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NEET परीक्षा में धांधली की सज़ा छात्र क्यों भुगतें?

बहुत ही कम परीक्षाएं होती हैं तो एक साल से कम समय में पूरी होती है. यानी ज्वाइनिंग तक पहुंचती हैं. ज़्यादातर परीक्षाएं कम से कम दो साल और अधिक से अधिक पांच साल में पूरी होती हैं. इस बीच कुछ परीक्षाएं लापता हो जाती हैं. मतलब फार्म भरा गया, परीक्षा हुई और आठ साल से रिज़ल्ट का पता नहीं.

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अगर आप छात्र हैं और किसी परीक्षा सिस्टम से गुज़र रहे हैं तो आपको मालूम है कि यहां सिर्फ परीक्षा ही नहीं देनी होती है. दुनिया में शायद ही कोई ऐसा देश हो, और आप किसी भी नॉन रेज़िडेंट इंडियन से पूछ सकते हैं, जहां परीक्षाओं को लेकर धांधली की इतनी ख़बरें आती हैं. मैं करीब दो साल से इस तरह के विषयों पर प्राइम टाइम कर रहा हूं. हर दिन सैकड़ों मैसेज और तस्वीरों से गुज़रता हूं. घंटों इन्हें पढ़ता रहता हूं. मैं चाहता हूं कि आप ये बात ध्यान से सुनें और इस शोध पर नोबेल देने की ज़रूरत नहीं है. इसका निष्कर्ष यह है कि आप इन परीक्षा सिस्टम के ज़रिए भारत के करोड़ों नौजवानों की ज़िंदगी पांच से दस साल तक बर्बाद कर सकते हैं. बहुत ही कम परीक्षाएं होती हैं तो एक साल से कम समय में पूरी होती है. यानी ज्वाइनिंग तक पहुंचती हैं. ज़्यादातर परीक्षाएं कम से कम दो साल और अधिक से अधिक पांच साल में पूरी होती हैं. इस बीच कुछ परीक्षाएं लापता हो जाती हैं. मतलब फार्म भरा गया, परीक्षा हुई और आठ साल से रिज़ल्ट का पता नहीं. आप किसी भी नॉन रेज़िडेंट इंडियन से पूछिए कि क्या वे इस सिस्टम में अपने बच्चों को डालना चाहेंगे, उनकी नींद उड़ जाएगी. मेरे रिसर्च का एक दूसरा पार्ट भी है. क्या इन परीक्षाओं की धांधली से परेशान नौजवानों की राजनीतिक चेतना अलग होती है?

इस सवाल का संदर्भ यह है कि आम तौर पर हम समझते हैं कि यूथ कोई अलग राजनीतिक प्राणी होता है. उसकी राजनीतिक चेतना में मुखरता होती है. बिल्कुल यह बात ग़लत है. झूठ है. बल्कि मैंने देखा है कि छात्रों ने उन्हीं सरकारों को चुना है, या उनकी राजनीतिक विचारधारा वही रहती है जिसके चंगुल में फंस कर वे पांच या छह साल तक इम्हतान ही देते रहते हैं. न रिज़ल्ट आता है न भर्ती होती है. इसलिए सरकारों को भी फर्क नहीं पड़ता है. उन्हें चलाने वाली राजनीतिक पार्टी जानती है कि नौजवान को पता है कि परीक्षा का रिजल्ट नहीं आया, धांधली हुई फिर भी वह जब वोट देगा तो अपनी जाति और धर्म की बात पहले करेगा. एक लाइन में कहूं तो नौजवानों का बर्बाद होना उनके राजनीतिक फैसले का हिस्सा होता ही नहीं है. ये कमाल की ओरिजनल रिसर्च है जो मुझसे अपने आप हो गई है. और नौजवान भी इसे सत्यापित करते हैं कि मैं ठीक कह रहा हूं. इसलिए सरकारों को बिल्कुल चिन्ता करने की ज़रूरत नहीं है. ऐसा नहीं कि वे मरे कहने से चिन्ता नहीं करेंगी बल्कि उन्हें यह बात ठीक ठीक पता है. आप चाहें तो अलग से रिसर्च कर लीजिए, उन छात्रों को लेकर जो किसी भी राज्य में सरकारी परीक्षा के सिस्टम में डाल दिए गए हैं. इतनी लंबी बात इसलिए कही क्योंकि अब जो बताने जा रहा हूं उसे सुनकर आप हैरान रह जाएंगे. मद्रास हाई कोर्ट ने जो आदेश दिए हैं, उससे भारत में मेडिकल परीक्षा सिस्टम की पोल खुल जाती है. दुआ करने पर तो भारत में शिक्षक सस्पेंड हो जाता है इसलिए आप प्रार्थना ही कर लीजिए कि कैसे कैसे लोग डॉक्टर बन रहे हैं. बशर्ते प्रार्थना से यह सिस्टम ठीक हो जाता है तो.


इस साल तमिलनाडु के मेडिकल कॉलेज में एडमिशन लेने वाले सभी मेडिकल छात्रों का फिंगर प्रिंट लिया जाएगा. इस साल राज्य के प्राइवेट और सरकारी कॉलेजों में 4250 छात्रों ने एडमिशन लिया था. इन सबी ने National Eligibility-cum-Entrance Test (NEET) की परीक्षा पास की थी. ऑल इंडिया टेस्ट है ये. मद्रास हाईकोर्ट के जस्टिस एन किरुबकरण और पी वेलमुरुगन की खंडपीठ ने यह फैसला दिया है. कोर्ट ने National Testing Agency से कहा है कि सभी छात्रों के अंगूठे के निशान सीबीसीआईडी को दे, जो जांच कर रही है ताकि यह सत्यापित हो सके कि एडमिशन लेने वाले छात्रों ने ही परीक्षा दी थी. उनकी जगह किसी और ने नहीं.

नेशनल टेस्टिंग एजेंसी ही नीट की परीक्षा कराती है. मेडिकल शिक्षा निदेशालय ने सभी कॉलेजों को ईमेल किया है कि प्रथम वर्ष के सभी छात्रों के अंगूठे के तीन-तीन निशान लिए जाएंगे और उनका मिलान किया जाएगा. ये निशान डीन ऑफिस में लिए जाएंगे. तीन-तीन प्रोफेसरों की मौजूदगी में. एनाटमी, फिज़ियॉलजी और बायेकेमेस्ट्री प्रोफेसर के सामने इन 4200 छात्रों को अपने अंगूठे का निशान देना होगा. उसके बाद छात्र, प्रोफेसर और डीन एक फार्म पर साइन करेंगे. इस फार्म की दो प्रतियां सील्ड लिफाफे में पांच दिनों के अंदर-अदर मेडिकल शिक्षा निदेशालय भेजी जाएंगी. फिर फॉरेंसिक एक्सपर्ट जांच करेंगे. सोचिए राज्य भर में एडमिशन लेने वाले 4200 छात्रों के अंगूठे के निशान का मिलान किया जाएगा. यह मेडिकल की परीक्षा है. कोर्ट में अतिरिक्त महाधिवक्ता पी एस अरविंद पांडियन ने कहा है कि छह छात्रों के मामले में पता चला है उनकी जगह किसी और ने परीक्षा दी है. यह परीक्षा दूसरे राज्यों में हुई है. कुछ प्राइवेट कोचिंग सेंटर का हाथ हो सकता है. जजों ने इस मामले में सीबीआई को भी पार्टी बनाया है ताकि भारत भर में जांच हो सके. फैसले में मीडिया में छपी ऐसी ख़बरों का हवाला दिया गया है. कहा गया है कर्नाटक में भी मेडिकल कॉलेज के एडमिशन में फ्रॉड की ख़बरें छपी हैं.

एक तरह से सीबीआई को पार्टी बनाने का मकसद यही है कि पूरे देश में जांच हो क्योंकि छात्र के बदले किसी और ने परीक्षा दी है और यह परीक्षा दूसरे राज्य में हुई है. इस मामले में किसी के बदले परीक्षा देने वाला जिसे अंग्रेज़ी में इंपर्सोनेटर कहते हैं, गिरफ्तार नहीं हुआ है. जजों ने अपने फैसले में कहा है कि 38000 सीट हैं और 14 लाख छात्रों ने परीक्षा दी थी. ज़ाहिर है एडमिशन के लिए घोर प्रतियोगिता होगी और इस तरह के फ्रॉड हो सकते हैं. जिसके कारण जो योग्य छात्र है, उसे मौका नहीं मिला होगा. अदालत ने यह भी कहा है कि नीट की परीक्षा को फूल प्रूफ बनाने के लिए सबको एक साथ काम करना होगा.

मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया, राज्य सरकारें और केंद्र सरकार को मिलकर काम करना होगा. फिंगर प्रिंट चेक करने का तरीका निकालना होगा और चेहरा पहचानने की तकनीक का इस्तमाल हो.

हमारे सहयोगी सैम डैनियल को जांच एजंसी ने बताया कि घर वाले 20-20 लाख देकर बच्चे की जगह परीक्षा देने वाले का इंतज़ाम करते हैं. छह गिरफ्तारियां हुई हैं. आज एक पिता पुत्र की गिरफ्तारी हुई. पिता खुद एक डाक्टर है, सरकारी अस्पताल में. उसने वेल्लौर के एजेंट के ज़रिए मुंबई में इंपर्सोनेटर का इंतज़ाम किया. 20-20 लाख रुपये देकर मां बाप अपने बच्चे को मेडिकल में सीट दिलवा रहे हैं. पिता ने बच्चे का जीवन बर्बाद किया इसलिए बच्चे को बेल मिल गई. अदालत ने यह भी कहा है कि मीडिया छात्रों का चेहरा न दिखाए ताकि वे अनावश्यक दबाव में न आए. जिनकी गिरफ्तारी हुई है उन्हें भी काउंसिलिंग दी गई है ताकि वे कोई और कदम न उठा लें. अभी तक के ज्ञात मामलों में ज़्यादातर यह खेल उत्तर भारत के परीक्षा केंद्रों में होता है.

9 अक्तूबर को कर्नाटक के चार मेडिकल कॉलेजों में छापा पड़ा था. चारों कॉलेज कांग्रेस नेता के हैं. इस छापे के दौरान पैसे देकर सीट बेचने के दस्तावेज़ भी बरामद किए गए थे. इसी का ज़िक्र दो जजों ने अपने फैसले में किया है. मीडिया में छपी खबरों के अनुसार कर्नाटक के इन चार कॉलेजों में 100 से 125 करोड़ में 185 सीटें बेची गई हैं. एक मेडिकल सीट के लिए 50 से 60 लाख लिए गए हैं. ज़ाहिर है इस नेटवर्क की जांच तो होनी चाहिए. यह हमारे समाज के चेहरे का भी पर्दाफाश करता है. हम बीमारी के वक्त सबसे अच्छा डाक्टर खोजते हैं लेकिन डाक्टर बनाते वक्त पैसे देकर किसी को भी डाक्टर बना देते हैं. ऐसे समाज में आप क्या उम्मीद करते हैं. जजों को इस पूरे नेटवर्क में कोचिंग सेंटर का खेल नज़र आता है. इसलिए उन्होंने पूछा है कि कितने ऐसे छात्र हैं जिनका पहली बार में एडमिशन होता है और कितने ऐसे हैं जिनका कई कई बार के प्रयास में होता है. साथ ही कितने ऐसे छात्र हैं जिन्होंने कोई कोचिंग नहीं ली और उनका मेडिकल हुआ.

2017 में तमिलनाडु में ही एस अनिता नाम की लड़की ने आत्महत्या कर ली थी. राज्य के बोर्ड में उसे 98 प्रतिशत अंक मिले थे. 1200 में से 1176 अंक मिले थे. तमिनलनाडु में पहले बोर्ड के आधार पर मेडिकल में एडमिशन मिलता था. इतना नंबर काफी था अनिता का डाक्टर बनने के लिए. अगर बन जाती तो अनिता अपने समुदाय और गांव की पहली डाक्टर होती है. उसी साल तमिलनाडु में नीट परीक्षा का सिस्टम लागू हुआ है. अनिता के पिता दिहाड़ी मज़दूर हैं. अनिता नीट के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट गई कि यह सिस्टम गरीब छात्रों के खिलाफ है. अनिता ने आत्महत्या कर ली. तमिलनाडु में यह बड़ा मामला बना था. बाद में अनिता की याद में 45 लाख की लागत से एक लाइब्रेरी भी बनाई गई लेकिन अनिता की लड़ाई कहीं पहुंची नहीं. इस साल जून के महीने में भी तमिलनाडू में तीन छात्रों ने नीट की परीक्षा के बाद आत्महत्या कर ली थी. तीनों लड़कियां थीं. ऋतु श्री के पिता कपड़ा फैक्ट्री में दिहाड़ी मज़दूरी का काम करते थे. एम मोनिषा और एन वैशिया के पिता मछुआरे थे. एक बार सोचिए, इन चारों लड़कियों ने जो खुदकुशी की है, वो ग़रीब थीं. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार तमिलनाडु में पिछले ढाई साल में नीट के कारण 6 बच्चों ने आत्महत्या की है इसलिए वहां यह आंदोलन चलता है कि उनके राज्य को नीट से अलग रखा जाए क्योंकि नीट प्राइवेट कोचिंग सिस्टम को बढ़ावा देता है. उसमें गरीब छात्र पीछे रह जाते हैं.

टाइम्स आफ इंडिया के चेन्नेई ब्यूरो के ए रघुरामन ने 17 अक्तूबर यानी आज ही रिपोर्ट की है. उसमें रघुरामन ने बताया है कि कई बार नीट देने वाले छात्र इसलिए पास होते हैं क्योंकि उन्हें इस परीक्षा के सिस्टम की समझ भी आ जाती है. उनकी रिपोर्ट के अनुसार पहले कई बार परीक्षा देकर पास करने वाले 12 प्रतिशत ही थे. इस साल यह नंबर बढ़कर 70 प्रतिशत हो गया है.

यह डेटा बताता है कि किस तरह से नीट के कारण कोचिंग इंडस्ट्री बढ़ रही है. रघुरामन ने लिखा है कि सिर्फ तीन साल में तमिलनाडु में नीट कोचिंग के दस हज़ार से अधिक ट्रेनिंग सेंटर शुरू हो गए हैं. 500 करोड़ से भी अधिक का कारोबार बन गया है.

देहरादून के परेड ग्राउंड में राज्य के तमाम बड़े कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं लेकिन इन दिनों परेड ग्राउंड पर उत्तराखंड के लगभग सभी निजी आयुर्वेदिक कॉलेजों के छात्र धरने और आमरण अनशन पर बैठे हैं. इनमें से कई छात्रों की तबीयत भी ख़राब हो चुकी है. इन छात्रों ने पहले अपने-अपने कॉलेजों में विरोध प्रदर्शन किए और अब परेड ग्राउंड पर बैठने को मजबूर हैं. इन छात्रों की मांग है कि 2015 का उत्तराखंड सरकार का वो शासनादेश वापस लिया जाए जिसमें प्राइवेट आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेजों की फीस 80 हज़ार से बढ़ाकर 2 लाख 15 हज़ार करने का निर्देश दिया गया था. आपको बता दें कि सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश के मुताबिक फीस बढ़ाना राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में नहीं है. ये अधिकार शुल्क निर्धारण कमेटी को है जो हर राज्य में हाइकोर्ट के रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में गठित होती है. लेकिन राज्य सरकार ने इसकी परवाह किए बग़ैर शासनादेश जारी कर दिया.

शासनादेश के ख़िलाफ़ विद्यार्थियों ने नैनीताल में उत्तराखंड हाइकोर्ट में अपील की. हाइकोर्ट की सिंगल जज बेंच ने सरकार को आदेश दिया कि वो छात्रों से लिया गया बढ़ा हुआ शुल्क वापस करे. पीछे की तारीख से फीस न बढ़ाई जाए और 2019 से आगे की फीस शुल्क निर्धारण कमेटी तय करे. सिंगल बेंच के इस फ़ैसले के विरोध में निजी कॉलेजों ने हाइकोर्ट में अपील की. हाइकोर्ट की दो जजों की बेंच ने भी सिंगल बेंच के फ़ैसले को क़ायम रखा और एक बार फिर बढ़ी हुई फीस वापस लेने के आदेश दिए. इसके बावजूद निजी कॉलेज मानने को तैयार नहीं हुए और छात्रों पर लगातार बढ़ी हुई फीस देने का दबाव बनाया जाता रहा. कई छात्रों को विरोध करने पर प्रताड़ित भी किया गया. हाइकोर्ट का आदेश लागू नहीं हुआ तो छात्रों ने हाइकोर्ट के आदेश की अवमानना की अर्ज़ी दायर कर दी. अवमानना की अर्जी पर सुनवाई हुई और हाइकोर्ट ने निजी कॉलेजों को आदेश दिया कि वो कोर्ट के पुराने आदेश पर अमल करें. लेकिन कॉलेज मानने को तैयार नहीं हैं. आपको बता दें कि उत्तराखंड में बाबा रामदेव की पतंजलि योगपीठ नाम का निजी आयुर्वेदिक कॉलेज तो है ही, कई अन्य कॉलेज हैं जिनमें राज्य के नामी गिरामी नेताओं और उद्योगपतियों का पैसा लगा है.

इस मामले पर उत्तराखंड में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही एक साथ खड़े हैं क्योंकि हाइकोर्ट के आदेश को लेकर विपक्ष भी चुप्पी साधे हुए है. इस मामले में उत्तराखंड की कुलाधिपति यानी राज्यपाल की उदासीनता भी समझ से परे है जबकि छात्रों और उनके अभिभावकों ने कई बार उनसे अपील की और इस मामले की गंभीरता से अवगत कराया लेकिन किसी को छात्रों की परवाह नहीं.

VIDEO: फीस बढ़ाने के खिलाफ आंदोलित निजी आयुर्वेदिक कॉलेजों के छात्र

17 अक्तूबर के दिन पूर्वी दिल्ली नगर निगम के दफ्तर के बाहर प्रदर्शन हुआ. क्योंकि इन्हें बताया गया कि ज्वॉइनिंग होने लगी लेकिन ज्वॉइनिंग नहीं हुई. मामला यह है कि नगर निगम के स्कूलों के लिए 4000 शिक्षकों की 15 अक्तूबर को ज्वॉइनिंग होनी थी. जब कैट के आदेश को लेकर नहीं हुई तो प्रदर्शन किया. मगर उत्तरी नगर निगम में ज्वॉइनिंग हो गई. प्रदर्शन के बाद. उत्तरी नगर निगम में 1600 के करीब शिक्षकों की ज्वॉइनिंग हो गई. लेकिन पूर्वी और दक्षिण दिल्ली के 1800 और 750 शिक्षकों की ज्वॉइनिंग नहीं हुई. इस कारण यहां पर पूरे दिन प्रदर्शन पर बैठे रहे. महिला शिक्षकों ने खासतौर से रेखांकित किया कि वे करवा चौथ के दिन भी धरने पर बैठी हैं. 16 अक्तूबर को बीजेपी अध्यक्ष मनोज तिवारी ने इनके बीच पहुंच कर आश्वासन दिया. दिल्ली बीजेपी ने प्रेस रीलीज जारी किया जिसमें लिखा है पूर्वी और दक्षिण दिल्ली नगर निगम द्वारा नव नियुक्त शिक्षकों की नियुक्तियां रद्द करने के मामले में आज बीजेपी अध्यक्ष मनोज तिवारी ने हस्तक्षेप किया. शिक्षकों से समस्याएं सुनी और निगम मुख्यालय में महापौर से बात की. अधिकारियों के साथ बैठक में विचार विमर्श किया. मनोज तिवारी ने ट्वीट भी किया कि तीनों निगमों में सभी अध्यापकों की ज्वॉइनिंग मुबारक. मोदी सरकार में अन्याय नहीं होने देंगे. सांसद गौतम गंभीर ने भी ट्वीट किया कि सभी की समस्याओं का हल निकाल लिया गया है. तुरंत एक्शन लेने के लिए एमसीडी का धन्यवाद. शिक्षकों को लगा कि रास्ता साफ हो गया है मगर आज उनकी ज्वॉइनिंग नहीं हुई और न ही उन्हें कुछ बताया गया. इसलिए वे तीन दिनों से ये धरने पर बैठे हैं. आखिर मनोज तिवारी के ट्वीट के अनुसार एक ज़ोन में नियुक्ति हो गई तो बाकी ज़ोन में क्यों नहीं हुई. जबकि इन शिक्षकों के बीच एमसीडी की स्थायी समिति के चेयरमैन ने भी आश्वासन दिया था कि 17 को ज्वॉइनिंग हो जाएगी. उन्हें निगम आयुक्त से मिलना होगा. मगर 17 को ज्वॉइनिंग नहीं हुई. मनोज तिवारी को भी पता करना चाहिए हुआ क्या.

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VIDEO: दिल्‍ली नगर निगम स्कूलों में ज्वॉइनिंग के लिए प्रदर्शन



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