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बच्ची से दरिंदगी करने वालों का बचाव क्यों?

बलात्कार के मामले में पुलिस जब आरोप पत्र दायर करने पहुंची तो थाने को जिस तरह घेरा गया और जय श्री राम के नारे लगे, यह सुन लेंगे तो आप कभी राम से नज़र नहीं मिला पाएंगे.

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बच्ची से दरिंदगी करने वालों का बचाव क्यों?

कठुआ रेप मामले के विरोध में प्रदर्शन करते लोग (फाइल फोटो)

हम कहां जा रहे हैं, यह जानने से पहले हम कहां आ पहुंचे हैं, ज़रा रुक कर देख लेना चाहिए. जम्मू के कठुआ में बलात्कार के मामले में हमारे समाज ने अपना नक़ाब ख़ुद ही उतार दिया है. हम बेटियों की परवाह करते हैं यह ढोंग भी अपने आप सामने आ गया है. कठुआ में आठ साल की बच्ची के साथ बलात्कार के बारे में ही सुन लेंगे तो आपको यकीन हो जाएगा कि आप एक मरे हुए समय में जीने का भरम पाल रहे हैं. यही नहीं बलात्कार के मामले में पुलिस जब आरोप पत्र दायर करने पहुंची तो थाने को जिस तरह घेरा गया और जय श्री राम के नारे लगे, यह सुन लेंगे तो आप कभी राम से नज़र नहीं मिला पाएंगे. संयोग ही हो सकता है कि यूपी के उन्नाव में बलात्कार के आरोपी विधायक कुलदीप सिंह सेंगर ने भी कहा था कि आरोप तो प्रभु श्री राम पर भी लगा था. जो लोग जय श्री राम के नारे लगाते हैं, मंदिरों में नहीं, रैलियों में वही बता सकते हैं कि अब जय श्री राम के नारे और कहां कहां लगने बाक़ी हैं. अफसोस कि राम के नाम पर जमा हो जाने वाले तथाकथित धर्मगुरुओं ने भी इस पर आपत्ति नहीं की है. किसी को क्यों लगता है कि जय श्री राम का नाम लेने से या नारे लगा देने से वह कानून से ऊपर हो जाएगा. क्या कानून के सिस्टम को ध्वस्त करने के लिए जय श्री राम का इस्तमाल हो रहा है तो फिर इसमें वो राम राज्य कहां है जिसमें सभी के साथ इंसाफ का सपना दिखाया जाता है. कई महीनों से कह रहा हूं कि आपके भारत में हर जगह एक भीड़ स्टैंड बाई पर खड़ी है. उसे सिर्फ इशारा मिलने की देर है, वो कुछ भी कर सकती है. अगर आप इस भीड़ को लेकर अब भी सतर्क नहीं होंगे तो एक दिन यह भीड़ आपको भी खींच ले जाएगी. या तो मार देने के लिए या फिर आपसे किसी की हत्या कराने के लिए.

8 साल की लड़की का मंदिर के देवस्थान में तीन बार बलात्कार किया गया है. उसके बाद अपराधी ने पूजा पाठ भी किया. एक बलात्कारी को मेरठ से बुलाया गया. लड़की को बेहोश होने की दवा देकर रखा गया, उसके बाद बलात्कार होता रहा और फिर गला घोंट दिया गया है. वो मर गई लेकिन ज़िंदा रहने की कोई संभावना न बचे इसलिए उसके सर को पत्थर पर दो बार मारा गया ताकि वो मर जाए. वो मर गई. सुना आपने कि वो मर गई. आपने ठीक से सुन तो लिया न कि वो मर गई. आपका सुनना बहुत ज़रूरी है कि बेहोशी की दवा देने, बलात्कार करने के बाद गला घोंट देने और पत्थर पर सर दे मारने के बाद मर गई. तब एक पुलिस वाला कहता है कि अभी रुको, वो एक और बार बलात्कार करना चाहता है. जम्मू के कठुआ में बक्करवाला मुस्लिमों के समूह को हटाने के लिए ये सब किया गया. चार्जशीट में ये सब लिखा है.

10 जनवरी को यह लड़की कठुआ के हीरानगर से अगवा कर ली जाती है. 17 जनवरी को जंगल में उसकी लाश मिलती है. 11 अप्रैल को यह कहानी आपके सामने इसलिए है क्योंकि 10 अप्रैल को जम्मू कश्मीर पुलिस इस मामले में 11 पन्नों की चार्जशीट फाइल करने पहुंची तो उसे घेरने के लिए शहर का एक तबका आ गया. वही भीड़ जो आपके आस पास स्टैंड बाई पर तैयार खड़ी रहती है. इस केस को रफा दफा करने के लिए उस पुलिसकर्मी को डेढ़ लाख की रिश्वत दी गई जिसे पता था कि लड़की कहां रखी गई थी. कठुआ में माहौल को सांप्रदायिक बना दिया गया ताकि हिन्दू मुस्लिम डिबेट चालू हो जाए और एक आठ साल की लड़की के साथ जो हुआ वो बहस से ग़ायब हो जाए. बलात्कारी के समर्थन में एक हिन्दू एकता मंच बन गया. इंडियन एक्सप्रेस के मुजामिल जमील ने लिखा है कि इस मंच को महबूबा मुफ्ती के दो मंत्रियों और बीजेपी विधायक लाल सिंह और चंदर प्रकाश गंगा का समर्थन मिल रहा था.

राजनीति अपना रास्ता खोज लेती है. मगर राजनीति जब कमज़ोर हो जाती है तो 8 साल की बच्ची को मोहरा बनाती है. अब उसके पास हिन्दू मुस्लिम के अलावा आपके सामने आने के लिए कोई रास्ता नहीं बचा है. या तो आप मुस्लिम बनिए या फिर हिन्दू बनिए तब वह आपके बीच आएगी. आठ साल की उस बच्ची के साथ कोई नागरिक खड़ा है या नहीं आप बता सकते हैं. जब पुलिस चार्जशीट दायर करने चली तो उसे घेरना रोकना किस तर्क से जायज़ था. क्या यह ज़रूरी था कि जम्मू पुलिस जब चालान फाइल करने पहुंची तो बहुत से लोग उसे रोकने के लिए आ गए. कई पत्रकारों ने रिपोर्ट किया है कि सोमवार यानी 9 अप्रैल को कठुआ ज़िला जेल के बाहर वकीलों ने भी प्रदर्शन किया. वहां भारत माता की जय के नारे लगे और जय श्री राम के. जम्मू कश्मीर ने हंगामा करने वाले वकीलों के ख़िलाफ़ केस दर्ज कर लिया है. क्या वकीलों को कानून का कायदा नहीं मालूम. अगर बीजेपी के नेताओं को अपनी पुलिस पर भरोसा नहीं है तो फिर उसके मंत्री महबूबा मुफ्ती की सरकार में क्या कर रहे हैं. हर किसी को पुलिस की जांच पर शक होता है, हिन्दुस्तान भर की पुलिस की विश्वसनीयता भी यही है तो भी क्या भीड़ तय करेगी कि वह क्या करे और उसके पीछे हिन्दू मुस्लिम का तर्क खड़ा किया जाएगा? क्या एक आठ साल की बच्ची की हत्या और बलात्कार के आरोपियों के पक्ष में भारत माता की जय के नारे लगेंगे?

11 पन्नों की चार्जशीट पढ़ेंगे तो आंख और आंत दोनों बाहर आ जाएगी. इस हत्या का आरोपी राजस्व विभाग से रिटायर हो चुका संजी राम है. उसने इस हत्या में अपने बेटे को भी शामिल किया और भतीजे को भी. इन दोनों की उम्र 18 साल से कम है. जुवेनाइल हैं दोनों. आठ लोग गिरफ्तार हुए हैं जिनमें स्पेशल पुलिस आफिसर दीपक खजुरिया और सुरिंदर कुमार को भी गिरफ्तार किया गया है. सहायक सब इंस्पेक्टर आनंद दत्ता और हेड कांस्टेबल तिलक राज को सबूत मिटाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है. संजी राम बक्करवाला घुमंतुओं को रसना गांव से हटाना चाहता था, इसलिए उसने आठ साल की एक बच्ची को अगवा कर हत्या की योजना बनाई. पिता संजी राम के कहने पर 7 जनवरी को उसका बेटा और दोस्त एक दवा की दुकान पर जाते हैं. बीमार चाचा की दवा की परची दिखाकर Epitril 0.5 mg के दस टेबलेट खरीद लाते हैं? उसी रोज़ संदी राम ने अपने भतीजे से कहा कि आठ साल की लड़की को अगवा कर ले जो अक्सर जंगलों में घोड़े चराने आती थी. लड़की ने भागने की कोशिश की मगर उसे दबोच लिया गया. उसका वहीं पर बलात्कार किया गया. फिर वहां से उठाकर देवस्थान यानी मंदिर में ले जाकर रखा गया. इसका ब्यौरा बताया नहीं जा रहा है पर बता रहा हूं. आप देख नहीं पा रहे हैं कि हिन्दू मुस्लिम डिबेट की राजनीति आपके बच्चों को हत्यारा बनाने के लिए तैयार कर चुकी है. हर प्राइम टाइम में ये बात कही है, आप चेक कर सकते हैं. लड़की के मां बाप ने राम से पूछा भी कि कहां है तो बोला कि रिश्तेदारों के यहां गई होगी जबकि राम ने ही उसे मंदिर में बंद कर रखा था. ये सब चार्जशीट में लिखा है. उसे बेहोश होने की दवा देकर खजुरिया और वो बच्चा जो 18 साल से कम का है, बलात्कार करता है. 11 जनवरी को 18 साल से कम वाला मेरठ गए विशाल को फोन करता है, विशाल मेरठ से जाकर उसका बलात्कार करता है. देखिए पढ़ा नहीं जा रहा है, फिर भी पढूंगा. उस लड़की को खाली पेट बेहोशी के तीन टेबलेट दिए जाते हैं और बलात्कार किया जाता है. गुस्सा होने की ज़रूरत नहीं है, गुस्सा तो वो हैं जो बलात्कार के आरोपियों के साथ खड़े हैं. ठंडे दिमाग़ से फिर भी सोचिए कि बलात्कार का ख़्याल आता कहां से है. क्यों आता है. जम्मू कश्मीर बार संघ ने बुधवार यानी 11 अप्रैल को जम्मू बंद का एलान किया है. वकील का संगठन सीबीआई जांच की मांग कर रहा है. वे सड़कों पर तिरंगा लेकर निकले हैं.

इस स्टोरी को कवर करने वाले रिपोर्टर भी हिल गए हैं. इस हत्या का डिटेल और चार्जशीट के विरोध की राजनीति ने उन्हें सन्नाटे में डाल दिया है. पत्रकार राहुल पंडिता ने फेसबुक पर लिखा है कि इस मामले की जांच करने वाले एस एस पी रमेश जाला की निष्ठा और प्रतिभा पर कोई सवाल नहीं उठा सकता है. उनका शानदार रिकॉर्ड है. कई आतंकवादी हमले भी झेले हैं. महीनों अस्पताल में भरती रहे हैं. ऐसे अफसर और उसी टीम की बनाई चार्जशीट पर इस तरह से सवाल उठाना शर्मनाक है. इसने जय श्रीराम और तिरंगा दोनों को शर्मसार किया है.

अगर आठ साल की बच्ची के साथ बलात्कार और उसकी हत्या को हिन्दू मुस्लिम राजनीति के नाम पर जायज़ ठहराने की कोशिश हो रही है, आरोपियों के साथ मज़हब के नाम पर खड़े होने की कोशिश है तो आपसे या खुद से क्या कहें. वो तो इस नरक को छोड़ कर जा चुकी है, आपको अभी इस नरक में रहना है. धर्म के नाम पर साइड लेकर नहीं बोलने से और तिरंगा लेकर चार्जशीट का विरोध करने की राजनीति से दहशत होनी चाहिए और शर्म भी आनी चाहिए. अगर आप पहाड़ों की व्यवस्था को जानते हैं, नहीं भी जानते हैं और जानना चाहते हैं कि बक्करवाला समुदाय पहाड़ों के लिए बहुत ज़रूरी है. सीधे सादे लोग होते हैं. चरवाही करते हैं और इनका कोई स्थायी ठिकाना नहीं होता है.

गुज्जर बकरवाल मुख्यतौर पर एक मुस्लिम खानाबदोश समुदाय है, इन्हें अनुसूचित जनजाति में रखा गया है. ये समुदाय मुख्य तौर पर मवेशियों को पाल कर अपना गुज़ारा करता है. लेकिन किसी एक जगह नहीं टिकता. आमतौर पर जंगलों में या उसके आसपास झोंपड़ी बनाकर छोटे छोटे टोलों में रहता है. मार्च अप्रैल में गर्मियां शुरू होने के साथ ही ये बकरवाल अपने मवेशियों जैसे गाय-भैंस, भेड़-बकरी वगैरह के साथ ऊंचे पहाड़ी इलाकों में चले जाते हैं. इस दौरान पहाड़ी इलाकों में इनके मवेशियों के लिए घास वगैरह खूब होती है. अक्टूबर के अंत तक ये लोग फिर शिवालिक की तलहटी में लौट आते हैं जहां अगले चार पांच महीने गुज़ारते हैं. गुज्जर बकरवाल समुदाय को पर्यावरण के लिहाज से काफ़ी ख़ास माना जाता है. इन लोगों को जंगल पेड़-पौधों की इतनी जानकारी होती है कि इन्हें बेयर फुट बॉटनिस्ट यानी नंगे पैर चलने वाले वनस्पति विज्ञानी तक कहा जाता है. लेकिन आज ये लोग जंगलों पर भी अपने पारंपरिक अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं. और समाज में इनके अधिकारों का हाल क्या है ये कठुआ की इस दिल दहला देने वाली कहानी से आपको समझ आ गया होगा.

अब हो सके तो अपने समाज के बारे में सोचिए. अपने बारे में सोचिए. हर तरफ भीड़ है, हर तरफ हिंसा है. कल ही बंगाल से एक तस्वीर आई. हाथों में हथियार लेकर तृणमूल समर्थक रैली में निकले थे. कोई कहीं से हथियार ले आता है, तलवार गंडासा लहराते हुए रैली निकालते हैं. रामनवमी की शोभा यात्रा तो हथियारों से ही भरी रहती है. तो आप सोचिए कि हम कहां जा रहे हैं. एक जनता के रूप में सोचेंगे तो आपको यह सवाल समझ आ जाएगा. हिंसा के हथियार आपका भला नहीं करेंगे. कहीं राम के नाम पर नेतागिरी है तो कहीं नेता ही राम से ऊपर समझने लगे हैं. यह जो भीड़ आपको दिख रही है, इससे डरिए. आपके देश में कहीं कोई सिस्टम नहीं है जो ऐसी भीड़ पर लगाम लगा ले. हर जगह लाचारी है, हावी है तो बस भीड़.

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कठुआ में हिन्दू एकता मंच आरोपियों के पक्ष में है तो यूपी में पूरी बीजेपी और योगी सरकार विधायक कुलदीप सिंह सेंगर के बचाव में नज़र आ रही है. उन्नाव की लड़की बीजेपी विधायक कुलदीप सेंगर पर हत्या के आरोप लगा रही है, आप उनके हंसते हुए बयान देखिए. इस लड़की के पिता की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई, आरोप विधायक के भाई पर लगा, हंगामा हुआ तब गिरफ्तारी हुई. अब तो सुप्रीम कोर्ट और हाइकोर्ट ने संज्ञान लिया. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी हल्ला मचने के बाद एक एसआईटी इस लड़की के गांव भेजी. लेकिन एसआईटी से पहले ही विधायक के सैकड़ों समर्थक वहां पहुंच गए, हंगामा करने लगे और विधायक को निर्दोष बताने लगे. मगर किसी किसी का ज़मीर जाग रहा है. यूपी में बीजेपी की मीडिया सेल की सदस्य दीप्ति भारद्वाज ने ट्विट किया है कि 'आदरणीय भाई अमित शाह जी, उत्तर प्रदेश को बचा लीजिए, सरकार के निर्णय शर्मसार कर रहे हैं. ये कलंक नहीं धुलेंगे. आदरणीय भाई नरेंद्र मोदीजी और आपके साथ हम सबके सपने चूर-चूर होंगे.'

बीजेपी अपने विधायक के प्रति सहानुभूति रखती है. वह नहीं चाहती कि मीडिया ट्रायल या आरोप के आधार पर गिरफ्तारी हो. क्या यही पैमाना बीजेपी खुद अपनाती है. जम्मू में जहां जांच हो रही है, चार्जशीट हो रही है वहां तो उसके मंत्री आरोपियों का बचाव कर रहे हैं. लड़की के पिता को पुलिस की हिरासत में मारा गया है. आप देखते रहिए कि इंसाफ का तराजू किस तरफ झुकता है. धर्म देखकर झुकता है या जाति देखकर झुकता है. हम भी मानते हैं कि भीड़ के दबाव में कुछ नहीं होना चाहिए लेकिन एक पिता की पुलिस की हिरासत में मौत हुई है, एफआईआर में भाई का नाम तक नहीं जोड़ा जाता है. किसके दबाव में पिता की गिरप्तारी हुई, उसकी हत्या हुई.


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