम बिहार की सत्ता उनके हाथों में ही होगी.  

अब तक बिहार के चुनाव में जीत का फार्मूला स्‍पष्‍ट हो गया था कि अगर आप अपनी राजनीती में नए दल या जातियों को जोड़ते रहे तब आपको कोई हारा नहीं सकता. और जब 2005 से 2009 के बीच नीतीश कुमार ने अति पिछड़ों और महादलितों के साथ-साथ परंपरागत अगड़ी जातियों और गैर यादव पिछड़ों का एक बड़ा वोट बैंक बनाया जिसे पराजित करना लालू यादव के हाथ में नहीं रहा, भले ही रामविलास पासवान उनके साथ एक बार फिर आ गए हों.

6. 2014 लोकसभा चुनाव : ये चुनाव पूरे देश में नरेंद्र मोदी के नाम पर लड़ा जा रहा था लेकिन बीजेपी को शयद उतना विश्वास नहीं था, इसलिए उसने न केवल रामविलास पासवान बल्कि उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी से तालमेल किया जिसके कारण नीतीश कुमार को मात्र दो सीटें मिली और लालू यादव को चार. बीजेपी गठबंधन को 31 सीटें मिलीं. लेकिन किसी ने ये आरोप नहीं लगाया कि चुनाव में धांधली हुई. सबने जीत और हार को स्वीकार किया. साफ़ है कि अगर आपके पास एक चेहरा हो, जातीय समीकरण और लोगो में आशा जगाने वाला नारा तब सत्ता में बैठा कोई व्‍यक्ति आपको पराजित नहीं कर सकता.

7. 2015 बिहार विधानसभा चुनाव : डेढ़ साल बाद ही विधानसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में वही बीजेपी, जिसके सहयोगियों में अब पासवान और कुशवाहा के अलावा जीतन राम मांझी भी शामिल हो गए थे, नीतीश-लालू-कांग्रेस के सामने चारों खाने चित हो गई. उसका एक बड़ा कारण था नीतीश का चेहरा तो था ही जिन्हें बिहार की जनता अभी भी मुख्यमंत्री पद पर देखना चाहती थी. साथ ही अति पिछड़े समुदाय के मतदाताओं का बड़ा तबका, जिसने लोकसभा चुनाव में मोदी के नाम पर बीजेपी को वोट दिया था, वह नितीश के नाम पर महागठबंधन के साथ फिर आ गया. बीजेपी ने नीतीश के खिलाफ कोई चेहरा नहीं दिया और लालू और नीतीश अपनी सारी कड़वाहट को भुला कर एक साथ आ गए.

इन सभी चुनाव परिणामों से एक बात साफ़ हैं कि EVM पूर्व चुनाव में लालू, नीतीश दोनों हारे और EVM आने के बाद भी नीतीश, लालू और बिहार में नरेंद्र मोदी जीते और हार का मुंह भी देखा. आप धांधली कर चुनाव नहीं जीत सकते. EVM आने के बाद लूट की संभावना ख़त्म हो गयी है. चुनाव की जीत का, चाहे वो बिहार हो या अन्य राज्य, एक ही फॉर्मूला है, अपने विरोधियों को विभाजित रखिये. अगर वो एक जुट हो गए तब उनके सामने एक ऐसा चेहरा दीजिये या ऐसा जातियों का समीकरण बनाइए कि वे सब पर बीस पड़े. चुनाव आयोग की भी भूमिका है लेकिन वो अपनी भूमिका विश्‍वास कीजिये, इस देश में ठीक से निभा रही है. और अगर लोगों का समय बर्बाद करना चाहते हैं तब समाजवादी नेता, राजनारायण जिन्होंने इंदिरा गांधी को रायबरेली से हराया था, उनकी लाइन याद कीजिये कि हारो तब कभी मानो मत. और चुनाव से जुड़े हर बिंदु पर नुक्ताचीनी और बहस का दौर जारी रखिये.

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मनीष कुमार NDTV इंडिया में एक्ज़ीक्यूटिव एडिटर हैं...

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति NDTV उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार NDTV के नहीं हैं, तथा NDTV उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.


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