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प्रधानमंत्री के खिलाफ शिकायतों पर कार्रवाई में चुनाव आयोग की देरी क्यों?

चुनाव आयोग ने कई नेताओं के खिलाफ एक्शन लिया है, लेकिन प्रधानमंत्री के खिलाफ़ की गई शिकायतों पर कार्रवाई में देरी क्यों हो रही है?

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प्रधानमंत्री के खिलाफ शिकायतों पर कार्रवाई में चुनाव आयोग की देरी क्यों?

शांतिपूर्ण मतदान के बीच अशांतिपूर्ण मतदान आज भी मौजूद हैं. चार चरण के मतदान इस तरह बीत गए. तीन चरण के अभी बाकी हैं. चुनाव आयोग एक तरफ गिरिराज सिंह से लेकर मेनका गांधी के बयानों को लेकर चेतावनी तो जारी कर रहा है मगर प्रधानमंत्री के 9 अप्रैल के बयान पर उसकी कार्रवाई का कुछ पता नहीं चल रहा है. 20 दिन हो गए. पुलवामा और ऑपरेशन बालाकोट के नाम पर पहली बार वोट डालने जा रहे वोटरों से अपील करने वाले बयान को लेकर अब विपक्ष भी पूछने लगा है कि कार्रवाई में देरी क्यों हो रही है. जबकि यही आयोग मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को मोदी की सेना कहने पर सज़ा दे चुका है और चेतावनी भी कि सेना का चुनाव प्रचार में इस्तमाल न करें. चुनाव आयोग ने कई नेताओं के खिलाफ एक्शन लिया है, लेकिन प्रधानमंत्री के खिलाफ़ की गई शिकायतों पर कार्रवाई में देरी क्यों हो रही है? मायावती के खिलाफ 4 दिन में ऐक्शन ले लिया गया. योगी आदित्यनाथ, मेनका गांधी और नवजोत सिंह सिद्धू के खिलाफ शिकायत के 6 दिनों के भीतर कार्रवाई हो गई थी. कांग्रेस पार्टी ने आज सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है. 

25 अप्रैल 2019 को हमारे सहयोगी अरविंद गुनाशेखर और श्रीनिवासन जैन ने रिपोर्ट की थी कि प्रधानमंत्री के भाषण के ख़िलाफ जो शिकायत की गई थी वह चुनाव आयोग की वेबसाइट से गायब है. कोलकाता के महेंद्र सिंह ने 9 अप्रैल को शिकायत की थी. चुनाव आयोग ने महाराष्ट्र के मुख्य चुनाव अधिकारी से भाषण की कॉपी मांगी, लेकिन अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है. बाद में आयोग की तरफ से सफाई आई कि वेबसाइट पर तकनीकि खराबी के कारण गलत जानकारी लिखी गई है. मूल बात यह है कि 20 दिनों बाद तक आयोग का क्या स्टैंड है, किसी को पता नहीं है. आज चुनाव आयोग की प्रेस कांफ्रेंस में यह सवाल उठा. आयोग ने कहा कि 30 अप्रैल को पूरे चुनाव आयोग की बैठक होगी. इसमें सभी मुख्य चुनाव आयुक्त के साथ दो चुनाव आयुक्त होंगे. उनकी बैठक में प्रधानमंत्री, अमित शाह और राहुल गांधी के बारे में फैसला होगा.


अब यहां एक सवाल उठता है कि मेनका गांधी, योगी आदित्यनाथ, मायावती, आज़म ख़ान, नवजोत सिंह सिद्धू इन सबके बयानों के खिलाफ एक्शन लेने के लिए चुनाव आयोग के फुल कमिशन की बैठक नहीं हुई. सचिव स्तर के अधिकारियों से बात कर ही कार्रवाई का फैसला ले लिया गया. ये और बात है कि तब सुप्रीम कोर्ट ने आयोग से कड़े शब्दों में सवाल किया था. मंगलवार को ऐसे ही चुनाव आयोग के सभी आयुक्तों की बैठक होती है, लेकिन प्रधानमंत्री के बयान पर कार्रवाई के लिए सभी आयुक्तों की बैठक क्यों जरूरी है? 

सवाल यह नहीं है कि लोकप्रिय है या नहीं, सवाल तो यह है कि 9 अप्रैल के उनके भाषण के बाद अभी तक कोई एक्शन क्यो नहीं लिया गया. बीजेपी ने भी राहुल गांधी को लेकर चुनाव आयोग से शिकायत की है. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के खिलाफ भी शिकायत की है. सवाल है कि क्या प्रधानमंत्री आचार संहिता का आदर्श रूप में पालन कर रहे हैं? अगर प्रधानमंत्री पर ही उंगली उठे तो फिर क्या रह जाएगा. आज स्क्रोल वेबसाइट पर शोएब दनियाल ने जो रिपोर्ट की है, उससे वाकई गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं. वो अगर साबित हो गया तो प्रधानमंत्री मोदी की उम्मीदवारी पर भी ख़तरा हो सकता है.

शोएब की रिपोर्ट बताती है कि नीति आयोग प्रधानमंत्री कार्यालय को सूचनाएं उपलब्ध करवा रहा है ताकि वे उनका इस्तेमाल अपनी चुनावी सभाओं में कर सके. शोएब ने मय प्रमाण अपनी रिपोर्ट लिखी है. इसके लिए उस ईमेल को देखा है और हासिल किया है जिसे नीति आयोग के इकोनोमिक अफसर पिंकू कपूर की तरफ से भेजा गया है. उस ईमेल में उन जगहों की जानकारी मांगी गई है जहां प्रधानमंत्री रैली करने वाले हैं. केंद्र शासित प्रदेश के एक मुख्य सचिव को यह ईमेल भेजा गया है और 9 अप्रैल को दोपहर 2 बजे तक जानकारी मांगी गई है. 8 अप्रैल को भेजी गई इस ईमेल में कहा गया है कि एक पूरा राइट अप भेजा जाए जिसमें उस जगह का इतिहास, स्थानीय नायक, संस्कृति, धर्म के बारे में जानकारी हो. पर्यटन, खेती, रोज़गार और आजीविका से संबंधित जानकारी हो. दिल्ली और पुड्डूचेरी के मुख्य सचिव, चंडीगढ़ के प्रशासक के सलाहकार को ईमेल भेजी गई थी.

आचार संहिता लागू होने के बाद भी प्रधानमंत्री अपनी चुनावी सभाओं के लिए सरकारी अफसरों से जानकारी मांग रहे हैं. यह आचार संहिता का उल्लंघन हो सकता है. सिर्फ पिंकू कपूर का ईमेल ही नहीं, स्क्रॉल के शोएब दानियल ने एक और जानकारी हासिल की है. प्रधानमंत्री कार्यालय की तरफ से बीजेपी शासित महाराष्ट्र के कलेक्टरों से उन जगहों की जानकारी मांगी गई है जहां उनकी रैली होने वाली थी. पिंकी कपूर ने इंकार किया है. स्क्रॉल ने इसी तरह के और भी दस्तावेज़ हासिल किए हैं. जो बीजेपी शासित महाराष्ट्र के कलेक्टरों को भेजे गए थे. 31 मार्च को गोंदिया की कलेक्टर कांदबिरी बलकावड़े ने नीति आयोग को एक नोट भी भेजा है. ईमेल का सब्सेजक्ट है 'Write UP/information For Gondia District for Prime Minister's Office. इसमें गोंदिया का संक्षिप्त इतिहास, आंकड़े, आबादी की प्रोफाइल, सहित कई सूचनाएं हैं. लातूर के कलेक्टर ने भी इतिहास, धर्म और पर्यटक स्थल की जानकारी भेजी गई है. वर्धा ज़िले के बारे में भी इस तरह की जानकारी तैयार की गई थी.

प्रधानमंत्री मोदी ने 1 अप्रैल को वर्धा में, गोंदिया में 3 अप्रैल और लातूर में 9 अप्रैल को रैली की थी. शोएब ने महाराष्ट्र के अतिरिक्त मुख्य चुनाव अधिकारी से जवाब मांगा था. उन्होंने इस तरह से सूचना मांगे जाने से इंकार किया है. हमने स्क्रॉल के शोएब दनियाल से भी बात की है, क्योंकि अगर यह स्टोरी जांच में साबित होती है तो इसके परिणाम बेहद गंभीर हो सकते हैं. नैतिक रूप से भी कि आचार संहिता लागू होने के बाद प्रधानमंत्री सरकारी तंत्र का इस्तमाल कर रहे हैं और दूसरा इसी तरह के एक केस में जून 1975 में इंदिरा गांधी के चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी गई थी.

अगर सरकारी अधिकारी जिन पर जिम्मेदारी होती है कि वे निष्पक्ष चुनाव कराएं, वो अगर चुनाव प्रचार में प्रधानमंत्री के भाषण के लिए जानकारी उपलब्ध करा रहे हैं तो इसका एक ही मतलब है कि वे अपना काम छोड़ कर उनकी मदद कर रहे हैं. 1 अप्रैल को गोंदिया की रैली का भाषण सुनाता हूं. उनके भाषण में जो स्थानीय जानकारी है, उसका ईमेल में भेजी गई जानकारी से मिलान किया जा सकता है. अगर मिल जाता है तब तो यह और भी गंभीर मामला हो जाता है.

चुनाव आयोग 9 अप्रैल के लातूर वाले भाषण पर अभी तक कार्रवाई नहीं कर पाया. स्क्रॉल ने तो ईमेल की तस्वीर भी छाप दी है. क्या चुनाव आयोग इस पर भी कार्रवाई करने या व्यवस्था देने में महीना लगा देगा ताकि चुनाव बीत जाए? चुनाव आयोग से सख्त सवाल पूछे जाने की ज़रूरत है. ऐसी खबरें आपको आपके हिन्दी अखबारों में नहीं मिलेंगी. इसके लिए पत्रकारिता करनी होती है और साहस की भी ज़रूरत होती है. उधर बंगाल से ममता बनर्जी ने आरोप लगाया है कि प्रधानमंत्री की रैलियों पर इतना ख़र्च कहां से हो रहा है? ममता ने कहा है कि अगर चुनाव आयोग दूसरों से चुनावी खर्चे का हिसाब मांग सकता है तो प्रधानमंत्री से क्यों नहीं? आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह ने भी चुनाव आयोग से लिखित शिकायत की है.

वाराणसी में हुए रोड शो के दौरान खर्चे को लेकर कई सवाल उठाए गए हैं. प्रधानमंत्री स्टार प्रचारक हैं. इसलिए उनके खर्चे का हिसाब पार्टी के खाते में होता है. जिसकी सीमा तो नहीं होती मगर उसका हिसाब रखना पड़ता है और देना पड़ता है. जनप्रतिनिधित्व एक्ट 1951 के सेक्शन 77 (1) के तहत अगर नेता स्टार प्रचारक हैं और अपने क्षेत्र से बाहर रैली का हिस्सा हैं तो उन्हें खर्चे का हिसाब देने से छूट है. अगर नेता किसी क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे हैं तब फिर उन्हें छूट का लाभ नहीं मिलेगा.

चुनाव आयोग के निर्देशों के हिसाब से स्टार प्रचारक का अपनी लोकसभा में किया गया खर्च उम्मीदवारी के खर्च में शामिल होता है. एक बात यह भी आई कि प्रधानमंत्री ने अपना रोड शो नामांकन से पहले किया है, इसलिए उसका खर्च 75 लाख की खर्च सीमा में नहीं जोड़ा जाएगा. तो क्या प्रधानमंत्री ने नियमों का लाभ उठाया और पहले रैली कर ली, जिससे उसमें हुए खर्च का कोई हिसाब नहीं जुड़े. नियम क्या है. इसके लिए हमने विराग गुप्ता से बात की.

क्या आपको पता है कि ईवीएम और वीवीपैट को लेकर आशंका होने पर शिकायत कैसे की जाती है और शिकायत गलत पाई गई तो आपको 6 महीने की जेल हो सकती है. 2013 में चुनाव आयोग ने चुनावी नियमों की संहिता सेक्शन 49 (एम ए) में भारतीय दंड संहिता आईपीसी की धारा 177 को शामिल किया था. यही कारण है कि असम के पूर्व पुलिस प्रमुख हरेकृष्णा डेका ने आरोप लगाया कि जिसे उन्होंने वोट किया था उसका नंबर वीवीपैट मशीन की पर्ची पर नहीं दिखा. डेका ने फेसबुक पर लिखा कि उन्होंने इसकी शिकायत नहीं की, क्योंकि अगर दावा सही नहीं निकला तो जेल हो सकती है. आज सुप्रीम कोर्ट में इस नियम को लेकर जनहित याचिका दायर की है कि ईवीएम और वीवीपैट की गड़बड़ी की शिकायत करने पर मतदाता के खिलाफ कानूनी प्रावधान है. इससे तो लोग शिकायत ही नहीं करेंगे. सुप्रीम कोर्ट ने आयोग से जवाब मांगा है.

राष्ट्रीय कौशल विकास निगम के एक सीनियर अफसर ने ब्लॉग लिखा है कि उन्हें केंद्रीय मंत्री धर्मेंद प्रधान ने सारे वरिष्ठ अधिकारियों के सामने गाली दी है. इस अफसर का नाम अजय कुमार है और सेना में 23 साल की नौकरी के बाद राष्ट्रीय कौशल विकास निगम इसलिए ज्वाइन किया ताकि कम पैसे में वे देश की ज्यादा सेवा कर सके. अजय कुमार ने लिंक्ड इन पर लंबा सा पोस्ट लिखा है. अजय कुमार राष्ट्रीय कौशल विकास निगम में उड़ान योजना और स्किल सेंटरों को मान्यता देने वाले स्मार्ट विभाग के प्रमुख थे. घटना पिछले साल की है और कांस्ट्टीट्यूशन क्लब में स्किल इंडिया का कार्यक्रम था. वहां अजय कुमार को नहीं जाना था, मगर जैसा कि उन्होंने लिखा है कि मंत्री के दफ्तर से कहा गया कि उन्हें भी कार्यक्रम में मौजूद रहना है.

कौशल विकास मंत्री धमेंद्र प्रधान से उनके किसी परिचित के सेंटर को मान्यता देने के सवाल पर बहस हो गई. कौशल मंत्रालय के संशोधित नियमों के खिलाफ जाकर मान्यता देनी थी. जब मैंने मंत्री जी को कहा कि दिशानिर्देशों के अनुसार उनके ज़ुबानी आदेश से काम नहीं होगा, उन्होंने आपा खो दिया. और मुझे गाली देने लगे. गंदी गालियां देने लगे. शुरू में उनके व्यवहार से मैं हतप्रभ था, लेकिन सबके बीच उनका गुस्सा जारी ही रहा. हो सकता है कि शुरू में चुप रहने से मंत्री जी को लगा हो कि वे अपनी राजनीतिक ताकत के दम पर मेरे साथ कुछ भी कर सकते हैं. वे ग़लत थे. वहां पर कौशल विकास मंत्रालय के संयुक्त सचिव राजेश अग्रवाल और प्रबंध निदेशक मनीष कुमार भी थे. वे लोग भी मेरी सेना की पृष्ठभूमि भूल गए कि हम सेना के लोग आत्मसम्मान, गौरव और स्वाभिमान को गंभीरता से लेते हैं. मैंने मंत्री जी से कहा कि अपने शब्दों पर ध्यान दें. मैं सिर्फ दिशानिर्देश का पालन कर रहा था. इस बात पर वे और भड़क गए और मेरी बर्खास्तगी का आदेश दे दिया और गालियां देते रहे.

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अजय कुमार ने लिखा है कि बाद में उन्हें इस्तीफा देने के लिए धमकाया गया और इस्तीफा देना पड़ा. 9 महीने बाद इस घटना का ज़िक्र इसलिए कर रहे हैं कि जहां भी इंटरव्यू देते हैं और पिछली नौकरी छोड़ने का कारण बताते हैं, फिर इंटरव्यू करने वाली कंपनी चुपचाप गायब हो जाती है. दोस्तों ने उन्हें राय दी कि आप कुछ झूठ बोल दो, लेकिन अजय कुमार ने तय किया कि इस बात को सबके सामने ही कह देते हैं. हमने कर्नल अजय कुमार से  बात करने की कोशिश की. सुशील महापात्रा उनके पास गए. उनका कहना था कि उन्हें जो भी कहना था अपने ब्लॉग में लिख चुके हैं. अब वे टीवी कैमरे के सामने नहीं आना चाहते.

हमने धर्मेंद्र प्रधान की प्रतिक्रिया लेने का प्रयास किया. वे इस समय ओडिशा में चुनाव प्रचार में व्यस्त हैं. उनके सहयोगी ने बताया कि राष्ट्रीय कौशल विकास निगम के अधिकारी से संपर्क करें. हमने उस अधिकारी से संपर्क किया. उन्होंने यही कहा कि कर्नल अजय कुमार ने राष्ट्रीय कौशल विकास निगम की प्रक्रियाओं पर जो सवाल उठाए हैं उसके बारे में जवाब तैयार किया जा रहा है, जिसे जल्दी ही मीडिया से साझा किया जाएगा. अजय कुमार ने प्रक्रियाओं के बारे में सवाल उठाए हैं. लेकिन क्या उन्हें धर्मेंद्र प्रधान ने सबके सामने गाली दी है, इसकी जांच कैसे होगी, यह सच्चाई कैसे सामने आएगी, क्या धर्मेंद्र प्रधान खुद सामने आकर नहीं कहेंगे कि उन्होंने सबके सामने किसी पूर्व सैनिक अफसर को इस तरह गंदी गालियां दी थी या नहीं. 



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