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आख़िर कांग्रेस ख़त्म क्यों नहीं होती?

जब लोगों को लगा कि योगेंद्र यादव कांग्रेस की किसी सकारात्मक भूमिका से ही इनकार कर रहे हैं तो उन्होंने फिर स्पष्ट किया कि वे अतीत में कांग्रेस के ऐतिहासिक योगदान की बात नहीं कर रहे, आने वाले दिनों में उसकी भूमिका की चर्चा कर रहे थे.

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आख़िर कांग्रेस ख़त्म क्यों नहीं होती?

योगेंद्र यादव के ट्वीट को लेकर हंगामा हो रहा है, लेकिन उसे ध्यान से देखने की ज़रूरत है. उन्होंने लिखा है, 'कांग्रेस को ख़त्म हो जाना चाहिए. अगर वो भारत के विचार की रक्षा के लिए बीजेपी को इन चुनावों में रोक पाने में नाकाम रही तो इस पार्टी के लिए भारतीय इतिहास में कोई सकारात्मक भूमिका नहीं है. आज किसी विकल्प के निर्माण में ये सबसे बड़ी बाधा की प्रतिनिधि है.' जब लोगों को लगा कि योगेंद्र यादव कांग्रेस की किसी सकारात्मक भूमिका से ही इनकार कर रहे हैं तो उन्होंने फिर स्पष्ट किया कि वे अतीत में कांग्रेस के ऐतिहासिक योगदान की बात नहीं कर रहे, आने वाले दिनों में उसकी भूमिका की चर्चा कर रहे थे.

बहरहाल यह पहली बार नहीं है जब किसी ने कांग्रेस के ख़ात्मे की ज़रूरत बताई हो. अब यह बात सर्वविदित है कि सबसे पहले महात्मा गांधी ने ही कांग्रेस को ख़त्म करने और इसकी जगह लोक सेवक संघ गठित करने का सुझाव दिया था. गांधी जी की हत्या के बाद कांग्रेस के भीतर यह मुद्दा उठा भी, लेकिन स्वतंत्रता प्राप्ति के तत्काल बाद उपजी हुई परिस्थतियां ऐसी नहीं रह गई थीं कि कांग्रेस के विसर्जन की कोई रूपरेखा बन पाती. इसके बाद कांग्रेस के ख़ात्मे का सुझाव तो नहीं आया, लेकिन उसके ख़त्म हो जाने की भविष्यवाणी कई बार हुई. 1967 में जब पहली बार नौ राज्यों में गैरकांग्रेसी सरकारें बनीं तब कहा गया कि कांग्रेस ख़त्म हो गई है. 1969 में जब कांग्रेस टूटी तब कहा गया कि अब कांग्रेस नहीं बचेगी. 1977 में इंदिरा गांधी की हार के बाद तो मान लिया गया कि कांग्रेस वाकई ख़त्म हो चुकी है. 1984 में इंदिरा गांधी की मृत्यु के बाद मान लिया गया कि अब कांग्रेस नहीं लौटेगी. 1996 में नरसिंह राव की सरकार गिरने और गठबंधन राजनीति का दौर शुरू होने के साथ बाकायदा भविष्यवाणी की गई कि अब तो कांग्रेस की वापसी असंभव है. 1998 के बाद राजनीति में नई-नई आई सोनिया गांधी का लगभग उसी तरह मज़ाक बनाया जाता था जिस तरह पिछले कुछ वर्षों में राहुल गांधी का बनाया जाता रहा है.


लेकिन कांग्रेस बार-बार किसी चमत्कार की तरह जीवित हो जाती रही. लोहिया जैसे दार्शनिक-राजनेता का समाजवाद पीछे छूट गया और बैंकों, कोयले खानों का राष्ट्रीयकरण करने से लेकर गरीबी हटाओ तक का नारा देने वाली कांग्रेस आगे बढ़ गई. 1977 की दूसरी आज़ादी और जयप्रकाश की संपूर्ण क्रांति हादसे की शिकार हो गई और इंदिरा गांधी फिर सत्ता में लौटीं. 1984 में राजीव गांधी की हार की घोषणा करने वाले माफ़ी मांगने को मजबूर हुए और बीजेपी दो सीटों तक सिमट कर रह गई. 2004 में अटल-आडवाणी की महाकाय लगती जोड़ी को हरा कर सोनिया गांधी की कांग्रेस ने वापसी कर ली.

आख़िर यह कौन सी संजीवनी है जो कांग्रेस को बार-बार जिला देती है? क्या यह आज़ादी की लड़ाई से कमाया हुआ पुण्य है जो अब तक काम आ रहा है? 30 साल पहले यह बात सही लग सकती थी लेकिन अब वह पीढ़ी जा चुकी है जिसने आज़ादी की लड़ाई देखी है या अपने बड़ों से उसकी कहानियां सुनी हैं. अब तो जो पीढ़ी है, वह किताबें नहीं, वाट्सऐप मेसेज पढ़ती है और इनमें से ज्यादातर मेसेज आज़ादी की विरासत और जज़्बे को, उसके नेताओं को, गांधी-नेहरू को ख़ारिज करने वाले होते हैं.

दरअसल इस सवाल के जवाब में फिर से योगेंद्र यादव के ट्वीट को देखने की ज़रूरत है. वे कांग्रेस का खात्मा क्यों चाहते हैं? उनका कहना है, अगर कांग्रेस भारत के विचार को संरक्षित नहीं रख पाती तो उसके बचे रहने का मतलब नहीं है. यानी यह कांग्रेस की नहीं, भारत के विचार की चिंता है जिसकी वजह से वे ऐसा बयान देते हैं.

यह भारत का विचार- यह आइडिया ऑफ इंडिया- क्या है? यह विचार एक बहुलतावादी-बहुसांस्कृतिक-बहुधार्मिक-बहुभाषिक भारत का विचार है. इस विचार में कोई एक धार्मिक पद्धति, कोई एक भाषा, कोई एक संस्कृति सिर्फ़ अपने बहुसंख्यक होने के आधार पर दूसरे धर्मों, दूसरी भाषाओं और संस्कृतियों को दोयम दर्जे का नहीं मानती, बल्कि यह मानती है कि भारत नाम का विचार सबके मेल से, सबकी बराबरी से और सबकी साझेदारी से फूलता-फलता है.

यह विचार अचानक किसी रात नहीं उपजा है. यह विचार संविधान नाम की किताब में यों ही किसी सिद्धांत की तरह अपना नहीं लिया गया है. यह विचार भारत के पांच हज़ार साल के इतिहास की आंतरिक मुठभेड़ और गत्यात्मकता के बीच विकसित हुआ है. इसमें एक ही साथ आपस में प्रतिस्पर्द्धा करते, कई बार टकराते और कई बार एक-दूसरे को मज़बूत बनाते कई विश्वास पले हैं- सनातन परंपरा में वैष्णव, शैव, शाक्त जैसी आस्थाएं हैं तो बौद्ध और जैन धर्म भी हैं, बाद में आए इस्लाम, पारसी और ईसाई भी इसी परंपरा का हिस्सा हैं. भारत का इस्लाम वही नहीं है जो अरब का इस्लाम है. वह ठेठ भारतीय मौसम में विकसित हुआ फूल है जिसे यहीं की हवा-पानी-खाद-मिट्टी मिली हुई है. भारत के जनजातीय इलाक़ों में रह रहे ईसाइयों को देख लें तो उनमें और जनजातीय समूहों में कोई अंतर मिलता ही नहीं.

बेशक, इस सांस्कृतिक बहुलता की राह में तरह-तरह की सामाजिक कट्टरताओं के अवरोध भी थे. अस्पृश्यता के अलावा हिंदू-मुस्लिम प्रतिस्पर्धा भी भारतीय समाज की एक समस्या रही. लेकिन इस समस्या से लड़ने वाले, इसका मज़ाक बनाने वाले लोग भी रहे. ये लोग न होते तो कबीर को कौन बचाता, कौन याद रखता? अमीर ख़ुसरो भारत की सांगीतिक-शास्त्रीय परंपरा का अविच्छिन्न हिस्सा कैसे बन पाते?

आज़ादी की लड़ाई के दौर में लेकिन भारत ने इस बहुलतावादी परंपरा के बीच अपना एक मानस बनाया. महात्मा गांधी ने अपनी प्रार्थना सभाओं के लिए जो भजन चुने, वे सब मध्य काल के कवियों के यहां से चुने- वे वेद ऋचाओं के आकर्षण और आतंक में नहीं पड़े. उन्हें मालूम था कि भारत की आत्मा कहां बसती है. 1933 में एक बार जब उन्हें गिरफ़्तार किया गया तो मजिस्ट्रेट ने पूछा कि वे कौन हैं. गांधी ने खुद को न स्वाधीनता का सिपाही बताया न संत बताया, उन्होंने कहा कि वे बुनकर हैं- जुलाहे. एक ही झटके में उन्होंने ख़ुद को और अपनी लड़ाई को कबीर की परंपरा से जोड़ लिया.

दरअसल यही भारत का विचार है- आइडिया ऑफ इंडिया- जिसे आज़ादी की लड़ाई के दौरान सबसे अच्छे से महसूस किया गया और जिसके आधार पर संविधान बनाया गया. यह संविधान इस मायने में एक नया भारत भी बना रहा था कि वह पुराने दौर की कट्टरताओं, विषमताओं, अन्यायों को पीछे छोड़ कर आगे बढ़ने का रास्ता सुझा रहा था.

आज़ादी के बाद कांग्रेस इस भारत की प्रतिनिधि बनी रही. वह तरह-तरह के मतों, विचारों, अलग-अलग भाषाओं और अंचलों को आपस में जोड़ती रही. जब कांग्रेस यह ताकत खो बैठी तो एक तरफ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और दूसरी तरफ़ सामाजिक न्याय की ताकतों का उदय हुआ. आज हम पा रहे हैं कि भारत का यह विचार खतरे में है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके अनुषंगी संगठन जिस इकहरे भारत का सपना पालते रहे, 2014 के बाद से उस पर अमल का काम जारी है. एक बहुत आक्रामक किस्म का बहुसंख्यकवाद समूचे भारत पर अपनी इकलौती दावेदारी जता रहा है और दूसरे समुदायों को लेकर तरह-तरह के डर दिखा रहा है.

कांग्रेस का काम इस बहुसंख्यकवाद से भी लड़ना है. अगर वह न लड़ सके तो उसे हट जाना चाहिए और उन ताकतों को कमान सौंप देनी चाहिए जो यह लड़ाई लड़ सकते हैं, इससे जुड़ी विचारधारा की राजनीति कर सकते हैं. भारत में गांधी-लोहिया के समाजवाद और अंबेडकर के दलितवाद की साझेदारी शायद उस सपने की ओर बढ़ने का एक रास्ता बना सकती है. इसमें संदेह नहीं कि अपनी राजनीतिक प्रगतिशीलता के बावजूद कांग्रेस अपने सामाजिक चाल-चरित्र में अरसे तक उदार बहुसंख्यकवाद की ही नुमाइंदगी करती रही. इसकी वजह से भी बीजेपी का रास्ता आसान हुआ.

लेकिन इसमें शक नहीं कि सोनिया-राहुल की कांग्रेस अपने चरित्र में इंदिरा-राजीव की कांग्रेस से भिन्न है. कई अर्थों में वह प्रगतिशील भी है और लोकतांत्रिक समावेशिकता में भरोसा रखने वाली भी. यही वजह है कि सपा-बसपा जैसे अस्मितावादी दलों या सीपीएम-सीपीआई जैसे वाम दलों से उसका झगड़ा उतना तीखा नहीं है. उल्टे कई जगह दोनों लगभग साथ चलते दिखाई पड़ते हैं.

कहने की ज़रूरत नहीं कि कांग्रेस को बचना होगा तो इसी रूप में बचना होगा और विकल्प की राजनीति में ज़रूरत पड़ने पर अपने को पीछे भी रखना होगा. कांग्रेस के ख़ात्मे का मतलब वर्चस्व की उसकी लालसा के खात्मे से है. वैसे कांग्रेस के अंत की घोषणा कर रहे लोगों को इतिहास देखना चाहिए और समझना चाहिए कि कांग्रेस एक राजनीतिक दल नहीं, एक सामाजिक प्रवृत्ति है जिसकी ओर यह देश बार-बार लौटने को मजबूर होता है.

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प्रियदर्शन NDTV इंडिया में सीनियर एडिटर हैं..

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