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भारत की अर्थव्यवस्था में मंदी जैसे हालात क्यों?

नेता लोग नेहरू को अपराधी बताने में व्यस्त हैं, इसलिए डेढ़ लाख बैंकरों से कहा गया होगा कि कम से कम आप लोग अर्थव्यवस्था को लेकर कुछ व्यस्त रहें और आइडिया दें कि भारत की अर्थव्यवस्था को 5 ट्रिलियन का कैसे बनाया जा सकता है.

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भारत की अर्थव्यवस्था में मंदी जैसे हालात क्यों?

न्यूज़ चैनल देखने से लगता है कि सारा देश कश्मीर, आबादी और आरक्षण को लेकर व्यस्त है. हो सकता है कि सारा देश व्यस्त हो भी, लेकिन डेढ़ लाख बैंकर इन विषयों को लेकर व्यस्त नहीं हैं. बल्कि इस शनिवार और रविवार तो उन्हें टीवी देखने का भी मौका नहीं मिला होगा कि कश्मीर पर नया बयान क्या आया है. उन्हें यह भी पता नहीं होगा कि चर्चा में दूसरे एंगल से प्रवेश पाने के लिए शिवराज सिंह चौहान और साध्वी प्रज्ञा ने जवाहर लाल नेहरू को अपराधी कहा है. नेहरू को कुछ भी बोलकर आप चैनलों के स्क्रीन पर टिकर से लेकर टिक टैक तक जगह पा सकते हैं. चूंकि नेता लोग नेहरू को अपराधी बताने में व्यस्त हैं, इसलिए डेढ़ लाख बैंकरों से कहा गया होगा कि कम से कम आप लोग अर्थव्यवस्था को लेकर कुछ व्यस्त रहें और आइडिया दें कि भारत की अर्थव्यवस्था को 5 ट्रिलियन का कैसे बनाया जा सकता है.

अगले चुनाव में इनसे यह भी लिखवाया जा सकता है कि वे पांच सौ शब्दों में निबंध लिखें, यदि मैं प्रधानमंत्री होता और जिसका श्रेष्ठ निबंध हो उसकी उम्मीदवारी पर कम से कम चर्चा हो. पर ब्रांच मैनेजर आइडिया दे रहे हैं कि 5 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था कैसे बनेगी? अब इसे लेकर कुछ ग़ैर ज़रूरी सवाल नहीं पूछे जाने चाहिए. जैसे रिज़र्व बैंक, नीति आयोग, वित्त मंत्रालय, प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार वगैरह क्या कर रहे हैं. क्या उनके पास आइडिया नहीं है.


शनिवार और रविवार की छुट्टी के दिन अर्थव्यवस्था के बारे में सोचना बहुत बड़ी बात है. वैसे बैंकर शुक्रवार से ही सोचने लगे थे. नोटबंदी के बाद उनके योगदान को तो किसी ने याद नहीं रखा उम्मीद है इस योगदान को याद रखा जाएगा. डेढ़ लाख बैंकर शनिवार रविवार को इस बात को लेकर विचार विमर्श करते रहे कि 2024 तक भारत की अर्थव्यवस्था का आकार 5 ट्रिलियन कैसे होगा? बैंकों की अपनी हालत खराब है. अपनी संपत्तियां बेच रहे हैं. मैनेजरों को काफी तनाव में काम करना पड़ रहा है. इसी पर वे मिलकर आइडिया उत्पादन करते और खुद राहत पहुंचाते, लेकिन वो नहीं हुआ तो क्या हुआ, देश के लेवल पर यह चिन्तन समारोह बेकार नहीं गया. कई बैंकरों ने वाकई कुछ आइडिया दिया जो पहले से भी सभी को पता है कि किस तरह बैंकों से कर्ज़ राशि धारा प्रवाह प्रवाहित होती रही. मध्यम श्रेणी की कंपनियों का पंजीकरण होना चाहिए, उन्हें लोन देना चाहिए. जिन किसानों का लोन चुकाने में रिकॉर्ड अच्छा है उन्हें बेटी की शादी या घर खरीदने के लिए लोन देना चाहिए. ब्रांच लेवल पर मैनेजर को अच्छा माहौल दिया जाए. ट्रांसफर की पारदर्शी नीति हो. बड़े लोन वालो की जवाबदेही तय हो और दबाव में लोन न दिलवाएं जाएं.

वित्त मंत्रालय यह अभ्यास करवा रहा है. अभी यह महीना भर चलेगा. उम्मीद है इनसे आइडिया प्राप्त करने के बाद भारत 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यस्था की ओर प्रस्थान करेगा. बैंकर यह भी सोचते रह गए कि 2017 से जो सैलरी नहीं बढ़ी है उसका क्या होगा, लेकिन अभी उनका टारगेट देश के लेवल पर हो गया है.

भारत की अर्थव्यवस्था मंदी से गुज़र रही है. विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार बड़ी अर्थव्यवस्था के मामले में भारत की रैकिंग सातवें नंबर पर आ गई है. भारत की जीडीपी का आकार इस वक्त 2.7 ट्रिलियन डॉलर है. 2024 तक भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर की इकॉनमी का लक्ष्य है. आप अगस्त महीने के बिजनेस अखबारों की खबरों को देखिए. हम कुछ खबरों का सैंपल आपको दिखाना चाहते हैं. अगली तिमाही में ऑटो इंडस्ट्री से 5 लाख लोगों की नौकरियां जा सकती हैं. 400 करोड़ से कम टर्नओवर वाली कंपनियों की हालत बहुत ख़राब है. सेल्समैन, पेंटिंग, वेल्डिंग, कास्टिंग, टाइप की नौकरियां जल्दी जाएंगी. पहले ही 2 से 3 लाख नौकरियां इस सेक्टर में जा चुकी हैं. हर बड़ी कंपनी में कम से कम 10 प्रतिशत की छंटनी हो रही है. ये 19 अगस्त की खबर है.

केयर रेटिंग का कहना है भारत में आर्थिक सुस्ती के कारण नई नौकरियां भी धीमी पड़नी वाली हैं. ब्लूमबर्ग के अनिर्बन नाग की रिपोर्ट है. बैंक, बीमा, ऑटो और लॉजिस्टिक और इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र की कंपनियां भर्ती कम करेंगी. केयर रेटिंग का यह अध्ययन 1000 कंपनियों के सर्वे पर आधारित है. यह 19 अगस्त की रिपोर्ट है. महिंद्रा के प्रबंध निदेशक की आशंका, बहुत से कार डीलर कंगाल हो सकते हैं. फाइनेंनशियल एक्सप्रेस के प्रितिश राज की रिपोर्ट है. महिंद्रा एंड महिंद्रा के एमडी पवन गोयनका का कहना है कि अगर त्योहारों में ऑटो सेक्टर में बदलाव नहीं आया तो डीलर और सप्लायर दीवालिया होने लगेंगे. 12 महीने से ऑटो सेक्टर में मंदी चल रही है. एक साल में 300 डीलर ने अपनी दुकान बंद कर दी है. 2 लाख लोगों की नौकरी गई है. ये भी 19 अगस्त की खबर है.

रोड डेवलपर्स भी आर्थिक मंदी से परेशान, पैसे की कमी का संकट. मिंट की वत्सला कामत की रिपोर्ट है. इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों का प्रदर्शन जून में खत्म हुई पहली तिमाही में निराशाजनक रहा है. इनके शेयरों के दाम भी अप्रैल के बाद से 25 प्रतिशत कम हो गए हैं. मुनाफा भी घटने लगा है. ब्याज़ बढ़ने लगा है. टोल पर कलेक्शन कम होने लगा है, जिससे इनकी चिन्ता बढ़ गई है. वत्सला ने लिखा है कि अशोका बिल्डकॉन के ज्यादातर प्रोजेक्ट में ट्रैफिक कम हो गया है यानी लोग कम चल रहे हैं और टोल कम दे रहे हैं. इस रिपोर्ट में है कि प्रोजेक्ट की मंज़ूरी के बाद भी काम शुरू नहीं हो पा रहा है. नेशनल हाईवेज़ अथॉरिटी ऑफ इंडिया की देनदारी पांच साल में सबसे अधिक है. कर्ज़ का लोड बढ़ गया है.
यह भी 19 अगस्त की रिपोर्ट है.

L&T चेयरमैन का बयान- मेक इन इंडिया से नौकरियां पैदा नहीं हो पा रही हैं. लाइव मिंट की तान्या थॉमस और देबोश्री चाकी की रिपोर्ट है. L&T चेयरमैन एएम नायक का बयान है कि भारत में हर साल दस लाख नौजवान नौकरियों के मार्केट में प्रवेश करते हैं. सरकार की मेक इन इडिया पर्याप्त नौकरियां पैदा करने में असफल रही है, क्योंकि ज़्यादातर सेक्टरों में कंपनियों ने आयात करना पसंद करती हैं. स्थानीय स्तर पर निर्माण नहीं कर रही हैं. हम नौकरियों का निर्यात कर रहे हैं. चीज़ों का निर्यात नहीं कर रहे हैं. हमें इसका जवाब खोजना होगा कि क्यों भारतीय कंपनियां ऐसा कर रही हैं. भारतीय कंपनियों के पास पैसे की भारी कमी हो गई है. उनके पास विकल्प बहुत कम हो गए हैं. इसी रिपोर्ट में यह आंकड़ा है कि नेशनल स्कील डेवलपमेंट सेंटर के तहत करीब 40 लाख लोगों को अलग-अलग काम में ट्रेनिंग दी गई, लेकिन मात्र 12 प्रतिशत को ही काम मिला. यानि 40 लाख में से मात्र पांच लाख को भी काम नहीं मिला. रिपोर्ट में कहा गया है कि यह सरकार का ही दावा है. यह भी 19 अगस्त की रिपोर्ट है.

महिंद्रा एंड महिंद्रा ने मंदी का सामना करने के लिए नए निवेश पर रोक लगाई. लाइव मिंट में अमित पांडे की खबर है कि महिंद्रा एंड महिंद्रा अपने निवेश में 15 से 20 प्रतिशत की कटौती करने जा रहा है. कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर पवन गोयनका का कहना है कि कुछ अस्थायी नौकरियां भी जा सकती हैं. उन्होंने कहा कि नौकरियों का जाना ज़्यादा चिंताजनक है. ऑटोमोटिव कंपोनेंट मैन्यूफैक्चर्स एसोसिएशन की महानिदेशक विनी मेहता ने बयान दिया है कि दस लाख नौकरियां जा सकती हैं अगर यही ट्रेंड रहा तो.

नई नौकरियां बंद सी होने लगी हैं. सबसे ज्यादा मार ठेके पर काम करने वाले लोगों पर पड़ी है, इसलिए उनकी आवाज़ आपको टीवी में सुनाई नहीं देती है. टेक्सटाइल सेक्टर की भी हालत खराब है. 2016 में जब 6000 का पैकेज दिया गया तब दावा किया गया था कि तीन साल में 1 करोड़ नौकरियां पैदा होंगी. हुईं, क्या कोई मंत्री इस पर बात करता है, क्या आपने टीवी पर सुना है, नहीं सुना है. बांग्लादेश और श्रीलंका इस सेक्टर में आगे निकलते जा रहे हैं. यह सेक्टर भी सरकार की तरफ देख रहा है. भारत से कॉटन यार्न का निर्यात अप्रैल से जून 2019 के बीच 33 प्रतिशत घट गया है. अगर संकट जारी रहा तो इस सेक्टर से भी नौकरियां जाने लगेंगी. रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने कहा है कि आर्थिक सुस्ती काफी चिंताजनक है. सरकार को जल्दी ही पावर और ग़ैर बैंकिंग वित्तीय सेक्टर को ठीक करना होगा और निवेश के लिए नए सुधार करने होंगे.

हिन्दू बिजनेस लाइन की रिसर्च टीम के अनुसार 2019 में भारत का शेयर बाज़ार का प्रदर्शन सबसे ख़राब रहा है. इस वित्त वर्ष की पहली तिमाही में कॉरपोरेट के मुनाफे में गिरावट आई है. ऑटो सेक्टर में 3 लाख लोगों की नौकरी चली गई है. आने वाले दिनों में दस लाख तक नौकरियां चली जाएंगी. अब टेक्सटाइल सेक्टर से तो भारत भर में 25 लाख लोगों की नौकरी जाने की ख़बर आ रही है. यह जानकारी फरीदाबाद टेक्सटाइल एसोसिएशन के अध्यक्ष अनिल जैन ने सुशील महापात्रा को फोन पर दी. अनिल जैन ने बताया कि पानीपत, फरीदाबाद गाजियाबाद के टेक्सटाइल सेक्टर में ही एक लाख से अधिक लोगों की नौकरी चली गई है. दिल्ली के आस पास 20 लाख लोग टेक्सटाइल सेक्टर से जुड़े हैं. 
अनिल जैन ने बताया कि टेक्सटाइल सेक्टर में 30 से 35 प्रतिशत की बिक्री घट गई है. जीसएटी के कारण मंदी थी लेकिन अब मांग भी काफी घट गई है. बांग्लादेश से आने वाला कपड़ा सस्ता पड़ रहा है. उत्पादन लागत अधिक होने के कारण भारत का निर्यात घट रहा है. 10 करोड़ लोग टेक्सटाइल में सीधे और परोक्ष रुप से जुड़े हैं. अनिल जैन ने यह भी बताया कि पहले धागा बनाने की फैक्ट्री कभी बंद नहीं होती थी, मगर अब हफ्ते में एक या दो दिनों के लिए बंद होने लगी है. हमारे सहयोगी सुशील महापात्रा फरीदाबाद और पलवल की तीन टेक्सटाइल फैक्ट्री में गए. एक बंद हो गई है और दो में मंदी का असर दिख रहा है. सुशील जहां भी गए सभी ने कहा कि जब से उन्हें पीएनजी यानि नेचुरल गैस खरीदने के लिए मजबूर किया गया है उत्पादन लागत काफी बढ़ गई है. जिसके कारण वे न तो निर्यात कर पा रहे हैं और न ही घरेलू बाज़ार के लिए उत्पादन कर पा रहे हैं.

मंदी की हालत ऐसी है कि 2018 में यह फैक्ट्री बनी थी अब इसके संस्थापक को लगता है कि कहीं बंद करने की नौबत न आ जाए. यह फैक्ट्री दिल्ली से सटे पलवाल के धतीर में है. यहां पर ऐसी कई फैक्ट्रियां हैं जो टेक्सटाइल से जुड़े अलग-अलग काम करते हैं. पिछले छह सात महीने से ऑर्डर कम होने लगे हैं. यहां पर सादे रंग के कपड़ों पर अलग अलग रंगों की छपाई हो रही है फिर उसे निर्यात के लिए भेजा जाता है. कमाई घटने से सैलरी देना मुश्किल हो गया है. यहां पर 200 से 300 वर्कर काम करते हैं. इस फैक्ट्री में जीन्स की धुलाई और रंगाई होती है. कुछ महीने पहले दस से बारह हज़ार जीन्स की धुलाई होती थी, लेकिन मार्च के बाद से गिरावट आने लगी. अब यहां पांच सात हज़ार जीन्स की ही धुलाई हो रही है. यहां पर दो सौ से ढाई सौ मज़दूर काम करते थे. ऑर्डर में कमी होने के कारण 15 से 20 प्रतिशत मज़दूर कम कर दिए हैं. 250 मज़दूरों की जगह अब 100 से 150 ही रह गए हैं.

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हम इस आर्थिक हालात से गुज़र रहे हैं. राष्ट्रीय बहसों में काल्पनिक सवालों को वास्तविक किया जा रहा है. जिन लाखों लोगों की नौकरी गई है, जिनकी जानी है और जिन्हें नई नौकरी नहीं मिल रही है, उनके सवाल कहीं नहीं हैं. शायद उनका ट्विटर पर अकाउंट नहीं है. सरकारी समाचारों में जम्मू-कश्मीर में आज लैंड लाइन सेवा चालू कर दी गई. उम्मीद है लोगों का आपसी संपर्क होने लगा होगा. वैसे भी मोबाइल फोन के ज़माने में लैंडलाइन कहां सबके पास होता होगा फिर भी कुछ काम तो चलेगा. सरकारी दफ्तरों के फोन चालू हो गए होंगे. हिन्दुस्तान टाइम्स ने पीटीआई के हवाले से लिखा है कि 17 टेलिफोन एक्सचेंज चालू कर दिए गए हैं. इससे 50,000 लैंडलाइन ऑपरेशनल हो गए हैं. मोबाइल फोन बंद है. एक करोड़ से अधिक की आबादी में 50,000 लैंडलाइन ऑपरेशनल हुए हैं. डीआईजी सेंट्रल कश्मीर ने बताया कि कुछ इलाकों में पत्थरबाज़ी की घटना देखी गई मगर नियंत्रण पा लिया गया. स्थिति धीरे-धीरे सामान्य हो रही है. घाटी में कानून-व्यवस्था की कोई बड़ी घटना नहीं हुई है. जम्मू-कश्मीर के जनसंपर्क विभाग की निदेशक सैय्यद शेहरिश असगर ने कहा है कि आज घाटी में कानून और व्यवस्था को लेकर कोई बड़ी घटना नहीं हुई है. जीवन धीरे-धीरे सामान्य हो रहा है. लोग सहयोग कर रहे हैं. 19 अगस्त को श्रीनगर में 190 स्कूल खोले गए.

संकेत उपाध्याय ने मात्र 4 स्कूलो में जाकर देखा कि क्या हालात हैं. स्कूल शिक्षा के निदेशक मोहम्मद यूनुस मलिक ने श्रीनगर और घाटी के अन्य ज़िलों का ब्यौरा दिया है जिनसे पता चलता है कि पहला दिन संतोषजनक भी नहीं रहा. स्कूल शिक्षा के निदेशक ने बताया कि श्रीनगर में 500 स्कूल हैं. उम्मीद थी कि 190 स्कूल खोले जाएंगे मगर 72 में ही उपस्थिति दर्ज की गई. उनमें भी बहुत कम उपस्थिति थी. 30-35 प्रतिशत स्टाफ की उपस्थिति रही. पुलवामा में कुछ क्षेत्रों के स्कूल में स्टाफ था. कुछ ही स्कूल खुले और कम संख्यां में छात्र नज़र आए. सोपियां में दस से बारह स्कूल खोले गए जहां कोई बच्चा नहीं आया. दीयतपुरा में स्कूल खुले, लेकिन कोई बच्चा नहीं आया. सिर्फ स्टाफ आए.अनंतनाग में कुल 1100 स्कूल हैं. जिनमें से 89 स्कूलों के खोलने के आदेश दिए गए. इनमें कुल 126 टीचर आए और 39 बच्चे. बारामूला में 671 स्कूलों में 322 स्कूलों के खुलने का आदेश दिया गया, जिनमें सिर्फ 40 प्रतिशत स्टाफ आया और बच्चे आए मात्र 20 फीसदी. कुपवाड़ा में 137 स्कूलों को खोला जाना था, इसमें 30 से 40 प्रतिशत स्टाफ आए और करीब 1000 बच्चे आए. पीटीआई के अनुसार श्रीनगर के बेमिना इलाके में पुलिस पब्लिक स्कूल और कुछ केंद्रीय विद्यालय खुले मगर छात्रों की उपस्थिति बहुत कम रही. कई जगहों पर शिक्षक तो आए, लेकिन छात्र नहीं आए. जहां आए वहां भी संख्या कम रही. मशहूर संगीतकार ख्यायम का निधन 



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