मायावती को क्यों आया गुस्सा?

कांग्रेस नेताओं खासतौर से दिग्विजय सिंह पर मायावती ने तीखा हमला बोला है और गठबंधन न होने के लिए उन्हें जिम्मेदार बताया है.

मायावती को क्यों आया गुस्सा?

बसपा प्रमुख मायावती ने कांग्रेस से गठबंधन नहीं होने के लिए दिग्विजय सिंह को जिम्‍मेदार ठहराया

बीएसपी प्रमुख मायावती ने कांग्रेस को करारा झटका दिया है. मायावती ने छत्तीसगढ़ के बाद मध्य प्रदेश और राजस्थान में भी कांग्रेस से गठबंधन करने से इनकार कर दिया. उन्होंने कहा है कि कांग्रेस की रस्सी जल गई पर बल नहीं गए. कांग्रेस नेताओं खासतौर से दिग्विजय सिंह पर मायावती ने तीखा हमला बोला है और गठबंधन न होने के लिए उन्हें जिम्मेदार बताया है. मायावती का यह रुख कांग्रेस के लिए राजस्थान तो नहीं लेकिन मध्य प्रदेश में दिक्कत खड़ी कर सकता है जहां पार्टी पिछले पंद्रह साल से सत्ता से बाहर है. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ इस उम्मीद में थे कि मायावती के साथ बात बन जाएगी. लेकिन मायावती ने तीखा हमला करते हुए कांग्रेस से गठबंधन को पूरी तरह से नकार दिया है.

मायावती यहीं नहीं रुकीं. उन्होंने दिग्विजय सिंह जैसे कांग्रेस नेताओं पर जम कर हमला बोला. उन्होंने कहा कि गठबंधन न होने के लिए उनके जैसे नेता ही जिम्मेदार हैं क्योंकि सोनिया गांधी और राहुल गांधी तो दिल से चाहते थे कि बीएसपी के साथ गठबंधन हो.

तो अचानक ऐसा क्या हुआ कि मायावती कांग्रेस के इतनी खिलाफ हो गईं. कर्नाटक में एचडी कुमारस्वामी के शपथ ग्रहण समारोह की ये तस्वीरें अब भी दिलोदिमाग में ताजा हैं. मंच पर मायावती और सोनिया गांधी के बीच गर्मजोशी में कांग्रेस के रणनीतिकारों को मिशन 2019 के लिए बड़ी उम्मीदें नज़र आ रही थीं. इसके बाद कहा जाने लगा था कि कांग्रेस बीजेपी को रोकने के लिए मायावती को प्रधानमंत्री बनाने तक की पेशकश कर सकती है ताकि दलित वोटों को अपने पाले में लाया जा सके. लेकिन देखते ही देखते पहले छत्तीसगढ़ और अब मध्य प्रदेश और राजस्थान में यह समझौता होते-होते टूट गया. कांग्रेस नेता इसके पीछे बड़ी वजह मायावती की ओर से कड़ी सौदेबाजी को बता रहे हैं. जहां मायावती छत्तीगसढ़ में पंद्रह सीटें मांग रही थीं वहीं मध्य प्रदेश में उनकी मांग 50 और राजस्थान में 25 सीटों की थी. कांग्रेस की राजस्थान इकाई वहां बीएसपी के साथ तालमेल के बिल्कुल खिलाफ थी. लेकिन मध्य प्रदेश में कांग्रेस को मायावती की जरूरत थी. फिर भी, राज्य ईकाई इतनी ज्यादा सीटें देने को तैयार नहीं थीं. इसी बीच मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का बयान आया. जिसमें उन्होंने आरोप लगाया कि मायावती इसलिए समझौता नहीं कर रही हैं क्योंकि सीबीआई और ईडी उनके खिलाफ लगा दी गई है.

दिग्विजय सिंह का यह बयान आते ही मायावती बिफर पड़ीं. उन्होंने आनन फानन में प्रेस कांफ्रेंस कर मध्य प्रदेश और राजस्थान में अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया. हालांकि जिस दिन उन्होंने छत्तीसगढ़ के लिए अजीत जोगी की पार्टी के साथ गठबंधन का ऐलान किया था उसी दिन बीएसपी की मध्य प्रदेश ईकाई की ओर से 22 उम्मीदवारों की सूची जारी कर दी गई थी. आज मायावती के निशाने पर दिग्विजय सिंह रहे.

इस ऐलान से मध्य प्रदेश कांग्रेस की उम्मीदें टूट गई हैं. कमलनाथ चाहते थे कि बीएसपी के साथ गोंडवाना गणतंत्र परिषद को भी लाकर राज्य में महागठबंधन किया जाए.

उत्तर प्रदेश से सटी ग्वालियर चंबल संभाग की कम से कम 50 सीटों पर मायावती का असर है. 14 जिले ऐसे हैं जहां बीएसपी जमीन पर मजबूत है. ये हैं पन्ना, छत्तरपुर, सतना, रीवा, सीधी, सिंगरौली, टीकमगढ़, शिवपुरी, अशोकनगर, ग्वालियर, शिवपुर, दतिया, भिंड और मुरैना.

पिछले विधानसभा चुनाव में बीएसपी को सिर्फ चार सीटें मिली थीं. बीएसपी को 6.29% वोट मिले थे. लेकिन दिलचस्प बात यह है कि बीएसपी दस सीटों पर दूसरे नंबर पर आई थी. 17 सीटों पर उसके वोट 20 हजार से ज्यादा और 62 सीटों पर दस हजार से ज्यादा वोट हासिल किए थे. वहीं कांग्रेस 36.68% वोटों के साथ 58 सीटें हासिल हुई थीं. अगर कांग्रेस और बीएसपी दोनों के वोट मिला दिए जाएं तो यह आंकड़ा 42.67% बनता है जो बीजेपी को मिले 44.88% के करीब पहुंच जाता है.

यही वजह है कि कांग्रेस मध्य प्रदेश में बीएसपी को साथ लाने को बेताब थी. लेकिन मायावती यह स्पष्ट कर चुकी थीं कि वे अकेले मध्य प्रदेश में नहीं बल्कि सभी राज्यों में समझौता करेंगी. यानी कांग्रेस के मिशन 2018 को फिलहाल तो मायावती ने झटका दे ही दिया है.

अब बात करते हैं कांग्रेस के मिशन 2019 की. इसे मायावती कैसे बना या बिगाड़ सकती हैं यह भी जानना जरूरी है. वैसे तो राजनीति में न तो कोई पक्का दोस्त है और न ही कोई दुश्मन. इन पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में अगर कांग्रेस का प्रदर्शन बेहतर रहता है तो जाहिर है मायावती कांग्रेस से अपने रिश्तों पर दोबारा विचार कर सकती हैं. लेकिन अगर कांग्रेस की हालत पतली रहती है तो फिर मायावती उत्तर प्रदेश में कांग्रेस से पूरी तरह से किनारा कर सकती हैं. मायावती को कांग्रेस ने जिस तरह से नजरअंदाज किया है उससे समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव भी खफा हैं.

तो यूपी में मायावती का क्या रुख रहेगा? फिलहाल तो आसार यही लग रहे हैं कि राज्य में वे सीनियर पार्टनर रहना चाहती हैं. यानी वे सपा से ज्यादा सीटें लड़ना चाह रही हैं. ऐसे में राज्य की 80 सीटों पर बीएसपी-एसपी-कांग्रेस और आरएलडी के महागठबंधन के बीच सीटों के बंटवारे को लेकर कई तरह के फार्मूलों पर चर्चा होती आई है. जितने मुंह उतनी बातें. हालांकि एनडीटीवी युवा कार्यक्रम में आए अखिलेश यादव कह चुके हैं कि जरूरत पड़ी तो उनकी पार्टी दो कदम पीछे जाने को भी तैयार है. पर ऐसे में कांग्रेस की हालत क्या होगी? मायावती कांग्रेस को यह भी याद दिला रही हैं कि उसे किसी मुगालते में नहीं रहना चाहिए क्योंकि लोग उसके भ्रष्टाचार को भूले नहीं हैं.

इधर बीजेपी ने मायावती के इस फैसले को कांग्रेस के लिए झटका बताया है. पार्टी महासचिव राम माधव ने एक ट्वीट में कहा कि

महागठबंधन बन रहा है. पहले आप और अब बीएसपी ने भंडाफोड़ किया. मायावती कहती हैं कांग्रेस अहंकारी है. यह उनके लिए नई बात है. उन्होंने एमपी, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस से गठबंधन नहीं किया.
 


इसी बीच ये संकेत भी मिल रहे हैं कि मायावती एक अलग रणनीति पर काम कर रही हैं. यह एक स्वतंत्र रणनीति है जो अपनी पार्टी के देश भर में विस्तार की दिशा में सक्रिय है. मिसाल के तौर पर उन्होंने कर्नाटक में जनता दल सेक्यूलर के साथ समझौता किया तो हरियाणा में ओम प्रकाश चौटाला के इंडियन नेशनल लोकदल के साथ. छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी के साथ गठबंधन का ऐलान भी वे कर चुकी हैं. राज्यवार छोटी पार्टियों को साथ लेकर मिशन 2019 के लिए वे एक अलग तरह का सियासी दांव चलना चाह रही हैं. शायद उनकी रणनीति है कि बीएसपी कम से कम 50 लोकसभा सीटें जीते ताकि त्रिशंकु लोकसभा के हालात में कांग्रेस को झक मार कर उनका समर्थन करना पड़े. मायावती के लिए यह सही है कि कांग्रेस कमजोर ही रहे. वे उसे संभलने के लिए बैसाखियां नहीं देना चाहतीं. हो सकता है कि मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में फैसले के पीछे यही वजह हो.

(अखिलेश शर्मा NDTV इंडिया के राजनीतिक संपादक हैं)

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