बीजेपी के संकल्प पत्र से बाकी बड़े नेता ग़ायब क्यों?

वसुंधरा राजे, शिवराज सिंह चौहान और रमन सिंह मुख्यमंत्री नहीं हैं. सुषमा स्वराज और अरुण जेटली चुनाव नहीं लड़ रहे हैं. राजनाथ सिंह चुनाव लड़ रहे हैं मगर उनकी तस्वीर नहीं है.

11 अप्रैल को पहला मतदान है. मतदान से ठीक तीन दिन पहले भाजपा का घोषणापत्र आया है. 2014 और 2019 के घोषणापत्र के कवर को ही देखें तो बीजेपी या तो बदल गई है या फिर बीजेपी में सिर्फ प्रधानमंत्री मोदी रह गए हैं. 2014 में कवर पर 11 नेता थे. इनमें से अटल बिहारी वाजपेयी और मनोहर पर्रिकर अब दुनिया में नहीं हैं. आडवाणी और मुरली मनोहन जोशी को टिकट नहीं मिला है. वसुंधरा राजे, शिवराज सिंह चौहान और रमन सिंह मुख्यमंत्री नहीं हैं. सुषमा स्वराज और अरुण जेटली चुनाव नहीं लड़ रहे हैं. राजनाथ सिंह चुनाव लड़ रहे हैं मगर उनकी तस्वीर नहीं है.

2019 के घोषणा पत्र के कवर पर सिर्फ मोदी हैं. बीजेपी इस पर गर्व करती थी कि उसके पास नेताओं की भरमार है मगर अब सिर्फ मोदी ही मोदी हैं. कवर के पीछे तीन तस्वीर है. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, दीनदयाल उपाध्याय और अटल बिहारी वाजपेयी. आडवाणी नहीं हैं. संकल्पित भारत, सशक्त भारत लिखा है. घोषणा पत्र के भीतर प्रधानमंत्री मोदी, अध्यक्ष अमित शाह और गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने अलग-अलग संदेश लिखा है.

प्रधानमंत्री ने लिखा है कि नया भारत अतीत की बेड़ियों से आज़ाद हो चुका है. आज हमारा देश बड़े सपने देखने की हिम्मत भी करता है और उन्हें पूरा करने का जज़्बा भी रखता है. पिछले पांच वर्षों में प्रत्येक परिवार को जन-धन योजना के कारण बैंक खाता मिला, 50 करोड़ भारतीयों को आयुष्मान भारत की बदौलत बीमारी से लड़ने का हौसला मिला और असंगठित क्षेत्र के 40 करोड़ से अधिक लोग अब पेंशन का लाभ ले सकते हैं. हमारा राष्ट्र अब निर्दयी आतंकी ताकतों के सामने लाचार नहीं है. देश की शांति और एकता के माहौल को नुकसान पहुंचाने वाली हर विनाशकारी विचारधारा को करारा जवाब दिया गया है. उन्हें पहली बार सूद समेत उन्हीं की भाषा में जवाब मिला है.

घोषणापत्र में बीजेपी ने आज़ादी के 75वें साल के लिए 75 लक्ष्य तय किए हैं. मोदी सरकार के 5 साल में किसानों के कई आंदोलन हुए. खेती की बात करें तो वास्तविक मज़दूरी और आय में भयंकर कमी की रिपोर्ट आती रही है. किसानों के लिए घोषणापत्र में सबसे बड़ी बात है कि भविष्य में न्यूनतम समर्थन मूल्य कितना देंगे यह सब नहीं लिखा है. यही लिखा है कि ई-नाम, ग्राम और प्रधानमंत्री आशा योजना के ज़रिए न्यूनतम समर्थन मूल्य प्राप्त करने के लिए पर्याप्त बाज़ार अवसर उपलब्ध कराए जाएंगे. बस इतना ही. इस मामले में यह साहसिक कदम है. सरकार का दावा रहा है कि उसने लागत से दुगना दाम दिया है मगर हकीकत कुछ और है. अंतिम बजट में पीएम किसान सम्मान योजना इस बात का प्रमाण है कि खेती किसानी में आर्थिक संकट भयंकर है. तबी तो लैंड होल्डिंग के आधार पर 2 हेक्टेयर वाले किसानों को एक साल में 6000 रुपये देने की योजना आई. अब बीजेपी ने कहा है कि अब सभी किसानों को साल में 6000 रुपये मिलेंगे. इसमें ज़मीन को लेकर कोई शर्त नहीं होगी. 2011-12 की कृषि गणना के अनुसार देश में 13 करोड़ 80 लाख किसान हैं. पीएम किसान का बजट 75,000 करोड़ था जिसे आप 6000 से भाग देंगे तो 12 करोड़ किसान होते हैं. यानी सभी सीमांत और लघु किसान इस योजना के दायरे में अभी ही आते हैं. बाकी बच गए 1 करोड़ 80 लाख किसान तो ये किसान कौन हैं. कृषि गणना के अनुसार ज्वाइंट प्रॉपर्टी है, संस्थाओं के पास ज़मीनें हैं. क्या बड़े और संपन्न किसानों को भी 6000 रुपये साल के मिलेंगे. तो क्या चंद सौ करोड़ जोड़ कर सिर्फ नारे को बड़ा किया गया है कि सभी किसानो को साल में 6000 करोड़ मिलेगा.

ग्रामीण क्षेत्र में 25 लाख करोड़ का निवेश. 2009-19 तक कृषि का बजट जोड़ लें तो वह छह लाख करोड़ भी नहीं पहुंचती है. यह भी सही है कि मोदी सरकार ने आखिरी बजट में कृषि का बजट 1 लाख 40 करोड़ से अधिक कर दिया. इतनी वृद्धि कभी नहीं हुई थी. कृषि और ग्रामीण क्षेत्र में 25 लाख करोड़ का वादा बहुत बड़ा है कम से कम बीजेपी को पूरा प्लान बताना चाहिए था ताकि कांग्रेस को पता चलता कि घोषणा पत्र कैसे डिटेल में बनाया जाता है. जो सवाल बीजेपी कांग्रेस से कर रही थी, वही अब उससे है. किसानों के लिए वादा करते समय साफ दिखता है कि बीजेपी के पास बड़ा आइडिया नहीं है. बीजेपी ने घोषणापत्र में बताया है कि काफी समय से अटकी पड़ी 31 सिंचाई परियोजनाओं को पूरा किया गया है. बाकी दिसंबर 2019 तक पूरी होंगी.


घोषणापत्र में लिखा है कि देश के सभी छोटे और सीमांत किसानों के लिए 60 साल के बाद पेंशन की योजना आरंभ की जाएगी. पेंशन की राशि कितनी होगी, इसका कोई ज़िक्र नहीं है. 1 से 5 साल के लिए ज़ीरो परसेंट ब्याज़ पर 1 लाख तक के अल्पावधि ऋण मूल राशि के समय पर भुगतान की शर्त पर देंगे. अभी भी समय पर लोन चुकाने पर किसानों को 4 परसेंट ब्याज़ देना पड़ता है और राज्यों में 2 परसेंट का ब्याज़ लगता है.

घोषणा पत्र में कहा गया है कि फसल बीमा योजना को अब स्वैच्छिक किया जाएगा. मगर इसका प्रावधान तो पहले से ही है. आप वेबसाइट पर जाकर खुद भी प्रधानमंत्री फसल बीमा की गाइडलाइन देख सकते हैं. कांग्रेस ने फसल बीमा के बारे में कहा है कि वह इस पालिसी को बदल देगी और कंपनियों को मजबूर करेगी कि न लाभ न हानि के सिद्धांत पर बीमा दे. आर्गेनिक फार्मिंग पर अच्छी बातें इस बार भी है मगर पिछली बार का ही वादे को लेकर सवाल हैं. 300-400 करोड़ होता है और उसमें से भी जो खर्च होने वाली राशि है वो कम ही होती गई. बीजेपी ने कहा है कि नेशनल हाईवे के किनारे राष्ट्रीय वेयरहाउसिंग ग्रिड की स्थापना करेंगे. पांच साल में कितने कोल्ड स्टोरेज बने इसी का हिसाब दिया जा सकता था. कांग्रेस ने भी कोल्ड स्टोरेज बनाने का वादा किया है. यह वो वादा है जो पिछले बीस साल से कई बजट और चुनावों में सुनता रहता हूं. आतंकवाद के प्रति ज़ीरो टारलेंस की नीति अपनाई जा रही है.

क्या रोज़गार पर घोषणापत्र में कुछ भी नहीं है. कांग्रेस का आरोप है कि रोज़गार पर कुछ नहीं कहा गया है. कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में वादा किया है कि एक साल में केंद्र के 4 लाख खाली पदों को भरेंगे. 12 महीने के भीतर अनुसूचित जाति, जनजाति और ओबीसी के खाली पदों को भर देंगे. अखिलेश यादव ने अपने घोषणापत्र में वादा किया है कि एक लाख सरकारी पदों को एक साल में भरेंगे. बीजेपी ने अपने घोषणा पत्र में सरकरी पदों के बारे में कुछ नहीं कहा है. सरकारी भरतियों की परीक्षा व्यवस्था में सुधार का वादा किसी ने नहीं किया है.

रोज़गार के नए अवसर प्रदान करने के लिए 22 चैंपि‍यन सेक्टर की पहचान की जाएगी. रक्षा एवं फार्मास्युटिकल में रोज़गार सृजन की दिशा में कार्य करेंगे. स्टार्ट अप के लिए 50 लाख का कोलेटरल मुक्त कर्ज दिया जाएगा. मुदा योजना के तहत 30 करोड़ लोगों को लोन दिया जाएगा.

बीजेपी लगता है कि स्टार्ट अप और स्व रोज़गार पर ही फोकस बनाए रखना चाहती है. यह बड़ी बात है कि वह सरकारी नौकरियों के दबाव में नहीं आई और न ही इस संबंध में कोई वादा किया है. सरकारी भर्तियों की परीक्षा व्यवस्था को लेकर भी कोई वादा नहीं है. बीजेपी ने इस मामले में कांग्रेस से प्रतियोगिता करना ज़रूरी नहीं समझा. शायद उसने सरकारी नौकरियों के सवाल को कांग्रेस का वाइड बॉल समझ कर छोड़ दिया है. क्या बीजेपी सिटिजन अमेंडमेंट बिल को लेकर वाकई सीरीयस है, अगर है तो इन पांच साल में क्यों नहीं पास करा सकी. क्यों बीच रास्ते में छोड़ दिया. 15 जुलाई 2016 को यह बिल लोकसभा में पेश हुआ, 8 जनवरी 2019 को पास हुआ मगर राज्यसभा में मोदी सरकार ने इसे छोड़ दिया. क्योंकि तब असम सहित पूर्वोत्तर के राज्यों में भयंकर तूफान मच गया था. इस बिल के तहत पाकिस्तान, बाग्लादेश, अफगानिस्तान से हिन्दू, सिख बौर्ध पारसी या ईसाई को भारतीयन नागरिकता दिए जाने की बात थी.

मगर मोदी सरकार के कार्यकाल में पास नहीं हो सका क्योंकि पूर्वोत्तर में आंदोलन होने लगा था. असम सरकार में सहयोगी रही असम गण परिषद बाहर हो गई. अब जब बीजेपी ने अपना सुर बदला है तो वापस असम गण परिषद बीजेपी के इस वादे का स्वागत करेगी. नेशनल रजिस्टर का काम भी तेज हो रहा था. घुसपैठियों को लेकर बयान दिए जा रहे थे मगर इसकी गति धीमी क्यों कर दी गई. क्यों सुप्रीम कोर्ट को काम पूरा करने के लिए फटकार लगानी पड़ रही है क्योंकि सामने घुसपैठिये नहीं, अब वोट है. 5 फरवरी 2019 की इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार भारत सरकार ने कहा था कि नेशनल रजिस्टर पर काम करने वाली सुरक्षा बलों को चुनाव के काम के लिए वापस लिया जाए तो सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसा लगता है कि गृहमंत्रालय चाहता ही नहीं है कि नेशनल रजिस्टर का काम पूरा हो और वह इस पूरी प्रक्रिया को नष्ट कर देना चाहता है. इंटरनेट सर्च कीजिए, तो पता चलेगा कि इसकी वजह से चुनावी गणित को नुकसान हो रहा था इसलिए अचानक इसे लेकर भाषणबाज़ी भी कम हो गई थी.

पुलिस बलों के आधुनिकीकरण की बात घोषणापत्र में है. पुलिस सुधार का कार्य तेजी से किया जाएगा. इसकी हकीकत कुछ और है. 23 अप्रैल 2018 को दि वायर में गौरव विवेक भटनागर की एक लंबी रिपोर्ट है. दस साल से अधिक वक्त हो गया, 2006 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर पुलिस सुधार होना था किसी भी सरकार ने इसे लागू नहीं किया. Commonwealth Human Rights Initiative (CHRI) ने एक अध्ययन किया और नतीजा यह निकला कि मात्र 18 राज्यों ने नया पुलिस एक्ट पास किया है. बाकी ने नोटिफिकेशन जारी कर पीछा छुड़ा लिया. 23 राज्यों ने पुलिस प्रमुख की नियुक्ति के दिशानिर्देशों को नज़रअंदाज़ कर दिया. दो साल का न्यूनतम कार्यकाल तय किया गया मगर सिर्फ चार राज्य ऐसे थे जिन्होंने दो साल का कार्यकाल दिया था.

आज भी पुलिस प्रमुख की नियुक्ति से लेकर एसएसपी के तबादले में मुख्यमंत्री से लेकर परिवहन मंत्री तक की मनमानी चल रही है. प्रधानमंत्री राज्यों के पुलिस प्रमुखों के साथ सालाना बैठकें करते रहे मगर पुलिस सुधार पर कभी ज़ोर नहीं दिया. को लेकर जिन प्रकाश सिंह ने मुकदमा लड़ा वो अखबारों में अपनी निराशा ज़ाहिर करते रहे. यही नहीं पुलिस बल में भरती की हालत भी बदतर है. अगस्त 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने 14 राज्यों को आदेश दिया था कि राज्यों में 4 लाख से अधिक वैकेंसी है उसे पूरा करें. 21 मार्च 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने एक सख्त आदेश जारी किया और सभी हाई कोर्ट से कहा कि वे पुलिस की भरती में खुद ही जनहित याचिका दायर करें. राज्यों में बहाली नहीं हो रही है.

सभी किसानों को साल में 6000, 60 साल के सीमांत किसानों को पेंशन, कितनी पेंशन ज़िक्र नहीं. उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, यूपी, मध्य प्रदेश में 1000 किसान पेंशन योजना चल रही है. हरियाणा सरकार ने फरवरी 2019 में परिवार सम्मान योजना का एलान किया था. इसके तहत 5 एकड़ भूमि तक खेती करने वाले और 15000 से कम कमाने वाले किसानों को साल में छह हज़ार दिया जाएगा. महीने का 500. सभी छोटे व्यापारियों को पेंशन देने का वादा किया है, मगर राशि कितनी होगी, इसका ज़िक्र नहीं है. इससे सरकार के खजाने पर क्या असर पड़ेगा, मिडिल क्लास पर टैक्स का बोझ बढ़ेगा, यह सब बीजेपी ने उसी तरह से नहीं बताया जैसे कांग्रेस ने नहीं बताया.

हर घोषणापत्र में पेंशन का ज़िक्र है. लेकिन सरकारी कर्मचारी पुरानी पेंशन स्कीम मांग रहे हैं. उसका कोई ज़िक्र नहीं है. डीएमके और शिवपाल यादव की प्रगतिशील समाजवादी पार्टी ने ही पुरानी पेंशन व्यवस्था बहाल करने की बात की है. इस पर कांग्रेस और बीजेपी ने कुछ नहीं कहा है.

बीजेपी ने अपने घोषणा पत्र में 75 नए मेडिकल कालेज और स्नातकोत्तर मेडिकल कालेज की स्थापनी का आरंभ लिखा है. कहा है कि पांच सालों में एमबीबीएस की 18000 सीटें बढ़ाई हैं. एमडी के सीटों के बारे में ठोस कहा जा सकता था. इसे बढ़ाने की बहुत ज़रूरत है. बीजेपी ने कहा है कि वह 1400 की आबादी पर एक डाक्टर का अनुपात लाने का प्रयास करेगी.

सेंट्रल ब्यूरो ऑफ हेल्थ इंटेलिजेंस की 2018 की नेशनल हेल्थ प्रोफाइल देखनी चाहिए. 11,082 लोगों के लिए केवल एक सरकारी एलोपैथिक डाक्टर उपलब्ध है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 1000 लोगों पर एक डाक्टर होना चाहिए. बिहार में 28,000 लोगों पर एक डाक्टर है. यूपी में 19,962 लोगों पर एक डाक्टर है.

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इस वक्त राष्ट्रीय औसत 11,000 की आबादी पर एक डाक्टर है. बीजेपी ने कोई डेडलाइन नहीं दी है. कब तक करेंगे. क्या बीजेपी 75 मेडिकल कालेज खोलकर वाकई 11000 से घटाकर 1400 लोगों पर एक डाक्टर का औसत पा लेगी. घोषणापत्र में एक जगह कहती है कि भारत के हर ज़िले में मेडिकल कालेज खोले जाएंगे फिर एक जगह कहती है कि 75 मेडिकल कालेज खोलेंगे. भारत में 600 से अधिक ज़िले है. कांग्रेस और डीएमके ने नीट परीक्षा व्यवस्था में बदलाव की बात कही है, बीजेपी ने इसे छोड़ दिया है. स्कूलों में कई लाख शिक्षकों के पद खाली हैं. इन पदों पर बहाली का कोई प्रोग्राम नहीं है. 2014 के चुनाव के पहले से नरेंद्र मोदी रेल यूनिवर्सिटी की खूब बातें करते थे. लगता था कि कोई नया आइडिया है. 5 साल पूरे हो गए मगर इस यूनिवर्सिटी का कैंपस बनकर तैयार नहीं हुआ है. 2018 में इसे डीम्ड यूनिवर्सिटी का दर्जा दिया गया, इसका पहला बैच शुरू हुआ है. 200 छात्रों ने एडमिशन लिया है. किसी और जगह पर उन्हें पढ़ाया जा रहा है. अब एक और नया आइडिया है पुलिस यूनिवर्सिटी का. हमने यूनिवर्सिटी सीरीज के तहत पचीसों एपिसोड किए. कस्बों से लेकर महानगरों के कालेजों का जो हाल देखा है, उन्हें मज़बूत करने का कोई ठोस प्लान नहीं दिखता है. कालेजों और सेंट्रल यूनिवर्सिटी में खाली पद कब भरे जाएंगे, इसका कोई ज़िक्र नहीं है. घोषणापत्र में कहा गया है कि 2022 तक सभी रेल पटरियों को ब्रॉड गेज में बदल दिया जाएगा. लेकिन 2018-19 के बजट में नई लाइनें, गेज परिवर्तन का जो लक्ष्य था उसका 50 प्रतिशत भी पूरा नहीं हो सका. 1000 किमी नई लाइनें बिछाने का लक्ष्य था मगर साल खत्म होने तक करीब 212 किमी नई लाइनें ही बिछ सकीं. नवंबर 2018 तक गेज परिवर्तन का काम केवल 21 प्रतिशत ही हो पाता. 2 फरवरी 2019 की सीएनबीसी की रिपोर्ट है.

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बीजेपी ने अपने पारंपरिक मुद्दों पर कुछ न कुछ न कहा है. 2014 में जो कहा था, वही 2019 में कह रहे थे. 2014 में कहा था कि बीजेपी संविधान के ढांचे के अंतर्गत राम मंदिर बनाने की सभी संभावनाओं का पता लगाएगी. 2019 में भी करीब करीब वही भाषा लिखी गई है. यूनिफार्म सिविल कोड पर अपना पुराना स्टैंड दोहराया है. लेकिन पांच सालों में इस पर सरकार क्यों नहीं कानून ला सकी. यह रिपोर्ट 31 अगस्त 2018 को आई थी. लॉ कमीशन ने कहा था कि यूनिफार्म सिविल कोड न तो ज़रूरी हैं न किए जाने की ज़रूरत है. उस समय किसी न्यूज़ चैनल पर हंगामा देखा हो, सरकार की कोई अतिरिक्त पहल याद हो तो मुझे भी बताइयेगा. कांग्रेस के अलावा अन्य विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया, मगर उससे पहले एक बात. हमने घोषणापत्र की सभी बातें नहीं बताईं हैं. आप खुद भी पढ़ें. ऑनलाइन है. मंगलवार के अखबार में जब बीजेपी का घोषणापत्र छपेगा तो आप कांग्रेस के घोषणापत्र के समय अपने अखबार के कवरेज को निकालें. दोनों में तुलना करें. आपको कवरेज के अंदाज़ से पता चलेगा कि इस चुनाव में मीडिया भी चुनाव लड़ रहा है. खासकर हिन्दी अखबारों को ध्यान से पढ़ा कीजिए.