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सबसे भले नेहरू, कम से कम सबके काम तो आ रहे हैं !

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सबसे भले नेहरू, कम से कम सबके काम तो आ रहे हैं !

महात्मा गांधी के साथ जवाहर लाल नेहरू (फाइल फोटो)

जवाहरलाल नेहरू के बारे में बात करते हुए कौन डरते हैं? वह डरते हैं, जिनके पास बात करने के लिए तथ्‍य नहीं हैं. कहने को कुछ न हो तो गाली देना शुरू कर दीजिए. निजी जीवन पर हमले और आरोप मढ़ दीजिए. ऐसे अफसर का तबादला करिए जो नेहरू को याद कर ले...
 
लेकिन आप किस-किस का तबादला करेंगे? किन-किन को धमकी देंगे? आप धमका सकते हैं, हत्‍या करवा सकते हैं, लेकिन आप... 'डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया' को पढ़ नहीं सकते. यहां तक कि रामचंद्र गुहा की 'इंडिया आफ्टर गांधी' में संक्षेप में भी नेहरू को नहीं समझ सकते.
 
कुल मिलाकर हम समझने-संवाद-बहस करने के अलावा सब कर सकते हैं. आप एक-एक करके गरीबों, खेतिहर मजदूरों की योजनाओं को री-पैकेज कर रहे हैं, लेकिन उस जवाहरलाल को, जिसे विरासत में बस बिखरा और कभी भी टूट सकने वाला हिंदुस्‍तान मिला था, उसके काम करने, देश को गढ़ने और संवारने के बारे में बात नहीं करते.
 
आप कुछ नहीं करते. बस ट्वि‍टर और फेसबुक पर हैशटैग के साथ गालियां देना शुरू कर देते हैं. फि‍र इसी गाली को मीडिया उठा लेता है, कुछ ही देर में. अगली सुबह अखबार अच्‍छी तरह गरियाने वालों की टिप्‍पणियां छापते हैं.
 
और इस तरह से कुछ ही देर में आप भारत के पहले प्रधानमंत्री और विश्‍वनेता पर अपनी पूरी कुंठा निकाल देते हैं. तनावमुक्‍त हो जाते हैं. अच्‍छा है, नेहरू हमसे विदा होने के बाद भी हमारे काम आ रहे हैं. वरना आजकल के नेता तो जीवित रहते हुए ही अप्रासंगिक हो जाते हैं...
 
नेहरू की विरासत को उनके बाद उनके वारिस तबाह कर रहे हैं, तो इससे उन्‍हें बरी करिए. भारतीय पंरपरा पुरखों को उनके किए के लिए आदर देने की है, उनके योगदान को तबाह करने वालों के लिए 'रिवर्स में अनादर' करने का यह नया चलन कथित 'सोशल' मीडिया के बाद आया है. नेहरू को समझना है तो उनके विरोधियों के पत्र व्‍यवहारों से समझिए. पटेल के साथ पत्र व्‍यवहार को पढि़ए और समझिए. दुर्भाग्‍य से अपने नायकों को जानने-बूझने के लिए पढ़ने के सिवा हमारे पास कोई दूसरा रास्‍ता नहीं है और सोशल मीडिया, राष्‍ट्रप्रेम के रंग में रंगे 'देशप्रेमी' अध्‍ययन के अतिरिक्‍त सब कर सकते हैं...
 
इसलिए आपके पास सीमित विकल्‍प हैं, नेहरू को समझने और परखने के. उन्‍हें याद करना है तो सच्चे वैज्ञानिक दृष्टिकोण और देश को तालिबान संस्‍कृति से बचाने और धर्मांधता की आग में झोंकने से बचाने वाले प्रधानमंत्री के रूप में याद कीजिए. आज मौका है तो चलते-चलते नेहरू की कार्यशैली की छोटी सी झलक देखिए.. प्रधानमंत्री के तौर पर कार्यकाल के दौरान नेहरू के साथ काम कर चुके और उनके पारिवारिक मित्र रहे हरिवंश राय बच्चन अपनी आत्मकथा 'दशद्वार से सोपान तक'  में लिखते हैं .... 'पंडितजी' का एक आदेश लकड़ी के बोर्ड पर लिखा विदेश मंत्रालय के हर कमरे में टंगा रहता था...

 

‘Iam not interested in the excuses for the delay,
Iam only interested in the work done in time.’
 
‘मेरी दिलचस्पी इस में नहीं है कि देरी के लिए क्या सफाई दी जाती है। मेरी दिलचस्पी सिर्फ इस बात में है कि काम वक्त पर पूरा हो।'

यह आदेश आजकल फैशन में चल रहे खाने और न खाने के कसमे वादों से कहीं गहरा है ...
 
नेहरू की किसी से तुलना मत कीजिए. क्‍या आप अपने दादाजी की तुलना दूसरे के दादाजी से करते हैं. नहीं न, ठीक वैसे ही. नेहरू से प्रेम कीजिए, घृणा कीजिए लेकिन उन्‍हें दूसरों के साथ उलझाइए मत, बस पढ़ि‍ये.... बिना किसी को जाने, उसे गाली भी भला ठीक से कैसे दे पाएंगे...


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दयाशंकर मिश्र khabar.ndtv.com के संपादक हैं.

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) :इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति एनडीटीवी उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार एनडीटीवी के नहीं हैं, तथा एनडीटीवी उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.



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