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प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की हालत क्यों नहीं सुधरती ? 

अगर आपको भारत में नेता बनना है तो दो चीजों की परवाह आपको नहीं करनी है. क्योंकि हमारी जनता उन दो चीजों के बारे में कभी आपसे सवाल नहीं करेगी.

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प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की हालत क्यों नहीं सुधरती ? 
अगर आपको भारत में नेता बनना है तो दो चीजों की परवाह आपको नहीं करनी है. क्योंकि हमारी जनता उन दो चीजों के बारे में कभी आपसे सवाल नहीं करेगी. ये दो चीज़े हैं स्वास्थ्य और शिक्षा. दोनों के घटिया स्तर के कारण हमारी और आपकी ज़िंदगी किस हद तक बर्बाद है, हम इसका हिसाब तो रखते हैं, मगर नेताओं से इसका हिसाब नहीं मांगते. इसलिए भारत में आपको नेता बनने के लिए बस एक चीज़ आनी चाहिए, वो है झूठ बोलने की बेशर्मी. अगर आप इस रास्ते चलेंगे तो यकीन मानिए आप नेता बन जाएंगे.

शिक्षा और स्वास्थ्य के सवाल आज के नहीं हैं. दुख की बात है कि न कल के थे न आज के हैं. आप जानते हैं कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने 2018 का एक नेशनल हेल्थ प्रोफाइल जारी किया है. इसमें भारत की घटिया स्वास्थ्य व्यवस्था के बारे में जानकारी है. 2005 से नेशनल हेल्थ प्रोफाइल बन रही है फिर भी खास सुधार नहीं हुआ है. हम इस पर भी बात करेंगे मगर पहले आपको बिहार के एक स्वास्थ्य केंद की हालत बताते हैं. 

हमारे सहयोगी कन्हैया का कैमरा जिस सफेद इमारत की तरफ धीरे-धीरे बढ़ रहा है उसकी परिभाषा सरकारी दस्तावेज़ों में अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य कें के रूप में दी गई है. इसका एक पता है ज़िला सहरसा, सदर प्रखंड कहरा का बसौना गांव. सामने नर्स जी बैठी नज़र आ रही हैं. उन्हें देखकर भरोसा कर सकते हैं कि इनका ड्यूटी नाम की चीज़ में आज भी भरोसा है. 2007 में बनी यह इमारत जल्दी ही आपको भरोसा दिलाएगी कि हमारे ठेकेदारों और अफसरों ने आपके पैसे का इतना तो इंतज़ाम किया है कि कोई भी इमारत एक दशक से ज़्यादा न टिके. दीवारों का साथ छोड़ सीमेंट के टुकड़े हवाओं के साथ यहां से भाग लिए हैं. गिरने की तमाम संभावनाओं के बाद भी यह इमारत अभी तक नहीं गिरी है, यही इस कुव्यवस्था में एकमात्र अच्छी ख़बर है.

डॉक्टरों के लिए जो शौचालय है उसमें दवाइयां बिखरी पड़ी हैं. मरीज़ों को जागरूक करने के लिए स्वास्थ्य विभाग के पोस्टर ज़मीन पर बिखरे पड़े हैं. मैंने कहा न कि आप इन सब सवालों के बिना भी नेता बन सकते हैं. बस झूठ बोलते चलना है और जनता को हिन्दू मुस्लिम के नाम पर लड़ाते चलना है. आज की रात इसे आप ठीक से निहार लीजिए मगर अपनी राजनीतिक निष्ठा को मत बदलिएगा. वही हम जनता का कफन है, उसे जीते जी भी ओढ़े रहना है और मरने के बाद भी. एक बार यह कफन उतर गया तो आपके शरीर से लिपटा नेताओं का झूठ सीमेंट की तरह यहां की दीवारों को छोड़ हवाओं के साथ भाग जाएंगे.

आपने जिस इमारत का हाल देखा उसका निर्माण 2007 में हुआ था. पांच छह पंचायत के हज़ारों लोगों की  प्राथमिक ज़रूरत इसी अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केंद के भरोसे है. गांव वालों ने चंदा जमा कर डागदर साहब के बैठने के लिए कुर्सी टेबल और अन्य उपकरणों का इंतज़ाम किया. यहां सप्ताह में दो बार डॉक्टर और नर्स की ड्यूटी तय हुई मगर दो दिन कहां कोई आता है. दो दिन भी डॉक्टर आते तो आप इमारत की वो हाल नहीं देख पाते. डॉक्टर आते भी होंगे तो भी इमारत का यही हाल रहता, क्योंकि इमारत ठीक रखना डॉक्टर का काम नहीं है. नर्स ज़रूर हाज़िरी लगाने आ जाती हैं. इस सेंटर पर हाल फिलहाल में कोई होम्योपैथिक डॉक्टर आया है. लोगों ने इस स्वास्थ्य केंद्र के भीतर से जो हाल बताया है उसे देखकर आपको किसी अच्छे रिपोर्टर की याद आएगी.

यहां के लोगों ने सहरसा के सीएमओ यानी मुख्य चिकित्सा पदाधिकारी को पत्र भी लिखा है कि गांव से 10 किमी दूर सहरसा जाना पड़ता है अस्पताल के लिए. 20 साल पहले यहां हर तरह की सुविधा थी मगर अब कुछ नहीं है. कई बार पत्र लिखा गया है मगर उतनी ही बार अधिकारियों ने अनदेखा कर यह साबित किया है कि उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता है. गांव वालों की तरह हमें भी इसका अहसास है, चूंकि उन्होंने कई बार पत्र लिखे हैं तो हम भी एक बार दिखा देते हैं. गांव के लोगों ने अनशन भी किया है ऐसा इस पत्र से पता चलता है. यह भी पता चलता है कि लोकतंत्र का ठेका सिर्फ दिल्ली के बुद्दिजीवी ही नहीं गांव वालों ने भी उठा रखा है मगर तंत्र के ठेकेदारों के सामने दिल्ली और सहरसा सब एक समान हैं.

नर्स पदमावती ने कहा कि इस सेंटर से अब सिर्फ आयरन और कैल्शियम की गोली बांटने के अलावा कोई काम नहीं नहीं होता न सुविधा है. इसी हफ्ते केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने नेशनल हेल्थ प्रोफाइल जारी की है. यह रिपोर्ट आप को सेंट्रल ब्यूरो ऑफ हेल्थ इंटेलिजेंस की वेबसाइट पर मिल जाएगी. 400 पन्नों की इस रिपोर्ट को आप भी पढ़िए. जी इस नाम की संस्था है, नाम से तो ऐसा लगता है कि सीबीआई का काम करती होगी पर ख़ैर. विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानक के अनुसार 1000 पर एक डॉक्टर होना चाहिए मगर इस रिपोर्ट के अनुसार बिहार में 28,391 लोगों पर एक डॉक्टर है. यूपी में 19,962 लोगों पर एक डॉक्टर है. मध्य प्रदेश में 16,996 लोगों पर एक डॉक्टर है. झारखंड में 18,518 लोगों पर एक डॉक्टर है.

हिन्दी भाषी प्रदेशों का बहुत बुरा हाल है. भारत में 5 लाख डॉक्टरों की ज़रूरत है. एम्स में 70 फीसदी टीचर नहीं हैं तो सोचिए जो बच्चा एम्स की कठिन प्रतियोगिता पास कर चुना जाता है वो पढ़ता किससे है, भूत से या प्रेत से. अस्पताल नहीं हैं डॉक्टर नहीं हैं, ग़रीब और साधारण और ठीक ठाक आमदनी वाले लोग भी इलाज कराते कराते कर्ज़ में आ जाते हैं. घर मकान बिक जा रहा है. डॉक्टर है नहीं तो इलाज का स्तर भी आप समझ सकते हैं.

भारत में एक बार अस्पताल में भरती होने पर औसत ख़र्च 26,455 हज़ार ख़र्च होता है. प्रति व्यक्ति आय के हिसाब से तीन महीने की कमाई एक बार में चली जाती है. बिहार में एक बार अस्पताल में जाने पर मरीज़ को 28,058 रुपया खर्च हो जाता है. उत्तराखंड में एक बार अस्तपताल में जाने पर 33,402 रुपया खर्च हो जाता है. असम में एक बार भर्ती होने पर बीमार का 52 हज़ार ख़र्च हो जाता है. इस औसत में मेडिकल और नॉन मेडिकल खर्चा दोनों है और यह शहरी हिसाब है. करोड़ों की आबादी का ये औसत है. हर आदमी अस्पताल में जाने पर कितना खर्च कर रहा है वो अपना हिसाब जानता है. भारत में 5 लाख डॉक्टरों की ज़रूरत है. फिर भी आप देखिए कि एमबीबीएस करने वाले सभी डॉक्टरों के लिए एमडी करने के लिए सीट नहीं है. चिन्ता मत कीजिए ये सब सवाल न तो जनता नेता से करेगी और न ही नेता जनता को जवाब देगा. मैं ये सिर्फ आपके रात्रि मनोरंजन के लिए बता रहा हूं.

क्या आप उस भीड़ के बन जाने को लेकर सतर्क हैं जो कभी बच्चा चोरी की अफवाह तो कभी गौ हत्या की अफवाह पर किसी को घेर लेती है और मार देती है. अगर चाहेंगे तो मैं बताना चाहूंगा कि पहले इस भीड़ ने मुसलमानों को निशाना बनाया, अब भी बना रही है, लेकिन हिन्दू भी इस भीड़ की चपेट में आने लगे हैं. इसकी मानसिकता तैयार है. बस व्हाट्सएप के ज़रिए कोई नई अफवाह भेजनी है और यह ऑटोमेटिक रूप से चालू हो जाती है. इसे मैं रोबो रिपल्बिक कहता हूं. पिछले कुछ दिनों में चार ऐसी घटनाएं हो गईं हैं जिसमें भीड़ ने मुसलमान को भीमारा और हिन्दू भी को भी मारा. असम में तो वहीं के रहने वाले दो साउंड इंजीनियर को लोगों ने बच्चा चोर समझ लिया और मार दिया, क्योंकि व्हाट्सएप पर बच्चा चोरी को लेकर कई तरह की अफवाहें चल रही थी.

असम के करबी आंगलांग ज़िले में निलोत्पल और अभिजीत के इंसाफ के लिए फेसबुक में एक ग्रुप भी बना है जिसे 60000 से अधिक लोग फॉलो कर रहे हैं. 8 जून को निलोत्पल दास और अभिजीत नाथ पिकनिक से लौट रहे थे, मगर पंजुरी में एक भीड़ ने उनकी जीप रोकी और उतार कर मारना शुरू कर कर दिया. दोनों असम के ही रहने वाले थे तो अहोमिया में भी लोगो से कहा कि वे बच्चा चोर नहीं हैं, लेकिन भीड़ ने दोनों को मार दिया. कई लोग हिरासत में लिए गए हैं और असम में यह बड़ा मुद्दा है. इस घटना के ठीक पहले हैदराबाद पुलिस ने अलर्ट जारी किया था कि सोशल मीडिया में बच्चा चोरी गैंग को लेकर अफवाह उड़ाई जा रही है, जिसकी वजह से अलग-अलग जगहों पर तीन लोगों को भीड़ ने घेर कर मार दिया. 10 लोगों को भीड़ ने पेड़ और बिजली के खंभे से बांध कर बुरी तरह पीटा गया था. जिनमें से कुछ की स्थिति बहुत ख़राब थी. यह ख़बर 25 मई के टाइम्स ऑफ इंडिया में भी छपी है और हमारी सहयोगी उमा सुधीर ने भी की है.

आप देखिए कि 25 से 10 जून के बीच भारत के दो राज्यों में पांच लोगों को भीड़ ने मार दिया. 10 लोगों को पेड़ बिजली के खंभे से बांध कर पीटा गया. यह हमारे समाज और देश की कैसी तस्वीर पेश कर रहा है. एक बार भीड़ को कानून हाथ में लेने और मारने की छूट मिल जाए तो फिर वो मुसलमान को ही नहीं हिन्दू को भी घेर कर मार रही है. बल्कि आप इन खबरों को देख भी रहे हैं. झारखंड में 2017 में ऐसी ही अफवाह उड़ी बच्चा चोरी के गिरोह की. हल्दी पोखर से राजनगर जा रहे नईम, सज्जू, शिराज और हलीम को सौ से भी अधिक लोगों ने घेर लिया और इतना मारा कि नईम, सज्जू और शिराज की मौत हो गई. उसी रात पूर्व सिंहभूम में विकास, गणेश और गौतम को भीड़ ने घेर लिया. इन तीनों को मार दिया. क्या हिन्दू क्या मुसलमान, भारत में नेशनल सिलेबस ने एक ऐसी भीड़ हर जगह तैयार कर दी है जो किसी को भी मार सकती है.

इस वीडियो में कासिम नाम का युवक खेत में घायल पड़ा है. कपड़े फट गए हैं. दर्द से कराह रहा है. एक आदमी मना भी कर रहा है कि ज्यादा मत मारे वरना परिणाम भुगतने होंगे. एक आवाज़ और आ रही है जो कहती है कि अगर हम नहीं पहुंचते तो गाय की हत्या हो चुकी होती. यह वीडियो वायरल हो रहा है. हमारे सहयोगी आलोक पांडे ने अपनी रिपोर्ट में इस वीडियो के बारे में लिखा है कि भीड़ ने ज़मीन पर पड़े कासिम को पानी तक नहीं दिया. यह घटना दिल्ली से 70 किमी दूर यूपी के हापुड़ में भी ऐसी एक घटना के होने की चर्चा है. कहा जा रहा है कि गौ हत्या की अफवाह के कारण भीड़ ने 45 साल के क़ासिम को धेर लिया और मार दिया. 65 साल के समयुद्दीन घायल हो गए. पुलिस कहती है कि इनका बाइक सवार से झगड़ा हो गया था उसके गुस्से में हत्या हो गई. एफआईआर रिपोर्ट में समीयुद्दीन के परिवार वालों ने गौ हत्या का ज़िक्र नहीं किया है.

पुलिस का कहना है को मोटर साइकिल के रास्ते को लेकर झगड़ा हो गया था. वैसे पुलिस इस बात की जांच कर रही है कि गौ हत्या को लेकर अफवाह फैली थी या नहीं. यही नहीं उस वक्त की एक तस्वीर ने बेचैन कर दिया है। भीड़ है जो घायल आदमी को खींच कर ले जा रही है. इस तस्वीर को देख कर लगता है कि हम सभ्य से असभ्य होते जा रहे हैं. हमारी क्रूरता चरम पर है. सोशल मीडिया पर यह शर्मनाक तस्वीर ट्रेंड करती रही. 45 साल के कासिम को भीड़ इस तरह से खींचते हुए ले जा रही है जैसे इंसान नहीं जानवर हो. साथ में पुलिस भी है जो आगे आगे चल रही है. यूपी पुलिस ने इस शर्मिंदगी के लिए माफी मांगी है और अपने तीन कर्मचारियों को ड्यूटी से हटा दिया है. पुलिस का कहना है कि तस्वीर उसके पहुंचने के बाद की है. पीड़ित को अस्पताल ले जाने के लिए एंबुलेंस नहीं था. तब लोग इस तरह से उठाकर ले जा रहे थे. पुलिस ने माना कि उसके सहयोगियों को और संवेदनशील होना चाहिए था. पुलिस ने सफाई तो दे दी, लेकिन आप इस तस्वीर को याद रखिए कि राजनीति ने कैसे इंसान को हैवान बना दिया है.

हाल फिलहाल में झारखंड से भी ऐसी दो घटनाएं सामने आईं हैं. झारखंड में पिछले कुछ साल में एक दर्जन से ज्यादा लीचिंग हो चुकी है. लीचिंग मतलब भीड़ ने किसी को घेर कर मार दिया है. आपको इससे सतर्क रहना है. कोई कानून तोड़ रहा है तो उसके लिए पुलिस है. भीड़ नहीं होनी चाहिए. सांप्रदायिकता इंसान को मानव बम में बदल देती है. जिसके नतीजे आप देख रहे हैं. बहुत से नौजवान कहते हैं कि उनके मां बाप और रिटायर्ट दादा जी और नाना जी भयंकर रूप से सांप्रदायिक हो चुके हैं. उन्हें समझाने से भी फर्क नहीं पड़ता है. भीड़ का एक हिस्सा हमारे आपके घरों और मोहल्लों में भी मौजूद है. इन्हे समझाइये कि सांप्रदायिक ज़हर ने उन्हें मानव बम में बदल दिया है. ऐसे खलिहर लोगों पर नज़र रखिए.

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उधर, तन्वी सेठ जब पासपोर्ट ऑफिस गईं तो वहां मौजूद अधिकारी विकास मिश्र ने उनसे कहा कि नाम और मज़हब बदल लें, क्योंकि उन्होंने मुस्लिम से शादी की है. उन्होंने विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को ट्वीट कर दिया. नोएडा के इस जोड़े ने अपनी पंसद से शादी की, लेकिन पासपोर्ट अधिकारी को क्या हक बनता था कि उसमें दखल दे और कहे कि पासपोर्ट नहीं बनेगा क्योंकि आपने मुस्लिम से शादी की है. तन्वी सेठ ने लिखा है कि अधिकारी ने उनके साथ ख़राब तरीके से बात की और अपमान किया. तनवी सेठ ने अपनी निजता और नागरिकता दोनों का फर्ज़ निभाया और सुषमा स्वराज को खूब ट्वीट किया कि ये क्या हो रहा है. यही नहीं विकास मिश्र ने अनस सिद्दीकी से भी कहा कि वे अपना नाम और मज़हब बदल लें. उसने कहा कि दोनों में किसी एक को अपना नाम और धर्म बदलना पड़ेगा. सुषमा स्वराज ने भी अपना संवैधानिक दायित्व निभाया और उस अफसर का तबादला हो गया. तन्वी और अनस का पासपोर्ट भी बन गया. अनस और तन्वी की शादी 2007 में हुई थी और एक बेटी भी है.

विकास मिश्र जैसे अफसरों के दिमाग में ये ज़हर कैसे पहुंचा, हम जानते हैं. वही नहीं कई अफसर और यहां तक कि वाइस चांसलर तक इस तरह के ज़हर उगल रहे हैं. खुलेआम फेसबुक पर लिख रहे हैं. अंग्रेज़ी में इसे हेट क्राइम कहते हैं. यह एक तरह का अपराध है और मानसिक रोग भी. भारत में टीवी न्यूज़ चैनलों के ज़रिए चार साल तक हिन्दू मुस्लिम नेशनल सिलेबस चला है. ज़ाहिर है विकास जैसे नौजवान इसकी चपेट में आ गए. नेता और राजनीति आपको हिन्दू मुस्लिम के बीच शादी को लेकर जाने किस तरह से बहका देती है, गांव कस्बे में आम नौजवान घिर जाते हैं, लेकिन वही राजनीति देखिए किस तरह से तन्वी और अनस के मामले में कार्रवाई करती है क्योंकि उसे पता है कि इस गंदी राजनीति को औपचारिक मान्यता नहीं दी जा सकती है. आईएएस टॉपर टीना डाबी और अतहर ने जब शादी की तो कई बड़े नेता आशीर्वाद देने पहुंचे थे. यानी वे भी ऐसी शादियों को मान्यता देते हैं और अच्छा करते हैं.


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